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पूर्णिया से लेकर दरभंगा तक, हिंदू आस्था पर हमला: क्या चुनाव से पहले बिहार को सुलगाना चाहते हैं इस्लामी कट्टरपंथी?

बिहार के लोग शांति और विकास चाहते हैं, लेकिन कुछ दल भावनाएँ भड़काकर सियासी फायदा उठाना चाहते हैं। जनता को सतर्क रहकर एकता बनाए रखनी होगी।

बिहार में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ लोग माहौल को खराब करने की कोशिश में जुट गए हैं। इसका मकसद साफ है- समाज को बाँटना, हिंदू-मुस्लिम के बीच तनाव पैदा करना और इसका फायदा उठाकर वोटों की सियासत करना। हाल ही में पूर्णिया और दरभंगा में हुई दो घटनाएँ इस बात का सबूत हैं कि कैसे कुछ लोग धार्मिक भावनाओं को भड़काकर माहौल को गर्म करने की कोशिश कर रहे हैं।

पूर्णिया में माँ दुर्गा की मूर्ति तोड़े जाने की घटना और दरभंगा में बाबा विश्वकर्मा की मूर्ति विसर्जन को लेकर हुए विवाद ने साफ कर दिया है कि बिहार में शांति और सौहार्द को निशाना बनाया जा रहा है। आइए इन घटनाओं को समझते हैं और देखते हैं कि कैसे ये सब सियासी फायदे के लिए किया जा रहा है।

पूर्णिया में माँ दुर्गा की मूर्ति तोड़ने का मामला

पूर्णिया के मजगामा हाट में माँ दुर्गा की मूर्ति को तोड़े जाने की घटना ने पूरे इलाके में हंगामा मचा दिया। ये मूर्तियाँ दुर्गा पूजा के लिए बनाई जा रही थीं, जो हिंदुओं के लिए बहुत बड़ा और पवित्र त्योहार है। शुक्रवार (19 सितंबर 2025) की सुबह जब लोगों ने देखा कि मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त हैं, तो उनका गुस्सा फूट पड़ा।

स्थानीय लोगों ने मुस्लिम युवक को पकड़ लिया, जिस पर मूर्ति तोड़ने का आरोप था। गुस्साए लोगों ने उसकी पिटाई कर दी, उसके हाथ रस्सी से बाँध दिए और सड़क जाम करके आगजनी शुरू कर दी। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को बीच-बचाव करना पड़ा।

पुलिस ने आरोपित को किसी तरह भीड़ से बचाकर एक सरकारी भवन में बंद किया, लेकिन गुस्साई भीड़ ने पुलिस पर भी हमला बोल दिया। इस घटना ने पूर्णिया में तनाव का माहौल बना दिया। लोग सड़कों पर उतर आए, टायर जलाए गए और माहौल को शांत करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी। सवाल ये है कि आखिर ऐसी घटना हुई ही क्यों? क्या ये सिर्फ एक व्यक्ति की हरकत थी या इसके पीछे कोई सुनियोजित साजिश थी?

दरभंगा में मूर्ति विसर्जन का विवाद

दरभंगा के सिंहवाड़ा थाना क्षेत्र के कटहरिया गाँव में बाबा विश्वकर्मा की मूर्ति विसर्जन को लेकर बवाल हुआ। ये पहली बार था जब गाँव में बाबा विश्वकर्मा पूजा का आयोजन हुआ था। विसर्जन के लिए जुलूस निकाला जा रहा था, लेकिन रास्ते में कुछ लोगों ने आपत्ति जताई और जुलूस को अपने गाँव से गुजरने से रोक दिया। इससे माहौल तनावपूर्ण हो गया। स्थानीय लोगों का कहना था कि जुलूस निर्धारित रास्ते से जा रहा था, लेकिन अचानक विरोध शुरू हो गया।

प्रशासन ने स्थिति को संभालने की कोशिश की। एसडीएम और एसडीपीओ भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे, लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार प्रशासन ने विवाद से बचने के लिए जुलूस का रास्ता बदल दिया। मूर्ति को लंबा रास्ता तय करके मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट थाना क्षेत्र के रास्ते विसर्जन के लिए ले जाया गया। इस घटना से स्थानीय लोग नाराज हो गए।

एक युवक ने कहा, “हम उनके त्योहार में जूस पिलाते हैं, लेकिन आज हमारे पर्व का रास्ता रोक दिया गया।” इससे साफ है कि लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं और उनके मन में गुस्सा भरा हुआ है।

क्या है इन घटनाओं का मकसद?

