Saturday, November 28, 2020
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₹7 लाख करोड़ के खिलौना मार्केट में हाथ आजमाएँ स्टार्ट-अप, देशी डॉग्स को बनाएँ साथी: ‘मन की बात’ में PM मोदी

"Team up for toys… आइए मिलकर खिलौने बनाएँ। अब सभी के लिए लोकल खिलौनों के लिए वोकल होने का समय है। इस बात पर मंथन करें कि भारत के बच्चों को नए-नए खलौने कैसे मिलें, भारत, Toy Production का बहुत बड़ा हब कैसे बने।"

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (अगस्त 30, 2020) को अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ के जरिए देशवासियों को सम्बोधित किया, जिसमें उन्होंने कोरोना वायरस आपदा से निपटने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों से लेकर भारत में तकनीक के विस्तार पर बात की। पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ के दौरान सुरक्षाबलों के साथ काम कर रहे कुत्तों की भी चर्चा करते हुए उनके योगदानों को सराहा।

पीएम मोदी ने कहा कि आमतौर पर ये समय उत्सव का होता है, जगह-जगह मेले लगते हैं, धार्मिक पूजा-पाठ होते हैं। कोरोना के इस संकट काल में लोगों में उमंग तो है, उत्साह भी है, लेकिन, हम सबको मन को छू जाए, वैसा अनुशासन भी है। उन्होंने कहा कि बहुत एक रूप में देखा जाए तो नागरिकों में दायित्व का एहसास भी है, लोग अपना ध्यान रखते हुए, दूसरों का ध्यान रखते हुए, अपने रोजमर्रा के काम भी कर रहे हैं।

उन्होंने ध्यान दिलाया कि देश में हो रहे हर आयोजन में जिस तरह का संयम और सादगी इस बार देखी जा रही है, वो अभूतपूर्व है। गणेशोत्सव भी कहीं ऑनलाइन मनाया जा रहा है, तो, ज्यादातर जगहों पर इस बार इकोफ्रेंडली गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की गई है। पीएम ने कहा कि बहुत बारीकी से अगर देखेंगे, तो एक बात अवश्य हमारे ध्यान में आयेगी – हमारे पर्व और पर्यावरण। इन दोनों के बीच एक बहुत गहरा नाता रहा है।

बकौल प्रधानमंत्री, जहाँ एक ओर हमारे पर्वों में पर्यावरण और प्रकृति के साथ सहजीवन का सन्देश छिपा होता है तो दूसरी ओर कई सारे पर्व प्रकृति की रक्षा के लिए ही मनाए जाते हैं। जैसे, बिहार के पश्चिमी चंपारण में, सदियों से थारु आदिवासी समाज के लोग 60 घंटे के लॉकडाउन या उनके ही शब्दों में कहें तो ’60 घंटे के बरना’ का पालन करते हैं। प्रकृति की रक्षा के लिये बरना को थारु समाज ने अपनी परंपरा का हिस्सा बना लिया है और सदियों से बनाया है।

उन्होंने कहा कि इस दौरान न कोई गाँव में आता है, न ही कोई अपने घरों से बाहर निकलता है और लोग मानते हैं कि अगर वो बाहर निकले या कोई बाहर से आया, तो उनके आने-जाने से, लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियों से, नए पेड़-पौधों को नुकसान हो सकता है। बरना की शुरुआत में भव्य तरीके से हमारे आदिवासी भाई-बहन पूजा-पाठ करते हैं और उसकी समाप्ति पर आदिवासी परम्परा के गीत-संगीत, नृत्य जमकर के उसके कार्यक्रम भी होते हैं।

