Tuesday, April 13, 2021
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लव जिहाद और वामपंथी नैरेटिव: हिंदू नारीवादी विमर्शों से ही खतरे का मुकाबला संभव

हिंदू महिलाओं को आगे आकर फेमेनिज्म के नए विमर्श को अपने कँधे पर उठाना पड़ेगा। नहीं तो प्रिया चौधरी, हिना तलरेजा, निमिषा, प्रज्ञा देवनाथ जैसी लड़कियाँ सेक्स स्लेव, हत्या, बलात्कार और अवसाद का शिकार हो कर दम तोड़ती रहेंगी।

मेरठ में माँ-बेटी के ह्रदय विहीन क़त्ल ने एक बार फिर भारत में लव जिहाद के विमर्श को हवा दी है। 30 वर्षीय शादीशुदा युवक शमशाद ने अपना नाम छुपा कर पहले तो तलाकशुदा प्रिया चौधरी को प्रेम जाल में फँसाया और बाद में उसके नमाज पढ़ने में आनाकानी करने के कारण हत्या कर दी।

वीभत्स बात तो यह है कि इस पूरे घटनाक्रम की गवाह पीड़िता की पाँच साल की छोटी बेटी को भी उसकी माँ के साथ ही मोहम्मद शमशाद ने मार कर घर में दफ़न कर दिया।

दूसरी घटना पश्चिम बंगाल के हुगली जिले की है, जब गीता देवनाथ को अख़बारों के हवाले से सूचना हुई कि वर्ष 2016 में घर से जरूरी काम से बाहर गई बेटी प्रज्ञा देवनाथ (नया नाम आयशा जन्नत माहुना) बांग्लादेश के सबसे खतरनाक इस्लामिक आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन (JMB) में जा कर शामिल हो गई है और बांग्लादेशी एजेंसियों की गिरफ्त में आने से पहले तक वह जमात के नारी वाहिनी में काम कर रही थी।

क्या है लव जिहाद ?

मेरी नज़र में “लव जिहाद ऐसा मजहबी कृत्य है जिसमें दूसरे समुदाय वाले अपनी पहचान छुपा कर हिंदू या इसाई लड़कियों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं या करने का प्रयास करते हैं। ऐसे मामलों में आरोपित की पहचान उजागर होने के बाद हिंदू या ईसाई लड़कियों को धोखे का एहसास होता है और वह इस विषय को खुद/धार्मिक संगठन या परिवारवालों की मदद से उजागर करने का प्रयास करती हैं।”

इस विषय की पहली व्याख्या वर्ष 2009 में दुनिया के महान राजनैतिक-धार्मिक विश्लेषक स्टीफन ब्राउन ने की थी l वो लव जिहाद की व्याख्या करते हुए लिखते हैं, “The love jihad’s modus operandi involves a heartless strategy of luring vulnerable girls and young women to convert to Islam by feigned love and promises of marriage. But instead of marital bliss, the girls unwittingly trapped in its deceitful web usually wind up in the hands of Muslim fundamentalist organizations.”

उनका कहना है कि लव जिहाद उन्मादी मजहबी लक्ष्य से प्रेरित एक ऐसा कृत्य है, जिसमें गैर इस्लामिक लड़कियों का धर्म परिवर्तन के लिए युवक धोखा और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं।

लव जिहाद का सबसे खतरनाक पहलू तब सामने आता है जब हिंदू या इसाई लड़की को यह पता चलता है कि हिंदू नाम का लड़का वास्तव में समुदाय विशेष से है और उसका लक्ष्य मोहब्बत नहीं बल्कि इस्लाम में धर्म परिवर्तन है। देश में ऐसे कई मामले हैं जहाँ ऐसी कई लड़कियों का सिर्फ इसलिए बेरहमी से क़त्ल कर दिया गया, क्यूँकि उसने इस्लाम मानने से मना कर दिया। ऐसे कई मामलों में एक हिना तलरेजा का मामला भी है।

