Friday, May 24, 2024
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ईरान के चाबहार बंदरगाह का ‘ठेकेदार’ बना भारत, 10 साल तक देखेगा संचालन: वाजपेयी के जमाने में शुरू हुई कवायद, मोदी राज में पूरा हुआ मिशन

भारत ने चाबहार के एक टर्मिनल में 85 मिलियन डॉलर (लगभग ₹7.09 करोड़) निवेश करने की घोषणा की थी। भारत ने इस बंदरगाह के विकास के लिए 150 मिलियन डॉलर (लगभग ₹1250 करोड़) का कर्ज देने की भी घोषणा की थी।

अब भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह को चलाएगा। इसके लिए भारत और ईरान के बीच 10 साल का समझौता हो रहा है। भारत के बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मामलों के मंत्री सर्बानंद सोनोवाल भारत और ईरान के इस समझौते पर हस्ताक्षर के लिए सोमवार (13 मई, 2024) को ईरान गए हैं।

भारत ने इस चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए बड़ी धनराशि का निवेश किया है। इसका प्रबंधन अभी तक भारत सीमित रूप से करता है। नया समझौता बंदरगाह को चलाने के लिए होगा जो कि 10 वर्षों का होगा। इसे आगे बढ़ाया भी जा सकेगा। चाबहार बंदरगाह आर्थिक के साथ ही सामरिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या है नया समझौता?

नए समझौते के अनुसार, भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह का पूरी तरह से प्रबन्धन करेगा। इसके ऑपरेशन को भारत ही चलाएगा। इसके अंतर्गत इस बंदरगाह पर होने वाली सभी गतिविधियों को भारत नियंत्रित करेगा। यहाँ आने जाने वाले जहाजों और माल के आवागमन को भारतीय कम्पनियाँ नियंत्रित करेंगी। भारत और ईरान के बीच यह समझौता 10 वर्षों के लिए होगा। भारत और ईरान के बीच पहले भी चाबहार पोर्ट के संचालन का समझौता हुआ था।

हालाँकि, इस समझौते के अंतर्गत भारत को चाबहार पोर्ट पर सीमित अधिकार थे। यह समझौता 2016 में हुआ था। इसके अंतर्गत चाबहार पोर्ट के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन की जिम्मेदारी भारत के पास थी। यह समझौता लम्बे समय के लिए नहीं किया गया था। यह समझौता प्रत्येक वर्ष दोहराया जाता था। यह समझौता भारत और ईरान के अलावा अफगानिस्तान के साथ भी किया गया था। भारत की चाबहार में बड़ी हिस्सेदारी के लिए ईरान पहले से जोर लगाता रहा है।

चाबहार में भारत ने किया है निवेश, अटल बिहारी सरकार से शुरू हुई कवायद

चाबहार बंदरगाह को विकसित करने में भारत का बड़ा रोल है। चाबहार बंदरगाह को विकसित करने की बातचीत 2002 में चालू हुई थी। 2003 में तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति मुहम्मद खतामी नई दिल्ली की यात्रा पर आए थे, इस यात्रा के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उन्होंने कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें आवागमन को लेकर सहयोग भी एक बिंदु था। इसके बाद देश में सत्ता बदल गई और UPA सरकार ने इस मोर्चे पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया।

मोदी सरकार आने के बाद इस मामले में तेजी से कदम बढ़ना चालू हुए। 2015 में भारत ने विदेश में पोर्ट चलाने के लिए एक नई सरकारी कम्पनी का गठन किया। भारत और ईरान के बेच इस दौरान चाबहार बंदरगाह को विकसित करने की बातचीत ने जोर पकड़ा और 2016 में दोनों देशों के बीच समझौता हुआ। पीएम मोदी ने 2016 में अपनी यात्रा के दौरान ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

भारत ने चाबहार के एक टर्मिनल में 85 मिलियन डॉलर (लगभग ₹7.09 करोड़) निवेश करने की घोषणा की थी। भारत ने इस बंदरगाह के विकास के लिए 150 मिलियन डॉलर (लगभग ₹1250 करोड़) का कर्ज देने की भी घोषणा की थी।

चाबहार को विकसित करने वाली भारतीय कम्पनी IPGL के अनुसार, बंदरगाह के पूरी तरह विकसित होने पर इसकी क्षमता 82 मिलियन टन हो जाएगी। इससे ईरान के बंदर अब्बास बंदरगाह से भीड़ कम करने में राहत मिलेगी। इसी के साथ इसके नए तकनीक से बने होने के कारण यहाँ माल की आवाजाही आसानी से हो सकेगी।

अफगानिस्तान का रास्ता आसान करता है चाबहार

भारत चाबहार में अफगानिस्तान के कारण सबसे अधिक रूचि रखता है। पहले भारत से अफगानिस्तान कोई भी माल भेजने के लिए उसे पाकिस्तान से गुजरना होता था। चाबहार बंदरगाह के विकास के बाद से अफगानिस्तान माल भेजने का यह सबसे अच्छा विकल्प है। भारत अफगानिस्तान को गेंहू भी इस रास्ते से भेज रहा है। अफगानिस्तान के अलावा यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशियाई देशों के भी रास्ते खोलेगा। इन देशों से गैस और तेल भी इस पोर्ट के जरिए लाया जा सकता है। इन देशों के साथ व्यापार इस चाबहार बंदरगाह के जरिए आसान हो जाएगा।

सामरिक महत्व भी रखता है चाबहार

चाबहार इस क्षेत्र में भारत के आर्थिक हितों के साथ ही सामरिक हितों को भी साधेगा। यह अफगानिस्तान से जुड़ने के लिए भारत की पाकिस्तान पर निर्भरता को खत्म कर देगा। इससे भारत अफगानिस्तान को सीधे मदद पहुँचा पाएगा। इस बंदरगाह की भौगोलीय स्थिति इसे और भी महत्वपूर्ण बनाती है। चाबहार बंदरगाह ईरान के सिस्तान और बलूचिस्तान में स्थित है। चाबहार, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के बराबर ही ओमान की खाड़ी में स्थित है।

ग्वादर बंदरगाह चीन ने बनाया है। ऐसे में भारत इस इलाके में चीन को भी चाबहार के जरिए चुनौती दे रहा है। चीन ग्वादर को बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत बना रहा है। इससे वह पूरी दुनिया को रोड, रेल और समुद्री मार्ग से जोड़ना चाहता है।

चाबहार से अफगानिस्तान की सीमा भी नजदीक है। ईरान से तेल समेत अन्य सामनों की आपूर्ति भी भारत में चाबहार के जरिए जल्दी हो सकती है। इससे इस इलाके में भारत का दबदबा भी बढ़ेगा। इसके अलावा चाबहार से जुड़ी हुई एक रेल लाइन भी बनाए जाने का प्रस्ताव है। ईरान को भी इस बंदरगाह से फायदा होगा। वह अपने ऊपर पर लगे प्रतिबंधों को इस बंदरगाह के जरिए बच सकता है। ऐसे में दोनों देशों को फायदा होगा।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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