Monday, August 2, 2021
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देश की अखंडता को हज़ार खतरे हैं साहब! बंद कीजिए ‘अहीर-चमार’ रेजीमेंट बनाने की लड़ाई

एक तरफ जहाँ सरकार 'सबका साथ-सबका विकास' का नारा देकर देश को एकजुट करने का प्रयास कर रही है, वहीं ये नेता देश में अलग-अलग जातियों की रेजीमेंट बनाने को चुनावी मुद्दा मानकर बैठे हुए हैं।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने शुक्रवार(अप्रैल 5, 2019) को अपनी पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया। इसमें उन्होंने चुनाव जीतने पर अहीर रेजीमेंट बनाने का वादा किया है। जिसके बाद भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर रावण ने उनपर जमकर निशाना साधा। दरअसल, चंद्रशेखर ने अखिलेश की अहीर बख्तरबंद रेजीमेंट और गुजरात इन्फैंट्री वाले बिंदु को आधार बनाकर कहा कि अखिलेश ने अपनी पार्टी के घोषणा पत्र में अहीर रेजीमेंट बनाने का वादा किया है, लेकिन वो चमार रेजीमेंट बनाना भूल गए हैं।

चंद्रशेखर ने 7 अप्रैल को ट्वीट करते हुए कहा, “अखिलेश यादव जी आपको अहीर रेजिमेंट तो याद रही परंतु चमार रेजिमेंट को भूल गए, जबकि हम काफी समय से चमार रेजिमेंट को बहाल करने की माँग कर रहे हैं। अभी से हमारे समाज की अनदेखी करना शुरू कर दिया है। प्रमोशन में रिजर्वेशन बिल पर भी आपने अबतक जुबान नहीं खोली है।”

सपा और बसपा में हुए गठबंधन के बाद एक तरफ जहाँ चंद्रशेखर रावण कई मौकों पर खुद को मायावती का बेटा बताते रहे हैं, वहीं सपा से उनका मनमुटाव समय-समय पर देखने को मिलता रहा है। हाल ही में अखिलेश और मुलायम सिंह को वह बीजेपी का एजेंट तक बता चुके हैं। इस छींटाकशी का कोई अंत नहीं है क्योंकि एक बार तो चंद्रशेखर रावण मायावती को मनुवादी भी बता चुके हैं

ऐसी परिस्थितियों में कहना गलत नहीं होगा कि इस समय पूरे विपक्ष की हालत एक जैसी हो चुकी है। सब भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए लुभावने वादे कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस का हाल हम उसके घोषणा पत्र में देख ही चुके हैं। अब अखिलेश, मायावती और चंद्रशेखर की राजनीति भी उनपर सवालिया निशान लगा रही है। एक तरफ जहाँ सरकार ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा देकर देश को एकजुट करने का प्रयास कर रही है, वहीं ये नेता देश में अलग-अलग जातियों की रेजीमेंट बनाने को चुनावी मुद्दा मानकर बैठे हुए हैं।

दलितों के उत्थान पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ये लोग आज जातिवाद को खत्म करने की जगह पर जातियों को पहचान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। यकीनन आजादी से पहले बाद के भारत में दलितों को ‘दलित’ बताकर पहचान दिलाने के लिए ऐसे ही राजनेता जिम्मेदार हैं, जो जाति को आधार बनाकर राजनीति करते नहीं थकते। यहाँ यह भी याद रखना आवश्यक है कि भारतीय सेना में रेजिमेंट सिस्टम अंग्रेज़ों का बनाया हुआ है। अंग्रेज़ों ने कुछ क्षेत्रों और जातियों के लोगों को ‘मार्शल कास्ट’ घोषित किया था। ब्रिटिश अधिकारी नस्लभेदी विचारधारा से ग्रसित होते थे इसीलिए कुछ क्षेत्र विशेष या जाति के लोगों के प्रति उनकी यह धारणा थी कि उस जाति के लोगों का जन्म युद्ध लड़ने के लिए ही हुआ है।

क्षेत्र और जाति विशेष के आधार पर ही अंग्रेज़ों ने सेना की इन्फैंट्री में रेजिमेंट बनाई थी। आज की भारतीय सेना एक मॉडर्न फ़ोर्स है और वह उस पुरातन औपनिवेशिक अवधारणा में विश्वास नहीं करती। हालाँकि रेजीमेंट सिस्टम आज भी हैं और प्रत्येक रेजिमेंट का अपना गौरवशाली इतिहास है। लेकिन यह भी सत्य है कि सेना में देश के प्रत्येक क्षेत्र या जातीय समुदाय की अपनी अलग रेजिमेंट नहीं है। और यदि किसी क्षेत्र या जाति के नाम पर रेजिमेंट नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस क्षेत्र अथवा जाति, समुदाय, पंथ के लोग हीन हैं। वास्तव में स्वतंत्रता के बाद भारतीय सेना ने यह निर्णय लिया था कि रेजिमेंट का नाम किसी क्षेत्र या समुदाय के नाम पर नहीं रखा जाएगा। 

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