Monday, May 25, 2020
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7 दिन में गोरी, 15 दिनों में छरहरी: क्रीम बेचने वालों पर लगाम जरूरी और खुद की मानसिकता पर भी!

सुंदरता के लोभ में आज हमारा समाज उस बीमार मानसिकता का अनुयायी हो गया है, जिस पर यदि थूक भी दिया जाए, तो वे इसे अपमान नहीं समझेगा, बल्कि उसे साफ करने के लिए बाजार में विकल्प ढूँढेगा।

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वैश्विक स्तर पर लड़कियों के लिए सुंदरता के पैमाने तय हैं- गोरा चेहरा, लंबी हाइट, गुलाबी होंठ, पतली कमर, पैनी नाक, काले बाल आदि। अब, जो लड़कियाँ प्राकृतिक रूप से इन मानकों पर खरी नहीं उतरतीं, उन्हें सौंदर्य जगत या फिर समाज में वैसी जगह नहीं मिलती, जैसी इन खूबियों से लबरेज लड़कियों को। अब हो सकता है कुछ लोग मेरी इस इस बात पर अपनी आपत्ति जताएँ। आधुनिक समाज की उलाहना दें। मुझे उन ब्लैक मॉडल्स के बारे में बताएँ, जिनकी फीस बाकी विश्व की सभी मॉडलों से ज्यादा है। या जिन्हें इंस्टाग्राम पर लाखों की तादाद में लोग फॉलो करते हैं। लेकिन, मैं फिर भी कहूँगी कि वैश्विक स्तर पर लड़कियों के लिए सुंदरता का पैमाना न केवल तय है बल्कि तटस्थ है। जिसकी जकड़ हमारे समाज के कण-कण में है… और यहाँ मैं केवल कुछ गिने-चुने उदाहरणों से गुमराह नहीं होने वाली। जिन्हें पेश करके ये साबित करने की जरूरत पड़े कि दुनिया काले रंग की लड़कियों की सुंदरता को तवज्जो देने लगी है…

बार-बार यहाँ लड़की शब्द का प्रयोग इसलिए क्योंकि लड़कों के लिए एक लंबे समय तक डार्क कॉम्प्लेक्शन अच्छी पर्सनेलिटी का कारक रहा। जिसे बाजारवाद ने बाद में विज्ञापनों के जरिए मटियामेट कर दिया। मगर, लड़कियों के लिए सुंदरता के लिए तय किए गए पैमाने बाजार ने सुनिश्चित नहीं किए। इन्हें गढ़ने वाला समाज है। इन्हें बढ़ावा देने वाला समाज है। जिसे समझते-परखते हुए बाजार ने सिर्फ़ फेयरनेस आदि का झूठा कॉन्सेप्ट लाया। उसने अपने विस्तार के लिए सिर्फ़ हमारी उस नब्ज को पकड़ा, जिसकी पीड़ा न होने के बावजूद हमने उसे जाहिर की, क्योंकि समाज ने हमसे ऐसा करवाया। बाजार ने तो बदले में हमें सिर्फ़ विकल्प दिए। जो बाद में देखते ही देखते हमारी जरूरत बन गए और जिसे बाद में बड़ी ट्यूब से लेकर छोटे शैशे के रूप में हम तक पहुँचाया जाने लगा।

आज बाजार में लाखों ऐसे प्रोडक्ट मौजूद हैं, जो दावा करते हैं कि वो आपकी कायापलट कर देंगे और आपको उस समाज में तारीफ के काबिल बनाएँगे, जिसके लिए गोरा रंग लंबी हाइट पतली कमर खूबसूरती बयां करने के गुण हैं। हालाँकि, आज इन्हीं विज्ञापनों के बहकावे से बचाने के लिए सरकार ने Drugs and Magic Remedies (Objectionable Advertisements) Act, 1954 में संशोधन करने का विचार किया है। जिसमें उन्होंने विज्ञापनों के जरिए बरगलाने वालों के लिए जुर्माना राशि और सजा तय की है। इसमें उपभोक्ताओं को पहली बार मिसलीडिंग ऐड दिखाते हुए पकड़े जाने पर 10 लाख रुपए का जुर्माना और 2 साल तक के जेल की सजा है। जबिक इसके बाद पकड़े जाने पर 50 लाख रुपए का जुर्माना और 5 साल तक की जेल की की सजा का प्रावधान है।

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यहाँ नैतिकता के आधार पर सरकार का ये कदम बहुत सरहानीय है। वे ब्यूटी प्रोड्क्स में इस्तेमाल होने वाले ड्रग्स आदि से अपने देश के नागरिकों को संरक्षित करना चाहती है। झूठे बहकावों से जनता को बचाना चाहती है। और इतने सब के लिए अगर वह इससे भी कड़े कदम उठाने पर विचार करती है, तो उस पर कोई सवालिया निशान नहीं लगाया जा सकता। क्योंकि, ये बात सब मानते हैं कि इंसान को आभासी दुनिया की बनावटी सुंदरता से ज्यादा व्यावहारिक दुनिया की प्राकृतिक सौंदर्यता दिखाना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

