Tuesday, August 16, 2022
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गर्भवती का भ्रूण आग में फेंकने से लेकर चूल्हे से गोधरा ट्रेन में आग तक: गुजरात दंगों पर वो 5 झूठ, जो नरेंद्र मोदी और हिन्दुओं को फँसाने के लिए फैलाए गए

हिरासत में मौत के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने झूठ बोला था कि वो 27 फरवरी 2022 को नरेंद्र मोदी से मिला था। मोदी विरोधी लॉबी का फेस बने भट्ट ने 2011 में आरोप लगाया कि 2002 के गोधरा दंगों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 फरवरी 2002 को अपने आवास पर एक बैठक बुलाई थी, ताकि हिन्दुओं को मुस्लिमों के खिलाफ गुस्सा जाहिर करने दिया जाए, जिससे राज्य में गोधरा जैसी घटना की पुनरावृत्ति न हो।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 जून, 2022) को बड़ा फैसला लेते हुए 2002 के गुजरात दंगों में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एसआईटी के द्वारा दी गई क्लीन चिट को बरकरार रखा। कोर्ट ने ये फैसला 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में हिंसा के दौरान मारे गए कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया। इस याचिका में मामले की जाँच के लिए गठित एसआईटी द्वारा पीएम मोदी और 62 अन्य को क्लीन चिट दिए जाने को चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को ही अयोग्य करार दिया। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली बेंच ने गुजरात दंगों में साजिश के आरोपों को खारिज कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के साथ ही गोधरा में ट्रेन जलाए जाने और उसके बाद भड़के दंगे की आँच में सियासी रोटियाँ सेंकने की कोशिश करने वालों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। याचिका दायर करने वालों का आरोप था कि गुजरात के तत्कालीन सीएम रहे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में साजिश के तहत इस घटना को अंजाम दिया गया था।

गोधरा के दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही पीएम मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। हालाँकि, उनके विरोधी काल्पनिक कहानियाँ गढ़ने से बाज नहीं आ रहे। ऐसे में इन दुष्प्रचारों को खारिज करना भी जरूरी था। फिर भी गोधरा ट्रेन जलने की घटना और उसके बाद हुए दंगों के बारे में गलत सूचनाओं, अफवाहों, और फर्जी खबरों से अपने करियर को गढ़ने की कोशिश करने वाले दुष्प्रचारकों के उन मिथकों का जिक्र भी जरूरी है। इसी तरह से यहाँ ऐसे कई मिथक हैं, जो कि गोधरा में एक ट्रेन के डिब्बे में महिलाओं और बच्चों सहित 59 हिंदुओं को जिंदा जलाने की घटना के बाद पैदा हुए।

मिथक 1: गर्भवती कौसर बानो का बलात्कार और पेट से भ्रूण बाहर निकालना

गुजरात दंगों के बाद कई लेफ्ट लिबरल मीडिया ने बड़े पैमाने पर ये खबर फैलाई कि एक गर्भवती मुस्लिम महिला का हिन्दुओं की भीड़ ने पहले बलात्कार किया और फिर तलवार से उसके पेट को फाड़कर उसके भ्रूण को बाहर निकाल लिया और उसे आग में फेंक दिया।

कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि वो कौसर बानो की भाभी सायरा बानो थी। सायरा बानो ने दावा किया, “उन्होंने मेरी भाभी की बहन कौसर बानो के साथ जो किया वह भयानक और जघन्य था। वह नौ माह की गर्भवती थी। उन्होंने उसका पेट काट दिया, उसके भ्रूण को तलवार से निकाल लिया और उसे धधकती आग में फेंक दिया। फिर उन्होंने उसे भी जला दिया।” कई कहानियाँ ऐसी भी हैं कि भ्रूण को तलवार से मार दिया गया था, जबकि कुछ में भ्रूण को तलवार की नोक पर घुमाया गया और फिर आग में फेंक दिया गया।

साल 2010 में आई एक रिपोर्ट में कौसर का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने भ्रूण को बरकरार पाया। 2 मार्च 2002 को शव परीक्षण करने वाले डॉ जे एस कनोरिया ने विशेष अदालत में सहायक दस्तावेज पेश किए और कहा कि महिला के गर्भ में भ्रूण बरकरार था। भ्रूण का वजन 2500 ग्राम और लंबाई 45 सेमी थी।

