Sunday, July 5, 2020
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नागरिकता संसोधन बिल को ख़त्म करें: नॉर्थ ईस्ट नेताओं का गृहमंत्री से आग्रह

नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस की तरफ से राजनाथ सिंह से मिलने आए नेताओं में मुख्य रूप से मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा, मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरामथांगा और भाजपा नेता मित सिंह शामिल थे

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

नॉर्थ ईस्ट की नेशनल पीपुल्स पार्टी, मिजो नेशनल फ्रंट समेत नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) की अन्य पार्टी के नेताओं ने राजनाथ सिंह से मिलकर नागरिकता संसोधन बिल को ठंडे बस्ते में डालने का आग्रह किया।

नागरिकता संसोधन बिल के मुद्दे पर राजनाथ सिंह से मिलने के लिए नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) के सात नेता दिल्ली पहुँचे थे। नेडा की तरफ से राजनाथ सिंह से मिलने आए नेताओं में मुख्य रूप से मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा, मिजोरम के मुख्यमंत्री जोरामथांगा और भाजपा नेता मित सिंह शामिल थे।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिलने आए नेडा के सभी नेताओं ने नागरिकता संसोधन बिल पर अपनी राय रखी। नेडा के नेताओं ने इस  मुद्दे पर नॉर्थ ईस्ट की जनता व सिविल सोसाइटी के लोगों की भावनाओं के बारे में भी गृहमंत्री को बताया।

नेडा के सात नेताओं में से ज्यादातर लोगों ने बिल के विरोध में अपनी राय रखी। उन्होंने देश के गृहमंत्री से कहा कि बिल पर हमें पुनर्विचार की जरूरत है। संगमा ने इस मीटिंग के बाद कहा कि नॉर्थ ईस्ट के ज्यादातर मुख्यमंत्री इस मसले पर एकमत हैं।

ऐसे में बेहतर होगा कि सरकार इस बिल पर पुनर्विचार करे। गृहमंत्री ने इस मुलाकात के बाद कहा कि हम जल्द ही नॉर्थ ईस्ट के सभी मुख्यमंत्रीयों के साथ बैठकर नागरिकता संसोधन बिल पर गहराई से बात करेंगे।

नागरिकता संसोधन विधेयक एक नज़र में

राजीव गांधी सरकार के दौर में असम गण परिषद से समझौता हुआ था कि 1971 के बाद असम में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले बांग्लादेशियों को निकाला जाएगा। 1985 के असम समझौते (ऑल असम स्टूडेंट यूनियन ‘आसू’ और दूसरे संगठनों के साथ भारत सरकार का समझौता) में नागरिकता प्रदान करने के लिए कटऑफ तिथि 24 मार्च 1971 थी। नागरिकता बिल में इसे बढ़ाकर 31 दिसंबर 2014 कर दिया गया है। यानी नए बिल के तहत 1971 के आधार वर्ष को बढ़ाकर 2014 कर दिया गया है। नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी व ईसाई शरणार्थियों को 12 साल के बजाय छह साल भारत में गुजारने पर नागरिकता मिल जाएगी।

ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य के अनुसार इस विधेयक से असम के स्थानीय समुदायों के अस्तित्व पर खतरा हो गया है। वे अपनी ही ज़मीन पर अल्पसंख्यक बन गए हैं। कैबिनेट द्वारा नागरकिता संशोधन बिल को मंजूरी देने से नाराज़ असम गण परिषद ने राज्य की एनडीए सरकार से अलग होने का ऐलान किया है।

यह संशोधन विधेयक 2016 में पहली बार लोकसभा में पेश किया गया था। विधेयक के खिलाफ धरना-प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि ये विधेयक 1985 के असम समझौते को अमान्य करेगा। इसके तहत 1971 के बाद राज्य में प्रवेश करने वाले किसी भी विदेशी नागरिक को निर्वासित करने की बात कही गई थी, भले ही उसका धर्म कुछ भी हो।

नया विधेयक नागरिकता कानून 1955 में संशोधन के लिए लाया गया है। भाजपा ने 2014 के चुनावों में इसका वादा किया था। कॉन्ग्रेस, तृणमूल कॉन्ग्रेस, सीपीएम समेत कुछ अन्य पार्टियाँ लगातार इस विधेयक का विरोध कर रही हैं। उनका दावा है कि धर्म के आधार पर नागरिकता नहीं दी जा सकती है, क्योंकि भारत धर्मनिरपेक्ष देश है। भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना और जेडीयू ने भी ऐलान किया था कि वह संसद में विधेयक का विरोध करेंगे। बिल का विरोध कर रहे बहुत से लोगों का कहना है कि यह धार्मिक स्तर पर लोगों को नागरिकता देगा। तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी के अनुसार केंद्र के इस फैसले से करीब 30 लाख लोग प्रभावित होंगे। विरोध कर रही पार्टियों का कहना है कि नागरिकता संशोधन के लिए धार्मिक पहचान को आधार बनाना संविधान के आर्टिकल 14 की मूल भावनाओं के खिलाफ है। जबकि भाजपा नागरिकता बिल को पारित करके असम व दूसरे राज्यों में रहने वाले बाहरी लोगों को देश से बाहर निकालना चाहती ताकि नॉर्थ ईस्ट के मूल नागरिकों को किसी तरह से कोई समस्या न हो।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
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