Thursday, June 4, 2020
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सियासत का स्वामी: जिसके कारण गॉंधी कठघरे में आए, वाजपेयी गए और रामसेतु बचा

मोदी सरकार के साथ स्वामी के रिश्ते के लिए झगड़ालू लेकिन वफ़ादार पत्नी से बेहतर उपमा नहीं हो सकती। जब किसी और पार्टी की बात नहीं हो रही होती तो वे न केवल मोदी सरकार को अपने अन्य मुद्दों पर बयान से मुसीबत में फँसा देते हैं, बल्कि कभी-कभी तो खुद विपक्ष की तरह सरकार को घेरने में लग जाते हैं।

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आज भारतीय राजनीति में अगर कोई एक अतरंगी किरदार है जिसे समझ पाना, खाँचे में फिट कर पाना मुश्किल है, तो वह हैं भाजपा के राज्य सभा सांसद और नेशनल हेराल्ड से लेकर, रामसेतु, 2G स्पेक्ट्रम जैसे मसलों के याचिकाकर्ता सुब्रमण्यम स्वामी। खुद को हिंदुवादी बताने वाले स्वामी न तो वाजपेयी सरकार गिराने से चूके और न हाशिमपुरा हत्याकांड में बेगुनाह मुसलमानों के पक्ष में अदालत में खड़े होने से। राजीव गाँधी को मित्र बताया लेकिन उनकी पत्नी सोनिया गाँधी और बेटे राहुल गाँधी को कानून के कठघरे में खड़ा करने से संकोच नहीं किया।

वे समलैंगिकता को अपराध नहीं मानते हैं, लेकिन जेनेटिक बीमारी मानते हुए उसके सार्वजनिक प्रदर्शन की आज़ादी का विरोध करते हैं। IIT दिल्ली से बरसों कानूनी जंग लड़कर प्रोफ़ेसरशिप पाई और अगले ही दिन इस्तीफ़ा देकर बकाया वेतन के लिए नया मुकदमा ठोंक दिया (और जीता भी)। वे मोदी के प्रधानमंत्रित्व के सबसे बड़े समर्थक माने जाते हैं, फिर भी उन्होंने चुनाव के ठीक पहले सरकार को चेतावनी दी कि अगर राम मंदिर के रास्ते में कोई अड़चन डाली, तो वे सरकार गिरा देंगे।  

“प्रधानमंत्री बनोगे?” 

बकौल सुब्रमण्यम स्वामी, चंद्रशेखर सरकार का बनना कोई बहुत बड़ी ‘रॉकेट साइंस’ नहीं थी। उनके अनुसार उसकी नींव संसद की बेंच पर ‘ऐंवई’ हुए वार्तालाप में पड़ी थी, जब चंद्रशेखर ने कहा कि उन्हें नहीं लगता प्रधानमंत्री बनना इस जीवन में हो पाएगा। स्वामी बताते हैं कि उन्होंने चंद्रशेखर से पूछा कि क्या चंद्रशेखर उन्हें अपनी सरकार में वित्त मंत्री बनाएँगे। उनके हाँ कहने पर (हालाँकि बाद में बनाया नहीं) स्वामी ने राजीव गाँधी को चंद्रशेखर सरकार के बाहरी समर्थन के लिए मनाया। 

“RSS-पति” सुब्रमण्यम स्वामी  

हार्वर्ड के सबसे कम उम्र के पीएचडी धारकों में शुमार सुब्रमण्यम स्वामी की पत्नी का नाम रॉक्सना सुब्रमण्यम स्वामी है। उनके नाम का “RSS” बनाकर स्वामी अक्सर मज़ाक करते हैं कि संघ के आधिकारिक सदस्य कभी न रहने के बावजूद वे भी RSS के ही हैं। स्वामी तमिल ब्राह्मणों की अय्यर जाति से ताल्लुक रखते हैं और पिता के वामपंथी होने के बावजूद कभी भी वामपंथी राजनीति के प्रति आकर्षित नहीं हुए। जिस समय वे IIT-दिल्ली से मुकदमा लड़ रहे थे, उसी बीच वे उसी संस्थान के निदेशक भी रहे। 2011 तक उन्होंने हार्वर्ड में ग्रीष्म सत्र में अर्थशास्त्र पढ़ाया है। 

