अमेरिकी प्रतिनिधि राइली एम. मूर ने प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill) की आलोचना करते हुए दावा किया है कि यह विधेयक भारत सरकार को ‘चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर कब्जा करने’ की अनुमति देता है। अपने पहले कार्यकाल के इस रिपब्लिकन सांसद ने इसे ‘ईसाइयों पर सीधा हमला’ करार दिया।
4 अगस्त को सोशल मीडिया मंच X पर लिखते हुए मूर ने कहा,
“हमारे प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद संत थॉमस भारत के मालाबार तट पर आए थे, लेकिन ईसाइयों के इस लंबे इतिहास के बावजूद भारत की संसद विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में ऐसे संशोधन पर विचार कर रही है, जिससे सरकार चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर कब्जा कर सके।”
उन्होंने आगे लिखा,
“यह ईसाइयों पर स्पष्ट हमला है। यदि यह विधेयक इसी रूप में आगे बढ़ा, तो यह भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।”
विडंबना यह है कि चर्चों पर ‘सरकारी कब्जे’ का उनका दावा उतना ही भ्रामक है, जितना पहली शताब्दी में संत थॉमस के दक्षिण भारत आने का दावा।
FCRA संशोधन विधेयक को लेकर अमेरिकी सांसद ने जो भ्रम और भय के माहौल तैयार करने की कोशिश की है, उसकी पड़ताल आवश्यक है।
मार्च 2026 में पेश किया गया FCRA संशोधन विधेयक मुख्य रूप से उन संस्थाओं से संबंधित है, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो चुका है, जिन्होंने स्वयं लाइसेंस सरेंडर कर दिया है या जिनका नवीनीकरण नहीं हुआ। यह विधेयक केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी को ऐसी संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और उस विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार देता है। इसका मकसद उनके दुरुपयोग, अवैध हस्तांतरण को रोकना है।
इसके अलावा, गृह मंत्रालय ने 22 जून 2026 को अधिसूचना के माध्यम से विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम, 2011 में संशोधन करते हुए धार्मिक समुदाय के कई वर्गों के लिए धर्मांतरण (Proselytisation) को नियमों के दायरे से बाहर रखा।
दिलचस्प बात यह है कि राइली मूर पहले अमेरिकी सांसद नहीं हैं, जिन्होंने भारत के FCRA संशोधन विधेयक को लेकर आपत्ति जताई है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मई 2026 की भारत यात्रा से पूर्व अमेरिकी सांसद क्रिस स्मिथ ने मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी का FCRA लाइसेंस निलंबित किए जाने का मुद्दा भारत के सामने उठाने की अपील की थी।
भय का माहौल बनाते हुए स्मिथ ने दावा किया था कि यदि यह विधेयक पारित हो गया, तो ‘सभी चर्चों और डायोसीज की संपत्तियाँ भारत के कब्जे में जा सकती हैं।’
राइली मूर की तरह स्मिथ ने भी चेतावनी दी थी कि यदि इस विधेयक को रोका नहीं गया, तो इससे भारत-अमेरिका संबंधों को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।
सिर्फ विदेशी राजनेता ही नहीं, बल्कि भारत के कुछ मीडिया संस्थान भी इस विधेयक को धार्मिक अल्पसंख्यकों और नागरिकों पर हमले के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

FCRA विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाला कानून है, धार्मिक कानून नहीं
राइली मूर ने इस मामले में भारतीय वामपंथी उदारवादी वर्ग से भी आगे बढ़कर भय और पीड़ित होने का नैरेटिव गढ़ा है। उनका यह दावा कि FCRA संशोधन विधेयक सरकार को मनमाने ढंग से चर्चों पर कब्जा करने का अधिकार देता है, पूरी तरह भ्रामक है।
सरकार न तो किसी पूजा स्थल का अधिग्रहण कर सकती है और न ही उसके धार्मिक स्वरूप में कोई बदलाव कर सकती है।
नियमों के अनुसार, सरकार की शक्तियाँ केवल उन विदेशी फंड से निर्मित परिसंपत्तियों तक सीमित हैं, जिन पर FCRA लाइसेंस समाप्त होने जैसी विशेष परिस्थितियाँ लागू होती हैं। इतना ही नहीं, ऐसे आदेशों की समीक्षा करने और अपील का अधिकार भी दिया गया है।
यह भी उल्लेखनीय है कि राइली मूर और कई भारतीय NGO केवल ईसाइयों का उल्लेख कर रहे हैं, जबकि यह कानून पूरी तरह धर्म-निरपेक्ष है और सभी FCRA पंजीकृत संस्थाओं पर समान रूप से लागू होता है। मौजूदा FCRA कानून और प्रस्तावित संशोधन दोनों ही विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले कानून हैं, न कि धार्मिक कानून।
दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले ऐसे कानून मौजूद हैं। अमेरिका में विदेशी एजेंट्स पंजीकरण अधिनियम (FARA), ब्रिटेन में विदेशी प्रभाव पंजीकरण स्कीम (FIRS) और ऑस्ट्रेलिया में विदेशी प्रभाव पारदर्शिता और जवाबदेही अधिनियम (FITAA) जैसे कानून इसी उद्देश्य से बनाए गए हैं।
भारत के FCRA की सबसे बड़ी खासियत है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह पूर्व अनुमति (Pre-approval) और अनुमति-आधारित व्यवस्था पर काम करता है।
अब प्रश्न उठता है कि अमेरिका भारत के FCRA संशोधन विधेयक का विरोध क्यों कर रहा है और भारत-अमेरिका संबंधों को नुकसान पहुँचने की चेतावनी क्यों दे रहा है?