‘मन की बात’ में केरल की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आजकल ओणम का पर्व भी धूम-धाम से मनाया जा रहा है। ये पर्व चिनगम महीने में आता है। इस दौरान लोग कुछ नया खरीदते हैं, अपने घरों को सजाते हैं, पूक्क्लम बनाते हैं, ओनम-सादिया का आनंद लेते हैं, तरह-तरह के खेल और प्रतियोगिताएँ भी होती हैं। ओणम की धूम तो, आज, दूर-सुदूर विदेशों तक पहुँची हुई है। उन्होंने कहा कि अमेरिका हो, यूरोप हो, या खाड़ी देश हों, ओणम का उल्लास आपको हर कहीं मिल जाएगा।

ओणम एक अंतरराष्ट्रीय त्यौहार बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि ओणम हमारी कृषि से जुड़ा हुआ पर्व है। ये हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी एक नई शुरुआत का समय होता है। किसानों की शक्ति से ही तो हमारा जीवन, हमारा समाज चलता है। हमारे पर्व किसानों के परिश्रम से ही रंग-बिरंगे बनते हैं। पीएम ने कहा कि हमारे अन्नदाता को, किसानों की जीवनदायिनी शक्ति को तो वेदों में भी बहुत गौरवपूर्ण रूप से नमन किया गया है। उन्होंने ऋगवेद के मन्त्र है ‘अन्नानां पतये नमः, क्षेत्राणाम पतये नमः’ की भी चर्चा की।

अर्थात, अन्नदाता को नमन है, किसान को नमन है। पीएम ने कहा कि हमारे किसानों ने कोरोना की इस कठिन परिस्थितियों में भी अपनी ताकत को साबित किया है | हमारे देश में इस बार खरीफ की फसल की बुआई पिछले साल के मुकाबले 7 प्रतिशत ज्यादा हुई है। उन्होंने जानकारी दी कि धान की रुपाई इस बार लगभग 10 प्रतिशत, दालें लगभग 5 प्रतिशत, मोटे अनाज-Coarse Cereals लगभग 3 प्रतिशत, Oilseeds लगभग 13 प्रतिशत, कपास लगभग 3 प्रतिशत ज्यादा बोई गई है। उन्होंने इसके लिए किसानों को धन्यवाद दिया।

पीएम ने ध्यान दिलाया कि कोरोना के इस कालखंड में देश कई मोर्चों पर एक साथ लड़ रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ, कई बार मन में ये भी सवाल आता रहा कि इतने लम्बे समय तक घरों में रहने के कारण, मेरे छोटे-छोटे बाल-मित्रों का समय कैसे बीतता होगा। उन्होंने बताया कि गांधीनगर की चिल्ड्रन यूनिवर्सिटी जो दुनिया में एक अलग तरह का प्रयोग किया गया है, भारत सरकार के महिला और बाल विकास मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, सूक्ष्म-लघु और मध्यम उद्योग मंत्रालय, इन सभी के साथ मिलकर, हम बच्चों के लिये क्या कर सकते हैं, इस पर मंथन किया, चिंतन किया।

उन्होंने बताया कि उनके लिए ये बहुत सुखद था, लाभकारी भी था क्योंकि एक प्रकार से ये उनके लिए भी कुछ नया जानने का, नया सीखने का अवसर बन गया। उन्होंने बताया कि चिंतन का विषय था- खिलौने और विशेषकर भारतीय खिलौने। इस बात पर मंथन किया गया कि भारत के बच्चों को नए-नए खलौने कैसे मिलें, भारत, Toy Production का बहुत बड़ा हब कैसे बने। पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में आगे कहा:

