Friday, June 18, 2021
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जब समुदाय विशेष खुद को स्वतः घुसपैठिया समझ कर सोशल मीडिया पर बकवास करता है

आखिर, किसने और कब कहा कि मजहब विशेष के सारे लोगों को भगा दिया जाएगा? किसी ने नहीं। ये कहने वाले या तो स्वयं उसी समुदाय के हैं, या गुहा टाइप के सड़कछाप लुच्चे उपन्यासकार जिन्हें इस समाज में दुर्भावना और मजहबी घृणा फैलाने से फ़ुरसत नहीं है।

अमित शाह का एक बयान खूब चर्चा में रहा जहाँ उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार पूरे देश में NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) लागू करवाएगी और हर एक घुसपैठिए को यहाँ से निकाल बाहर करेगी सिवाय बौद्ध, हिन्दू और सिक्खों के। इस बयान में क्या समस्या है, मुझे नहीं पता, लेकिन इस बयान को तोड़-मरोड़ कर हर जगह शेयर करते हुए, समुदाय विशेष में एक दुर्भावना फैलाने की बात करने वालों में क्या समस्या है, यह मुझे बख़ूबी पता है।

जब साफ-साफ घुसपैठियों की बात की है, और उसमें यह कहा है कि बौद्ध, सिक्खों और हिन्दुओं के अलावा जो भी बाहर से आए लोग हैं, उन्हें बाहर किया जाएगा, तो इसमें समुदाय विशेष खुद को कहाँ से देख रहा है? उसमें भी वह व्यक्ति क्यों चिंतित है जो इस देश का नागरिक है? न तो अमित शाह ने ऐसा कहा, न मोदी ने, न ही इस बयान में खास मजहब का कोई ज़िक्र है, फिर कुछ मजहबी दूसरे मजहबी को यह क्यों बता रहे हैं कि उन्हें देश से बाहर निकालने की साज़िश हो रही है?

We will ensure implementation of NRC in the entire country. We will remove every single infiltrator from the country, except Buddha, Hindus and Sikhs: Shri @AmitShah #NaMoForNewIndia— BJP (@BJP4India) April 11, 2019

एक बात और, जब आप संदर्भ ले आएँगे तो चीज़ें और साफ हो जाएँगी कि आखिर अमित शाह ने हिन्दुओं, सिक्खों और बौद्धों की ही बात क्यों की। क्योंकि ये लोग बाहर के देशों में अल्पसंख्यक हैं, जो बहुसंख्यकों के अत्याचार या सरकार की उदासीनता के शिकार हैं। पाकिस्तान, बंग्लादेश आदि जगहों पर हिन्दुओं, सिक्खों या बौद्धों की हालत बहुत खराब है। इनकी संख्या लगातार घट रही है, और चूँकि इन तीनों धर्मों का उदय भारत में हुआ है, तो ये उनका नैसर्गिक घर है।

अगर बौद्धों, हिन्दुओं और सिक्खों को भारत शरण नहीं देगा तो आखिर वो जाएगा कहाँ? अब इसे रोहिंग्या और बंग्लादेशियों के संदर्भ में देखा जाए तो पता चलता है कि एक आबादी अपने देश से भारत में, यहाँ के कुछ नेताओं द्वारा ग़ैरक़ानूनी रूप से बसाए गए हैं ताकि इनका वोट इन्हें मिलता रहे। इनकी संख्या बहुत ज़्यादा है, और इन्हें अपने देश में इसलिए रहना चाहिए क्योंकि वहाँ का मज़हब, वहाँ की संस्कृति और सरकार उनके लिए ज़्यादा उपयुक्त है।

भारत में रोहिंग्या और बंग्लादेशी घुसपैठियों ने काफी समय से कैंसर की तरह जकड़ बना रखी है। ये लोग व्यवस्थित तरीक़ों से आधार कार्ड और वोटर कार्ड बनवा ले रहे हैं। ये लोग उत्तरपूर्व से भारत में घुसते हुए कश्मीर और राजस्थान कैसे पहुँच रहे हैं, ये कोई नहीं जानता। दक्षिण भारत की ट्रेनों में बैठ कर उधर घुसपैठ करने की कोशिशें नाकाम की गई हैं हमारी एजेंसियों के द्वारा।

मानवतावाद का दृष्टिकोण तब लगता है, और उसके लिए लगता है, जब शरण देने वाला देश स्वयं उन्हें पालने में सक्षम हो। दूसरी बात, शरण लेने वाला देश स्वयं यह बताता है कि वो किसे रखना चाहता है, किसे नहीं। उसकी शर्तें देश तय करता है, सुरक्षा के लिहाज से और इस लिहाज से भी कि क्या उनकी संख्या जितनी है, उतनी वो झेल पाएँगे। इसलिए, बहुत ही कम संख्या में आए हिन्दुओं, सिक्खों और बौद्धों के लिए भारत उनका सहज आवास है, लेकिन मजहब विशेष के लिए नहीं क्योंकि वो एक बहुत बड़ी आबादी बन कर घुसपैठ कर रहे हैं।

