Wednesday, October 21, 2020
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सर्टिफाइड ‘मौलाना’ है मसूद अजहर: आतंक का मजहब भले न हो, आतंकी का मजहब स्पष्ट है

ध्यान रहे कि प्रतिबंध ‘मौलाना’ मसूद अज़हर पर लगा है। यह नाम ही मज़हबी आतंकवाद को प्रमाणित करता है। मसूद अज़हर सर्टिफाइड ‘मौलाना’ है, और उसे उसके पूरे नाम से जाना जाता रहा है। कहने के लिए आतंक का मज़हब भले न हो लेकिन आतंकी का मज़हब स्पष्ट है।

अंततः मौलाना मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध लग ही गया। वैश्विक इस्लामिक आतंक के विरुद्ध यह छोटा ही सही लेकिन प्रभावशाली निर्णय है। भारत लगभग 10 वर्षों तक संयुक्त राष्ट्र में जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद पर प्रतिबंध लगाने की लड़ाई लड़ता रहा जिसमें अब जाकर सफलता मिली है। दस वर्षों की इस मेहनत को केवल यह कहकर नकारा नहीं जा सकता कि ‘इससे कुछ नहीं होने वाला’। वैश्विक स्तर पर यह भारत की कूटनीतिक विजय है और इसके मायने केवल एक आतंकी सरगना पर प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं।

मौलाना मसूद अज़हर पर प्रतिबंध के क्या मायने हैं?

पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा पोषित आतंकी सरगना मौलाना मसूद अज़हर पर संयुक्त राष्ट्र की 1267 सैंक्शन कमेटी ने प्रतिबंध लगाया है। यह कमेटी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की उन 14 कमेटियों में से एक है जो आतंक, परमाणु प्रसार और देशों के बीच ‘कन्फ्लिक्ट’ की स्थिति में आवश्यकतानुसार किसी संगठन अथवा व्यक्ति पर प्रतिबंध लगा सकती है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 15 अक्टूबर 1999 को प्रस्ताव संख्या 1267 को सर्वसम्मति से पारित किया गया था और एक सैंक्शन कमेटी बनाई गई थी। सुरक्षा परिषद के पाँच स्थाई और 10 अस्थाई सदस्य, इस कमेटी के सदस्य हैं। कमेटी ने सन 1999 में मुख्यतः तालिबान और उससे जुड़े संगठनों को सूचीबद्ध किया था और उन पर प्रतिबंध लगाया था। सन 2011 में इस सूची में अल-क़ायदा को जोड़ा गया।

इसके बाद 2015 में इस कमेटी का दायरा बढ़ाकर इसमें इस्लामिक स्टेट को भी जोड़ा गया। दो साल बाद 2017 में कमेटी ने इस्लामिक स्टेट और अल कायदा की सारी संपत्तियों को सीज़ कर दिया, आतंकवादियों की यात्राओं पर प्रत्येक देश ने प्रतिबंध लगाया और उन्हें किसी भी तरह से हथियारों की सप्लाई बंद की।

इस प्रस्ताव के तहत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद किसी आतंकवादी या आतंकी संगठन को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी या आतंकवादी संगठन घोषित कर सकती है और उस पर व्यापक प्रतिबंध लगा सकती है। प्रतिबंध का अर्थ यह है कि इस सूची में नाम शामिल होते ही संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश प्रतिबंधित व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी या आतंकी संगठन के रूप में सत्यापित मानकर कठोर रवैया अपनाते हैं। भले ही ऐसे आतंकी या आतंकवादी संगठन दुनिया में कहीं भी स्थित क्यों न हों उनके सारे बैंक खाते फ्रीज़ कर दिए जाएँगे, विदेशी यात्रा करने पर प्रतिबंध होगा और हथियारों की आपूर्ति निषेध हो इसे भी सुनिश्चित किया जाएगा।

अभी तक 1267-सैंक्शन कमेटी 262 आतंकियों और 83 संगठनों पर प्रतिबंध लगा चुकी है। लश्कर-ए-तय्यबा का सरगना हाफिज सईद, इस्लामिक स्टेट का चीफ अबु बक़र अल बग़दादी, अल क़ायदा का आयमन अल ज़वाहिरी और ओसामा बिन लादेन का लड़का हमज़ा पहले से ही इस सूची में है। मौलाना मसूद अज़हर पर भी वही सारे प्रतिबंध लागू होंगे जो इन पर हैं। मसूद पर प्रतिबंध तो अभी लगा है लेकिन जैश-ए-मोहम्मद को संयुक्त राष्ट्र ने 17 अक्टूबर 2001 को प्रतिबंधित किया था।

ध्यान देने वाली बात यह है कि मौलाना मसूद अज़हर कोई एक अकेला आतंकवादी नहीं है। जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन पूरी तरह से उसके परिवारवालों और परिजनों द्वारा संचालित है। मौलाना मसूद को छुड़ाने के लिए इंडियन एयरलाइन्स के विमान IC-814 की हाईजैकिंग का मास्टरमाइंड मसूद का भाई इब्राहिम अज़हर था। आज की तारीख में मौलाना मसूद के 19 रिश्तेदार जैश-ए-मोहम्मद के सदस्य हैं। इनमें मसूद के भाई, ससुरालवाले और उनकी अगली पीढ़ी भी शामिल है।

