‘केसरी’ का महत्व अक्षय कुमार की पगड़ी का रंग नहीं, बल्कि सारागढ़ी की याद दिलाना है

जब कोई सैनिक, कोई योद्धा 'लास्ट स्टैंड' लेता है, तो वह इस एक कदम से नैतिक-अनैतिक, सही-गलत से ऊपर उठ जाता है। वह किसके लिए लड़ रहा है, किस विचारधारा का है, या कोई विचारधारा है भी या नहीं- यह सब बातें उसके निर्णय के साहस के आगे गौण हो जाती हैं।

इतिहास के दो हिस्से होते हैं- भाषा और नैरेटिव तथा रूखे-सूखे तथ्य। दोनों की ही अपनी-अपनी भूमिकाएँ और महत्ताएँ हैं। लेकिन जब इतिहास किताबों और शोध-पत्रों के पन्नों से निकल कर ‘पॉपुलर कल्चर’ का हिस्सा बनना चाहता है, फिल्मों का, वो भी ‘आर्ट’ नहीं, बल्कि सौ-करोड़ी फिल्मों का विषय बनना चाहता है, तो कथानक यानी नैरेटिव का पलड़ा ज़ाहिर तौर पर भारी हो जाता है और तथ्यों की ‘technicality’ के साथ 19-20 हो ही जाता है।

लेकिन इससे न इतिहास बदलता है और न ही इतिहास पर बनी मसाला फिल्मों की महत्ता खत्म हो जाती है। वह ज़रूरी इसलिए नहीं होतीं क्योंकि उनसे ही इतिहास सीखना-पढ़ना है। यह काम नॉन-फ़िक्शन मीडिया, किताबों और ब्लॉगों, शोध-पत्रों का ही रहेगा। इन फिल्मों का काम इतिहास पढ़ाना नहीं, किसी विषय के प्रति जागरुकता पैदा करना है, उस विषय को समाज की चेतना में, उसके अंतस में लाना है। सारागढ़ी की लड़ाई के लिए ‘केसरी’ फिल्म यह काम बखूबी करती है।

आज यानी 12 सितम्बर को सारागढ़ी की बरसी है। 122 साल पहले इसी दिन 21 सिख सैनिकों और उनके खानसामे ‘दाद’ ने हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्व में 10,000 के करीब की पठान सेना को सारागढ़ी का किला जीतने से 6 घंटे के करीब रोककर रखा और आखिरी दम, आखिरी गोली, आखिरी जवान तक लड़ते रहे। उनमें सबसे कम उम्र के गुरमुख सिंह ने अपने साथियों के वीरगति को प्राप्त होने के बाद भी लड़ना जारी रखा। उन्होंने 20 के करीब पठान सैनिकों को मीनार से छिप-छिप कर मार गिराया। अंत में पठानों को उसे मारने के लिए पूरी मीनार ही जला देनी पड़ी। असैनिक ‘दाद’ ने भी जब मौत सामने देखी तो गिड़गिड़ाते हुए, जान की भीख माँगते हुए जिबह होने की बजाय लड़ना उचित समझा और 5-6 पठानों को ले बीता।

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सैन्य इतिहास में इसे ‘लास्ट स्टैंड’ कहते हैं- जब जंग में गुत्थमगुत्था हुए पड़े, या होने जा रहे, दो धड़ों में से एक को यह आभास हो जाए कि उसकी जीत तो किसी भी तरह नहीं हो सकती और उस धड़े के सैनिक तय करें कि जान की भीख माँगने, जान बचाकर भागने, या कैदी/गुलाम को मिलने वाली ज़िल्लत और यातना की मौत से बेहतर लड़ते हुए मरना है; और वे इसी मौत को गले लगाने समर में कूद पड़ते हैं।

