Thursday, November 26, 2020
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वामपंथियों के बेचे हुए सपने खरीदने वाले भारतीय अब ‘अंतरिक्ष के सेनानी’ बन चुके हैं

एंटी सैटलाइट वेपन बनाकर हम कुंठा की बेड़ियों से आज़ाद हुए हैं। हम वामपंथी बुद्धिजीवियों की उस स्वप्न नगरी से मुक्त हुए हैं जहाँ केवल यही सिखाया जाता रहा कि शांतिप्रिय देश होने का अर्थ कम्युनिस्ट चीन और जेहादी पाकिस्तान का तुष्टिकरण होता है।

सन 1998 में जब भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण कर स्वयं को ‘न्यूक्लियर पॉवर स्टेट’ घोषित कर दिया था तब अमेरिका आदि देशों के अतिरिक्त भारत के कुछ बुद्धिजीवियों ने भी इस निर्णय की निंदा की थी। उन बुद्धिजीवियों की कुंठा इतनी अधिक थी कि पाँच वर्ष सरकार की आलोचना करने के पश्चात भी उन्हें यही लगता रहा कि कोई उनकी बात सुन नहीं रहा। तब ओरिएंट लॉन्गमैन प्रकाशक ने उन बुद्धिजीवियों को बुलाकर “Prisoners of the Nuclear Dream” नामक पुस्तक लिखवाई जो सन 2003 में प्रकाशित हुई थी।

इस पुस्तक का शीर्षक एक पाकिस्तानी न्यूक्लियर पॉलिसी एक्सपर्ट ज़िया मियाँ ने सुझाया था, संभवतः इसीलिए मुझमें इसे पढ़ने की उत्सुकता जगी थी। इस पुस्तक में यह स्थापित किया गया था कि भारत को परमाणु परीक्षण करने की कोई आवश्यकता नहीं थी और ऐसा कर के भारत ने दक्षिण एशिया की स्थिरता और सुरक्षा के वातावरण को दूषित कर दिया था। कई वामपंथी विद्वानों ने विविध प्रकार के विचार विभिन्न दृष्टिकोण से प्रस्तुत किए थे जिनका एकमात्र उद्देश्य यही बताना था कि भारत को परमाणु परीक्षण क्यों नहीं करने चाहिए थे।

लेखक एक प्रकार से भारत के नागरिकों को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनने के दिवास्वप्न की बेड़ियों से बंधा हुआ बंदी मानते थे जो नींद से जागकर और मुक्त होकर सत्य नहीं देख पा रहे थे। वस्तुतः दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन पर चिंतन करने वाले उन बुद्धिजीवियों के अनुसार इस क्षेत्र में शांति की एकमात्र गारंटी पाकिस्तान का तुष्टिकरण ही थी। अर्थात भारत को कभी भी ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए था जिससे पाकिस्तान (या चीन) भड़क जाए अथवा नाराज़ हो जाए।  

आज इक्कीस वर्ष पश्चात भारत के उन्हीं नागरिकों ने बुद्धिजीवियों के उस मिथक को तोड़ दिया है जिसके अनुसार भारत को एक दब्बू राष्ट्र की भाँति सब कुछ सहते हुए निरस्त्रीकरण की निद्रा में सोते हुए शांति के स्वप्न देखने चाहिए थे। आज भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र ही नहीं वरन अंतरिक्ष शक्ति संपन्न राष्ट्र भी बन गया है। दिनांक 27 मार्च 2019 को भारत के रक्षा वैज्ञानिकों ने मिशन शक्ति के अंतर्गत ‘एंटी सैटलाईट’ मिसाईल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। भारत यह उपलब्धि अर्जित करने वाला विश्व का चौथा राष्ट्र बन गया है।

बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम से एंटी सैटलाइट वेपन बनने की कहानी