वाजपेयी सरकार गिरवाने में अहम भूमिका  

स्वामी के जहाँ सबसे बड़े समर्थक हिंदूवादी हैं, वहीं उनका सबसे बड़ा विरोध भी उन्हीं कोनों से आता है। विरोधी पूछते हैं कि इतने बड़े हिंदूवादी ने पहली हिंदूवादी सरकार कैसे गिरवा दी। कहा जाता है कि स्वामी की  चाय पार्टी पर ही वाजपेयी की 13 महीने की सरकार को गिराने की पटकथा लिखी गई थी। उनके हिंदूवादी विरोधी उस समय संघ के लिए इस्तेमाल कटु-शब्दों को भी याद रखे हुए हैं। 

वहीं, स्वामी-समर्थक इन बातों को विशुद्ध रूप से राजनीतिक और पुरानी बात बताते हैं और गिनाते हैं कि कैसे रामसेतु के पक्ष में केंद्र की कॉन्ग्रेस/संप्रग और तमिलनाडु की द्रमुक सरकार से स्वामी अदालत में न केवल भिड़े, बल्कि रामसेतु को बचा भी लाए, कैसे उन्होंने तारकेश्वर मंदिर में ममता बनर्जी से मिलकर मुसलमान फिरहाद हकीम को मंदिर बोर्ड का अध्यक्ष बनवाए जाने का निर्णय पलटवा दिया।  

मुसलमानों पर सावरकर की लाइन, फिर भी हाशिमपुरा के पैरोकार  

स्वामी उन मुसलमानों से नागरिकता और मताधिकार छीन लेने की वकालत करते हैं, जो भारत को अपना ही नहीं, अपने पूर्वजों का भी देश आधिकारिक तौर पर नहीं मान लेते। उनके मुताबिक जो मुसलमान खुद को भारतीयों का, हिन्दुओं का वंशज नहीं मानते और अरबी-तुर्की पूर्वजों पर ‘गर्व’ से इतराते हैं, वे हिन्दुओं की हत्या और उनके धर्म को खत्म करने की कोशिश करने वालों पर इतरा रहे हैं और ऐसी मानसिकता के लोगों को मताधिकार देने के लिए हिन्दू और भारत बाध्य नहीं है। यह विचार बहुत कुछ ‘हिंदुत्व’ की सावरकर की परिभाषा (“आस्था या पंथ नहीं, बल्कि जो भी भारत की अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है, वह हिन्दू है”) से मिलता-जुलता है।

उनके ऐसे ‘उग्र’ हिन्दूवाद को देखते हुए लोगों को आश्चर्य होता है, जब पता चलता है कि बेगुनाह मुस्लिमों के 1987 के हाशिमपुरा हत्याकांड में स्वामी ने न्याय की लड़ाई लड़ी थी। उनका आरोप है कि तत्कालीन गृह राज्य मंत्री पी. चिदम्बरम की इस हत्याकांड में भूमिका की जाँच होनी चाहिए।

जेटली, वाजपेयी से 36 का आँकड़ा

स्वामी का भाजपा के दो कद्दावर नेताओं अरुण जेटली और भाजपा के शलाका-पुरुष व पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी से 36 का आँकड़ा रहा है। उन्होंने कभी इस बात को न छिपाया, न नकारा। उन्होंने वाजपेयी पर मोरारजी सरकार को गिराने के लिए चरण सिंह को उकसाने के अलावा अपने (स्वामी के) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच गलतफहमियों का सर्वप्रमुख कारण होने का इल्ज़ाम लगाया।

स्वामी की पत्नी रॉक्सना तो यहाँ तक दावा करतीं हैं कि वाजपेयी ने जनसंघ से भाजपा का निर्माण करने के समय स्वामी को उसका सदस्य स्वीकार करने से साफ़ मना कर दिया था। साथ ही स्वामी वाजपेयी-नरसिम्हा राव की सरकारों की चुनावी हार का उदहारण अपने इस दावे के सबूत के तौर पर देते हैं कि केवल आर्थिक-विकासवादी राजनीति कर, चाहे वह कितनी भी अच्छी क्यों न हो, जनता को अपनी तरफ़ नहीं किया जा सकता। उसके साथ भावनात्मक अपील का पुट होना जरूरी है।