जब कोई सैनिक, कोई योद्धा ‘लास्ट स्टैंड’ लेता है, तो वह इस एक कदम से नैतिक-अनैतिक, सही-गलत से ऊपर उठ जाता है। वह किसके लिए लड़ रहा है, किस विचारधारा का है, या कोई विचारधारा है भी या नहीं- यह सब बातें उसके निर्णय के साहस के आगे गौण हो जाती हैं। इसलिए ब्रिटिश सरकार के किले की रक्षा में पठान विद्रोहियों से लड़ने वाले सारागढ़ी के सिख, महाभारत में रथ का पहिया उठाकर सात महारथियों पर पिल पड़ने वाला अभिमन्यु, लाखों फ़ारसियों से लड़ने वाले मुट्ठी-भर ग्रीक सैनिक हों, वे सभी हर राजनीति और विचारधारा के परे सम्मान के हकदार होते हैं- इसलिए कि वे कुछ ऐसा करने का साहस/दुस्साहस रखते थे, जिसका दम हर किसी में नहीं होता।

तो केसरी पर चुप क्यों रहे हम 70 साल?

इतनी लम्बी-चौड़ी भूमिका का मकसद यही सवाल पूछना है- कि जब अभिमन्यु से लेकर राजा लियोनाइडस तक के बारे में हम जानते हैं, उनकी कहानियाँ पढ़ते और सुनते हैं, तो आखिर हमने कभी हवलदार ईशर सिंह, खानसामे ‘दाद’ या सैनिक चाँद सिंह के बारे में क्यों नहीं सुना? और आज जब कोई सुना रहा है, भले ही उसका मकसद राष्ट्रवाद और सेना-समर्थक वर्तमान जनभावना का फायदा उठाकर पैसा पीटना ही क्यों न हो, तो कहानी सुनाए जाने पर ही सवाल क्यों उठाया जा रहा है।

आप गूगल पर ‘kesri saragarhi battle’ लिख कर सर्च करिए। अधिकाँश वेबसाइटों पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से नाराज़गी ही मिलेगी, कि आखिर सारागढ़ी की कहानी सुनाई ही क्यों जा रही है। जहाँ तक ऐतिहासिक सत्यता को लेकर आपत्तियाँ हैं, मैं उनसे सहमत तो नहीं हूँ, लेकिन उन्हें गलत भी नहीं मानता। सहमत इसलिए नहीं हूँ क्योंकि मेरे हिसाब से यह बेवजह की नुक्ताचीनी है- पॉपुलर सिनेमा का काम केवल यह बताना है कि भाई, सारागढ़ी जैसी लड़ाई भी हुई थी, जाओ, पढ़ो, जानो; उसके आगे वे जितना सटीक हो जाएँ, अच्छी बात। लेकिन न हों तो उसी को लेकर बवाल काटने को मैं सही नहीं मानता।

लेकिन असली दिक्कत उन चुनिंदा तथ्यात्मक आलोचनाओं से नहीं है- वह तो अपने-अपने पसंद की बात है, कि किसी को ईशर सिंह की तथ्यात्मक रूप से सही खाकी पगड़ी पसंद हो सकती है, मुझे अक्षय कुमार की केसरी पग का भाव अधिक पसंद आया। असली दिक्कत उनसे है, जिन्हें इस फिल्म के बनाए जाने से ही दिक्कत है, क्योंकि इस फिल्म में हमलावर मुसलमान हैं और उनके हिसाब से इस्लामी इतिहास में जो कुछ स्याह-सा दिखे, उसे या तो दबा दो, या उस पर सफेद प्लास्टर से रंग-रोगन कर दो।