पूर्व डीआरडीओ अध्यक्ष वी के सारस्वत ने 2010 में ही कहा था कि अग्नि शृंखला की मिसाइलें भविष्य में एंटी सैटलाइट हथियार के रूप में भी विकसित की जा रही हैं। एंटी सैटलाइट वेपन क्या है? नाम से ही स्पष्ट है कि किसी सैटलाइट को मार गिराने की क्षमता वाले अस्त्र को एंटी सैटलाइट वेपन कहा जाता है। एंटी सैटलाइट वेपन का विकास बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के विकास के साथ ही हुआ था। बैलिस्टिक मिसाइल वह मिसाइल होती है जो एक बार फायर करने के बाद वायुमंडल में बहुत ऊपर तक जाती है फिर पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ही नीचे निर्धारित लक्ष्य पर गिरती है।

उदाहरण के लिए एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप पर मार करने वाली इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें जिन्हें ICBM भी कहा जाता है। भारत की अग्नि-5 मिसाइल ICBM की श्रेणी में आती है। यह परमाणु आयुध ले जाने में सक्षम है और वैश्विक शक्ति बनने के लिए भारत के पास ऐसी मिसाइल होना अनिवार्य भी है। बहरहाल, रूस और अमेरिका ने एक दूसरे की बैलिस्टिक मिसाइलों के हमले से बचने के लिए बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) सिस्टम विकसित किए थे।

शीतयुद्ध के दौरान पचास और साठ के दशक में अमेरिका और रूस ने सोचा कि ऐसे BMD विकसित किए जाएँ जिनके ऊपर न्यूक्लियर बम लगा हो जो शत्रु की बैलिस्टिक मिसाइल को नष्ट कर सके। लेकिन इस विचार को त्याग दिया गया क्योंकि ऐसे किसी भी जवाबी हमले में दोनों तरफ की क्षति होने का खतरा था और वायुमंडल में न्यूक्लियर रेडिएशन फैलने का भी अंदेशा था। अमेरिका ने स्ट्रेटेजिक डिफेंस इनिशिएटिव (SDI) के अंतर्गत ऐसे BMD विकसित करने का विचार अपनाया था लेकिन बाद में इसे रद कर दिया गया और बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस ऑर्गेनाइज़ेशन (BMDO) की स्थापना की गई।

इस परियोजना के अंतर्गत ऐसे BMD विकसित किए गए जो शत्रु की बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में एक निश्चित ऊँचाई पर मार गिराने में सक्षम हों। आज ऐसे BMD विकसित हो चुके हैं जो शत्रु की बैलिस्टिक मिसाइल को बीच रास्ते में, यहाँ तक की लॉन्च होने से पहले ही नष्ट कर सकें। एक्स रे लेज़र, पार्टिकल बीम जैसी किरणों की तकनीक भी विकसित की जा रही है जो बैलिस्टिक मिसाइल को नष्ट कर सके। यह बिलकुल वैसा ही होगा जैसा जेम्स बॉन्ड की एक फिल्म में ‘इकेरस’ डिवाइस करती है।

भारत के बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम की बात करें तो हमारे पास तीन सिस्टम हैं: एडवांस्ड एयर डिफेंस (AAD), जो 30 किमी ऊँचाई से आ रही मिसाइल को मार गिराने में सक्षम है; पृथ्वी एयर डिफेंस (PAD) जो 80 किमी ऊँचाई पर बैलिस्टिक मिसाइल को नष्ट कर सकता है और पृथ्वी डिफेंस वेहिकल (PDV) जो 150 किमी की ऊँचाई पर बैलिस्टिक मिसाइल को नष्ट कर सकने में सक्षम है।

बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के विकास क्रम में यह विचार उत्पन्न हुआ कि यदि हमला करने वाली वस्तु कोई बैलिस्टिक मिसाइल न होकर शत्रु देश की सैटलाइट हुई तो उसे कैसे नष्ट किया जाएगा। इसी विचार से एंटी सैटलाइट अस्त्र की परिकल्पना साकार हुई। एक सैटलाइट को नष्ट करने के लिए न्यूक्लियर वारहेड या किसी अन्य विस्फोटक की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए ‘काईनेटिक किल’ (Kinetic Kill) तकनीक विकसित की गई। इस तकनीक में मिसाइल के ऊपर धातु का एक टुकड़ा लगा दिया जाता है जिसे सैटलाइट को लक्षित कर दागा जाता है। पृथ्वी का चक्कर काट रही सैटलाइट की गति ही इतनी अधिक होती है कि वह धातु से टकरा कर टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। भारत ने भी मिशन शक्ति के अंतर्गत इसी तकनीक से उपग्रह को मार गिराया।

क्या अंतरिक्ष का सैन्यीकरण अवश्यंभावी है?

