Wednesday, April 1, 2020
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केंद्र सरकार के ‘खेलो इंडिया प्रोग्राम’ ने बदल दी इन 3 बॉक्सरों की जिंदगी

इस प्रोग्राम ने कई ऐसे बच्चों का जीवन बदल दिया है, जिनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर खेलना एक सपना था। लेकिन सरकार की इस योजना से अब उनको 8 साल तक पाँच लाख प्रति वर्ष की सरकारी मदद मिलेगी, जिससे वो अपने सपनों को साकार कर सकेंगे।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

आज हम आपको तीन ऐसे बॉक्सरों की कहानी बताने जा रहे हैं, जिनकी केंद्र सरकार के ‘खेलो इंडिया यूथ गेम्स’ ने ज़िंदगी बदल दी। कभी पिता को गार्ड की नौकरी करता देख और माता को मजदूरी में हाथ बटाँने वाले छात्र-छात्राओं को अब 8 सालों तक अपने सपने को उड़ान देने के लिए केंद्र सरकार उन्हें 5 लाख प्रति वर्ष तक की मदद उपलब्ध कराएगी।

पुणे के आकाश ने फाइनल में बाज़ी मारकर पिता की आँखे नम कर दी

बड़ा अजीब लगता है अपना देश छोड़कर पराए देश में अपना आशियाना बनाना। 21 साल पहले नेपाल से भारत के पुणे में आए आकाश के पिता गार्ड की नौकरी करते हैं। यहाँ आने के पीछे उनका बस एक ही सपना था कि वो अपने बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल कर सकें।

दिन-रात एक करके उन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और बेटे को आगे बढ़ाते रहे। यही कारण रहा कि आकाश ने भी महाराष्ट्र में ‘खेलो इंडिया यूथ गेम्स’ में अंडर-17 57 किग्रा वर्ग के फाइनल में हरियाणा के अमन दुहान को हराकर उनके सपने को साकार कर दिया।

अपने परिवार और कोच उमेश जगदाले के साथ आकाश गोरखा

विदेश में भी मनवा चुके हैं अपने हुनर का लोहा

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2018 सर्बिया में आयोजित जूनियर बॉक्सिंग चैंपियनशिप में आकाश ने रजत पदक अपने नाम किया था। जबकि 2017 में वे दूसरे स्थान पर रहे थे। आकाश के बचपन के कोच उमेश जगदाले कहते हैं, “वह मैदान पर बहुत तेज था, मुझे लगा कि वह एक अच्छा बॉक्सर बना सकता है और उसने मुझे सही साबित किया।”

बता दें कि जगदाले ने आकाश को 2010 से प्रशिक्षित करना शुरू किया था। वहीं आकाश ने कहा कि, “सर जगदाले मेरा मार्गदर्शन करने के लिए हमेशा मौजूद रहते हैं।” आकाश के पिता कहते हैं, “मैं अपने बेटे के खेल संतुष्ट हूँ। अब मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ।”

चौकीदार की बिटिया ने जीता गोल्ड मेडल

‘खेलो इंडिया यूथ गेम्स’ में हिमाचल की बेटी विनाक्षी ने वर्ल्ड चैंपियन को हराकर गोल्ड मेडल जीतते हुए अपने पिता का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया। जनजातीय क्षेत्र किन्नौर की विनाक्षी ने महाराष्ट्र में खेले गए फाइनल मुकाबले में हरियाणा की जूनियर बॉक्सिंग वर्ल्ड चैंपियन रह चुकी शशि चोपड़ा को 57 किलोग्राम भार वर्ग में हारकर ये उपलब्धि हासिल की। बता दें कि विनाक्षी के पिता जगन्नाथ चौकीदार की नौकरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं लेकिन बेटी को आगे बढ़ाने में वो हमेशा उसके सपनों के साथ खड़े रहे हैं।

7वीं क्लास से शुरू किया था बॉक्सिंग खेलना

विनाक्षी ने 7वीं क्लास से बॉक्सिंग की शुरूआत की थी और पाइका खेलों में साल 2016 में सिल्वर मेडल जीता था। उन्होंने साल 2018 में यूथ नेशनल में भी रजत पदक जीत कर अपने प्रदेश का मान बढ़ाया था। यही नहीं 2018 में महाराष्ट्र में हुए अंडर-19 स्कूल नेशनल में भी विनाक्षी गोल्ड जीत चुकी हैं।

तेज बुखार और तपन भी नहीं तोड़ पाया शिवानी का हौसला

बदन में तेज बुखार और पेट दर्द से तड़प रही शिवानी ने हार नहीं मानी और रिंग में उतरने का फैसला लिया। शिवानी ने 54 किग्रा भार वर्ग में रजत पदक अपने नाम किया। 17 साल की शिवानी जब गेम खेलने पुणे पहुँचीं उन्हें काफी तेज बुखार था कोच और साथी खिलाडियों ने सलाह दी कि बॉक्सिंग रिंग में न उतरे।

बावजूद इसके शिवानी ने सभी की बातों को अनसुना करते हुए दो अंतरराष्ट्रीय स्तर की बॉक्सरों को पटखनी देते हुए फाइनल में जगह बना ली। हालाँकि, अंतिम मुकाबले में उनके शरीर ने उन्हें धोखा दे दिया और उन्हें हार का सामना करते हुए रजत पदक से संतोष करना पड़ा।

शिवानी तेज बुखार और पेट दर्द के बाद भी हार नहीं मानीं और रिंग में उतरी

माता-पिता भी कर रहे हैं संघर्ष

शिवानी की माँ पूनम मजदूरी करती हैं, जबकि पिता स्वतंत्र कुमार गार्ड की नौकरी छोड़ बॉक्सरों की मालिश का काम करते हैं। तंगहाली और तमाम परेशानियों के बावजूद, उन्होंने बेटी को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया और आज वह निर्णय सही साबित हुआ।

शिवानी कहती हैं, “हरियाणा में सर्दी थी, पुणे में मौसम गर्म था इसलिए वहाँ पहुँचते ही बुखार हो गया और पेट में दर्द भी। इस स्थिति में मेरे लिए खेल पाना कठिन था। लेकिन, मैंने हार नहीं मानी और नेशनल चैंपियन उत्तराखंड के पिथौरागढ़ की सपना और अंतरराष्ट्रीय बॉक्सर दिल्ली की रिया टोकस को हराकर फाइनल में जगह बनाई। फाइनल मुकाबले में पेट दर्द बढ़ गया था, फिर भी मैंने अंतरराष्ट्रीय स्तर की बॉक्सर, मध्यप्रदेश की दिव्या, को कड़ी टक्कर दी, लेकिन हार गई। मुझे स्वर्ण पदक नहीं जीतने का मलाल है।”

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