इसका उत्तर भूराजनीतिक हितों और धार्मिक महत्वाकांक्षाओं में छिपा है।
अमेरिकी मिशनरी नेटवर्क, World Vision, USAID और FCRA संशोधन विधेयक का विरोध
दशकों से अमेरिका स्थित अनेक इंजीलवादी (Evangelical) और मिशनरी नेटवर्क भारत में चर्च स्थापित करने, गरीबों, विशेषकर जनजातीय और दलितों के बीच धर्मांतरण अभियान चलाने तथा उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए फंडिंग करते रहे हैं। Compassion International, World Vision India, Joshua Project समेत कई विदेशी ईसाई संगठन आज भी भारत में सक्रिय हैं और धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ अपने मूल देशों के रणनीतिक हितों को भी आगे बढ़ाने का काम करते हैं।
OpIndia लगातार अमेरिका स्थित वर्ल्ड विजन इंटरनेशनल की गतिविधियों को लेकर चेतावनी देता रहा है। इस ईसाई NGO को अब बंद हो चुकी अमेरिकी एजेंसी USAID से भी फंडिंग मिलती रही, जिस पर भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी संगठनों तथा व्यक्तियों को वित्तीय सहायता देने के आरोप लगते रहे हैं।
वर्ल्ड विजन का असर पूर्वोत्तर तक ही सीमित नहीं है। संगठन स्वयं को एक मानवीय संगठन (Humanitarian Organisation) के रूप में दिखाता है, जबकि वास्तविकता में यह कट्टर ईसाई मिशनरी संगठन है। पिछले लगभग सात दशकों से इसने अन्य मिशनरी समूहों के साथ मिलकर हिंदुओं का धर्मांतरण करने के लिए अभियान चलाए। इनमें विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों शामिल हैं। यह उस दौर में हुआ जब नेहरू सरकार ने इस संगठन को भारत में खुलकर काम करने की छूट दी।
वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार ने World Vision के संस्थापक बिली ग्राहम को नागालैंड जाने की अनुमति भी दी थी। उस समय राज्य में अस्थिरता के कारण विदेशियों को जाने की अनुमति भी नहीं दी जाती थी। स्वयं ग्राहम ने भी इस अनुमति पर आश्चर्य व्यक्त किया था। इसके बाद World Vision ने नागालैंड और दूसरे क्षेत्रों में अपने धर्मांतरण अभियानों को आगे बढ़ाया।
वर्ष 2024 में मोदी सरकार ने World Vision का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया, जिससे भारत में उसकी गतिविधियों को बड़ा झटका लगा। OpIndia पहले भी रिपोर्ट कर चुका है कि World Council of Churches, World Evangelical Alliance और World Vision जैसे विदेशी ईसाई संगठन भारत के धर्मांतरण-रोधी कानूनों का लगातार विरोध करते रहे हैं।
अब यही विदेशी और भारतीय मिशनरी संगठन FCRA संशोधन विधेयक का भी विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इससे उन संस्थाओं तक विदेशी धन का बिना रुकावट के प्रवाह रुक जाएगा, जो भारत की धार्मिक जनसांख्यिकी बदलने तथा राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले एजेंडे पर काम करती हैं।
सिर्फ मिशनरी संगठन ही नहीं, बल्कि कई NGO और वामपंथी विचारधारा से जुड़े नेटवर्क भी लंबे समय से विकास परियोजनाओं के विरोध, आंदोलन भड़काने और भारत-विरोधी प्रचार के आरोपों के चलते जाँच एजेंसियों के रडार पर रहे हैं।
सरकार ने पहले भी विकास परियोजनाओं का विरोध, हिंसक या उग्र प्रदर्शन भड़काना तथा जबरन धर्मांतरण जैसी गतिविधियों की वजह से FCRA लाइसेंस रद्द किया था।
कुडनकुलम परमाणु परियोजना: विदेशी फंडिंग और आंदोलन
विदेशी फंडिंग के प्रभाव का सबसे चर्चित उदाहरण कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना (KKNPP) है, जिसे वर्षों तक वामपंथी दलों और विदेशी धन प्राप्त NGO के विरोध का सामना करना पड़ा।
तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में स्थित इस परियोजना की परिकल्पना भारत के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र के रूप में की गई थी, जिसकी कुल क्षमता 6,000 मेगावाट निर्धारित थी। इसका निर्माण 2002 में शुरू हुआ, लेकिन लगातार प्रदर्शन और राजनीतिक विरोध के कारण यह परियोजना लंबे समय तक बाधित रही।
इन विरोध प्रदर्शनों का चरम वर्ष 2011 में देखने को मिला, जब जापान के फुकुशिमा परमाणु हादसे के बाद लोगों में भय का माहौल बनाया गया कि कुडनकुलम में भी वैसी ही त्रासदी हो सकती है।
पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी (PMANE) के नेता एस. पी. उदयकुमार इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।
वर्ष 2012 में कई अंतरराष्ट्रीय ईसाई प्रकाशनों ने खुलकर लिखा था कि चर्च और कैथोलिक संगठन इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। इडिंथाकराई स्थित ‘लेडी ऑफ लूर्ड्स कैथोलिक चर्च‘ तथा दो कैथोलिक पादरी PMANE की समन्वय समिति का हिस्सा थे।
बाद में परमाणु परियोजना का विरोध करने वाले कई प्रमुख कार्यकर्ता, जिनमें एस. पी. उदयकुमार और जी. सुंदरराजन शामिल थे, आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़ गए। सुंदरराजन ने तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में AAP के उम्मीदवार के रूप में चुनाव भी लड़ा।
इसी प्रकार हाल में दिल्ली में हुए Cockroach Janta Party (CJP) के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अभिजीत दिपके भी अतीत में आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं।
इस पूरे विवाद के दौरान भारत के पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने स्वयं सार्वजनिक रूप से कहा था कि कुडनकुलम परियोजना पूरी तरह सुरक्षित है और लोगों को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसमें विश्वस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है।
फिर भी विरोध प्रदर्शन और न्यायालयों में याचिकाओं का सिलसिला वर्षों तक चलता रहा।
मनमोहन सिंह का बयान, IB रिपोर्ट और विदेशी फंडेड NGO का नेटवर्क
कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना को लेकर लगातार चल रहे विरोध के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी सार्वजनिक रूप से विदेशी फंड प्राप्त गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की भूमिका पर सवाल उठाए थे।
उन्होंने फरवरी 2012 में प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका Science को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि कई NGO, विशेषकर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से वित्तीय सहायता प्राप्त संगठन, भारत की विकास संबंधी चुनौतियों को समझने के बजाय देश की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं।
डॉ. सिंह ने कहा था,
“कई NGO, जिन्हें अक्सर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से धन मिलता है, हमारे देश की विकास संबंधी आवश्यकताओं को समझने के बजाय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम और कृषि में जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं। परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, उसके पीछे ऐसे NGO हैं, जो यह नहीं समझते कि भारत को अपनी ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।”
यानी, उस समय स्वयं कॉन्ग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि विदेशी फंड प्राप्त संगठन भारत की रणनीतिक और विकास संबंधी परियोजनाओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे।
मानवाधिकार और लोकतंत्र की आड़ में विदेशी फंडिंग
मानवाधिकार, लोकतांत्रिक स्वतंत्रता, आर्थिक न्याय, सरकारी जवाबदेही, शिक्षा के प्रसार और आदिवासी अधिकार जैसे आकर्षक नारों के साथ भारत में अनेक NGO विदेशी वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं। लेकिन समय-समय पर आरोप लगते रहे हैं कि इनमें से कई संगठनों का वास्तविक उद्देश्य विकास परियोजनाओं को रोकना, अराजकता फैलाना और भारत की आर्थिक प्रगति को बाधित करना रहा है।
इसी संदर्भ में वर्ष 2014 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें विदेशी फंड प्राप्त NGO के कामकाज और उनके तौर-तरीकों का विस्तृत उल्लेख किया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड सहित कई देशों से वित्तीय सहायता प्राप्त भारतीय NGO ऐसे मुद्दों को चुनते थे, जिनके माध्यम से बड़े विकास कार्यों के विरुद्ध जनमत तैयार किया जा सके।
