Wednesday, October 21, 2020
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Facebook की राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल, दक्षिणपंथी आवाज़ें दबाने का आरोप: पूर्व कर्मचारी ने खोली पोल

जिस यूज़र के फ़ेसबुक पेज पर यह टैग लगाया जाता है उसे पता भी नहीं चलता कि यह रोक लगाई गई है और उसकी लाइवस्ट्रीम उसके दोस्तों की न्यूज़फ़ीड में दिखनी बंद हो चुकी है, उन्हें उसके नोटिफिकेशन नहीं आते, और...

लोकसभा चुनावों की दुंदुभी बजने के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है जिसके अंतर्गत मीडिया भी किन चुनावी चीज़ों को कवर कर सकता है और किनको नहीं, क्या छाप सकता है और क्या नहीं (मसलन एक्जिट पोल्स, चुनावी प्रचार सामग्री वगैरह) आदि भी तार्किक नियमों के घेरे में है- जिसका उल्लंघन करने पर टीवी चैनलों, अख़बारों, रेडियो चैनलों इत्यादि को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

पर राजनीतिक हलचल में भागीदारी और उस पर असर डाल सकने के हिसाब से सबसे बड़ा और ताकतवर माध्यम- फेसबुक– चुनाव आयोग, और यहाँ तक कि भारत सरकार, की पहुँच के न केवल बाहर है, बल्कि राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप (फेसबुक अधिकारियों द्वारा अपने फेसबुक पद का प्रयोग राजनीति को प्रभावित करने के लिए करना) के लिए कमर कस कर तैयार भी है।   

प्रोजेक्ट वेरिटास (Project Veritas) के चिंताजनक खुलासे

गैर लाभकारी मीडिया वेबसाइट प्रोजेक्ट वेरिटास ने गत 27 फ़रवरी को फेसबुक की आतंरिक गतिविधियों को लेकर बहुत ही चिंताजनक कुछ दस्तावेज़ जारी किए हैं। इन दस्तावेज़ों के मुताबिक हिंसक, भड़काऊ, और फेक न्यूज़ फैलानी वाली सामग्री रोकने के नाम पर फेसबुक प्रबंधन दक्षिणपंथी सामग्री और व्यक्तियों को बाकायदा निशाना बनाकर वायरल होने से रोक रहा है। (इन्टरनेट की भाषा में इसे टार्गेटेड डीबूस्टिंग कहते हैं)

फ़ेसबुक की ही पूर्व कर्मचारी ने खोली पोल

जिन दस्तावेज़ों के आधार पर वेरिटास ने यह दावा किया है, वह दस्तावेज़ उसे फेसबुक की ही पूर्व कर्मचारी ने उपलब्ध कराए हैं। उसकी सुरक्षा और उसे ऑनलाइन प्रताड़ना से बचाने के मद्देनज़र वेरिटास ने उसकी पहचान गुप्त रखते हुए केवल इतना बताया है कि वह कर्मचारी अब वेरिटास के साथ ही काम कर रही है।

क्या है पूरा मामला

ActionDeboostLiveDistribution लेबल के इस तकनीकी निर्देश को, ‘इनसाइडर’ कह कर रिपोर्ट में जिक्र की गई कर्मचारी के अनुसार, उसने जब माइक सर्नोविच (अमेरिकी लेखक व राजनीतिक टिप्पणीकार), स्टीवेन क्राउडर (अमेरिकी दक्षिणपंथी हास्य-कलाकार और अभिनेता), डेली कॉलर (वॉशिंगटन डीसी से चलने वाली दक्षिणपंथी खबर व ओपिनियन वेबसाइट, जिसे डिजिटल मार्केटिंग विशेषज्ञ नील पटेल और दक्षिणपंथी राजनीतिक टिप्पणीकार टकर कार्लसन ने स्थापित किया है) आदि दक्षिणपंथी हैंडल्स पर नोटिस किया तो उसे शक हुआ।