जेटली से स्वामी की नाराज़गी का उद्गम 2014 के लोकसभा चुनावों को माना जाता है। स्वामी की अध्यक्षता में जनता पार्टी के भाजपा में विलय के बाद से उनके नई दिल्ली लोकसभा सीट पर उम्मीदवार बनने की चर्चा थी, लेकिन अंत में ऐसा हुआ नहीं। माना जाता है कि स्वामी ने इसका ज़िम्मेदार अरुण जेटली को ठहराया और मोदी सरकार के 5 सालों में शायद ही किसी ने जेटली या उनके किसी विभाग के बारे में स्वामी के मुख से तारीफ़ के दो बोल सुने हों।

राजन अर्थव्यवस्था में ‘टाइम बम’ लगा गए हैं’

आज अर्थव्यवस्था पर जिस तरह के बादलों का ग्रहण लगा है, सुब्रमण्यम स्वामी पिछले 3-4 सालों से (2015-16) उसके बारे में चेतावनी दे रहे थे। हालाँकि उन्होंने कभी इसके लिए मोदी सरकार की खुद की नीतियों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया, लेकिन हमेशा कहते रहे कि पिछली सरकार और RBI के पूर्व प्रमुख रघुराम राजन अर्थव्यवस्था में ‘टाइम बम’ लगा गए हैं, जो ज़रूर फटेंगे और भारत मंदी में जरूर डूबेगा। इस ‘धमाके’ का उनका अनुमान भले ही गलत निकला (उन्होंने जीडीपी ग्रोथ 5% तक डूबने के लिए अधिकतम 2017 तक का समय बताया था, जबकि यह हो 2019 में रहा है) लेकिन बाकी हर लिहाज से वह सही बैठे।

अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए स्वामी जो उपाय बताते हैं, वे भी आसानी से लोगों के गले उतरने वाले नहीं हैं। वे सरकार की राजस्व आय में बड़ा हिस्सा रखने वाले आयकर को खत्म करने की सलाह देते हैं, और उसकी जगह एक न्यून प्रतिशत टैक्स ‘उपभोग टैक्स’ या हर बैंकिंग ट्रांजैक्शन टैक्स के तौर पर लगाने की वकालत करते हैं। इसके पीछे उनका तर्क है कि हाथ में अधिक पैसा होने पर लोग अधिक खर्च करेंगे और सरकार फिर लोगों की आय और बचत की बजाय खर्च पर कर लगा सकती है।

उनके द्वारा सार्वजनिक रूप से सुझाए गए अन्य उपायों में कर्ज की दरों को गिराने और फिक्स्ड डिपॉज़िट पर अधिक ब्याज देने, RBI की स्वायत्ता पर लगाम लगाने जैसे और भी विवादास्पद उपाय शामिल हैं, जिनपर आम लोगों ही नहीं, अर्थशास्त्रियों को भी शंका होती है।

कानून के जानकार

स्वामी का आधिकारिक रूप से कानून का डिग्री धारक न होना उन्हें हैरत में डाल देता है, जिसने उन्हें कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, हाल ही में दिवंगत हुए राम जेठमलानी जैसे वकीलों से बहस करते हुए देखा है। हालाँकि अधिकांश मामलों में उनके अदालती वकील के तौर पर पत्नी रॉक्सना स्वामी या उनकी कानूनी टीम उनका प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन स्वामी खुद क़ानूनी पहलुओं का अध्ययन भी करते हैं और सार्वजनिक बहसों में भी ज़्यादातर कानूनी तर्कों के आधार पर ही बात रखते हैं।

“मैं ‘मजदूर’ लगा लेता हूँ”