IB रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसे संगठन परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, यूरेनियम खदानों, कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजनाओं, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों (GMO), POSCO और वेदांता जैसी औद्योगिक परियोजनाओं, नर्मदा और अरुणाचल प्रदेश की जलविद्युत परियोजनाओं तथा पूर्वोत्तर भारत में तेल और खनन गतिविधियों के विरुद्ध आंदोलन खड़े कर रहे थे।
रिपोर्ट के अनुसार, इन गतिविधियों का भारत की आर्थिक वृद्धि पर प्रतिवर्ष 2 से 3 प्रतिशत GDP तक का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था।
विदेशी दानदाताओं की कार्यप्रणाली
IB रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि विदेशी दानदाता अपने वास्तविक उद्देश्य को छिपाने के लिए मानवाधिकारों की रक्षा, विस्थापितों के पुनर्वास, आदिवासी आजीविका की सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और सुशासन जैसे विषयों के नाम पर धन उपलब्ध कराते थे।
इसके बाद स्थानीय NGO उन विषयों पर रिपोर्ट तैयार करते थे, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता था और जो पश्चिमी देशों की विदेश नीति के रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम बनती थीं।
रिपोर्ट में Greenpeace International और CORDAID जैसे संगठनों का विशेष उल्लेख किया गया, जिन पर ऐसे अभियानों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करने का आरोप लगाया गया। वहीं ActionAid और Amnesty International जैसे संगठनों के बारे में कहा गया कि वे अपनी कुल फंडिंग का एक हिस्सा इसी प्रकार की गतिविधियों में लगाते हैं।
IB रिपोर्ट ने कुडनकुलम परमाणु परियोजना, प्रस्तावित कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं, GMO के विरोध, POSCO और वेदांता जैसी औद्योगिक परियोजनाओं के खिलाफ अभियानों को उदाहरण के रूप में बताते हुए निष्कर्ष निकाला है कि विदेशी संस्थाएँ भारतीय NGO का उपयोग भारत की विकास परियोजनाओं को रोकने और उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए कर रही थीं।
USAID और भारत विरोधी नेटवर्क
लेख के अनुसार, बाद के वर्षों में यह भी सामने आया कि United States Agency for International Development (USAID) भारत में कई विवादास्पद NGO को वित्तीय सहायता दे रही थी।
OpIndia ने पहले भी रिपोर्ट किया है कि USAID पर भारत और बांग्लादेश में शासन परिवर्तन (Regime Change) जैसे अभियानों को समर्थन देने के आरोप लगे। लेख में यह भी उल्लेख है कि बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अमेरिका बांग्लादेश, म्यांमार और भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक अलग ईसाई राष्ट्र बनाने की कोशिशों का समर्थन कर रहा है।
इन सभी घटनाओं को आधार बनाते हुए लेख में तर्क दिया गया है कि विदेशी फंडिंग को लेकर भारत सरकार की सतर्कता केवल प्रशासनिक या वित्तीय मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा विषय है।
ईसाइयत नैरेटिव या विदेशी फंडिंग पर कार्रवाई?
लेख के अनुसार, भारत और विदेशों के अनेक ईसाई संगठनों तथा उनके समर्थकों द्वारा प्रचारित “ईसाइयों पर हमले” का नैरेटिव वास्तविक मुद्दे से ध्यान भटकाने का प्रयास है। वास्तविक चिंता चर्चों या धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर नहीं, बल्कि उन विदेशी फंडिंग नेटवर्क पर बढ़ती निगरानी को लेकर है, जिनका उपयोग वर्षों से धर्मांतरण और भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है।
लेख का तर्क है कि मोदी सरकार ने न केवल धर्मांतरण के नेटवर्क पर कार्रवाई तेज की है, बल्कि FCRA संशोधन विधेयक के माध्यम से यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि जिन संस्थाओं का FCRA लाइसेंस रद्द हो चुका है, उनके खिलाफ की गई कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित न रह जाए।
लाइसेंस रद्द होने के बाद अब क्या बदलेगा?