“खिलौने जहाँ एक्टिविटी को बढ़ाने वाले होते हैं, तो खिलौने हमारी आकांक्षाओं को भी उड़ान देते हैं। खिलौने केवल मन ही नहीं बहलाते, खिलौने मन बनाते भी हैं और मकसद गढ़ते भी हैं। मैंने कहीं पढ़ा, कि, खिलौनों के सम्बन्ध में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि सबसे अच्छा खिलौना वो होता है जो इन्कम्प्लीट हो। ऐसा खिलौना, जो अधूरा हो, और, बच्चे मिलकर खेल-खेल में उसे पूरा करें। गुरुदेव टैगोर ने कहा था कि जब वो छोटे थे तो खुद की कल्पना से, घर में मिलने वाले सामानों से ही, अपने दोस्तों के साथ, अपने खिलौने और खेल बनाया करते थे। लेकिन, एक दिन बचपन के उन मौज-मस्ती भरे पलों में बड़ों का दखल हो गया। हुआ ये था कि उनका एक साथी, एक बड़ा और सुंदर सा, विदेशी खिलौना लेकर आ गया। खिलौने को लेकर इतराते हुए अब सब साथी का ध्यान खेल से ज्यादा खिलौने पर रह गया।”

“हर किसी के आकर्षण का केंद्र खेल नहीं रहा, खिलौना बन गया। जो बच्चा कल तक सबके साथ खेलता था, सबके साथ रहता था, घुलमिल जाता था, खेल में डूब जाता था, वो अब दूर रहने लगा। एक तरह से बाकी बच्चों से भेद का भाव उसके मन में बैठ गया। महँगे खिलौने में बनाने के लिये भी कुछ नहीं था, सीखने के लिये भी कुछ नहीं था। यानी कि, एक आकर्षक खिलौने ने एक उत्कृष्ठ बच्चे को कहीं दबा दिया, छिपा दिया, मुरझा दिया। इस खिलौने ने धन का, सम्पत्ति का, जरा बड़प्पन का प्रदर्शन कर लिया लेकिन उस बच्चे की क्रिएटिव स्पिरिट को बढ़ने और सँवरने से रोक दिया। खिलौना तो आ गया, पर खेल ख़त्म हो गया और बच्चे का खिलना भी खो गया। इसलिए, गुरुदेव कहते थे, कि, खिलौने ऐसे होने चाहिए जो बच्चे के बचपन को बाहर लाए, उसकी क्रिएटिविटी को सामने लाए।”

“बच्चों के जीवन के अलग-अलग पहलू पर खिलौनों का जो प्रभाव है, इस पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी बहुत ध्यान दिया गया है। खेल-खेल में सीखना, खिलौने बनाना सीखना, खिलौने जहाँ बनते हैं वहाँ की विजिट करना, इन सबको सिलेबस का हिस्सा बनाया गया है। हमारे देश में लोकल खिलौनों की बहुत समृद्ध परंपरा रही है। कई प्रतिभाशाली और कुशल कारीगर हैं, जो अच्छे खिलौने बनाने में महारत रखते हैं। भारत के कुछ क्षेत्र Toy Clusters यानी खिलौनों के केन्द्र के रूप में भी विकसित हो रहे हैं। जैसे, कर्नाटक के रामनगरम में चन्नापटना, आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा में कोंडापल्ली, तमिलनाडु में तंजौर, असम में धुबरी, उत्तर प्रदेश का वाराणसी – कई ऐसे स्थान हैं, कई नाम गिना सकते हैं। आपको ये जानकार आश्चर्य होगा कि वैश्विक खिलौना इंडस्ट्री, 7 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक की है। 7 लाख करोड़ रुपयों का इतना बड़ा कारोबार, लेकिन, भारत का हिस्सा उसमें बहुत कम है। अब आप सोचिए कि जिस राष्ट्र के पास इतनी विरासत हो, परम्परा हो, विविधता हो, युवा आबादी हो, क्या खिलौनों के बाजार में उसकी हिस्सेदारी इतनी कम होनी, हमें, अच्छा लगेगा क्या?”

