Thursday, May 23, 2024
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‘…तो उनके घर एक कुत्ता भी नहीं जाता’: बलिदानी मेजर के परिवार का वामपंथी CM ने किया था अपमान, मुंबई हमलों की एक कहानी यह भी

आतंकियों को ऊपर होने का फायदा मिल रहा था और उन्होंने NSG के जवानों को देख लिया था। साथियों के कवर फायर के बीच मेजर संदीप उन्नीकृष्णन आगे बढ़े। तभी अचानक एक और ग्रेनेड ब्लास्ट हुआ और उनके साथी सुनील जोधा घायल होकर सीढ़ियों से नीचे जा गिरे। इसके बाद...

आज भी उस घटना को याद कर हमारी रूह काँप जाती है, जब 26 नवंबर, 2008 को मुंबई दहली थी। 10 में से 9 आतंकियों को मार गिराया गया और अजमल कसाब ज़िंदा पकड़ा गया। इस हमले में हमलावरों सहित कुल 175 लोग मारे गए थे। इनमें 15 पुलिसकर्मी और 2 NSG कमांडो थे। छत्रपति शिवजी टर्मिनल, नरीमन हाउस और ताज होटल को आतंकियों ने खून से लाल कर दिया था। इस हमले में देशवासियों की रक्षा करते हुए बलिदान होने वालों में केरल के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन शामिल थे। केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने बलिदानी मेजर के परिवार को अपमानित किया था।

आगे बढ़ने से पहले परिचय दे देते हैं कि मेजर संदीप उन्नीकृष्णन थे कौन। उनका जन्म 15 मार्च, 1977 को केरल के कोझिकोड में स्थित चेरुवन्नूर में एक मलयाली परिवार में हुआ था। उनका परिवार बाद में कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में रहने लगा था। उनके पिता के उन्नीकृष्णन ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)’ में अधिकारी थे। वो उनके इकलौते बेटे थे। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखे बेंगलुरु के फ्रैंक एंथोनी पब्लिक स्कूल में हुई। उन्होंने 1995 में विज्ञान से स्नातक किया।

उनके शिक्षकों का कहना है कि वो बचपन से ही खेल-कूद में रुचि रखते थे और एक अच्छे एथलिट भी थे। उन्हें फ़िल्में देखना भी पसंद था। उनकी पत्नी का नाम नेहा है। 1995 में ही वो महाराष्ट्र के पुणे में ‘राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA)’ में शामिल हुए। वहाँ के उनके दोस्त भी उन्होंने एक निःस्वार्थ और दरियादिल और शांत चित्त के व्यक्ति के रूप में याद करते हैं। 12 जुलाई, 1999 को उन्हें भारतीय सेना में ‘बिहार रेजिमेंट’ की 14वीं बटालियन में लेफ्टिनेंट के रूप में शामिल किया गया। नीचे की तस्वीर उसी समय की है।

जब ‘बिहार रेजिमेंट’ में लेफ्टिनेंट बने थे संदीप उन्नीकृष्णन

उन्होंने जम्मू कश्मीर से लेकर राजस्थान तक में भारतीय सेना के लिए सेवाएँ दीं, जिसके बाद उनका चयन ‘राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG)’ के लिए हुआ। प्रशिक्षण के बाद उन्हें जनवरी 2007 में NSG के ‘स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप (SAG)’ में शामिल किया गया। इसके बाद उन्होंने कई सफल अभियानों में हिस्सा लिया। बेलगावी में स्थित कमांडो विंग इन्फेंट्री स्कूल में सबसे कठिन माने जाने वाले ‘घातक कोर्स’ में उन्होंने शीर्ष स्थान प्राप्त किया था। 2006 में वो NSG के कमांडो सर्विस में शामिल हुए थे। उन्होंने खुद ये विकल्प चुना था।

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के बारे में उनके पिता कहते हैं कि उन्होंने जिस भी क्षेत्र में कदम रखा, वहाँ वो जीतना चाहते थे और इसीलिए वो सचिन तेंदुलकर के बड़े फैन भी थे। वो हमेशा भारत को जीतते हुए देखना चाहते थे और क्रिकेट में भी जब हार होती थी तब वो उदास हो जाते थे। जब ISRO का कोई प्रोजेक्ट सफल नहीं होता था तब वो अपन पिता को ढाँढस बँधाते थे। उनके पिता कहते हैं कि अच्छा वेतन होने के बावजूद संदीप के अकाउंट में 3-4 हजार रुपए ही होते थे, क्योंकि वो लोगों की खूब मदद किया करते थे।