वर्तमान व्यवस्था में यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द हो जाता है, तब भी उसके पास विदेशी धन से खरीदी गई जमीन, भवन, अस्पताल, स्कूल और अन्य परिसंपत्तियां बनी रहती हैं। ऐसे मामलों में वर्षों तक मुकदमे चलते रहते हैं और कई बार संबंधित संस्थाएँ व्यावहारिक रूप से अपना संचालन जारी रखती हैं।
लेख के अनुसार, प्रस्तावित संशोधन इस स्थिति को बदलने का प्रयास करता है। यदि किसी संस्था का लाइसेंस रद्द हो जाता है, तो उसकी विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियां सरकार द्वारा नियुक्त डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी की निगरानी में आ जाएँगी। आवश्यकता पड़ने पर इन परिसंपत्तियों का प्रबंधन या निस्तारण किया जा सकेगा और उससे प्राप्त राशि भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा होगी।
लेख के अनुसार, इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि FCRA लाइसेंस रद्द होने के बाद भी विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों का उपयोग पूर्ववत जारी न रह सके।
किन संगठनों को आपत्ति है?
लेख में कहा गया है कि यही कारण है कि भारत और विदेशों के अनेक ईसाई संगठन इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं ।इनमें Catholic Bishops’ Conference of India (CBCI), All India Christian Council तथा आर्चबिशप जोसेफ डी’सूज़ा का उल्लेख किया गया है। लेख के अनुसार, आर्चबिशप डी’सूज़ा ने FCRA संशोधन को ईसाई संस्थाओं की संपत्तियों की ‘लूट’ तक बताया है।
भारत के बाहर भी National Hispanic Christian Leadership Conference सहित कई अमेरिकी ईसाई संगठनों ने इस विधेयक को वापस लेने की माँग की है।
इसके अलावा Christianity Today, International Christian Concern जैसी ईसाई पत्रिकाओं और पोर्टलों पर भी ऐसे लेख प्रकाशित हुए, जिनमें यह दावा किया गया कि भारत की ‘हिंदू राष्ट्रवादी सरकार’ ईसाइयों को निशाना बना रही है।
दिल्ली के CJP आंदोलन और चर्च की भागीदारी
लेख में यह भी दावा किया गया है कि हाल में दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन में कई कैथोलिक पादरी भी प्रदर्शनकारियों के साथ मार्च करते दिखाई दिए। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया है कि दिल्ली पुलिस ने इस आंदोलन से जुड़े कुछ NGO और व्यक्तियों की भूमिका की जाँच शुरू की है।
लेख का निष्कर्ष है कि FCRA संशोधन विधेयक से विदेशी फंडिंग के उन स्रोतों पर प्रभाव पड़ने वाला है, जिनका उपयोग धार्मिक धर्मांतरण, राजनीतिक सक्रियता और भारत-विरोधी अभियानों के लिए किया जाता रहा है। यही कारण है कि विदेशी राजनीतिक नेता और मिशनरी संगठन इस कानून के विरुद्ध सक्रिय अभियान चला रहे हैं।
कॉन्ग्रेस के विदेशी फंडिंग का इतिहास पुराना
पूरे विवाद का राजनीतिक पक्ष भी है। कॉन्ग्रेस पार्टी इस विधेयक के विरोध का नेतृत्व कर रही है, जबकि उसका अपना इतिहास विदेशी फंड प्राप्त संस्थाओं से जुड़ा रहा है।
लेख में राजीव गाँधी फाउंडेशन का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इस संस्था की अध्यक्ष सोनिया गाँधी और ट्रस्टी राहुल गाँधी रहे हैं। इस संस्था को चीन सहित विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त हुआ था। बाद में जाँच के दौरान कथित अनियमितताएँ सामने आई और उसका FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया।

लेख में यह भी दावा किया गया है कि राहुल गाँधी कई अवसरों पर विदेशों में भारत के लोकतंत्र को लेकर चिंता व्यक्त करते रहे हैं और विदेशी हस्तक्षेप की माँग जैसे बयान देते रहे हैं। ऐसे माहौल में अमेरिकी सांसदों द्वारा भारत की नीतियों की आलोचना उसी अभियान का विस्तार प्रतीत होती है।
लेख के अनुसार, FCRA संशोधन विधेयक का मूल उद्देश्य चर्चों या धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा करना नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग के उन नेटवर्क को नियंत्रित करना है, जिनका उपयोग धर्मांतरण, डेमोग्राफी के बदलाव, विरोध प्रदर्शनों, अराजक गतिविधियों या ऐसे सिस्टम को खड़ा करने के लिए किया जाता रहा है।
इसलिए लेख में निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि अमेरिकी सांसद राइली मूर सहित कई विदेशी राजनीतिक और धार्मिक संगठन इस विधेयक को ‘ईसाइयों पर हमले’ के रूप में दिखा कर धार्मिक भावनाएँ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उनके अनुसार वास्तविक मुद्दा विदेशी धन के उपयोग और उस पर भारत सरकार की बढ़ती निगरानी है।
(मूलरूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