अगर बंग्लादेशी घुसपैठियों की बात करें तो लगभग 40 लाख नाम तो सिर्फ असम में निकले हैं जो NRC की शर्तों पर सही नहीं उतरते। 2007 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में तिब्बत के बौद्ध शरणार्थियों की संख्या लगभग 1,92,000 है, और श्रीलंका से भागे और तमिलनाडु में रहने वाले लोगों की संख्या एक लाख के क़रीब बताई जाती है। पाकिस्तान से, अगर बँटवारे को अलग रखें, आए हिन्दुओं की संख्या लगभग 20,000 है, जिसमें से 13,000 को भारतीय नागरिकता दी जा चुकी है। ये सारी संख्या 2007 तक की ही है। हाल-फ़िलहाल में सिर्फ बंग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठ अचानक से बढ़ा है, जिनमें बंग्लादेशी तो लगातार लाए और बसाए जाते रहे हैं। वहीं वर्तमान में अफ़ग़ानिस्तान में हिन्दुओं और सिक्खों की संख्या सिमट कर 5000 रह गई है। पाकिस्तान में हिन्दुओं का क्या हाल है, यह किसी से छुपा नहीं है।

लेकिन आज के समय में यह समस्या अतिविकट हो चुकी है। असम, मणिपुर, त्रिपुरा जैसे राज्यों में वहाँ के स्थानीय लोग स्वयं अल्पसंख्यक बन कर रह रहे हैं, और दंगे आम हो गए हैं। यहाँ हिंसक झड़पें होती हैं और यहाँ की सामाजिक संरचना पूरी तरह से बिगड़ चुकी है। 2012 का कोकराझार दंगा इसी कारण से हुए था जिसमें 80 लोगों की मौत हुई थी। इन सारे समयों में आप इन राज्यों की सरकारों को देखेंगे तो आपको वही लोग मिलेंगे जिनके लिए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ महज़ दो शब्द हैं, जिसको ताक पर रख कर लगातार घुसपैठ कराए गए, कैम्प बनाए गए, और हालात यह हैं कि वो कई जगहों पर किंगमेकर की भूमिका में हैं।

रोहिंग्याओं को उनकी अपनी सरकार ही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा मानती है, तो फिर भारत उन्हें कैसे अपने पास रख ले? इस्लामी आतंक का जितना दंश भारत ने सहा है, उसके बाद भी मानवीय आधार पर इन्हें लेने की गलती करना जीती मक्खी निगलने जैसा है। रोहिंग्या को बर्मा वाले अपना नहीं मानते क्योंकि वो लोग बंग्लादेशी हैं जिन्होंने बर्मा में बौद्धों को भी हिंसा के लिए मजबूर कर दिया था। इनका इतिहास इतना क्रूर है कि इनका वर्तमान में विक्टिमहुड खेलना मजाक लगता है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मई 2018 की एक रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि रोहिंग्याओं ने राखिने में हिन्दू अल्पसंख्यकों को समूहों में काटने की वारदातों को अंजाम दिया है। ये हिन्दू अंग्रेज़ों द्वारा कामगारों के रूप में भारत से ले जाए गए थे और फिर वही हुआ जो हर इस्लामी देश में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के साथ होता है।

रोहिंग्या की मिलिटेंट आर्मी ने हिन्दुओं को जगह-जगह जाकर काटना शुरु किया और बौद्ध धर्मावलम्बियों तक अपनी हिंसा की छाप छोड़ते हुए ऐसा आतंक मचाया कि वहाँ के बौद्ध लोगों को हथियार उठाना पड़ गया। बौद्ध लोगों को वर्चस्व के लिए नहीं, अस्तित्व के लिए हथियार उठाना पड़ा, वहीं इस्लामी आतंक वर्चस्व और ‘हम दुनिया को क़दमों में और इस्लाम की ख़िलाफ़त के अंदर लाना चाहते हैं’ की तर्ज़ पर चलता है।

फिर इन लोगों को आखिर भारत क्यों जगह दे? भारत के प्रसिद्ध उपन्यासकार, कहानीकार और फ़िक्शन राइटर रामचंद्र गुहा ने, जो कॉन्ग्रेसियों के फ़ेवरेट इतिहासकार भी माने जाते हैं, ने अमित शाह के बयान में वह भी पढ़ लिया जो कहा ही नहीं गया। लेकिन, गुहा जैसे कहानीकारों ने भारत के इतिहास के साथ भी तो वही किया है कि जो कहीं है नहीं, उसे इतिहास बनाकर पढ़ा दिया हमें। अमित शाह ने घुसपैठियों की बात की है, और भारत में 15 करोड़ आबादी है खास मजहब की, जो भारतीय हैं। क़ायदे से देखा जाए तो राम चंद्र गुहा ऐसा मानते हैं कि भारत में रह रहे सारे समुदाय विशेष वाले लोग घुसपैठिए हैं, जो कि निहायत ही निंदनीय और बकवास बात है।

Amit Shah’s insinuation, that Muslims shall not and cannot be safe and secure in India, will be widely acclaimed in one country: Pakistan. Shah’s majoritarian bigotry is music to the ears of those who rule that country.— Ramachandra Guha (@Ram_Guha) April 11, 2019

इसलिए, गुहा की तो मजबूरी है कि वो भारतीय कथित अल्पसंख्यकों में डर भरना चाहते हैं ताकि वो चुनावों में भाजपा या मोदी को वोट न दें, लेकिन मजहब के उन लोगों की बात मेरी समझ से बाहर है जो स्वयं को एक घुसपैठिए के रूप में देखने लगे हैं। आखिर, किसने और कब कहा कि मजहब विशेष के सारे लोगों को भगा दिया जाएगा? किसी ने नहीं। ये कहने वाले या तो स्वयं उसी मजहब के हैं, या गुहा टाइप के सड़कछाप लुच्चे उपन्यासकार जिन्हें इस समाज में दुर्भावना और मजहबी घृणा फैलाने से फ़ुरसत नहीं है।

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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