उनके पिता ने ‘द हिन्दू’ को बताया था, “मैं सोचता था कि मेरा बेटा महँगी ब्रांडेड चीजें खरीदता है, इसीलिए पैसे की बचत नहीं करता। लेकिन बाद में पता चला कि वो चैरिटी करते हैं। उनकी एक दोस्त की माँ को स्पाइन समस्या थी, जिसका सारा खर्च उन्होंने ही उठाया था। कई समाजसेवी संस्थाओं को भी वो रुपए दान दे देते थे। उनके निधन के बाद मुझे उन डोनेशंस को रिन्यू कराने के रिमाइंडर्स आने लगे, तब जाकर मुझे इन चीजों का पता चला।”

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने बताया था कि वो एक राष्ट्रवादी थे और हमेशा राष्ट्रवाद का समर्थन करते थे और राष्ट्रवाद से उनका आशय था कि आप देश के लिए कुछ करें, लेकिन उससे फायदा प्राप्त करने की कोशिश न करें। उन्होंने कहा था कि वो हमेशा ऐसे लोगों का विरोध करते थे, जो खुद को राष्ट्रवादी बताते फिरते थे, क्योंकि उनका मानना था कि कोई राष्ट्रवादी है तो दूसरे लोग ऐसा बोलने चाहिए वो खुद नहीं। वो हमेशा कहते थे कि वो अपने किसी साथी की लाश पर उसकी माँ को रोते हुए नहीं देख सकते। पिता कहते हैं कि उन्होंने इसके बदले अपनी माँ का रोना ही चुना।

26/11 का मुंबई हमला और मेजर संदीप उन्नीकृष्णन

मुंबई में हुए 26/11 के हमले के दौरान आतंकियों से निपटने में महाराष्ट्र पुलिस के जवानों से लेकर NSG के कमांडोज तक ने जो पराक्रम दिखाए, उसके लिए देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा। NSG को इस हमले से निपटने के लिए बुलाया गया था। इसी दौरान तेज़ होटल में मेजर संदीप उन्नीकृष्णन और चबाड हाउस में हवलदार गजेंद्र सिंह बिष्ट ने आतंकियों से लड़ते हुए देश के लिए बलिदान दे दिया। वो 28 नवंबर, 2008 को रात के 1 बजे का समय था, जब मजे संदीप उन्नीकृष्णन की टीम Y-शेप में ताज की सीढ़ियों से आगे बढ़ी थी।

अंदर पूरा अंधेरा था। बाहर से फायर ब्रिग्रेड लगातार पानी बरसा रहे थे, ताकि तेज़ होटल में लगी आग को बुझाया जा सके। सीढ़ियों पर भी पानी फैला हुआ था। जब NSG के जवान वहाँ गए, तो आतंकियों ने ऊपर से ही गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के दो साथियों ने दरवाजे के दोनों तरफ पोजीशन लिया। तभी अचानक से एक ग्रेनेड सीढ़ी पर आकर गिरा और अंधेरे में जोर का ब्लास्ट हुआ। ऊपर से आतंकी AK-47 से गोलीबारी कर रहे थे, जिसकी गोलियाँ दीवारों तक को छेद दे रही थीं।

इस पूरे घटनाक्रम का जिक्र ‘इंडिया टुडे’ मैगजीन के लिए लंबे समय तक आंतरिक सुरक्षा को कवर करने वाले पत्रकार संदीप उन्नीथन ने अपनी पुस्तक ‘Black Tornado, The 3 Sieges of Mumbaiमें किया है। इसमें उन्होंने लिखा है कि किस तरह आतंकियों को ऊपर होने का फायदा मिल रहा था और उन्होंने NSG के जवानों को देख लिया था। साथियों के कवर फायर के बीच मेजर संदीप उन्नीकृष्णन आगे बढ़े। तभी अचानक एक और ग्रेनेड ब्लास्ट हुआ और उनके साथी सुनील जोधा घायल होकर सीढ़ियों से नीचे जा गिरे।