बिहार की इन दोनों घटनाओं को देखकर एक बात साफ है- बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले माहौल को खराब करने की कोशिश हो रही है। पूर्णिया और दरभंगा की घटनाएँ कोई इत्तेफाक नहीं हैं। ये दोनों घटनाएँ धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली हैं और इनका समय भी बहुत सोचा-समझा लगता है। बिहार में दुर्गा पूजा जैसे बड़े त्योहार नजदीक हैं और इसके बाद विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। ऐसे में कुछ लोग चाहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम के बीच तनाव पैदा हो, जिससे वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके।

बिहार की सियासत में वोटों का ध्रुवीकरण कोई नई बात नहीं है। कुछ पार्टियाँ खासकर जो खुद को मुस्लिम हितैषी बताती हैं, जैसे आरजेडी और AIMIM इस तरह की घटनाओं का फायदा उठाने की कोशिश करती हैं। इनका मकसद है कि मुस्लिम वोटरों को एकजुट किया जाए और उन्हें ये दिखाया जाए कि बीजेपी-जेडीयू गठबंधन उनके हितों के खिलाफ है।

विकास बनाम सियासी साजिश

पूर्णिया की घटना का समय भी गौर करने लायक है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्णिया में 40,000 करोड़ रुपए की योजनाओं का ऐलान किया। ट्रेन, एयरपोर्ट और दूसरी विकास परियोजनाओं की शुरुआत हुई। बिहार विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की सरकार ने कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और विकास को बढ़ावा देने का काम किया है। लेकिन जब विकास की बातें जोर पकड़ने लगती हैं, तो कुछ लोग माहौल बिगाड़ने की कोशिश शुरू कर देते हैं।

विपक्ष को लगता है कि विकास के मुद्दे पर वो एनडीए को टक्कर नहीं दे सकता। इसलिए वो धार्मिक और सामुदायिक तनाव को हवा देने की कोशिश करता है। पूर्णिया और दरभंगा की घटनाएँ इसका उदाहरण हैं। मूर्ति तोड़ने और विसर्जन रोकने जैसी घटनाएँ लोगों की भावनाओं को भड़काती हैं और समाज में नफरत फैलाती हैं। इसका नतीजा ये होता है कि लोग विकास की बात भूलकर भावनात्मक मुद्दों में उलझ जाते हैं।

चुनाव से पहले माहौल बिगाड़ने के पीछे की रणनीति

बिहार में सभी समुदाय मिलजुलकर रहते हैं और एक-दूसरे के त्योहारों में हिस्सा लेते हैं। फिर ऐसी घटनाएँ क्यों हो रही हैं? साफ है कि ये कुछ लोगों की साजिश है, जो समाज को तोड़ना चाहते हैं। बिहार के लोग चाहे हिंदू हों या मुस्लिम, वे शांति और भाईचारे में विश्वास रखते हैं। लेकिन कुछ सियासी लोग इस भाईचारे को तोड़कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं।

दरभंगा में भी यही देखने को मिला। एक युवक ने कहा कि वो मुस्लिम समुदाय के त्योहारों में हिस्सा लेते हैं, फिर उनके पर्व का रास्ता क्यों रोका गया? ये सवाल हर बिहारी के मन में है। लोग समझ रहे हैं कि ये सब सियासी खेल का हिस्सा है।

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह की घटनाएँ बढ़ने की आशंका है। दुर्गा पूजा जैसे बड़े त्योहार के दौरान मूर्ति विसर्जन को लेकर और विवाद पैदा किए जा सकते हैं। इसका मकसद है कि हिंदू और मुस्लिम वोटरों को बाँटा जाए। कुछ पार्टियाँ चाहती हैं कि मुस्लिम वोटर एकजुट होकर उनके पक्ष में वोट करें। इस तरह की सियासत बिहार के विकास और शांति के लिए खतरनाक है।

पूर्णिया और दरभंगा की घटनाएँ बिहार में चुनाव से पहले माहौल बिगाड़ने की साजिश का हिस्सा हैं। ये घटनाएँ समाज को बाँटने और वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश हैं। लेकिन बिहार के लोग समझदार हैं। वे जानते हैं कि उनका असली मुद्दा विकास, रोजगार और शांति है। हमें इन सियासी खेलों को समझना होगा और एकजुट होकर बिहार को आगे ले जाना होगा। शांति और सौहार्द ही बिहार की ताकत है और इसे कोई नहीं तोड़ सकता।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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