मगर, यहाँ इस बात पर विचार करिए कि क्या आधुनिकता के इस दौर में जहाँ सूचना क्रांति से लेकर नारियों द्वारा अधिकारों के लिए लड़ी जाने वाली कहानियों का विस्फोट है, वहाँ हमारी सरकार को आखिर क्यों हमें बाजार के प्रलोभ से सुरक्षित करने के लिए ऐसे बिल लाने पर सोचना पड़ रहा है? क्या हम इतने मूढ़ और लाचार हो चुके हैं कि अब भी समाज द्वारा निर्मित भ्रांतियाँ-कुरीतियाँ हमें भीतर तक जकड़े हुए है और हम सब जानते-समझते हुए उससे उभरना नहीं चाहते।

आज मैं अन्य देशों में स्थापित हो रहे उदाहरणों को देखकर खुश नहीं होना चाहती। क्योंकि मैं पहले अपने आस-पास, अपने समाज, और विविधताओं से भरे अपने देश के बारे में बात करना चाहती हूँ, जहाँ के लोगों की सोच आधुनिक होने के बावजूद भी इस मामले में समय के साथ अधिक रूढ़ हो रही है। जिसकी जकड़ इतनी बुरी है कि अगर सरकार अपने प्रयासों से बाजार के फर्जी दावों पर नियंत्रण भी कस दे, तो भी हमारी भीतर से चाह यही होगी कि किसी तरह, कहीं से बाजार हमें वो वस्तुएँ मुहैया करवा दे, जिनके जरिए हम खुद को निखार-सँवार पाएँ।

इसे आज के परिपेक्ष्य में उदाहरण सहित समझिए। बॉलीवुड की जानी-मानी अदाकारा कंगना रनौत और टॉलीवुड की उभरती सितारा साईं पल्लवी दो ऐसी लड़कियों के नाम हैं, जिन्होंने करोड़ों रुपए के फेयरनेस क्रीम के विज्ञापनों को करने से साफ मना कर दिया। ऐसा सिर्फ़ इसलिए, क्योंकि उनका मानना था कि इससे समाज में गलत संदेश जाएगा। लोग उन्हें इस फेयरनेस कैंपेन का हिस्सा मानेंगे, जिसमें आज अधिकतर लोग शुमार हैं। हालाँकि, फिल्मी जगत से जुड़ी हिरोइनों द्वारा उठाया गया ये कदम वाकई प्रशंसा के लायक है। लेकिन फिर भी, दुख इस बात का है कि सोशल मीडिया पर इनके इस कदम के लिए ताऱीफों के कसीदें पढ़ने वाली लड़कियाँ खुद इसकी जकड़ से बाहर नहीं हैं। वे तथाकथित नारीवादी महिलाएँ भी इस सोच से ऊपर नहीं है, जो हर समय नैचुरल सेल्फी अभियान चलाकर एक दूसरे को चैलेंज करती हैं कि दूसरी महिला या उनकी सहेली बिना मेकअप के अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर डाले। सोचिए, वे उस सोच के कितनी अधीन हो चुकी हैं कि उनके लिए अपनी वास्तविक छवि एक चैलेंज का विषय है।

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व्यावहारिक तौर पर अगर इस मुद्दे के संबंध में सोशल मीडिया का अध्य्यन किया जाए तो मालूम होगा कि फेसबुक से लेकर ट्विटर और इंस्टाग्राम से लेकर स्नैपचैट गोरा दिखने के लिए फिल्टर का प्रयोग होता है। कैमरे के एंगल से छोटी हाइट को सामान्य हाइट में बदला जाता है। ताकि सुंदरता के पैमानों पर अपनी तस्वीर को खरा उतारा जा सके। तो सोचिए, वास्तविकता में खुद को बदलने के लिए कितने प्रयास किए जाते होंगे। मानिए या मत मानिए, कॉलेज-ट्यूशन से लेकर शादी-ब्याह तक के बीच एक लड़की के मन में ब्यूटी प्रोडक्ट्स को लेकर चुनाव चलता ही रहता है कि आखिर वो किस तरह समाज के बनाए पैमानों पर निखर पाएगी और कैसे अन्य लड़कियों की तरह खुद को सुंदर बना पाएगी…

सुंदरता के लोभ में आज हमारा समाज उस बीमार मानसिकता का अनुयायी हो गया है, जिस पर यदि थूक भी दिया जाए, तो वे इसे अपमान नहीं समझेगा, बल्कि उसे साफ करने के लिए बाजार में विकल्प ढूँढेगा। इसलिए विचार कीजिए कि सरकार जनता को सुरक्षित रखने के लिए कब तक कानूनों में संशोधन करके बाजार पर शिकंजा कस पाएगी? कब तक उन्हें नुकसानदायक प्रोडक्स बेचने से रोक पाएगी?

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