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भजन के नाम पर घुसपैठ है ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’, अटल जयंती में गायिका ने माफी माँग सुधारी भूल: जानिए ‘रघुपति राघव राजा राम’ को गाँधी ने कैसे और क्यों किया विकृत

शुरुआत में जहाँ राम धुन का विकृत रूप गाँधी की प्रार्थना सभाओं के जरिए मशहूर किया गया तो वहीं बाद में बलीवुड ने भी धार्मिक भजन के मिलावटी संस्करण का प्रचार करने में अपनी भूमिका निभाई। हिंदी फिल्मों, जैसे ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ और ‘कुछ कुछ होता है’ में इसका इस्तेमाल किया गया।

बिहार के पटना में बुधवार (25 दिसंबर 2024) को बापू सभागार में अटल जयंती समारोह के दौरान देवी नाम की गायिका ने ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ गाया तो हंगामा मच गया। खुद कार्यक्रम में मौजूद केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने उनका विरोध किया और मंच से ‘जय श्रीराम’ के नारे लगे। आखिर में गायिका को मंच से माफी माँगनी पड़ी और उन्होंने ‘छठी मैया आई ना दुअरिया’ गाया और कार्यक्रम से चली गईं।

बता दें कि गायिका के गीत पर इसलिए इतना बवाल हुआ क्योंकि गीत के लिरिक्स असल में ये नहीं है जो गाए गए। इस गीत की असली पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम।
सुन्दर विग्रह मेघश्याम,
गंगा तुलसी शालिग्राम।
भद्रगिरीश्वर सीताराम,
भगत जन-प्रिय सीताराम।
जानकीरमणा सीताराम,
जय जय राघव सीताराम है…

उक्त पंक्तियाँ श्री हरि के मानव अवतार पुरुषोत्तम श्री राम को समर्पित भजन श्री लक्ष्मणाचार्य द्वारा रचित श्री नम: रामायणम् का एक अंश है।

सवाल है कि जब भजन की पंक्तियाँ विशुद्ध रूप से सीताराम पर हैं, तो फिर इसमें समय के साथ ‘ईश्वर अल्लाह’ जैसे शब्द आए कहाँ से? तो जवाब है कि ये सब किया गया महात्मा गाँधी के द्वारा। उन्होंने सेकुलर माहौल बनाने के नाम पर राम भजन के साथ छेड़छाड़ की और उसे विकृत करने का प्रयास किया। उनके उसी प्रयास का नतीजा है कि आज बच्चों की जुबान पर सही पंक्तियाँ होने की बजाय विकृत पंक्तियाँ हैं। जैसे-

रघुपति राघव राजाराम,
पतित पावन सीताराम,
भज प्यारे तू सीताराम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम,
सबको सन्मति दे भगवान।

समय के साथ देखते-देखते धार्मिक भजन का यह घटिया संस्करण घर-घर में लोकप्रिय हो गया। लोग इसे स्वतंत्रता के समय रचित गीत बताने लगे जबकि हकीकत यह है कि शुरुआत में गाँधी ने भी राम भजन के साथ छेड़छाड़ करके उसका इस्तेमाल अपनी सभाओं में किया और बाद में तो बॉलीवुड ने इसे और मशहूर कर दिया। हिंदी फिल्मों, जैसे ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ और ‘कुछ कुछ होता है’ में इसका इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा, यह 1982 में अफ्रोबीट बैंड के एल्बम ओसिबिसा- अनलेशेड – लाइव का शुरुआती ट्रैक भी था।

लिरिक्स में इस हेरफेर के साथ मुस्लिमों को अपना समर्थन गाँधी को देने और उन प्रार्थना सभाओं में शामिल होने में कोई समस्या नहीं होती थी, जिसका उद्देश्य दोनों समुदायों के बीच मतभेदों को सुलझाना और सांप्रदायिक सद्भाव बनाना था। हालाँकि, मुस्लिम अल्पसंख्यक की माँगों के साथ सामंजस्य बैठाने की जिम्मेदारी हमेशा हिंदू बहुसंख्यकों की ही रही।

गाँधी ने मुस्लिमों द्वारा रखे गए आरक्षण को संबोधित करने के लिए एक हिंदू धार्मिक गीत के लिरिक्स को विकृत करने में बेजोड़ निपुणता दिखाई, लेकिन उन्होंने कभी भी पवित्र कुरान के आयतों की निंदा नहीं की, जो मूर्ति-पूजा को पाप कहता है और मूर्तिपूजा के लिए मृत्युदंड का आदेश देता है। 

गाँधी ने मुस्लिमों को खुश करने के लिए हिंदुओं के राम जाप वाले भजन को विकृत कर दिया। बता दें कि गाँधी के सामुदायिक प्रार्थना में मुस्लिमों का कलमा जाप भी शामिल था। हालाँकि, ऐसी कोई रिपोर्ट या ऐतिहासिक सबूत नहीं हैं, जो यह बताता हो कि गाँधी ने हिंदुओं की चिंताओं को दूर करने के लिए कुरान की आयतों को बदल दिया या कलमा में बदलाव किया था, ताकि इसे आपसी सह-अस्तित्व और सांप्रदायिक सद्भाव के अपने स्वीकृत रुख के अनुकूल बनाया जा सके। शायद इस दोहरेपन के कारण ही विभाजन के दौरान गाँधी की प्रार्थना सभाओं का ध्रुवीकरण हो गया और प्रार्थना सभाओं के दौरान कलमा को शामिल करने पर सवाल उठाए जाने लगे।

राम धुन में मिलावट एक ऐसी घटना थी, जिसमें गाँधी ने हिंदुओं की भावनाओं के प्रति बेहद कम संवेदनशीलता दिखाई। अटल जयंती पर आयोजित समारोह में गायिका का भजन के नाम पर इस धुन को दोहराना भी ठीक उसी तरह असंवेदनशीलता थी। इसके लिए माफी माँग उन्होंने अपनी भूल दुरुस्त करने का कार्य किया है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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