Friday, October 2, 2020
Home बड़ी ख़बर अल्पसंख्यक ही नहीं बहुसंख्यक भी होते हैं सांप्रदायिक वारदातों के शिकार, छिपाता है मीडिया

अल्पसंख्यक ही नहीं बहुसंख्यक भी होते हैं सांप्रदायिक वारदातों के शिकार, छिपाता है मीडिया

आँख मूँद कर मेन स्ट्रीम मीडिया पर विश्वास करना छोड़ना पड़ेगा। अगर बिना ग्राउंड रियलिटी जाने कोई सेलिब्रिटी या पत्रकार कुछ कमेंट करता है तो उसे लताड़ना पड़ेगा।

आजकल हमारे देश में एक नया ख़तरनाक ट्रेंड चल पड़ा है। देश के किसी कोने में जब कोई जुनैद मारा जाता है (जो कि दुःखद है, निंदनीय है) तो उसे जबरदस्ती सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जाती है। जब कोई वसीम घृणाभाव से भरकर महाशिवरात्रि के दौरान पूजा पंडाल उखाड़ (यह भी निंदनीय है) डालता है तो इस पर आउटरेज नहीं होता। ऐसा कब तक चलता रहेगा? अगर पीड़ित जुनैद है तो आपसी विवाद भी सांप्रदायिक रंग में रंग दिए जाते हैं और अगर अपराधी, आरोपित या दोषी वसीम है तो इस घटना को बड़ी चालाकी से ‘समुदाय विशेष द्वारा किया गया’ कहकर समाचारपत्रों, मीडिया पोर्टलों और टीवी न्यूज़ चैनलों से छिपा दिया जाता है। अब इन गिद्धों को कौन समझाए कि जब पीड़ित संयोग से अल्पसंख्यक हो तो घटना सांप्रदायिक नहीं हो जाती। यहाँ हम कुछ ऐसी ही घटनाओं की पड़ताल कर मीडिया के दोहरे रवैये की पोल खोलेंगे।

बात महाशिवरात्रि से शुरू करते हैं। अगर आप आज भी महाशिवरात्रि के एक दिन बाद के अख़बारों को खंगालेंगे तो आपको पता चलेगा कि ऐसी न जाने कितनी घटनाएँ हुईं, जिनमें पूजा-पाठ में व्यवधान पैदा किया गया, टेंट उखाड़ डाला गया, शिवजी की बरात रोक दी गई, शिवलिंग को लेकर वाल्मीकि समुदाय के लोगों से मारपीट की गई। आपने कहीं मीडिया में ये ख़बरें पढ़ीं क्या? आपने नहीं पढ़ी क्योंकि इसे या तो अख़बारों के एक कोने में छोटी सी जगह देकर ‘समुदाय विशेष’ के भीतर छिपा दिया गया या फिर न्यूज़ पोर्टल्स और टीवी मीडिया द्वारा बड़े स्तर पर नज़रअंदाज़ किया गया। महाशिवरात्रि में हुई ऐसी घटनाओं की एक बानगी देखिए। इसे पढ़ने के बाद आपको पता चलेगा कि पीड़ित सिर्फ़ अल्पसंख्यक ही नहीं होते।

महाशिवरात्रि पर हुई सांप्रदायिक वारदातों पर मीडिया की चुप्पी

फतेहगंज पश्चिमी में पुलिस चौकी के बगल में स्थित ब्रह्मदेव महाराज धर्मस्थल पर महाशिवरात्रि की वार्षिक पूजा चल रही थी। तभी वसीम ने आकर टेंट उखाड़ डाला, जिसके बाद इलाक़े में तनाव फैल गया। सूचना मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुँची, जिसके बाद अनुष्ठान फिर से शुरू हो सका। पंचायत की बैठक बुलाने के बाद पूजा समिति धीमी आवाज पर माइक बजाने के लिए तैयार हो गई, जिसके बाद सब कुछ सामान्य हो सका। इसका क्या अर्थ निकलता है? इसका अर्थ यह है कि दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर से आवाज आए तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए और दिक्कत होते ही ये सांप्रदायिक रंग ले लेगा लेकिन साल भर में एक बार आने वाली महाशिवरात्रि के दौरान ज़ोर की आवाज़ का बहाना बनाकर टेंट ही उखाड़ डाला जाता है।