मैं यहाँ तक भी सहमत हूँ कि अगर सारागढ़ी की लड़ाई का आह्वान करने वाले मुल्ला ने किसी लड़की का सिर कलम नहीं किया था, तो नहीं दिखाया जाना चाहिए था। लेकिन इसके बहाने यह नैरेटिव चलाने की कोशिश करना गलत है कि बॉलीवुड को ऐसे विषयों के प्रति अतिरिक्त ‘संवेदनशील’ होना चाहिए, जिनमें कोई मुसलमान नकारात्मक भूमिका में हो। मेरी सबसे ज़्यादा आपत्ति उन लोगों के मुँह खोलने से है, जो दबी-ज़बान यह पूछ रहे थे कि आखिर भगवा रंग के महिमामंडन की, मुसलमानों की गैर-मुसलमानों से लड़ाई में गैर-मुसलमानों की वीरता की, (“भाजपा और राष्ट्रवादियों को फायदा पहुँचाने वाली”) फ़िल्में बनाए जाने की ज़रूरत ही क्या है।

लाख गलतियों के बाद भी खुद में गलत नहीं है फिल्म ‘केसरी’

केसरी नामक फिल्म में लाख गलतियाँ हो सकतीं हैं, लेकिन खुद में फिल्म गलत नहीं है। इसका प्रभाव गलत नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि इसने केवल राष्ट्रवादियों के ‘पक्ष में’ गलतियाँ की हैं। इसमें सैनिकों को मस्जिद बनाते हुए दिखाया गया है, जबकि उस समय ऐसा कुछ नहीं हुआ था। लेकिन किसी सिख को या हिन्दू को मैंने इस पर तो बात का बतंगड़ बनाते नहीं देखा! इसमें अंतिम सैनिक गुरुमुख सिंह की बीस पठान सैनिकों को गोली मारने के बाद खुद जलकर मर जाने की बहादुरी को एक कबायली नेता को पकड़ कर आत्मघाती ‘बम’ धमाका करने के उस कालखण्ड में असम्भव कारनामे से बदल दिया गया है।

हो सकता है सारागढ़ी पर हमला करने वाले पठान उतने बर्बर और जिहादी न हों जितना फिल्म में दिखाया गया है। हो सकता है वे सच में अंग्रेज़ों से अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे हों और सारागढ़ी के वे 21 सिख उनके रास्ते में खड़े हों। ऐसा भी हो सकता है कि वे सैनिक कंपनी बहादुर के लिए ही मरे हों, न कि किसी अंग्रेज़ को हिंदुस्तान की ताकत दिखाने के लिए, जैसा कि इस फिल्म में दिखाया गया है। मैं इतिहास का विशेषज्ञ नहीं हूँ, और इसलिए ऐसे विषय पर अंतिम फैसला नहीं दे सकता।

लेकिन पठान सही थे या सिख, यह फैसला करना न केसरी फिल्म का मकसद है, न इतिहास के सारागढ़ी पन्ने का मूल। मूल यह है कि चाहे वे सिख सैनिक अंग्रेज़ों के गुलाम सिपाही बनकर लड़ें हों, या आज़ाद सिख, चाहे उन पर हमला करने वाले पठान आज़ादी के परवाने हों, या जिहादी हमलावर, उन 22 वीरों का वह ‘लास्ट स्टैंड’ इन सब बातों से ऊपर था, इसके परे था- और इसके बारे में हमें पता होना चाहिए था।

अपने पूर्वजों के इस कारनामे के बारे में जानना हमारा हक था, जो हमें 70 साल तक राजनीतिक इशारों पर इतिहास की किताबें लिखने वालों, इतिहास का सिलेबस तय करने वालों के चलते नहीं मिला। आज जब अक्षय कुमार और अनुराग सिंह ने वह हक़ किसी न किसी कारण और माध्यम से दिया है, तो देने पर ही आपत्ति जताने वालों को पहले अपने राजनीतिक और बौद्धिक पूर्वजों के ‘उत्तराधिकारी’ के तौर पर उत्तर देना चाहिए कि 70 साल में ऐसा क्यों नहीं हो पाया? उसके बाद इस पर बहस होगी कि अक्षय कुमार को केसरिया पगड़ी पहननी चाहिए थी कि नहीं।

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