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स्क्रॉल, टेलीग्राफ, NDTV समेत कई संस्थानों से सम्पादकीय टीम में छँटनी, फंडिंग एक बड़ी वजह

मीडिया जगत में इतने बड़े पैमाने पर छँटनी का कारण यह बताया जा रहा है कि हालिया आर्थिक स्थिति उन्हें इतना भारी-भरकम स्टॉफ मैनेज करने की इजाजत नहीं दे रहा है। साथ ही, वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए अधिकांश इन्वेस्टर ऐसे पोर्टलों और चैनलों में दोबारा पैसा लगाने से कतरा रहे हैं।

स्वघोषित ‘विरोध की पत्रकारिता’ और किसी खास वर्ग और पार्टी की पक्षकारिता का झंडा बुलंद करने वाले कई स्वनामधन्य मीडिया समूह पिछले एक-दो सालों में चुपचाप अपने सम्पादकों, टेक्निकल स्टाफ़ और ग्रॉउंड रिपोर्टरों, पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखाते रहें। कुछ ने अपने कई एडिशन बंद किए तो कुछ किसी तरह चुनाव तक अपना एजेंडा इस आस में चलाते रहें कि अगर वो अपने मतलब की सरकार बनवाने में कामयाब हो गए तो शायद उनके वही ‘लुटयंस पत्रकारिता’ का सुनहरा दौर लौट आए। पर अफ़सोस! लोकसभा चुनाव-2019 के साथ उनकी रही-सही उम्मीद भी जाती रही।

चुनाव परिणाम के बाद फिर से आनन-फानन में सम्पादकों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। उन्हें संस्थान से त्यागपत्र देने को कहा जा रहा है बिना यह सोचे कि अब वही उनके अजेंडा परोसने वाले संपादक-पत्रकार आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ?

पहले की खबरों पर नज़र दौड़ाएँ तो कई मीडिया संस्थानों में नौकरियों की कटौती की शुरुआत जनवरी 2017 से ही शुरू हो गई थी। इसमें सबसे पहला नाम जो नज़र आता है वह है Hindustan Times जिसने अपने 4 ब्यूरो बंद करने का निर्णय लिया जिससे सैकड़ों कर्मचारी एक झटके में बेरोजगार हो गए। इसके बाद यह सिलसिला उन तमाम मीडिया समूहों में जारी रहा जिनकी पत्रकारिता का पर्याय ही एक मात्र बीजेपी का विरोध है। सरकार के अच्छे से अच्छे काम में भी खोट निकालना और अपने समर्थक पार्टी की बड़ी से बड़ी गलती को भी छिपा जाना ही इनके लिए पत्रकारिता का स्वर्णिम मानदंड बन चुका था।

बाद के समय में The TelegraphNDTVDB Post ने अपने कई सम्पादकों, एंकरों, रिपोर्टरों की नौकरियाँ छीन लीं। इस साल के शुरुआत में भी BuzzfeedVice और DNA ने भी अपने कई सम्पादकों, पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। जो बचे रहे उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान विरोध के नाम पर खुलेआम पक्षकारिता और फेक न्यूज़ की बाढ़ लगा दी ताकि किसी भी तरह से अपने सत्ता में घुसपैठ वाली और लगातार डर का माहौल है या एक तरफा खबरों वाली पत्रकारिता को बचाया जा सके लेकिन वह काम नहीं आया। सारे हथकंडे फेल हो गए यहाँ तक कि टीवी न देखने की अपील को भी जनता ने ठुकरा दिया।

30 मई को मोदी के शपथ के दिन जहाँ देश उत्सव के माहौल में डूबा था तो वहीं अगले ही दिन विरोध और नफ़रत की पत्रकारिता को हवा देने वाले एक और संस्थान Scroll.in ने 31 मई को अपने कई सम्पादकों को निकालने की तैयारी कर ली। न्यूज़ लॉन्ड्री के मुताबिक स्क्रॉल ने अपने सम्पादकीय टीम के 16 कर्मचारियों को 3 जून तक त्यागपत्र देने को कहा। हालाँकि इसमें अभी तक बाहर किए जाने वाले पत्रकारों और प्रॉडक्शन, मार्केटिंग टीम के कर्मचारियों की संख्या शामिल नहीं है और न ही स्क्रॉल के हिंदी वेबसाइट सत्याग्रह से कितनों को बाहर किया गया इसकी अभी तक कोई सूचना नहीं है।

वैसे मजाक-मजाक में यह भी कहा जा रहा है कि बीजेपी विरोध के नाम पर झूठ और फेक न्यूज़ परोसने वाले इन पत्रकारों के सामने दोहरा संकट है। एक तो यहाँ से इनकी नौकरी गई, दूसरा CV में यदि उस संस्थान का जिक्र करते हैं तो आगे भी इन्हें कोई मीडिया संस्थान नौकरी नहीं देगा। खबर यह भी है कि Scroll ने कॉस्ट कटिंग के लिए या व्यूअरशिप की संख्या कम होने के कारण Hotstar पर आने वाले अपने एक शो का प्रसारण भी बंद कर दिया है।

स्क्रॉल द्वारा निकाले गए कर्मचारियों के लिए कहा जा रहा है कि राहत की बात यह कि उन्हें जून-जुलाई दो महीने के पेमेंट के साथ विदा किया जाएगा। मीडिया जगत में इतने बड़े पैमाने पर छँटनी का कारण यह बताया जा रहा है कि हालिया आर्थिक स्थिति उन्हें इतना भारी-भरकम स्टॉफ मैनेज करने की इजाजत नहीं दे रहा है। साथ ही, वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए अधिकांश इन्वेस्टर ऐसे पोर्टलों और चैनलों में दोबारा पैसा लगाने से कतरा रहे हैं।

कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि एकतरफा पत्रकारिता में संलिप्त होने के कारण आने वाला दौर ऐसे पत्रकारों के लिए बहुत कठिन हो गया है क्योंकि उनकी छवि किसी भी हद तक जाकर सरकार का विरोध करने की बन गई है। इसके अलावा उनकी चिंता यह भी है कि अभी आने वाले कई महीनों तक अधिकांश मीडिया समूहों में भर्ती भी बंद है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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