किसी महान विचारक ने कहा था कि हम युद्ध को नहीं चुनते, युद्ध हमें चुनता है। अमेरिका ने रूस के साथ होड़ करने के चक्कर में सन 1985 में पहली बार किसी सैटलाइट को मार गिराया था। दक्षिण एशिया में अपनी दादागिरी दिखाने को आतुर चीन ने सन 2007 से 2014 के बीच एक दो नहीं बल्कि सात ऐसे कारनामे किए जिन्हें एंटी सैटलाइट वेपन के परीक्षण के रूप में देखा जा सकता है। चीन के परीक्षणों से ढेर सारा मलबा अंतरिक्ष में इकठ्ठा हो चुका है और यह मलबा दूसरे देशों की सैटलाइट के लिए संकट बन चुका है। मलबे का एक छोटा सा टुकड़ा भी तीव्र गति से पृथ्वी का चक्कर लगाती किसी सैटलाइट से टकरा कर उसे नष्ट करने की क्षमता रखता है।

धरती के ऊपर सैटलाइट प्रायः तीन कक्षाओं में प्रक्षेपित की जाती हैं: लो अर्थ ऑर्बिट (LEO; 2000 KM above earth’s surface), मीडियम अर्थ ऑर्बिट (MEO; 2000-35,786 KM above earth’s surface) तथा हाई अर्थ ऑर्बिट (above 35,786 KM). चीन की गतिविधियाँ लो अर्थ ऑर्बिट से लेकर हाई अर्थ ऑर्बिट में परिक्रमा कर रहे उपग्रहों को नष्ट करने की तकनीक विकसित करने का संदेह उत्पन्न होने के पर्याप्त कारण गिनाती हैं। ध्यातव्य है कि हम जिसे अंतरिक्ष कहते हैं वह धरातल से 100 किमी ऊपर का आकाश है।

वायुमंडल से अंतरिक्ष को अलग करने वाली रेखा कारमन लाइन कहलाती है। इसके ऊपर जो कुछ भी है वह लीगल शब्दावली में ‘आउटर स्पेस’ कहलाता है। सन 1967 में संयुक्त राष्ट्र ने सभी सदस्य देशों से एक आउटर स्पेस संधि पर हस्ताक्षर करने का आग्रह किया था। सौ से अधिक देशों के साथ भारत ने भी इस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। किंतु आउटर स्पेस ट्रीटी के बावन वर्ष बीत जाने के बाद भी विश्व में एंटी सैटलाइट अस्त्र विकसित होने बंद नहीं हुए हैं क्योंकि ऐसे किसी भी अस्त्र के प्रयोग पर यह संधि मौन है। आउटर स्पेस संधि मूल रूप से यही कहती है कि कोई देश चंद्रमा या किसी ऐसी खगोलीय वस्तु पर अपना अधिकार नहीं कर सकता और अंतरिक्ष का उपयोग वैज्ञानिक शोध के लिए किया जाना चाहिए इत्यादि।

अंतरिक्ष विधि विशेषज्ञ आउटर स्पेस में निरस्त्रीकरण के लिए मुख्य रूप से दो शब्दों का प्रयोग करते हैं: Militarization of Space और Weaponization of Space. इन दोनों के भिन्न अर्थ हैं। अंतरिक्ष के सैन्यीकरण का अर्थ हुआ कि हम अंतरिक्ष के संसाधनों का उपयोग सैन्य आवश्यकताओं के लिए करें, जैसे कि नेविगेशन, संचार या खोजी उपग्रह इत्यादि। जबकि अंतरिक्ष के ‘वेपनाईज़ेशन’ का अर्थ हुआ किसी दूसरे देश के संसाधनों को अंतरिक्ष से धरती पर अथवा धरती से अंतरिक्ष में नष्ट करना।

