Friday, August 6, 2021
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पत्रकारिता के समुदाय विशेष के लोगो! मोदी के वीडियो से जलता है बदन क्या?

व्यक्ति विशेष से घृणा ही इस तरह की घटिया पत्रकारिता करने पर मजबूर करती है जहाँ किसने कौन सी साड़ी पहनी है, किसकी शक्ल किससे मिलती है, भाषण में कौन सा शब्द कितनी बार बोला, सीबीआई का डायरेक्टर शुक्ला क्यों है, मुसहर क्यों नहीं आदि आदि पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है।

आज एक ख़बर, या एक तरह की ख़बर, पत्रकारिता के यूजुअल सस्पैक्ट्स यानी छाती पीटो पत्रकारिता गिरोह के सदस्यों ने एक सुर में चलाई कि डल झील की बोट राइड में प्रधानमंत्री मोदी जो हाथ हिलाकर अभिवादन करते दिख रहे हैं, वो काल्पनिक है। किसी ने लिखा पहाड़ों को हाथ दिखा रहे हैं, किसी ने लिखा काल्पनिक लोगों को दिखा रहे हैं, कोई खोजो तो जानें कर रहा है, किसी ने कहा कि झील को हाथ दिखा रहे हैं…

लल्लनटॉप, फर्स्टपोस्ट, NDTV, The Telegraph, The Quint, News 18 आदि तमाम वेबसाइटों पर ये ख़बर खूब चलाई गई। ये सब हमारे दौर के ठीक-ठाक पढ़े जाने वाले वेबसाइटों में आते हैं। लेकिन पत्रकारिता का यह सम्प्रदाय विशेष पत्रकारिता के नाम पर मोदी के चश्मे के फ़्रेम से लेकर सोनिया गाँधी से ‘इंदिरा घर में खाना बनाती थी कि नहीं’ पूछने तक रायता फैलाता रहा है। इसीलिए, आश्चर्य नहीं होगा कि कल को ये और भी विचित्र बातें लिखने लगें। 

पहली बात तो यह है कि अगर एक भी व्यक्ति वहाँ है, चाहे वह वही कैमरामैन ही क्यों न हो जो वीडियो बना रहा है, तो भी मोदी ने अभिवादन किया तो इसमें समस्या क्या है? यहीं अगर मोदी चुप-चाप खड़े रहते तो पत्रकारिता के मानक स्तम्भ यह लिखते नज़र आते कि कश्मीर को ‘सॉफ़्ट टच’ की ज़रूरत है न कि मोदी के भावहीन चेहरे की। 

क्या यही गिरोह भूल गया है कि वो जो लिखता है उसे कोई पढ़ता है, स्क्रीन पर, न कि वो अपने आर्टिकल तभी लिखता है जब उसे सामने बैठकर पढ़नेवाला मिले? आज के दौर में जब आधिकारिक मीडिया कवरेज होती है, लाइव विडियो शेयर होता है तो क्या किसी राष्ट्र के प्रधानमंत्री को हाथ हिलाकर अभिवादन करते दिखाने में इतनी जासूसी करनी ज़रूरी है?

अगर वहाँ एक भी व्यक्ति था, चाहे वो कश्मीर का हो, या कहीं बाहर का, उसे देखकर मोदी ने अभिवादन किया तो इन पत्रकारों की देह में आग क्यों लग रही है? क्या ये मीडियावाले वहाँ मौजूद थे, और क्या ये बताएँगे कि वहाँ मोदी के अलावा और कोई था ही नहीं? अगर नहीं था तो विडियो किसने बनाया? ख़ैर, ये अब कुतर्क की तरफ़ जा रहा है, तो ज़्यादा नहीं करूँगा। फ़ैक्ट चेक वाले कहाँ हैं वैसे? किसी को कश्मीर भेजकर पूछ लेते कि मोदी किसको देख कर हाथ हिला रहे थे।

दूसरी बात यह है कि पत्रकारिता के इस ‘स्वर्णिम दौर’ में जब तैमूर की नैपी तक कवर की जाती हे, तो क्या और कोई ख़बर नहीं मिली गिरोह के लोगों को? इस ख़बर से समाज का क्या लाभ हो रहा है? ख़बर चलाने का कोई तो उद्देश्य होगा? या बस मज़े लेने की प्रवृत्ति है, तो आर्टिकल लिख रहे हैं, और ट्वीट एम्बेड कर रहे हैं? 

जब हमारे पत्रकार इतने खाली थे, तो कुछ और कर लेते, मोदी का हाथ देखकर इतने विचलित क्यों हो रहे हैं? ये किसी को सूचित करने का काम नहीं है, इसके अंदर एक घृणा की भावना है। वो भावना ही इस तरह की घटिया पत्रकारिता करने पर मजबूर करती है जहाँ किसने कौन सी साड़ी पहनी है, किसकी शक्ल किससे मिलती है, भाषण में कौन सा शब्द कितनी बार बोला, सीबीआई का डायरेक्टर शुक्ला क्यों है, मुसहर क्यों नहीं आदि आदि।

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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