“मुझे ये बताया गया कि मुझे केस से हटा दिया गया है, क्योंकि मेरी तबियत ठीक नहीं है। ये बिल्कुल बकवास बात है। जमीयत को ये हक है कि वो मुझे केस से हटा सकते हैं लेकिन जो वजह दी गई है वह गलत है।”
शाह ने कहा कि सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि राम जन्मभूमि मामले की सुनवाई में जल्दबाजी न करें। लेकिन, जनता ने मोदी को चुना। हमने अदालत से जल्द सुनवाई का आग्रह किया।
जमीयत ने कहा है कि पर्यटकों और घुमंतुओं के रचित वृत्तांतों पर अदालत को भरोसा नहीं करना चाहिए। उसने कहा है कि मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने के कोई सबूत नहीं है। साथ ही इतिहास में हुई ग़लतियों को कोर्ट सुधार नहीं सकता है।
हाजी सईद ने बताया कि राम मंदिर निर्माण के लिए हुए एक यज्ञ में शामिल हुए थे। कार्यक्रम की फोटो सार्वजनिक होने के बाद उन्हें उनके धर्म से खारिज कर दिया गया। माफी मॉंगने के बाद भी उन्हें अंजाम भुगतने की धमकी मिल रही है।
आजम खान ने इस दौरान अयोध्यावासियों को संदेश देते हुए कहा कि रामलला किसी एक नहीं, बाकी सब धर्मों के हैं। इसलिए अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के बाद रामलला को पहली चुनरी वही चढ़ाई जाए, जिसे मुस्लिम कारसेवकों की ओर से आज पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास को दिया गया है।
राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी अशोभनीय हरकत की थी। उन्होंने अदालत में दस्तावेजी साक्ष्य के रूप में पेश किए गए नक्शे को फाड़ दिया था। उनकी इस हरकत पर सीजेआई ने काफी नाराजगी जताई थी।
मामले के दो मुख्य पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड और इकबाल अंसारी ने पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने का फैसला किया है। एआईएमपीएलबी ने कहा है कि इस फैसले से न उसे फर्क पड़ता है और न इसका उसकी याचिका पर कानूनी तौर पर कोई फर्क पड़ेगा।
मस्जिद के लिए जमीन कबूल करने को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। बोर्ड के एक सदस्य ने कहा है कि इस संबंध में अभी फैसला नहीं हुआ है। वहीं, कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि इस्लामिक यूनिवर्सिटी बनाने के लिए जमीन ली जाएगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्षी गठबंधन पर हमला किया और कहा कि कॉन्ग्रेस, झामुमो और राजद भाजपा के ख़िलाफ़ एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने कहा, "महागठबंधन सिर्फ़ सत्ता हथियाने के लिए बनाया गया था। अगर विपक्ष जीत गया, तो राज्य की स्थिति फिर से अस्थिर हो जाएगी।"
90 के दशक की शुरुआत में अली मियाँ ने कहा था- यह झगड़ा अदालत के दायरे से बाहर है। अदालत का फैसला शायद ही माना जाए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जिस तरह कुछ नुमाइंदों के सुर बदले हैं उसने एक बार फिर उनकी नीयत को कठघरे में खड़ा कर दिया है।