चीन के अड़ंगे से मौलाना मसूद पर प्रतिबंध लगने में हुआ विलंब

सैंक्शन कमेटी 1267 के तहत संयुक्त राष्ट्र का कोई भी सदस्य देश किसी भी आंतकवादी को वैश्विक आतंकवादी की सूची में शामिल करने का निवेदन कर सकता है, जिस पर सुरक्षा परिषद की स्थाई समिति का अनुमोदन करना जरूरी है। अगर सुरक्षा परिषद का कोई एक भी स्थाई सदस्य देश इस प्रस्ताव का वीटो करता है तो वह निवेदन पारित नहीं होगा। भारत द्वारा मौलाना को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने के प्रयास पर चीन बार-बार वीटो कर अड़ंगा लगाता रहा है।  

दस सालों में चार बार चीन ऐसी हरकत कर चुका है जिससे मौलाना मसूद पर संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंध नहीं लग पाया था। भारत ने मुंबई पर 26/11 के हमले के बाद 2009 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मौलाना मसूद को प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में डालने का निवेदन किया था जिसे चीन ने यह कहकर लटका दिया कि मौलाना के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं है। इसके बाद 2016 में पठानकोट आतंकी हमले के बाद जब भारत ने मौलाना मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया तब भी चीन ने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र में उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं।

फिर 2017 में चीन ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में मौलाना मसूद के खिलाफ सर्वसम्मति नहीं बन पाई है। पुलवामा हमले के बाद मार्च 2019 में अमेरिका, ब्रिटेन और फ़्रांस ने एकमत होकर मसूद पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसे चीन कुछ तकनीकी कारणों का हवाला देकर रोकने में सफल रहा। इसके बाद अमेरिका ने स्वतंत्र रूप से 27 मार्च को प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसके बाद चीन पर दबाव बढ़ गया था।

अमेरिका ब्रिटेन और फ्रांस ने चीन पर दबाव डाला कि वह रेसोलुशन UNSC-1267 से तकनीकी रोक एक-दो सप्ताह में हटाए। यदि चीन ऐसा नहीं करता तो चीन को मौलाना मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने के लिए काउंसिल में दूसरे प्रस्ताव का सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा गया था।

इस पूरे मामले पर एक विदेशी डिप्लोमेट ने कहा था कि चीन को 23 अप्रैल तक का समय दिया गया था कि वह रोक हटा ले नहीं तो 1267 को दरकिनार करते हुए एक नया प्रस्ताव लाया जाएगा। ऐसा एक प्रस्ताव अनौपचारिक रूप से सभी 15 सदस्य देशों के बीच सर्कुलेट करने की चर्चा भी सामने आई थी, इस आशय के साथ कि चीन इसके दबाव में आकर आतंकी सरगना मसूद अज़हर पर अपने स्टैंड पर पुनर्विचार करे। तब चीन ने 6 मई तक का समय माँगा। अंततः अमेरिका अपने स्टैंड पर कायम रहा और चीन को झुकना पड़ा और 1 मई 2019 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा मौलाना मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया गया।

सर्टिफाइड ‘मौलाना’ है मसूद अज़हर; पहचानने में कोई गलती न करें

मौलाना मसूद पर वैश्विक आतंकवादी होने का आधिकारिक ठप्पा लगने के साथ ही टीवी चैनल और प्रिंट मीडिया के वाले उसे ‘मसूद अज़हर’ कहने लग गए हैं। आश्चर्य की बात है कि अमेरिका की प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के Center for International Security and Cooperation की वेबसाइट पर मौलाना मसूद अज़हर को एक रैडिकल इस्लामिस्ट ‘स्कॉलर’ लिखा गया है। अब जब मसूद अज़हर वैश्विक आतंकी घोषित हो गया है तब पश्चिमी ‘विद्वान’ उसे क्या कहेंगे यह विचारणीय प्रश्न है।

ध्यान रहे कि प्रतिबंध ‘मौलाना’ मसूद अज़हर पर लगा है। यह नाम ही मज़हबी आतंकवाद को प्रमाणित करता है। मसूद अज़हर सर्टिफाइड ‘मौलाना’ है, और उसे उसके पूरे नाम से जाना जाता रहा है। कहने के लिए आतंक का मज़हब भले न हो लेकिन आतंकी का मज़हब स्पष्ट है और सारे मज़हब परस्त ‘मौलाना’ शब्द को छिपाने की भरपूर कोशिश करते दिखेंगे। हमारे आसपास के 90% पत्रकारों और कथित लेखकों आदि को परखिये तो इनकी प्रतिबद्धता ‘मौलाना’ के प्रति 100 टका स्पष्ट दिखेगी। आसपास नज़र भी बनाये रखिये कौन जाने कि आपके आसपास कोई मज़हबी किसी आम लड़के को पेट पर बम बाँधकर फूटने की जन्नती प्रेरणा देने में लिप्त है। सतर्क रहें, सत्यनिष्ठ रहें, मज़हबी प्रेरणाओं की सच्चाई से लोगों को अवगत कराते रहें।

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