“गृह उद्योग हो, छोटे और लघु उद्योग हो, MSMEs हों, इसके साथ-साथ बड़े उद्योग और निजी उद्यमी भी इसके दायरे में आते हैं। इसे आगे बढ़ाने के लिए देश को मिलकर मेहनत करनी होगी | अब जैसे आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में श्रीमान सी.वी. राजू हैं। उनके गाँव के एति-कोप्पका खिलौने एक समय में बहुत प्रचलित थे। इनकी खासियत ये थी कि ये खिलौने लकड़ी से बनते थे, और दूसरी बात ये कि इन खिलौनों में आपको कहीं कोई एंगल या कोण नहीं मिलता था। ये खिलौने हर तरफ से गोल होते थे, इसलिए, बच्चों को चोट की भी गुंजाइश नहीं होती थी। सी.वी. राजू ने एति-कोप्पका खिलौने के लिये, अब, अपने गाँव के कारीगरों के साथ मिलकर एक तरह से नया अभियान शुरू कर दिया है। मैं अपने स्टार्ट-अप मित्रों को, हमारे नए उद्यमियों से कहता हूँ – Team up for toys… आइए मिलकर खिलौने बनाएँ। अब सभी के लिये लोकल खिलौनों के लिए वोकल होने का समय है।”

‘मन की बात’ में पीएम मोदी ने आगे कहा कि भारत एक विशाल देश है, खान-पान में ढेर सारी विविधता है, भारत एक विशाल देश है, खान-पान में ढेर सारी विविधता है। हमारे देश में छह अलग-अलग ऋतुएँ होती हैं, अलग-अलग क्षेत्रों में वहाँ के मौसम के हिसाब से अलग-अलग चीजें पैदा होती हैं। पीएम ने हर क्षेत्र के मौसम, वहाँ के स्थानीय भोजन और वहाँ पैदा होने वाले अन्न, फल, सब्जियों के अनुसार एक पोषक, न्यूट्रिएंट रिच डाइट प्लान बनाने पर जोर दिया। जैसे, अब जैसे Millets – मोटे अनाज – रागी है, ज्वार है, ये बहुत उपयोगी पोषक आहार हैं। उन्होंने बताया कि एक “भारतीय कृषि कोष’ तैयार किया जा रहा है, इसमें हर एक जिले में क्या-क्या फसल होती है, उनकी न्यूट्रिशन वैल्यू कितनी है, इसकी पूरी जानकारी होगी।

पीएम मोदी ने ‘मन की बात’ में कहा कि हाल ही में हमारे सुरक्षाबलों के दो जांबाज किरदारों की चर्चा हुई, एक है सोफी और दूसरी विदा। सोफी और विदा, भारतीय सेना के श्वान हैं, डॉग्स हैं और उन्हें Chief of Army Staff ‘Commendation Cards’ से सम्मानित किया गया है। पीएम ने बताया कि सोफी और विदा को ये सम्मान इसलिए मिला, क्योंकि इन्होंने अपने देश की रक्षा करते हुए, अपना कर्तव्य बखूबी निभाया है। हमारी सेनाओं में, हमारे सुरक्षाबलों के पास, ऐसे, कितने ही बहादुर श्वान है, डॉग्स हैं जो देश के लिए जीते हैं और देश के लिये अपना बलिदान भी देते हैं।

उन्होंने बताया कि कितने ही बम धमाकों को, कितनी ही आंतकी साजिशों को रोकने में ऐसे डॉग्स ने बहुत अहम् भूमिका निभाई है। एक डॉग बलराम ने 2006 में अमरनाथ यात्रा के रास्ते में, बड़ी मात्र में, गोला-बारूद खोज निकाला था। 2002 में डॉग्स भावना ने IED खोजा था। IED निकालने के दौरान आंतकियों ने विस्फोट कर दिया, और श्वान बलिदान हो गये। दो-तीन वर्ष पहले, छत्तीसगढ़ के बीजापुर में CRPF का sniffer dog ‘Cracker’ भी IED ब्लास्ट में बलिदान हो गया था। पीएम ने बताया कि बीड में रॉकी ने 300 से ज्यादा केसों को सुलझाने में पुलिस की मदद की थी। डॉग्स की Disaster Management और Rescue Missions में भी बहुत बड़ी भूमिका होती हैं।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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