इसके अलावा पोस्टमार्टम व गवाहों के जरिए ये भी पता चला कि कौसर बानो की मौत दम घुटने, डर और सदमे से हुई थी और उसके शरीर पर किसी भी तरह की बाहरी या अंदरूनी चोट का कोई निशान नहीं था। उसके शरीर पर किसी तलवार का निशान भी नहीं था। ये पोस्टमार्टम 1 मार्च 2002 को किया गया था। दंगों के दौरान कनोरिया दौरान सरकारी सिविल अस्पताल में कार्यरत थे और उन्होंने बयान दिया था कि पोस्टमॉर्टम के बाद कौसर बानो के भ्रूण को हटा दिया गया था। पोस्टमॉर्टम 1 मार्च 2002 को किया गया था।

मिथक नं 2: चूल्हे से साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग

लिबरल्स हमेशा एक और मिथक फैलाते हैं, जिसमें दावे किए जाते हैं कि ‘आकस्मिक आग’ के कारण साबरमती एक्सप्रेस में आग लगी। हालाँकि, 27 फरवरी 2002 की गोधरा ट्रेन जलने की घटना की जाँच के लिए गुजरात सरकार द्वारा नियुक्त जाँच आयोग ‘नानावती-मेहता आयोग‘ ने इस दावे का खंडन किया था। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है, “गवाह ने इस बात से इनकार किया है कि कोच में एक बर्तन में ज्वलनशील तरल पदार्थ गिरने से कोच में ऐसी आग लग सकती थी। गवाह ने अपने कार्यालय द्वारा उस कोच की जाँच के समय ली गई तस्वीरों को पेश किया था।”

इसके अलावा गोधरा के दंगों के बाद एफएसएल में वैज्ञानिक मुकेश जोशी 2002 में तीन बार गोधरा गए थे। उन्होंने देखा था, “कोच एस/6 के बाहरी हिस्से पर पत्थरों से टकराने के कारण उसके निशान पड़े हुए हैं। कोच एस/6 और एस/7 के बाहरी हिस्से में भी जलने के निशान थे।”

नानावटी-मेहता आयोग ने घटना के विभिन्न प्रत्यक्षदर्शियों से भी बात की थी। इसमें कईयों ने बताया कि जैसे ही ट्रेन चली भीड़ ने डिब्बे के बाईं ओर से पथराव शुरू कर दिया था। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था, “सज्जनलाल रानीवाल ने कहा है कि जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म से बाहर निकली, बाईं ओर खड़ी भीड़ ने उस पर पथराव करना शुरू कर दिया। इसके चलते उन्हें उनके डिब्बे की खिड़कियों के दरवाजे और शटर बंद करने के लिए कहा गया था। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो सज्जनलाल के ऐसा कहने का और कोई कारण नहीं होता। वो तब तक खिड़कियाँ तब तक बंद नहीं करते, जब तक कि उसे ऐसा करने के लिए मजबूर न किया गया हो।”

आयोग ने आगे कहा, “यात्रियों ने यह भी कहा है कि चूँकि ट्रेन के बाईं ओर के लोगों ने ट्रेन पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया था, इसलिए उन्हें अपने कोच की खिड़कियाँ बंद करने की जरूरत थी। कुछ गवाहों के मुताबिक, ट्रेन पर फेंके गए पत्थरों के कारण एक या दो खिड़कियों के शीशे भी टूटे थे। इसी कारण कोच में यात्रियों को उस तरफ की खिड़कियों के टिन/धातु के शटर बंद करने जरूरत थी। हरिप्रसाद ने कहा था कि जिस समय ट्रेन स्टेशन से बाहर निकली, उसी समय से ट्रेन पर पथराव शुरू हो गया था और इस वजह से यात्रियों ने अपने कोच की खिड़कियाँ बंद कर दी थीं। उनके साक्ष्य पर संदेह का कोई कारण नहीं है।”

मिथक नंबर 3: शॉर्ट सर्किट से ट्रेन में आग

साबरमती एक्सप्रेस में आग को लेकर मुकुल सिन्हा के जन संघर्ष मंच ने एक और शिगूफा छोड़ा था, जिसमें साजिश की थ्योरी को ‘शॉर्ट सर्किट’ करार दिया गया था। हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग का यह कहना था, “शॉर्ट सर्किट जन संघर्ष मंच द्वारा प्रचारित एक और संभावना है। कोच में शॉर्ट सर्किट होने की संभावना को दर्शाने के लिए कोई सबूत नहीं दिया गया है और आयोग के समक्ष कोई सामग्री पेश नहीं की गई है। इस संभावना के समर्थन में कारण यह बताया गया है कि पहले कोच में धुआँ था और कुछ देर बाद आग की लपटें दिखाई दीं। आयोग की जाँच में कोच एस/6 के एक भी यात्री से यह नहीं पूछा गया कि क्या कोच में शॉर्ट-सर्किट जैसा कुछ हुआ है।”

इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है, “आयोग द्वारा निरीक्षण के दौरान पक्षकारों की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं की उपस्थिति में यह देखा गया कि बिजली के तार कोच के ऊपरी हिस्सों में थे। अगर शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लगती तो उस जगह बैठे यात्रियों को सबसे पहले इसका पता चलता। ऐसे में नीचे की बैठे यात्री खुद को बचाने के लिए ऊपर की बर्थ पर नहीं चढ़ते। उल्टे जो लोग ऊपर की बर्थ पर बैठे थे, वे फौरन नीचे आ जाते। यात्रियों ने तुरंत चारों दरवाजों से कोच छोड़ दिया होता और इतने लोगों की जान नहीं जाती।”

दुष्प्रचार फैलाने वाले जहाँ इसे आकस्मिक आग की घटना बताते हैं। वहीं जस्टिस नानावती-मेहता समिति की रिपोर्ट (पीडीएफ) ने स्पष्ट किया है कि गोधरा में किस साजिश के कारण 59 हिन्दुओं की मौत हुई। गोधरा रेलवे स्टेशन के ठीक बाद, ‘सिग्नल फलिया’ नामक एक सड़क और एक इलाका है। रिपोर्ट के मुताबिक, “यह पुलिया तक फैली हुई है और आगे ए केबिन की ओर जाती है। यह मुख्य रूप से घाँची मुस्लिमों का इलाका है।” यहाँ जब भी कोई ट्रेन आती, तो बहुत सारे अनधिकृत विक्रेता, मुख्य रूप से घाँची मुस्लिम प्लेटफॉर्म नाश्ता, कोल्ड ड्रिंक, बीड़ी आदि बेचते थे।

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि ट्रेन सुबह 7: 43 बजे प्लेटफॉर्म पर करीब पाँच घंटे की देरी से पहुँची। वहाँ पर इसका केवल 5 मिनट स्टॉप था। सबूतों वाले हिस्से में रिपोर्ट में नरसंहार के एक दिन बाद 28 फरवरी 2002 की मीडिया रिपोर्टों का हवाला है। इसमें मुख्यधारा के मीडिया ने रिपोर्ट किया था कि एक भीड़ ने हिंदुओं को आग लगा दी थी। उन्होंने उल्लेख किया कि हिंदू कारसेवा से लौट रहे थे और भीड़ ने ट्रेन के डिब्बों में पेट्रोल डालकर आग लगा दी।

सिग्नल फलिया पर ट्रेन के रोके जाने को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया ने उल्लेख किया था कि सिग्नल फलिया पर किसी ने चेन खींची थी। ट्रेन के रुकते ही कोच एस 6 और एस 7 पर पथराव से इसकी खिड़कियाँ टूट गईं। इसके बाद पेट्रोल बम अंदर फेंक दिए गए। इंडियन एक्सप्रेस ने भी चश्मदीद गवाहों के बयान दिए कि कैसे भीड़ ने पथराव के बाद कोच को आग लगा दी थी।

मिथक नं 4: कारसेवकों उकसाने वाली मुस्लिम लड़की किडनैप करने की कोशिश

गुजरात दंगों पर चौथी काल्पनिक कहानी एक ‘हाथापाई’ नैरेटिव गढ़ा गया कि ‘कारसेवकों’ ने एक मुस्लिम लड़की का अपहरण करने की कोशिश की। हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग ने इस परिकल्पना को खारिज करते हुए कहा कि कारसेवकों द्वारा एक मुस्लिम लड़की का अपहरण वास्तविकता से परे था। आयोग ने कहा, “इन सभी गवाहों और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्रियों के साक्ष्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि ट्रेन में भीड़भाड़ और ट्रेन के अंदर और बीच के स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर कभी-कभार नारे लगाने के अलावा, रामसेवकों ने कुछ नहीं किया था और पहले कोई घटना नहीं हुई थी।”

आयोग के मुताबिक, हाथापाई के बाद मुस्लिम महिला के अपहरण के ‘प्रयास’ सही नहीं लगता। रिपोर्ट में कहा गया है, “अगर वे वास्तव में वडोदरा जाने के लिए स्टेशन गए होते, तो वे साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हो जाते, क्योंकि यह उन्हें पहले वडोदरा ले जाती, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया था। उनका अपहरण करने का कथित प्रयास उस समय किया गया, जब वे बुक स्टॉल के पास थे। इसका मतलब यह होगा कि वे लगभग प्लेटफॉर्म के ढके हुए हिस्से के बीच में थे और वे रेलवे ऑफिसों के काफी करीब थे।”

