30 पार्टियों ने एक भी महिला को नहीं दिया टिकट
15 फरवरी को बांग्लादेश में आम चुनाव है। इसके लिए 51 पार्टियों ने 1981 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं। इनमें सिर्फ 78 महिलाएँ हैं। करीब 30 पार्टियों ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया। शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग को चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। खालिदा जिया दुनिया छोड़ चुकी है। उनकी पार्टी बीएनपी ने 10 महिलाओं को टिकट दिया है।
द डेली स्टार के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस, खिलाफत मजलिस, बांग्लादेश इस्लामी फ्रंट, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी, जोनोतार दल, बांग्लादेश सांस्कृतिक मुक्ति जोत, बांग्लादेश कांग्रेस, जातीय पार्टी , बांग्लादेश खिलाफत आंदोलन, बांग्लादेश नेशनलिस्ट फ्रंट और बांग्लादेश जसद समेत कम से कम 30 पार्टियों ने सिर्फ पुरुष उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा है।
जानकारी के मुताबिक, 78 महिलाओं में से एक तिहाई भी खुद राजनीतिज्ञ नहीं हैं, बल्कि असरदार राजनीति लोगों की रिश्तेदार हैं, पार्टी नेताओं की पत्नियाँ, बेटियाँ या परिवार की सदस्य हैं।
बांग्लादेश में आधी से ज्यादा आबादी औरतों की है। देश में पुरुषों और औरतों का अनुपात 97 : 100 है। इसके बावजूद देश में मात्र 3.93 परसेंट औरतों को उम्मीदवार बनाया गया है। 78 महिला उम्मीदवारों में से 61 को 21 राजनीतिक पार्टियों ने टिकट दिया है, जबकि 17 निर्दलीय हैं।
रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल ऑर्डर 1972 के तहत पॉलिटिकल पार्टियों को सेंट्रल लेवल सहित कमिटी में कम से कम 33 फीसदी पद महिलाओं के लिए आरक्षित करना जरूरी है, लेकिन कोई भी पार्टी ऐसा करने में नाकाम रही तो 2021 में चुनाव आयोग ने इसकी मियाद 2030 तक बढ़ा दी।
महिला नहीं कर सकती कौम का नेतृत्व- जमात
जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान जैसे नेता खुलेआम कहते हैं कि महिला पार्टी, समाज या देश का नेतृत्व नहीं कर सकतीं, इसलिए उनकी पार्टी ने किसी महिला को टिकट नहीं दिया।
कुछ ऐसा ही बयान हिफाजत ए इस्लाम जैसी इस्लामिक संगठन का भी है। इसके नेता अजीज उल हक का कहना है कि जिस कौम का लीडर महिला होता है, वह कौम तरक्की नहीं कर सकती। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई। उन्होंने यहाँ तक कहा कि बांग्लादेश में शरिया कानून लागू होना चाहिए।
जमात-ए-इस्लामी महिला विंग की सेक्रेटरी नूरुन्निसा सिद्दिका ने कहा, “कुरान के अनुसार, पुरुष महिलाओं के डायरेक्टर होते हैं, जिसे इस्लाम में एक आदेश और जिम्मेदारी माना जाता है।” सिद्दिका ने महिलाओं को टिकट नहीं दिए जाने को ‘संगठन का फैसला’ बताया।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे बयान पितृसत्तात्मक मानदंडों को मजबूत करते हैं। इससे महिलाएँ और भी राजनीति से दूर हो गई है। महिलाओं में जबरदस्त असुरक्षा की भावना है और ऐसे बयान उन्हें हतोत्साहित करते हैं। राजनीत जैसे क्षेत्र में आने के लिए विश्वास की काफी जरूरत है, मानवाधिकार कार्यकर्ता भी कट्टरपंथी बयानों से बेहद चिंतित हैं।
महिलाओं को मिल रही धमकियाँ
कई महिला उम्मीदवारों का कहना है कि उन्हें ऑनलाइन और जमीनी स्तर पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। साइबरबुलिंग, यौन उत्पीड़न की धमकी, चरित्र हनन करने की कोशिश की जा रही है। उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है, ताकि चुनाव मैदान छोड़ दें।
नेशनल सिटिजन पार्टी यानी एनसीपी की उम्मीदवार दिलशाना पारुल का कहना है कि उन्हें हेडस्कार्फ को लेकर ट्रोल किया जा रहा है। हिजाब पर छींटाकशी की जा रही है। ट्रोल करने वालों में तथाकथित प्रोग्रेसिव लोग भी शामिल हैं। उनका कहना है कि पुरुष नेताओं को उनकी कार्यशैली, भ्रष्टाचार जैसे वजहों से आलोचना की जाती है, लेकिन महिलाओं के चरित्र पर आसानी से वार कर देते हैं।
एनसीपी की एक और उम्मीदवार नबीला तस्नीद ढाका 20 से चुनाव मैदान में हैं। उनका कहना है कि उनके बैनर पोस्ट तक फाड़ दिए गए। अधिकारियों ने उन्हें मदद करने के बजाए किसने किया उसका वीडियो लाने को कह रहे हैं। उन्हें डराया धमकाया जा रहा है।
एक और उम्मीदवार तस्लीमा अख्तर का कहना है कि ऑनलाइन उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं। ऑनलाइन टारगेट करना आसान होता है। उनका कहना है कि देश की कानून व्यवस्था काफी लचर है, महिलाओं को घर में रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है। इसलिए महिलाएँ वोट डालने कितनी निकलेंगी, ये भी बड़ा सवाल है।
जमीन पर संघर्ष कर राजनीति में आगे बढ़ने वाली महिलाएँ काफी कम है। इसके पीछे पारिवारिक माहौल है। कोई नहीं चाहता कि उनके घर की बेटी अनसेफ हो। इसलिए राजनीति में नहीं आने देते।