कोई भी संधि अंतरिक्ष के सैन्य उपयोग से मना नहीं करती इसीलिए विश्व के कुछ सक्षम देशों के साथ भारत ने भी IRNSS उपग्रह समूह द्वारा स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NAVIC विकसित की है। दूसरी तरफ अमेरिका चीन और रूस के कारण हुए अंतरिक्ष के वेपनाईज़ेशन से जो संकट उत्पन्न हुआ है उसके प्रति निरोधक (deterrence) क्षमता होना अत्यंत आवश्यक था इसलिए भारत को एंटी सैटलाइट वेपन विकसित करना पड़ा।

इतिहास देखें तो भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम सदैव शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही समर्पित रहा है। हमने संचार (टीवी, रेडियो) उपग्रह प्रक्षेपित किए, शिक्षा के लिए EDUSAT छोड़ा गया। धीरे-धीरे भारत ने रिमोट सेंसिंग तकनीक विकसित की, कुछ वर्ष पहले ही खगोलीय विश्लेषण के लिए ASTROSAT छोड़ा गया था। मंगलयान की कीर्ति इतनी फैली कि विदेशी अख़बारों ने कटाक्ष तक किया। चंद्रयान द्वितीय चरण शीघ्र ही मूर्तरूप लेगा और तब तक शायद हम मानव को भी अंतरिक्ष में भेजने की योजना भी पूर्ण कर लेंगे। इंटेलिजेंस जुटाने वाली सैटलाइट EMISAT 1 अप्रैल 2019 को अंतरिक्ष में भेजी जाएगी।

भारत सरकार ने एक संयुक्त सैन्य स्पेस एजेंसी के गठन को स्वीकृति पहले ही प्रदान कर दी है। इन सब उपलब्धियों के आलोक में राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से ‘ASAT-मिशन शक्ति’ निश्चित ही एक मील का पत्थर सिद्ध होगा। एंटी सैटलाइट वेपन से लैस होने पर कोई अन्य देश हमारे सैटलाइट को नष्ट करने की हिमाकत नहीं करेगा। चूँकि आज बैंक के वित्तीय लेनदेन से लेकर जीपीएस तक और गहरे समुद्र में तैरते जहाज से लेकर सियाचिन ग्लेशियर तक सब जगह की संचार और नेविगेशन व्यवस्था सैटलाइट पर ही निर्भर है इसलिए हमारे पास शत्रु के उपग्रह को मार गिराने वाली प्रतिरक्षात्मक प्रणाली होना गर्व की बात है।

इस प्रकार उन बुद्धिजीवियों के मुँह पर भी तमाचा पड़ा है जिन्हें मई 1998 में किए गए ऑपरेशन शक्ति पर आपत्ति थी। भारत तकनीकी विकास में कभी पीछे नहीं रहा। हमने अपने बलपर वह प्रत्येक तकनीक विकसित की है जो विश्व हमें नहीं देना चाहता था चाहे वह सुपर कंप्यूटर हो या परमाणु अस्त्र की सामग्री। एंटी सैटलाइट वेपन बनाकर हम कुंठा की बेड़ियों से आज़ाद हुए हैं। हम वामपंथी बुद्धिजीवियों की उस स्वप्न नगरी से मुक्त हुए हैं जहाँ केवल यही सिखाया जाता रहा कि शांतिप्रिय देश होने का अर्थ कम्युनिस्ट चीन और जेहादी पाकिस्तान का तुष्टिकरण होता है। न्यूक्लियर सुपर पॉवर बनने का स्वप्न देखने वाले भारतीय आज अंतरिक्ष के योद्धा भी बन चुके हैं।      

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