हिना तलरेजा एक हाई प्रोफाइल लड़की थी। उसकी हुक्का बार में अदनान खान नाम के एक लड़के से दोस्ती हुई। वर्ष 2017 के जुलाई महीने में अदनान खान ने अपने दो दोस्तों के साथ हिना तलरेजा का बलात्कार किया और फिर उसके माथे पर गोली मारकर हत्या करने के बाद फरार हो गया।

अभी जनवरी माह में केरल के सबसे बड़े कैथेलिक चर्च समूह सायरो-मालाबार ने अपनी गंभीर छानबीन के बाद यह पाया कि केरल लव जिहाद से बुरी तरह ग्रसित है। इस डरावने विषय पर उनका यह मानना था कि गैर इस्लामिक धर्म की लड़कियों का इस्लाम में परिवर्तन ना सिर्फ भारत के सेक्युलर ढाँचे के लिए खतरा है, बल्कि इससे सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित हो रहा है।

केरल के लव जिहाद का मॉडल इतना खतरनाक है कि इसमें ना सिर्फ उन्मादी लोग अपनी पहचान छुपा कर हिंदू और ईसाइयों का धर्म परिवर्तन करते हैं, बल्कि उन्हें इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों को आउटसोर्सिंग भी करते हैं। यानी हिंदू और ईसाई, लड़कियों का लव जिहाद के नाम पर इस्लामिक संगठनों के वजूद के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।

निमिषा (केरल) और प्रज्ञा देवनाथ (धानीखाली, हुगली जिल्ला, पश्चिम बंगाल) इसके कई उदाहरणों में से एक उदहारण हैं।

सबसे बड़ा प्रश्न

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि भले ही वामपंथी झुकाव वाले मीडिया और अकादमिक संस्थान इस मुद्दे को नकारते रहते हैं या फिर कुछ अपवाद जैसे अखिला अशोकन (केरल) के मुद्दे से वास्तविक लव जिहाद के मुद्दों को सामाजिक सौहार्द्र और गंगा-जमुनी तहजीब का हवाला देने लग जाते हैं, लेकिन समय-समय पर लव जिहाद के नाम पर उत्पीड़न के मामले, हत्या, धोखा और बलात्कार की मीडिया रिपोर्टिंग किस बात की गवाही देती है?

अब तक इस देश में लव जिहाद की लाखों घटनाएँ हो चुकी हैं और ऐसी लाखों घटनाएँ समाज में हो रही होंगी, लेकिन स्त्री अस्मिता से जुड़ा यह मुद्दा होने के बावजूद ऐसे मामले भारत की नारीवादियों के विमर्श से गायब क्यूँ हैं, जबकि लव जिहाद तो पुरुषों के मजहबी सत्ता की पराकाष्ठा है। इस कृत्य में ना सिर्फ उन्मादी पुरुष अपनी पहचान छुपा कर हिंदू और इसाई लड़कियों के साथ मानसिक, शारीरिक और सामाजिक सम्बन्ध बनाते हैं, बल्कि इन तीन तरह के समबन्धों का दुरुपयोग भी करते हैं। साथ-साथ मजहब का पटाक्षेप होने पर उन्मादी युवक उनकी हत्या, दोस्तों संग बलात्कार और सामाजिक छवि को बर्बाद भी करते हैं।

क्या यह सोचने की बात नहीं है कि लव जिहाद भारत में एक सामान्यीकृत उपलब्ध सामाजिक बुराई का स्वरुप ले चुका है। फलस्वरूप आज यह ना सिर्फ धार्मिक रूप से सहिष्णु हिन्दुओं के अस्तित्व पर संकट की स्थिति पैदा कर दी है, बल्कि इसने स्त्रियों की मर्यादा पर भी एक प्रश्न चिह्न खड़ा किया है। लेकिन सबसे दुखद बात यह है कि इतना कुछ होने के बावजूद भी अब तक यह भारतीय नारीवादी विमर्शों का विषय नहीं पाया बन पाया है।