दो गोलियाँ उनकी छाती में लगीं। उन्हें कुल 7 गोलियाँ लगी थीं, लेकिन वो इस हमले के बाद किसी तरह मौत से संघर्ष करते हुए जीवित बचने में सफल रहे थे। अपने एक साथी को सुनील को फर्स्ट ऐड देने का निर्देश देकर मेजर संदीप उन्नीकृष्णन अकेले आगे बढ़े। उन्हें कवर करने के लिए कोई नहीं था। उन्हें बार-बार कर्नल की तरफ से वापस आने के लिए कहा जा रहा था, लेकिन उनके साथियों ने सोचा कि वो आतंकियों के नजदीक चले गए हैं, इसीलिए जवाब नहीं दे सकते। दूसरे तरफ से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।

28 नवंबर, 2021 को सुबह 3 बजे तक ताज टॉवर की सभी 21 मंजिलों से सभी बंदियों को निकाल कर मुंबई पुलिस को सौंप दिया गया था, लेकिन मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का कोई अता-पता नहीं था। सुबह 10 बजे के करीब उनका मृत शरीर होटल में ही पड़ा मिला। उनके शरीर में कई गोलियाँ धँसी हुई थीं। यहाँ तक कि गोलियाँ उनके सिर के भी आर-पार हो गई थीं। असल में आतंकी एक मूर्ति के पीछे ताखा में छिपे हुए थे। मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के बलिदान के बाद उनके हथियार भी आतंकी लूट कर निकल गए थे।

वो NSG के पहले कमांडो थे, जो मुंबई के 26/11 हमले में बलिदान हुए थे। इसके बाद NSG और ज्यादा सावधान हो गई थी। उसने नए सिरे से रणनीति बनाई थी, ताकि जान का नुकसान न हो। लेकिन, मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ने आतंकियों को होटल के उत्तरी हिस्से में एक रेस्टॉरेंट की तरफ धकेल दिया था, जहाँ उनके पास भागने तक की जगह नहीं थी। चारों आतंकी ढूँढ कर ढेर कर दिए गए। बलिदान से पहले वॉकीटॉकी पर उनके अंतिम शब्द थे, “ऊपर मत आना। मैं इनसे निपट लूँगा।”

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की प्रतिमा

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को भारत सरकार ने ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया। राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। बेंगलुरु में 4.5 किलोमीटर लंबी एक सड़क का नामकरण उनके नाम पर किया गया। मुंबई के विखरोली लिंक रोड में स्थित जोगेश्वरी के ‘इंडियन एजुकेशन सोसाइटी’ में उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गई। ये पहली बार नहीं था, जब उन्होंने ऐसी बहादुरी दिखाई। ‘ऑपेरशन विजय’ के दौरान 31 दिसंबर, 1999 में उन्होंने पाकिस्तानी गोलीबारी के बीच शत्रु से मात्र 200 मीटर की दूरी पर पोस्ट स्थापित किया था

जब CPI(M) के मुख्यमंत्री ने किया बलिदानी के परिवार का अपमान

उस समय केरल में CPI(M) की सरकार थी और वीएस अच्युतानंदन मुख्यमंत्री हुआ करते थे। एक तरफ जहाँ परिवार ने अपने एकलौते बेटे को खो दिया था, वहीं दूसरी तरह मुख्यमंत्री ने उनका अपमान किया। केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने कहा था, “अगर शहीद का घर नहीं होता उनके यहाँ एक कुत्ता भी नहीं जाता।” दरअसल, केरल के तब गृह मंत्री रहे कोडियेरी कलाकृष्णन ‘पोलिटिकल टूरिज्म’ के लिए उनके बेंगलुरु स्थित आवास पर पहुँचे थे, जहाँ उन्हें परिवार के गुस्से का सामना करना पड़ा था, जिसके बाद मुख्यमंत्री ने ये बयान दिया।