यहाँ यह जानना ज़रूरी है कि क्राउडर के खिलाफ़ पहले भी इसी प्रकार के गुप्त ‘बैन’ को लेकर फ़ेसबुक विवादों में घिर चुका है। वर्ष 2016 में डिज़ाइन, टेक्नोलॉजी, विज्ञान से जुड़े विषयों की विशेषज्ञ वेबसाइट गिज़्मोडो ने अपनी एक खबर में यह दावा किया था कि स्टीवेन क्राउडर, जो कि फॉक्स न्यूज़ के साथ भी जुड़े रह चुके हैं, क्रिस काइल (भूतपूर्व सील सैनिक, 2013 में जिनकी हत्या हुई), दक्षिणपंथी न्यूज़ एग्रीगेटर द ड्रेज रिपोर्ट, इत्यादि छः विषयों को फ़ेसबुक योजनाबद्ध तरीके से ट्रेंड करने से, लोगों की न्यूज़ फीड में आने आदि से रोक रहा है- गौरतलब है कि सभी छः विषय दक्षिणपंथियों के लिए ही भावनात्मक अपील वाले थे।

इस खबर के सामने आने के बाद क्राउडर ने फ़ेसबुक पर मुकदमा किया था, जिसका निपटारा फ़ेसबुक को आउट-ऑफ़-कोर्ट सेटेलमेंट में करना पड़ा था।

इनसाइडर ने जब अश्वेत अमेरिकी खिलाड़ी कॉलिन केपर्निक, यंग टर्क्स आदि वाम की ओर झुकाव रखने वाले फ़ेसबुक पेजों पर इस ActionDeboostLiveDistribution टैग को ढूँढ़ने का प्रयास किया तो उन्हें यह टैग किसी भी वामपंथी झुकाव वाले व्यक्ति या संस्था के फ़ेसबुक पेज पर नहीं मिला।

वेरिटास ने जब अभी भी फ़ेसबुक में कार्यरत अपने एक गुप्त सूत्र से इनसाइडर की खबर और दावों की पुष्टि करनी चाही तो उस सूत्र ने अनाधिकारिक तौर पर इस खबर की पुष्टि करते हुए साथ में यह भी जोड़ा कि यह टैग पूरी तरह से गुप्त होकर अपना काम करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जिस यूज़र के फ़ेसबुक पेज पर यह टैग लगाया जाता है उसे पता भी नहीं चलता कि उसके पेज पर यह रोक लगाई गई है और उसकी लाइवस्ट्रीम उसके दोस्तों की न्यूज़फ़ीड में दिखनी बंद हो चुकी है, उन्हें उसके लाइव जाने की नोटिफिकेशन नहीं आते, और उसके लाइव वीडियो शेयर भी नहीं हो पाते।

आत्महत्या के लाइव प्रसारण रोकने के लिए बना था यह सिस्टम

वेरिटास के पास मौजूद दस्तावेजों में यह ActionDeboostLiveDistribution लेबल जिस Sigma के बगल में दिख रहा है, वह फ़ेसबुक का एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम है जिसे फ़ेसबुक ने आत्महत्या, सेल्फ़-हार्म जैसी- किसी भी आम इन्सान को विचलित कर सकने वाली सामग्री से कमज़ोर दिल वालों की रक्षा करने के लिए विकसित किया था। पर इन दस्तावेज़ों से यह साफ़ है कि फ़ेसबुक इसका दुरुपयोग राजनीतिक हित साधने के लिए कर रहा है।

‘भड़काऊ सामग्री’ पहचानने का फ़ेसबुक का तरीका और भी चिंताजनक

वेरिटास ने यह भी बताया कि डेटा साइंस मेनेजर सेजी यामामोटो और फ़ेसबुक के चीफ़ डेटा साइंटिस्ट एडूआर्डो एरिनो डे ला रुबिया ने एक चिंताजनक पेपर फ़ेसबुक के आतंरिक चैनल में पेश किया है। वे फ़ेसबुक की सीक्रेट सेंसरशिप को नस्लवादी और होमोफ़ोबिक गालियों से आगे ले जाकर ‘पोटेंशियली हेट्फुल’ (संभावित रूप से नफ़रत फ़ैलाने वाली) कैटेगरी बना कर उसपर भी “लगाम लगाने” की वकालत करते हैं। जिन ‘कीवर्ड्स’ में वह ‘संभावित नफ़रत’ की सम्भावना देखते हैं, उनमें लगभग सभी शब्द दक्षिणपंथी सर्कल्स में आम हंसी-मज़ाक या मुख्यधारा के पॉप-कल्चर और मीम-कल्चर का हिस्सा हैं।

