शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से स्पष्ट हो सकती है राजनीतिक तस्वीर। अजित पवार को मनाने की कोशिश में जुटी एनसीपी। छगन भुजबल ने की मुलाकात। संसद में भी हंगामे के आसार।
भाजपा ने अपने सबसे बड़े तुरुप के इक्के को आगे कर दिया है। बड़ी जिम्मेदारी दे दी है। एक ऐसा नेता, जिसके दोस्त सभी पार्टियों में हैं। हाँ, शिवसेना के उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस के अशोक चव्हाण से उनकी व्यक्तिगत खुन्नस है। वो निकल गए हैं, फडणवीस के लिए समर्थन जुटाने। उनके 4 उसूल हैं- साम. दाम, दंड और भेद।
"मैं सुरक्षित हूँ। मैं एनसीपी के निशान पर चुनाव जीतकर आया हूँ, इसलिए पार्टी बदलने का कोई सवाल ही नहीं है। शरद पवार और अजित पवार जो भी फ़ैसला लेंगे मैं उसके साथ हूँ। किसी भी अफ़वाह पर विश्वास न करें।”
कॉन्ग्रेस-शिवसेना-एनसीपी की तरफ से कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने दलीलें पेश की। सिब्बल ने कोर्ट से कर्नाटक की तर्ज पर 24 घंटे के भीतर बहुमत परीक्षण कराने का आदेश देने की माँग की।
“सुप्रीम कोर्ट जो भी निर्देश देगा, हम उसका पालन करेंगे। राज्यपाल ने हमें 30 नवंबर तक का समय दिया है, हम 170 विधायकों या उससे अधिक के साथ बहुमत साबित करेंगे।”
छोटे दलों और निर्दलीयों को लेकर कोई भी दल पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। मसलन, भारतीय शेतकारी कामगार पार्टी ने चुनाव कॉन्ग्रेस-एनसीपी गठबंधन के साथ लड़ा था। लेकिन, उसके इकलौते विधायक श्यामसुंदर शिंदे बीजेपी को समर्थन देने का ऐलान कर चुके हैं।
ज़हीर सैयद महाराष्ट्र के गढ़चंदूर स्थित महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। उनका दावा है कि राजनीतिक घटनाक्रम से वे ‘सदमे’ में हैं और बीमार हो गए हैं। हालॉंकि छुट्टी की उनकी अर्जी नामंजूर की दी गई है।
महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन हट गया और देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अजित पवार एनसीपी के एक धड़े के साथ भाजपा से जा मिले और डिप्टी सीएम बने। कब, क्या और कैसे हुआ, पल-पल की कहानी।
"अभी लोकतंत्र की हत्या हो गई? जब शिवसेना स्वार्थ भाव से प्रेरित होकर 30 साल की दोस्ती तोड़कर अपने घोर विरोधियों का दामन थाम ले तो ये लोकतंत्र की हत्या नहीं है क्या?"