Friday, November 27, 2020
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दुष्यंत चौटाला हरियाणा में नहीं बन पाएँगे किंग मेकर, ये 3 राजनीतिक समीकरण हैं उनके खिलाफ

मैजिक आँकड़ों तक पहुँचने के लिए अगर निर्दलीय या अन्य छोटे-मोटे दलों के विधायक मौजूद हों (जिसकी संख्या फिलहाल 9 दिख रही है) तो सबसे बड़ी पार्टी क्या करेगी? क्या अगले 5 साल तक वो बड़े दल के नखरे झेलेगी? या फिर...

लंबे-चौड़े डील-डौल वाले जेजेपी के दुष्यंत चौटाला बड़े चौड़े होकर घूम रहे हैं। जीत की खुमारी के बाद यह स्वभाविक भी है। देश के उप-प्रधानमंत्री से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री तक की राजनीतिक विरासत जिसे मिली हो, जिसके पास सबसे युवा सांसद का तमगा रहा हो, उसके लिए यह जीत तब और ज्यादा मायने रखती है, जब पिता और दादा जेल में हों। खुद की बनाई पार्टी नई हो। लेकिन 10 सीटों पर जीत लगभग पक्की कर चुके दुष्यंत राजनीति की सबसे पुरानी लाइन भूल जाते हैं – कुछ भी संभव है यहाँ।

हरियाणा चुनाव के परिणाम लगभग स्पष्ट हो चुके हैं। BJP 46 के मैजिक आँकड़े से पीछे रह गई है। पीछे तो कॉन्ग्रेस भी रह गई है। लेकिन मामला अंतर का है, मामला गणित का है। अभी तक का गणित BJP को 40 जबकि कॉन्ग्रेस को 30 सीट दे रहा है। मतलब मैजिक आँकड़े तक पहुँचने के लिए BJP को चाहिए 6 विधायक जबकि कॉन्ग्रेस को चाहिए 16 विधायक।

अब बात दुष्यंत चौटाला के किंग मेकर बनने की। और उस गणित की, जो उनके सपने पर पानी फेर सकता है। अभी तक जेजेपी के 10 विधायक बनते दिख रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि दुष्यंत चौटाला पूरी पार्टी के साथ कॉन्ग्रेस से गठजोड़ कर भी लेते हैं तो भी मैजिक नंबर से 6 पीछे ही रह जाएँगे। फिर इस 6 की जुगाड़ उन्हीं 9 अन्य विधायकों (अगर अभी के आँकड़े देखते हुए ये सभी बन जाते हैं तो, जिनमें 6 निर्दलीय भी हैं) में से करनी होगी, जिन पर BJP की भी निगाहें होंगी।

ग्राफिक्स साभार: Times of India

किंग मेकर दुष्यंत चौटाला वाली बात स्पष्ट रूप से खारिज तब हो जाती, जब वो कॉन्ग्रेस से हाथ मिलाते हैं। इस समीकरण में किंग मेकर दुष्यंत नहीं बल्कि निर्दलीय होंगे।

बीजेपी के साथ जाने का मन बना लिया तो… तो क्या BJP भी आपके साथ सत्ता में रहने का मन बना सकती है? शायद हाँ, शायद ना! लेकिन आँकड़े और राजनीतिक गणित ‘ना’ की ओर इशारा कर रहे हैं। कैसे? वो ऐसे क्योंकि राज्य में राजनीतिक वर्चस्व वाली पार्टी के साथ (जिसके विधायकों की संख्या 10 हो) सबसे बड़ी पार्टी तब तक समझौता करने से बचेगी, जब तक कोई और विकल्प उपलब्ध न हो। क्योंकि बड़ी और नामी पार्टी के अपने नखरे होंगे, पद की लालसा होगी, चुनाव बाद जनता के सामने मुद्दे उठाने का प्रेशर होगा… आदि-इत्यादि।

लेकिन मैजिक आँकड़ों तक पहुँचने के लिए अगर निर्दलीय या अन्य छोटे-मोटे दलों के विधायक मौजूद हों (जिसकी संख्या फिलहाल 9 दिख रही है) तो सबसे बड़ी पार्टी क्या करेगी? क्या अगले 5 साल तक वो बड़े दल के नखरे झेलेगी? या फिर निर्दलीय विधायकों को सत्ता में रखने की लॉलीपॉप दिखा उनके दम पर सरकार चलाएगी? ऐसा नहीं है कि इसमें रिस्क नहीं है, क्योंकि निर्दलीय बिना पेंदी के लोटे की तरह होते हैं, कभी भी, किसी के भी साथ पासा पलट लेते हैं। लेकिन यह समस्या आजकल हर दल के साथ हो गई है। इसलिए वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ा दल निर्दलीय विधायकों पर ही दाँव खेलेगा।

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चंदन कुमारhttps://hindi.opindia.com/
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