यही नहीं, महत्वपूर्ण चुनावों के पहले चिह्नित दक्षिणपंथी यूज़र्स को तकनीकी खराबियां देने, जैसे कि बार-बार ऑटो-लॉगआउट, उनके कमेन्ट करने में बाधा पैदा करना, आदि शामिल हैं। इसके अलावा किसी भी यूज़र को बैन करने के समय उसकी मित्र-सूची को इसकी नोटिफिकेशन देकर उसकी सोशल शेमिंग और दूसरे “ट्रोल्स” (जिसमें फ़ेसबुक की दुराग्रही परिभाषा के चलते कोई भी दक्षिणपंथी यूज़र शामिल हो सकता है) को आतंकित करने की भी वकालत की गई है।

भारत के लिए इसके मायने

सबसे ज़्यादा फ़ेसबुक यूज़र्स का देश होने के नाते निश्चित तौर पर भारत के लिए यह खुलासा अहम है। 5 साल पहले जब फ़ेसबुक का राजनीतिक प्रभाव इस हद तक नहीं था, तब ही नरेन्द्र मोदी ने शायद आधा चुनाव फ़ेसबुक पर ही जीत लिया था। तब से चुनाव-दर-चुनाव फ़ेसबुक का राजनीतिक महत्त्व बढ़ता जा रहा है।

ऐसे में फ़ेसबुक का एक राजनीतिक विचारधारा और पक्ष की आवाज़ पर रोक लगाना निष्पक्ष चुनाव कराने की हमारी सिस्टम की कोशिश में रुकावट डालने से कम कुछ भी नहीं है। तिस पर से अमेरिका से संचालित होने के कारण फ़ेसबुक भारत के कानून और राजनयिकों की पकड़ से भी कोसों दूर है।

दक्षिणपंथी आवाज़ों को दबाने के लिए जिन तरीकों को इस्तेमाल करने की वकालत इन दस्तावेज़ों में की गई है, वह समस्याएँ, जैसे बार-बार ऑटो-लॉगआउट, कमेन्ट करने में बाधा, इत्यादि एक बड़ी संख्या में भारतीय यूज़र्स काफ़ी समय से झेल रहे हैं। अभी तक तो इन्हें नेटवर्क समस्या, डिवाइस समस्या आदि मानकर हम नज़रंदाज़ करते आए हैं। पर अब यह सवाल बेशक मन में उठेगा कि क्या फ़ेसबुक अपने खुद के देश अमेरिका में जिस तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप करने के बारे में सोच भर रहा है, भारत में क्या उसने चुपचाप उसे लागू भी कर दिया? या फिर भारतीय यूज़र्स उसके ‘गिनीपिग्स’ हैं, जिन पर वह यह सब टेस्ट कर रहा था?

भारत में इलेक्शन वॉर रूम के मायने क्या हैं?

लोकसभा चुनावों की घोषणा होते ही यह खबर आई कि फ़ेसबुक चुनावों में अपने दुरुपयोग और फेक न्यूज़ के फैलाव को रोकने के लिए अमेरिका-सरीखा वॉर रूम बना रहा है, और राजनीतिक विज्ञापनों से जुड़े सारे ब्यौरे साप्ताहिक रूप से सार्वजनिक करेगा।

पर ऑर्गेनिक पोस्ट्स का क्या? क्या फ़ेसबुक यह हलफ़नामा देगा कि वह किसी भी भारतीय यूज़र के राजनीतिक झुकाव के चलते उसकी पोस्ट्स को बूस्ट या डीबूस्ट नहीं कर रहा है?

चुनाव आयोग भी फ़ेसबुक के साथ सहयोग करके चुनाव प्रक्रिया में उसकी भूमिका को मान्यता और स्वीकार्यता पाने में सहयोग कर रहा है। क्या चुनाव आयोग को फ़ेसबुक की यह सच्चाई पता है?

यदि फ़ेसबुक भारत में अपनी निष्पक्षता उपरोक्त हलफ़नामे या किसी अन्य प्रकार से साबित नहीं करता है तो यह मानने के पूरे-पूरे कारण होने चाहिए कि फ़ेसबुक यह इलेक्शन वॉर रूम निष्पक्षता के लिए नहीं बल्कि अपने वामपंथी मित्रों को और सहयोग करने के लिए कर रहा है।

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