अव्वल तो यह कि इस पर कोई आउटरेज नहीं होता। आपको याद है कि कैसे प्रसिद्ध गायक सोनू निगम को लाउडस्पीकर के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के कारण ट्विटर छोड़ना पड़ा था। हालाँकि, उन्होंने मंदिरों व मस्जिदों दोनों के ही लाउडस्पीकर्स पर सवाल खड़े किए थे लेकिन किन लोगों द्वारा उन्हें धमकियाँ दी गई, प्रताड़ित किया गया, ये छिपा नहीं है। अब आप सोचिए कि अगर किसी अल्पसंख्यक समुदाय के पूजा-प्रतिष्ठान में व्यवधान डालते हुए उनके धार्मिक सेट-अप को उखाड़ फेंका जाता तो मीडिया का क्या रिएक्शन होता? निंदनीय दोनों है, कार्रवाई दोनों मामलों के दोषियों पर होनी चाहिए, लेकिन एक को छिपा कर एक पर सीधा केंद्र सरकार पर निशाना बनाना और फिर पूरे भारत को भीड़तंत्र द्वारा शासित साबित कर देना मीडिया हिपोक्रिसी है।

रायबरेली के ऊंचाहार में भगवान शिव की बारात निकाली गई, जिसका वहाँ के समुदाय विशेष के लोगों ने विरोध किया। विरोध इतना ज्यादा बढ़ गया कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिसके बाद मामला शांत हुआ और बारात दूसरे रास्ते से निकाली गई। दरअसल शिवरात्रि के मौके पर ऊंचाहार में तकरीबन एक दशक से शिव जी की बारात निकाली जा रही है। इस घटना से क्या पता चलता है? यह घटना बताती है कि आप दशकों पुरानी वार्षिक धार्मिक परंपरा को निभाते हैं तो भी आपको परेशान किया जाएगा लेकिन मीडिया द्वारा इसे सांप्रदायिक नहीं मना जाएगा। महाशिवरात्रि की शिव-बारात से मुस्लिमों को आपत्ति होती है और श्रद्धालुओं को दशकों पुराना रास्ता बदलना पड़ता है।

क्या आप इस घटना को दूसरे रूप में सोच सकते हैं? क्या आप सोच सकते हैं कि अगर किसी ईदगाह में कुछ लोग पहुँच कर मुस्लिमों को तुरंत जगह बदलने को मज़बूर कर दें तो क्या होगा? आउटरेज। मीडिया और बुद्धिजीवियों द्वारा हंगामा खड़ा कर दिया जाएगा और ये देशस्तरीय मुद्दा बन जाएगा। लेकिन, जिन्हें असहिष्णु कहा जाता है, वो दूसरे समुदाय की आपत्ति के कारण रास्ता बदल लेते हैं और मीडिया में कोई उनकी तरफ से आवाज़ तक नहीं उठाता। उनकी ख़बर ‘समुदाय विशेष की आपत्ति’ के हेडलाइन तले स्थानीय अख़बार के एक कोने में पड़ी होती है। अरे, हिन्दू तो बने ही हैं दूसरों की आपत्ति के कारण अपनी परंपरा, पूजा-पाठ के तरीके और स्थान में बदलाव करने के लिए! इस सबके बावजूद असहिष्णु बहुसंख्यक ही है!

महाशिवरात्रि के दौरान ही हुई ऐसी एक और घटना को देखिए। लोहामंडी के मोहल्ला पुरानी गढ़इया में खाली जमीन पर वाल्मीकि बस्ती के लोग भगवान शिव की प्रतिमा स्थापना करना चाहते थे। लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया। बताया जाता है कि प्रतिमा स्थापना की तैयारी काफ़ी दिनों से ज़ोर-शोर से चल रही थी। लेकिन 4 मार्च 2019 को सांप्रदायिक तनाव ने मारपीट का रूप ले लिया, जिसके कारण तीन थानों की पुलिस को घटनास्थल पर कैम्प करना पड़ा। तब दलितों के हितैषी कहाँ थे? दलितों से मारपीट की गई लेकिन दलित हितों के कथित रक्षकों, उनकी आवाज़ उठाने का दावा करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया पर एक दलित के घर हुई चोरी को लेकर भी मोदी को गाली देने वाले बुद्धिजीवियों ने उफ्फ तक नहीं की।

