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Saturday, May 30, 2020
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तीसरा चरण: कहीं चाचा-भतीजा की लड़ाई, कहीं सबरीमाला का मुद्दा, कहीं 3 यादवों की ज़ंग

पुरी से संबित पात्रा, अनंतनाग से महबूबा मुफ़्ती, पीलीभीत से वरुण गाँधी और पश्चिम बंगाल में पूर्व राष्ट्रपति के पुत्र अभिजीत मुख़र्जी के भाग्य का भी फ़ैसला होना है।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

लोकसभा के तीसरे चरण के लिए चुनाव प्रचार का शोर थम चुका है। अब गेंद पूरी तरह से जनता के पाले में है। तीसरे चरण में 14 राज्यों की 116 सीटों पर मतदान होना है। इसमें चुनावी रूप से महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश की 10 सीटें भी शामिल हैं। जहाँ इस चुनाव में एक तरफ़ समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा का सवाल है, वहीं दूसरी तरफ़ कर्णाटक-महाराष्ट्र में भाजपा की गढ़ बचाने की चुनौती है। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की किस्मत का फ़ैसला भी इसी चुनाव में होगा। आइए एक नज़र डालते हैं इस चुनाव में हिस्सा ले रहे दिग्गज उम्मीदवारों का, जिसकी किस्मत का फैसला जनता को कल मंगलवार (अप्रैल 23, 2019) को करना है।

गाँधीनगर से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह

गाँधीनगर से भाजपा अध्यक्ष इस बार ख़ुद चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा की पारम्परिक सीट रही गाँधीनगर से पूर्व भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण अडवाणी जीतते रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी भी यहाँ से जीत दर्ज कर चुके हैं। अगर अमित शाह को यहाँ से जीत मिलती है तो वो तीसरे ऐसे सांसद होंगे, जो भाजपा अध्यक्ष भी रहे। हालाँकि अमित शाह नामांकन के बाद से सिर्फ़ 2 बार ही गाँधीनगर जा पाए हैं लेकिन वहाँ उनके प्रचार अभियान का संचालन एक विश्वस्त टीम कर रही है। अमित शाह की लड़ाई गाँधीनगर से दो बार विधायक रहे सीजे चावड़ा से है। जब अडवाणी 2009 में भारत भर में प्रचार में व्यस्त थे, गाँधीनगर में उनके प्रचार अभियान की ज़िम्मेदारी शाह ने ही संभाली थी।

मैनपुरी से सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव

मैनपुरी सपा के प्रमुख परिवार की पारम्परिक सीट रही है। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी से पहली बार 1996 में चुनाव लड़ा था। उसके बाद से अभी तक इस सीट पर सपा का ही कब्ज़ा रहा है। पिछले चुनाव में भी मुलायम ने यहाँ से जीत दर्ज की थी लेकिन दो सीटों से चुनाव लड़ने के कारण उन्हें ये सीट छोड़नी पड़ी थी। उपचुनाव में तेज प्रताप सिंह यादव ने जीत दर्ज की। वो मुलायम के बड़े भाई के पोते हैं और लालू यादव के दामाद हैं। मुलायम 2004 और 2009 में भी यहाँ से जीत दर्ज कर चुके हैं। 28 वर्ष की उम्र में 1967 में वे पहली बार विधायक यहीं की सीट (जसवंतनगर) से बने थे। उनका मुक़ाबला इस बार भाजपा के प्रेम सिंह शाक्य से होना है।

रोम पोप का, मधेपुरा गोप का

बिहार की मधेपुरा सीट पर भी इस बार रोचक लड़ाई है। दिग्गज नेता पप्पू यादव की किस्मत का भी कल फ़ैसला होना है। यहाँ से 4 बार सांसद रहे शरद यादव ने कभी इस सीट पर लालू यादव को हरा दिया था। पप्पू यादव इस सीट से शरद यादव को हरा चुके हैं। पिछले 40 वर्षों से इस सीट पर किसी न किसी यादव का ही कब्ज़ा रहा है। इस बार महागठबंधन में स्थान पाने में असफल रहे पप्पू यादव अपनी जन अधिकार पार्टी से मैदान में हैं। उनका मुक़ाबला राजद के सिंबल पर लड़ रहे पूर्व जदयू अध्यक्ष शरद यादव और जदयू के दिनेश चंद्र यादव से होगा। बिहार में मंत्री रह चुके दिनेश के लिए ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुनाव प्रचार किया है।

फ़िरोज़ाबाद में चाचा-भतीजा की लड़ाई

फ़िरोज़ाबाद सीट से इस बार शिवपाल सिंह यादव और उनके भतीजे अक्षय यादव में लड़ाई है। अक्षय रामगोपाल यादव के पुत्र हैं। भाजपा नेता डॉ चंद्रसेन जादौन के कारण त्रिकोणीय बने इस मुक़ाबले को लेकर ख़ुद मुलायम सिंह यादव ख़ामोश हैं। सपा के कई नेताओं को अपने पाले में कर के शिवपाल ने अपने भतीजे के लिए ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है, जिससे वो बहार नहीं निकल पा रहे। हालाँकि, अक्षय को 2014 में इस सीट से जीत मिली थी लेकिन जो नेता उस वक़्त अक्षय के साथ थे, वो अब शिवपाल के लिए प्रचार कर रहे हैं। माया-अखिलेश-चौधरी अजीत की साझा रैली के बावजूद यहाँ शिवपाल डटे हुए हैं। चाचा-भतीजे की इस लड़ाई में भाजपा की जीत के लिए शाह और योगी ने यहाँ रैलियाँ भी कीं। यही वो सीट है जहाँ से कभी राज बब्बर ने डिंपल यादव को हरा दिया था।

शशि थरूर के ख़िलाफ़ इस बार मज़बूत उम्मीदवार

कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर के ख़िलाफ़ इस बार भाजपा ने केरल में पार्टी के अध्यक्ष रहे पुराने संघी कुमानम राजशेखरन को उतारा है। राजशेखरन ने मिजोरम के राज्यपाल पद से इस्तीफा देकर लोकसभा चुनाव में कूदने का फ़ैसला लिया है। स्थानीय ओपिनियन पोल्स में राजशेखरन को बढ़त मिलती दिख रही है। पिछले 2 चुनावों से यहाँ से जीत रहे थरूर को पहली बार कड़ी चुनौती मिल रही है। पिछले चुनाव में अंतिम राउंड में थरूर को जीत तो मिल गई थी लेकिन उनका मत प्रतिशत अच्छा-ख़ासा गिरा था। सबरीमाला के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे अनुभवी राजशेखरन कॉन्ग्रेस और लेफ्ट के विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं। जहाँ 2009 में थरूर की जीत का अंतर क़रीब 1 लाख था, 2014 में यह घटकर सिर्फ़ 15,000 रह गया था।

उपर्युक्त उम्मीदवारों के अलावा पुरी से संबित पात्रा, अनंतनाग से महबूबा मुफ़्ती, पीलीभीत से वरुण गाँधी और पश्चिम बंगाल में पूर्व राष्ट्रपति के पुत्र अभिजीत मुख़र्जी के भाग्य का भी फ़ैसला होना है।

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