आज भारतीय नारीवादियों को 19वीं शताब्दी के गड़े मुर्दों पर विमर्श का मौका मिल जाता है। सती प्रथा, बाल विवाह पर आत्ममुग्ध करने वाले विषयों पर सेमिनारों में जीभ नचा-नचा कर बोलने का मौका मिल जाता है। लेकिन इन कॉपी-पेस्ट और पेलेग्रजिम नारीवादी चिंतकों को लव जिहाद में स्त्री विमर्श पर बोलने का मौका कभी नहीं मिलता है।

भारतीय फेमिनिस्ट के इस अनदेखेपन से क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भारत का स्त्री विमर्श वामपंथी है? या फिर भारत के नारीवादी विमर्शों को पिंजड तोड़ जैसे समूहों ने कब्ज़ा कर लिया है जो कि शाहीन बाग़ में अराजकता फ़ैलाने के विमर्शों में व्यस्त हो गए हैं? क्या भारत के फिमेनिस्ट खुद को हिंदू धार्मिक मान्यताओं की ऐसी आत्ममुग्ध आलोचनाओं में व्यस्त रखना चाहती हैं जो कि अब या तो मिथकों का हिस्सा हो गया है या फिर यूरोपीय और अमेरिकी संस्थानों से फेमिनिस्ट स्टडी के नाम पर मिलने वाले भरी-भरकम रकम प्राप्त करने का खिलौना बन कर रह गया है?

उपरोक्त प्रश्नों का समाधान क्या है?

वस्तुतः फेमिनिज्म डिबेट पुरुषों के द्वारा अस्तित्व में लाया गया विमर्श है। पुरुष प्रधान देशों में स्त्रियों के हक की बात मुख्यत: लिबरल पुरुष ही उठाते रहे हैं। हालाँकि फेमिनिज्म का विमर्श पुरुषों ने उठाया जरूर, लेकिन इसकी व्यापक स्थापना में स्त्रियों का अमूल्य योगदान रहा है। भारत के लव जिहाद के मामले को भी मुख्यत: हिंदू पुरुष ही उठाते हैं।

केरल में भी लव जिहाद के खिलाफ आवाज ईसाई पुरुष पादरियों ने ही उठाया है। लेकिन हिंदू स्त्री या ईसाई स्त्रियों के मजहबी उत्पीड़न की बात क्या सिर्फ पुरुष ही उठाते रहेंगे? हिंदू स्त्री, लव जिहाद के नाम पर अपने मानवीय अधिकार के नाम पर कब जागरूक होंगी?

इसलिए आज जबकि भारत का नारीवाद भटका हुआ रेडिकल वामपंथी है, इस स्थिति में आज हिंदू फेमिनिज्म (Hindu feminism) विमर्श की सख्त आवयशकता है। हिंदू महिलाएँ जो लेफ्ट की शिकार हैं, उन्होंने लव जिहाद से पीड़ित लाखों हिंदू और ईसाई महिलाओं की पीड़ा समझने और उसे डिबेट में लाने में अक्षम हैं।

यह नॉलेज गैप सिर्फ हिंदू फेमिनिज्म के नए विमर्शों से ही भर पाएगा। हिंदू और ईसाई महिलाओं को आगे आकर फेमेनिज्म के इस नए विमर्श को अपने कँधे पर उठाना पड़ेगा। नहीं तो प्रिया चौधरी, हिना तलरेजा, निमिषा, प्रज्ञा देवनाथ सहित अन्य लाखों लड़कियाँ सेक्स स्लेव, हत्या, बलात्कार और अवसाद का शिकार हो कर दम तोड़ती रहेंगी। परिणामस्वरूप भारत का समाज अपना मूल स्वरुप खोकर इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगा।

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