इस घटना से पता चलता है कि ये दलित हितैषी होने का दिखावा तभी तक है, जब तक मामले से कोई सवर्ण न जुड़ा हो। अगर किसी व्यक्ति की उसके भाई द्वारा भी पिटाई की जाती है तो इसे दलितों पर अत्याचार और उनके शोषण के रूप में प्रचारित करनेवाला मीडिया तब चुप हो जाता है जब शिवजी की पूजा के दौरान वाल्मीकि समुदाय के लोगों से मारपीट की जाती है। इनका दलित प्रेम कुछ ‘नियम एवं शर्तों (Terms & Conditions)’ से बँधा हुआ है। दलितों को भगवान शिव की पूजा नहीं करने दी जाती तो इनके कानों पर जूँ तक न रेंगती क्योंकि इसमें इन लोगों का कोई हित नहीं सधेगा। हमने उपर्युक्त घटनाओं में देखा कि कैसे श्रद्धालुओं को रास्ता बदलना पड़ा, मूर्ति स्थापना रोकनी पड़ी और उनका टेंट उखाड़ डाला गया, दलितों से मारपीट हुई सो अलग।

जब घटना को जबरदस्ती दिया गया सांप्रदायिक रंग

अब ऐसी घटनाओं पर आते हैं, जहाँ पीड़ित या पीड़ित होने का दावा करने वाला अल्पसंख्यक था तो घटना को जबरदस्ती सांप्रदायिक रंग देकर इसे मोदी की विफलता और भारत को असहिष्णु बता दिया जाता है। ऐसा दर्शाया जाता है कि भारत में भीड़ हत्या कर देती है और सरकार को उनका समर्थन प्राप्त है। जुनैद वाला मामला याद होगा आपको। ट्रेन में सीटों के बँटवारे को लेकर हुए विवाद में उसकी हत्या कर दी गई थी। यह कृत्य घृणित था लेकिन इससे भी ज्यादा घृणित था इसे सांप्रदायिक रंग देना। ख़ुद जुनैद के भाई ने बताया कि ये विवाद सीटों के बँटवारे को लेकर शुरू हुआ था। पुलिस द्वारा भी इस मामले में ‘Criminal Assault’ और हत्या का मामला दर्ज किया गया था।

न तो शिकायतकर्ताओं और न ही आरोपित द्वारा कहीं भी ‘बीफ’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया लेकिन मीडिया में इसे बीफ के कारण एक अल्पसंख्यक की हत्या के रूप में प्रचारित किया गया। सच्चाई थोड़ी देर बाद सामने आती है लेकिन तब तक झूठ के सहारे ही इस पर एक नैरेटिव तैयार कर अपना कुटिल अजेंडा साध लिया जाता है। जब सच्चाई सामने आई तो इनके मुँह बंध गए। अभी हाल ही में महेश भट्ट की पत्नी सोनी राजदान ने जुनैद को लेकर फिर से झूठ फैलाया। उन्होंने ट्विटर पर लोगों से कहा कि उसे मुस्लिम होने का कारण मार डाला गया जबकि इस हत्याकांड में धर्म कहीं से भी कोई एंगल था ही नहीं। हाईकोर्ट ने भी स्पष्ट किया था कि ये सीट शेयरिंग का मुद्दा था जो हिंसा में बदल गया।

