"एक प्रचलित वाक्य है- विविधता में एकता। लेकिन हमारा देश एक कदम आगे जाता है। केवल विविधता में एकता नहीं बल्कि एकता की ही विविधता है। हम विविधताओं में एकता नहीं खोज रहे हैं, हम उस एकता को खोज रहे हैं जिससे विविधता निकली है।"
संघ प्रमुख ने कहा कि महिला के प्रति पुरुषों को शुद्ध दृष्टि रखनी होगी, जो अपराध करने वाले हैं इनकी भी तो माताएँ-बहने होंगी, तभी तो इनका भी अस्तित्व है।
आरएसएस प्रमुख भागवत के साथ हाल में मंच साझा करने वाले वे कॉन्ग्रेस से जुड़े दूसरे नेता हैं। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आरएसएस के विजयादशमी कार्यक्रम में शामिल हुए थे। मुखर्जी का इस कार्यक्रम में जाना गॉंधी परिवार को रास नहीं आया था।
भागवत ने कहा कि RSS को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार क़दम उठाएगी। उन्होंने कहा कि अतीत को भूल हम सभी को मिलकर रामजन्मभूमि स्थल पर भव्य मंदिर निर्माण के कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
भाजपा और शिवसेना बैकडोर से बातचीत के लिए राजी हो सकते हैं। हालाँकि, भाजपा सीएम, स्पीकर और गृह मंत्री का पद अपने पास ही रखेगी और इन्हें लेकर कोई समझौता नहीं होगा। भाजपा मंत्रियों की संख्या को लेकर अपने रुख में नरमी ला सकती है।
“यहूदी मारे-मारे फिरते थे अकेला भारत है, जहाँ उनको आश्रय मिला। परसियन (पारसी) की पूजा और मूल धर्म केवल भारत में सुरक्षित हैं। विश्व के सर्वाधिक सुखी मुस्लिम भारत में मिलेंगे। ये क्यों है? क्योंकि हम हिंदू हैं।”
कार्यक्रम के दौरान सरसंघचालक ने शस्त्र-पूजन भी किया। एचसीएल के संस्थापक और अरबपति कारोबारी शिव नादर इस दौरान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। मोहन भागवत ने 'मॉब लिंचिंग' गिरोह को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि कुछेक सामाजिक अपराध की घटनाओं को 'मॉब लिंचिंग' के रूप में ब्रांड किया गया।
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि संघ ने हिन्दू नहीं बनाए बल्कि यह तो हज़ारों वर्षों से चला आ रहा है। उन्होंने बताया कि संघ ने बाहर से आए लोगों को भी अपनाया है। उन्होंने कहा कि देश, काल या परिस्थिति के अनुरूप अब तक संघ में बदलाव होता आया है और यह प्रगतिशील संगठन है।
यह सर्वेक्षण साक्षात्कार आधारित था और इसमें 18 वर्ष से ऊपर की महिलाओं से बात की गई थी। इसमें 29 राज्य, 5 केंद्र शासित प्रदेश और 465 जिले की लगभग सभी धर्म की महिलाओं को शामिल किया गया था।
प्रस्तावित नागरिकता विधेयक संशोधन अधिनियम के प्रावधानों के तहत पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रस्ताव लंबित है। संसद के आगामी सत्र में यह बिल लाने पर बल दिया गया। कई नेताओं ने कहा कि एनआरसी से पहले इस बिल को लाने की कवायद होनी चाहिए थी।