मोदी सरकार के साथ स्वामी के रिश्ते के लिए झगड़ालू लेकिन वफ़ादार पत्नी से बेहतर उपमा नहीं हो सकती। जब किसी और पार्टी की बात नहीं हो रही होती तो वे न केवल मोदी सरकार को अपने अन्य मुद्दों पर बयान से मुसीबत में फँसा देते हैं, बल्कि कभी-कभी तो खुद विपक्ष की तरह सरकार को घेरने में लग जाते हैं। यहाँ तक कि 2019 में मोदी के दोबारा सत्ता में आने के बाद एक बार फिर वित्त मंत्री के लिए अपनी अनदेखी होने पर उन्होंने लिखा, “मुझे अपने नाम में ‘चौकीदार’ तो नहीं लेकिन ‘मजदूर’ अवश्य लगा लेना चाहिए। अदालत में केस लड़-लड़कर ‘इमारत’ मैं बनाता हूँ लेकिन मुझे ही उसमें रहने के लिए लक्ज़री अपार्टमेंट (मंत्रिपद) नहीं मिलता। कृष्ण ने यह महाभारत के बाद अर्जुन को समझाया था।”

स्वामी का इशारा इस तथ्य की ओर था कि भाजपा और मोदी कॉन्ग्रेस को जिन मामलों में कठघरे में खड़ा कर रहे थे (2G घोटाला, नेशनल हेराल्ड, राम मन्दिर मामले में कपिल सिब्बल का फैसला रुकवाने का खुल्लम-खुल्ला प्रयास), उनमें मुकदमा दायर कर लड़ने वाले स्वामी ही थे- उन्हीं के प्रयासों से सोनिया-राहुल को नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत लेनी पड़ी और मोदी-भाजपा ने कहना शुरू कर दिया कि कॉन्ग्रेस का राजपरिवार ‘bail-गाड़ी’ पर है।

विपक्ष की दुर्गति को देखते हुए उन्होंने कॉन्ग्रेस से ‘इतालवियों’ को हटाने के बाद एनसीपी-तृणमूल का कॉन्ग्रेस में विलय कर लोकतंत्र के हित में एक मजबूत विपक्षी पार्टी बनाने की सलाह दी और ममता बनर्जी को उसका अगुआ ‘मनोनीत’ भी कर दिया। लेकिन खुद भाजपा छोड़ विपक्ष को मजबूत करने की बात पर छटकते हुए बता दिया कि उनके लिए साफ़-सुथरी राजनीति का पर्याय भाजपा-संघ-मोदी ही हैं।

स्वामी की ‘legacy’ के आकलन में पार्टी, विचारधारा, और निष्ठा को एक ही चीज़ मानकर देखने पर वे शायद ‘मौकापरस्त’, ‘loose cannon’, ‘unpredicatable’ आदि वे सभी चीजें नज़र आएँगे, जो उनके विरोधी उन्हें कहते हैं। लेकिन किसी नेता को आंकने के पैमाने के तौर पर उसके कर्म उसके शब्दों से अधिक सटीक होते हैं, क्योंकि राजनीति कुछ बोलने और कुछ और ही करने का पर्याय बन गई है- शायद राजनीति का स्वभाव ही यही है और शायद इसीलिए स्वामी के बयानों में तमाम विरोधाभास मिलते हैं।

लेकिन डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी के कर्म हमेशा से हिन्दू-हित, दक्षिणपंथी/मुक्त-बाज़ार अर्थव्यवस्था, और उदारवादी (असली अर्थों में, “लिबरल” का मुलम्मा ओढ़कर घोर असहिष्णुता फ़ैलाने वाले धूर्तों की तरह नहीं) लोकतान्त्रिक राजनीति की दिशा से शायद ही इधर-उधर फिरते दिखें। शायद इसीलिए अपनी खुद की इसी भ्रामक ‘legacy’ को ध्यान में रखकर गीता और महाभारत को बार-बार पढ़ने वाले और भगवान कृष्ण को अपना पसंदीदा ‘हीरो’ मानने वाले स्वामी बताते हैं कि वह खुद भी लोगों का आकलन उनके शब्दों नहीं, कृत्यों से करते हैं। और किसी इन्सान को कसने के लिए उसकी खुद की तय की हुई कसौटी से कड़ी शायद ही कोई हो सकती हो!

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