इसी तरह गुरुग्राम में हुई एक घटना को सिर्फ़ इसीलिए सांप्रदायिक रंग दे दिया गया क्योंकि पीड़ित मुस्लिम था और आरोपित गुर्जर समुदाय से आते थे। गाँव वालों ने इसे एक ‘Road Rage’ बताते हुए कहा था कि इसे आतंरिक रूप से ही निबटा दिया गया है। संयोगवश होली के समय हुई घटना के बारे में ख़ुद पीड़ितों ने कहा कि ये हिन्दू-मुस्लिम वाला मामला नहीं है और मीडिया व राजनेता मिलकर इसे सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं। ये मीडिया के लोग कौन हैं? ये राजनेता कौन हैं? ये वही ‘Usual Suspects’ हैं, जिन्हे हम अक्सर सोशल मीडिया पर झूठ फैलाते हुए देख सकते हैं। क्या आरोपित अगर गुर्जर हो और पीड़ित मुस्लिम हो तो घटना सांप्रदायिक हो जाती है क्या? क्या ये बुद्धिजीवी अख़बार भी पढ़ते हैं? बिना ग्राउंड रियलिटी जाने हंगामा खड़ा कर देना कैसी पत्रकारिता है?

अभी हाल ही में मेरठ के एक कॉलेज में हुई एक घटना को जबरदस्ती सांप्रदायिक रंग देकर इसे भारतीय जनता पार्टी से जोड़ दिया गया। Times Of India के पत्रकार पीयूष राय ने मेरठ लॉ स्टूडेंट की एक ख़बर की, जिसमें बताया गया कि बीजेपी की टोपी पहनने से मना करने के बाद एक छात्रा को कॉलेज से निलंबित कर दिया गया। अपनी इस झूठी ख़बर के ज़रिए पत्रकार ने भाजपा को निशाना बनाने को कोशिश की। उन्होंने आगे दावा किया कि जिन ‘कथित’ छात्रों ने उमाम खानम को कथित तौर पर ‘बीजेपी की टोपी पहनने से मना’ किया था, उन्हें भी निष्कासित कर दिया गया। सोशल मीडिया पर इस चर्चित इस ख़बर की सच्चाई जानने के लिए स्वराज्य की स्वाति गोयल ने इस पर ग्राउंड रिपोर्ट की, जिनमें ये दावे झूठे पाए गए

क्या चारा है बहुसंख्यकों के पास?

अभी-अभी बीती रामनवमी के दौरान ऐसी कई घटनाएँ सामने आ रही हैं जहाँ समुदाय विशेष के लोगों द्वारा पत्थरबाज़ी की गई, पूजा में व्यवधान डाला गया लेकिन मीडिया चुप है। आप हमारी वेबसाइट पर जाकर ऐसे न्यूज़ देख सकते हैं। यहाँ सवाल उठता है कि आख़िर कब से हिन्दू समुदाय अपनी परंपरा को स्वतंत्रतापूर्वक निर्बाध निभा पाएगा? कब तक असल सांप्रदायिक वारदातों को ‘समुदाय विशेष’ के हेडलाइन तले दबाते रहा जाएगा और आपसी विवादों या अन्य कारणों से हुई आपराधिक वारदातों को सांप्रदायिक रंग दिया जाएगा? अब आम जनता को एक स्टैण्डर्ड तय करना होगा। आँख मूँद कर मेन स्ट्रीम मीडिया पर विश्वास करना छोड़ना पड़ेगा। अगर बिना ग्राउंड रियलिटी जाने कोई सेलिब्रिटी या पत्रकार कुछ कमेंट करता है तो उसे लताड़ना पड़ेगा।

सोनी राजदान जैसे इन तथाकथित सेलेब्स को रास्ता दिखाना होगा। हमारा कर्त्तव्य बनता है कि जब भी ये कोई फेक न्यूज़ या फेक एंगल लेकर झूठी साम्प्रदायिकता तले अपनी दुकान चलाने की कोशिश करें, हम सच्चाई से इन पर ऐसी चोट करें कि ये फिर से ऐसी हरकत करने से पहले सौ बार सोचें। हिन्दू आज़ादी से अपने त्यौहार मनाएँ, मुस्लिम बिना व्यवधान से नमाज़ पढ़े, लेकिन दोनों ही मामलों में अगर कोई बाधा डालने वाला कार्य करता है तो दोनों ही ख़बरों को समान प्राथमिकता दी जाए। एक को छिपाना और एक को विश्व स्तर पर ले जाकर भारत को भीड़तंत्र वाला देश साबित करने का प्रोपेगंडा अब नहीं चलेगा।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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