मुस्लिम महिला की गवाही को खारिज करते हुए आयोक कहता है, “सबूत बताते हैं कि स्टेशन पर कई लोग थे। वहाँ यात्रियों के अलावा कई मुस्लिम वेंडर भी थे। रेलवे कर्मचारी अपने कार्यालयों में मौजूद रहे। कुछ पुलिसकर्मी भी मौजूद थे। अगर वो अपने बचाव में चिल्लाई होती तो वो लोग तो जरूर सुनते जो उसके आसपास थे। लेकिन कोई भी उसके पक्ष का समर्थन करने के लिए आगे नहीं आया।”

आयोग की रिपोर्ट कहती है, “उसके (मुस्लिम महिला) सबूतों के अनुसार, वो बुकिंग क्लर्क के ऑफिस में गई, वहाँ क्या हुआ इसकी जानकारी उन्होंने किसी को नहीं दी। उस ऑफिस के अंदर उनके पास किसी भी चीज से डरने का कोई कारण नहीं था। बावजूद इसके मेमू ट्रेन का इंतजार करने की बजाय वो तुरंत संबंधियों के पास लौट आई। उनका यह स्पष्टीकरण कि वह बहुत डरी हुई थीं और उन्हें चक्कर आ रहा था और इसलिए उन्होंने उस दिन वडोदरा वापस नहीं जाने का फैसला किया था, सच नहीं लगता।”

मिथक संख्या 5: दागी आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट और नरेंद्र मोदी की मुलाकात

लिबरल मीडिया अक्सर एक और शिगूफा छोड़ता रहा है। वो ये कि पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने 27 फरवरी 2022 को सीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनके घर पर मुलाकात की थी। इस बैठक में विशेष रूप से पीएम मोदी को गोधरा में ट्रेन जलाए जाने की घटना के मद्देनजर नरसंहार में शामिल होने के लिए फंसाने के लिए विशेष रूप से प्रकाश डाला गया था।

हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग के मुताबिक, हिरासत में मौत के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने झूठ बोला था कि वो 27 फरवरी 2022 को नरेंद्र मोदी से मिला था। मोदी विरोधी लॉबी का फेस बने भट्ट ने 2011 में आरोप लगाया कि 2002 के गोधरा दंगों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 फरवरी 2002 को अपने आवास पर एक बैठक बुलाई थी, ताकि हिन्दुओं को मुस्लिमों के खिलाफ गुस्सा जाहिर करने दिया जाए, जिससे राज्य में गोधरा जैसी घटना की पुनरावृत्ति न हो।

भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपे गए एक हलफनामे में दावा किया था कि यह बैठक साबरमती एक्सप्रेस जलने की घटना के बाद हुई थी, जिसमें 59 अयोध्या कारसेवक मारे गए थे। उस कथित बैठक के समय भट्ट स्टेट इंटेलीजेंस के डिप्टी कमिश्नर थे। उन्होंने हलफनामे में आगे कहा कि बैठक में आठ शीर्ष पुलिस अधिकारी भी शामिल हुए थे। भट्ट ने यह भी आरोप लगाया कि दंगों की जाँच के लिए गठित एसआईटी गुजरात सरकार को बचाने की कोशिश कर रही है।

जबकि, नानावती-मेहता आयोग भट्ट के दावों का खंडन करता है। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्होंने (संजीव भट्ट) बैठक में अपनी उपस्थिति को साबित करने के लिए झूठे दस्तावेज़, एक फैक्स संदेश का इस्तेमाल किया। जस्टिस जीटी नानावती और अक्षय मेहता की रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में कहा गया है, “सबूतों पर विचार करने पर यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि 27 फरवरी 2002 को सीएम आवास पर हुई बैठक को लेकर भट्ट झूठ बोल रहे हैं। बैठक में उपस्थित होने के उनके द्वारा किए गए दावे झूठे प्रतीत होते हैं।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि मुख्यमंत्री मोदी के बयानों के बारे में भट्ट के दावे उनके द्वारा बनाई गई एक कहानी थी। आयोग ने कहा कि फैक्स संदेश की प्रति, जिसका उपयोग कर भट्ट ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक का दावा किया था, वास्तव में पीपी उपाध्याय द्वारा 2 मार्च 2002 को भेजी गई थी। ये पांडर्व पंचमहल की घटना को लेकर था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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