Tuesday, April 23, 2024
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DD न्यूज़ ऑफिस में बाँटी गई थी मिठाइयाँ, जब मोदी को नहीं मिला था US वीजा: किताब में खुलासा

हिंदी में लिखी यह किताब इस बात का सबूत है कि कॉन्ग्रेस के समय में मीडिया किस हद तक 'स्वतंत्र' थी। इस किताब से मालूम चलता है कि आज मीडिया पर खतरा बताने वाली बातें भी केवल एक प्रोपेगेंडा का ही हिस्सा है।

डीडी न्यूज़ यानी कि दूरदर्शन समाचार का यूपीए सरकार द्वारा 2004-2014 के बीच किस तरह से दुरुपयोग किया गया था, इसका  खुलासा डीडी न्यूज़ के एंकर और पत्रकार अशोक श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक “नरेंद्र मोदी सेंसर” में हुआ है।

यह पुस्तक मुख्य रूप से नरेंद्र मोदी के एक साक्षात्कार के बारे में है, जो 2014 के लोकसभा चुनावों में डीडी न्यूज पर प्रसारित किया गया था। यह साक्षात्कार अशोक श्रीवास्तव द्वारा संचालित किया गया था, लेकिन इसका प्रसारण काफी देर से और सेंसर करने के बाद किया गया था।

प्रसारित होने के बाद भी, यह विवादों में घिर गया क्योंकि ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने डीडी न्यूज़ द्वारा सेंसर की गई इस गलतफहमी को और भी ज्यादा फैला दिया था। अशोक श्रीवास्तव उस साक्षात्कार के आसपास की घटनाओं से जुड़े तारों को याद करते हुए अपनी किताब में यह भी बताते हैं कि कैसे कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा एक सार्वजनिक संस्थान का इस्तेमाल एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को निशाना बनाने के लिए किया गया था।

इस पुस्तक के अनुसार दूरदर्शन का इस्तेमाल यूपीए सरकार के कार्यक्रमों और नीतियों के समर्थन में सामग्री बनाने के लिए भी किया गया था। उस समय दूरदर्शन में काम कर रहे कुछ लोग वहाँ के ‘पावर सेंटर’ बन गए थे। पत्रकारिता करने वाली यह सरकारी जगह बहुतों को शर्मिंदगी महसूस करवाने के लिए 9 दिसंबर को मिठाईयाँ बाँटकर सोनिया गांधी का जन्मदिन भी मनाती थी।

अशोक श्रीवास्तव बताते हैं कि जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और उन्हें वीजा देने से मना कर दिया गया था तो मिठाईयाँ बांंटकर उन्हें और उनके जैसे कुछ और पत्रकार, जो कि वहाँ पर काम करते थे, को काफी शर्मिंदगी महसूस करवाई गई थी।

हालाँकि, किसी ने भी इस तरह की प्रथाओं के खिलाफ कुछ नहीं बोला क्योंकि ‘पावर सेंटर’ में कॉन्ग्रेस के सदस्य थे और ‘दूरदर्शन के कर्मचारी’ इस बात के गवाह थे कि दर्जनों पत्रकार – मुख्य रूप से जो दीपक चौरसिया के साथ शामिल हुए थे, को 2004 में मज़बूरन इस्तीफा देना पड़ा था, जब कॉन्ग्रेस सरकार सत्ता में आई थी। इसीलिए कोई भी पत्रकार कॉन्ग्रेस के खिलाफ कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था।

इतना ही नहीं, इस किताब का दावा है कि साल 2007 के गुजरात चुनाव के दौरान दूरदर्शन के संवाददाता संपादकीय सलाह के तौर पर एक ‘कंसलटेंट’ और तीस्ता सीतलवाड़ से आदेश लेते थे। लेकिन 2009 के लोकसभा चुनावों के बाद इस ‘पावर सेंटर’ की विशेष शक्तियाँ कम हो गई थीं। संभवतः ऐसा कॉन्ग्रेस की आंतरिक राजनीति के कारण हुआ था। लेकिन फिर भी यह ‘पावर सेंटर’ मोदी पर निशाना बनाने के लिए तुली हुई थी।

दूरदर्शन में मोदी से जुड़ी अच्छी खबरों पर और उनके द्वारा किए गए कार्यों पर बैन लगना जारी रहा। जिसके कारण अशोक श्रीवास्तव को उस समय काफ़ी हैरानी हुई, जब पब्लिक ब्रॉडकास्टर ने नरेंद्र मोदी के साक्षात्कार को आगे बढ़ाने को कहा।

हिंदी में लिखी यह किताब इस बात का सबूत है कि कॉन्ग्रेस के समय में मीडिया किस हद तक ‘स्वतंत्र’ थी। इस किताब से मालूम चलता है कि आज मीडिया पर खतरा बताने वाली बातें भी केवल एक प्रोपेगेंडा का ही हिस्सा है।

यह किताब इस बात की भी याद दिलाती है कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भी प्रियंका गांधी का इस्तेमाल किया गया था और 2019 के आते-आते भी स्थितियाँ बदली नहीं हैं। चीजें आपके सामने हैं, उस समय प्रियंका को प्रचारक के रूप में उतारा गया था और अब महासचिव का चेहरा दिया गया है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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