अच्युतानंदन ने कहा था, “क्या ये कहीं का नियम है कि कर्नाटक और केरल के मुख्यमंत्री को साथ में दौरा करना चाहिए? अगर वो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का घर नहीं होता तो उसकी तरफ एक कुत्ता भी नहीं देखता। उनके परिवार के साथ हमारा जुड़ाव खास है। एक सैनिक के पिता होने के नाते के उन्नीकृष्णन को ये नहीं समझना चाहिए क्या?” केरल सरकार की तरफ से बलिदानी मेजर के अंतिम संस्कार में कोई नेता नहीं गया, जिस पर विपक्षी भाजपा के हमले के बाद वहाँ की सरकार ने बलिदानी मेजर के घर का दौरा किया।

बलिदानी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने उन नेताओं को घर में नहीं घुसने दिया था, जिसके बाद एक सीएम ने अपने ही राज्य के बलिदानी सैनिक के लिए इस तरह की भाषा का प्रयोग किया। उनके पिता ने केरल के मुख्यमंत्री से मिलने से इनकार कर दिया था। कर्नाटक में तब भाजपा का बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री थे। वो खुद अंतिम संस्कार में उपस्थित थे। कर्नाटक के कई लोग थे। लेकिन, केरल सरकार ने किसी को नहीं भेजा। उनके पिता का कहना था कि उनका बेटा सिर्फ केरल का ही नहीं, बल्कि पूरे देश का था।

केरल के मुख्यमंत्री के दौरे से पहले वहाँ सिक्योरिटी के लिए स्निफर कुत्ते भी लाए गए थे, जिन्हें पिता ने घर से घुसने से मना कर दिया था। तामझाम के साथ वहाँ पहुँचे केरल के सीएम को लेकर मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने कहा था कि नेताओं ने इस तरह दौरा जारी रखा तो वो आत्महत्या के लिए भी मजबूर हो जाएँगे। बाद में केरल सरकार ने सफाई दी थी कि मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन के ‘राजनीतिक सचिव’ बलिदानी मेजर के अंतिम संस्कार का हिस्सा बने थे।

बेशर्मी की हद तो ये थी कि मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने बाद में कहा कि वो बलिदानी मेजर के परिवार पर टिप्पणी के लिए माफ़ी नहीं माँगेंगे। एक तो वो 4 दिनों तक परिवार से मिलने नहीं गए जबकि येदियुरप्पा वहाँ मुस्तैद थे, ऊपर से उन्होंने इस तरह की बातें की। जब केरल के ये नेतागण वहाँ पहुँचे थे, तब परिवार की स्थिति बेहाल थी और माँ बार-बार बेहोश हो रही थीं। इसी दौरान पिता ने इन नेताओं को वहाँ से निकल जाने के लिए कहा था, जो पूरे लाव-लश्कर के साथ वहाँ पहुँचे हुए थे।

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन पर एक फिल्म भी बनी है, जिसका नाम है – ‘मेजर’। तेलुगु अभिनेता अदिवि शेष ने इसमें उनका किरदार निभाया है। फिल्म की स्क्रिप्ट भी उन्होंने ही लिखी है। कोरोना के कारण इस फिल्म की रिलीज डेट में देरी हुई है। इसे 11 फरवरी, 2022 को तेलुगु के अलावा हिंदी और मलयालम में भी रिलीज किया जाएगा। तेलुगु के बड़े स्टार महेश बाबू ने इस फिल्म का निर्माण किया है। शोभिता धूलिपाला और प्रकाश राज अन्य किरदारों में दिखाई देंगे।

जब उन्हें मरणोपरांत ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया, तब बताया गया कि किस तरह अपने दाहिने हाथ में गोली लगने के बावजूद वो लड़ते रहे थे। उन्होंने अपने घायल साथी को सुरक्षित वहाँ से दूर किया। उन्होंने 14 बंदियों की जान बचाई थी और उन्हें सुरक्षित निकाला था। आज भी येलाहंका न्यू टाउन में उनके नाम पर जो सड़क है, वो उनकी गाथा कहती है। बेंगलुरु के राममूर्ति नगर आउटर रिंग रोड जंक्शन पर भी उनकी प्रतिमा है। 15 घंटों तक लगातार संघर्ष कर के लोगों को आतंकियों सुरक्षित निकालने वाले मेजर संदीप उन्नीकृष्णन अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी अगली पीढ़ियों को ज़रूर मालूम होनी चाहिए।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
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