तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने एक बार फिर अपनी पार्टी डीएमके की पुरानी आदत चली। प्रोफेट मुहम्मद के 1500वें जन्म वर्षगांठ पर रविवार (21 सितंबर 2025) को चेन्नई में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में उन्होंने ऐलान कर दिया कि राज्य के स्कूलों के पाठ्यक्रम में इस्लामिक स्टडीज को शामिल किया जाएगा।
स्टालिन ने कहा कि डीएमके हमेशा मुस्लिम समुदाय के साथ खड़ी रही है। उन्होंने सीएए का विरोध करने और वक्फ कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का जिक्र किया। इस दौरान उन्होंने विपक्षी पार्टी एआईएडीएमके पर तीखा हमला बोला कि वो ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दों पर दोहरा चरित्र अपनाती है। लेकिन ये ऐलान सिर्फ मुस्लिम भाईयों का दिल जीतने की कोशिश ही नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले वोटबैंक को मजबूत करने का शातिर खेल लगता है।
कार्यक्रम में स्टालिन ने मुस्लिम संगठनों जैसे पीएफआई और एसडीपीआई की पुरानी माँगों पर भी हामी भरी। एसडीपीआई के नेता नेलाई मुबारक ने स्कूलों में प्रोफेट मुहम्मद की शिक्षाओं को पढ़ाने की बात कही थी और स्टालिन ने तुरंत हाँ कह दी। ये देखें तो साफ है कि डीएमके अब तमिलनाडु की राजनीति और समाज को इस्लामी रंग देने पर तुली हुई है। स्टालिन का ये कदम चुनावी साल में आया है, जब तमिलनाडु में 2026 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। क्या ये सिर्फ वोट की राजनीति है या सनातन धर्म को नेस्तनाबूद करने की साजिश का नया चरण?
अब बात करते हैं डीएमके की पुरानी दुश्मनी की। ये पार्टी तो सनातन धर्म को लेकर खुलेआम जंग का ऐलान करती रही है। स्टालिन के बेटे और डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन ने तो सनातन को डेंगू और मलेरिया से जोड़ दिया था। सितंबर 2023 में एक कार्यक्रम में उदयनिधि ने कहा था कि सनातन धर्म जैसी चीजों को मिटा देना चाहिए, जैसे बीमारियों को खत्म किया जाता है।
ये बयान सुनकर पूरे देश में हंगामा मच गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी उदयनिधि को फटकार लगाई और कहा कि वो कोई साधारण आदमी नहीं, मंत्री हैं, तो बयान जिम्मेदारी से दें। लेकिन उदयनिधि ने माफी नहीं माँगी। अक्टूबर 2024 में उन्होंने फिर कहा कि वो कलाइग्नार के पोते हैं, माफी नहीं देंगे। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2025 में उनके खिलाफ नई एफआईआर रोक दी, लेकिन डीएमके की एंटी-सनातन सोच साफ दिखती है। द्रविड़ राजनीति की जड़ों में ही सनातन को वैदिक परंपरा बताकर जातिवाद का प्रतीक मानने की आदत है।
डीएमके का ये रवैया नया नहीं है। वो तो ब्राह्मणों के खिलाफ खुली जंग लड़ती रही है। 1930-40 के एंटी-हिंदी आंदोलन में डीएमके के पूर्वजों ने हिंदी और संस्कृत को ब्राह्मणों की साजिश बताया। वो मानते थे कि ब्राह्मण तमिल पर हिंदी-सस्कृत थोपना चाहते हैं।
आज भी डीएमके संस्कृत को हिंदू भावना का प्रतीक मानकर विरोध करती है। फरवरी 2025 में एक रिपोर्ट में कहा गया कि डीएमके ने तमिलनाडु में संस्कृत की पढ़ाई को व्यवस्थित तरीके से खत्म करने की कोशिश की है। ये सब सोशल जस्टिस के नाम पर एंटी-हिंदू एजेंडा है।
इसी तरह हिंदी को लेकर डीएमके की दुश्मनी जगजाहिर है। मुख्यमंत्री स्टालिन ने हाल ही में एंटी-हिंदी बयान देकर फिर हंगामा बांधा, लेकिन ये राजनीतिक फायदा नहीं दे रहा। नॉर्थ इंडियन और ब्राह्मणों को निशाना बनाकर डीएमके तमिल अस्मिता का ढोंग करती है। लेकिन वोटबैंक के लिए इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों को समर्थन? ये तो दोहरा चरित्र है!
देखिए, कैसे तमिलनाडु की हवा जहरीली हो रही है। स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा, साइंस, मैथ्स या इतिहास की जगह धार्मिक किताबें पढ़ाई जाएंगी। स्टालिन ने सितंबर 2025 में ही 2000 मुस्लिम छात्रों के लिए स्कॉलरशिप प्रोग्राम लॉन्च किया, जिसमें हर साल 10 हजार रुपए मिलेंगे। ये सब मुस्लिम युवाओं को लुभाने की चालें हैं।
डीएमके नेता करुणानिधि ने तो कहा था कि वो एंटी-इंडियन, एंटी-तमिल, एंटी-ब्राह्मण हैं। उनकी विचारधारा आज भी जिंदा है। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति ने सनातन को कास्ट सुप्रीमेसी का नाम दिया, लेकिन अब इस्लाम को बढ़ावा देकर बैलेंस करने की कोशिश? ये तो समाज को बाँटने वाली साजिश है।
भाजपा ने स्टालिन के ऐलान पर तीखा रिएक्शन दिया। नारायण तिरुपति ने कहा कि डीएमके कम्युनल पार्टी है, जो हमेशा मुस्लिम वोट्स के लिए कुछ न कुछ करती रहती है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट में भी यही कहा गया कि ये प्री-पोल पुश है। विपक्ष का कहना है कि तमिलनाडु में पहले से ही सांप्रदायिक तनाव है और ये कदम आग में घी डालने जैसा है।
एआईएडीएमके ने भी स्टालिन पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। लेकिन डीएमके चुप नहीं बैठी। स्टालिन ने कहा कि उनकी पार्टी सभी धर्मों का सम्मान करती है, लेकिन सच्चाई तो ये है कि सनातन को तो वो मलेरिया बता चुके हैं।
अब सवाल ये है कि तमिलनाडु का भविष्य क्या होगा? जहाँ एक तरफ स्कूलों में इस्लाम की पढ़ाई, तो दूसरी तरफ सनातन, हिंदी और संस्कृत का विरोध। ये जड़ों में जहर घोलने जैसा है। बच्चे अच्छी शिक्षा से वंचित हो जाएँगे और समाज बँट जाएगा।
विशेषज्ञ कहते हैं कि ड्राविड़न पॉलिटिक्स ने तमिलनाडु को एंटी-हिंदू बना दिया और अब ये इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहा है। स्टालिन सरकार का ये फैसला चुनावी दाँव हो सकता है, लेकिन लंबे में तमिलनाडु की एकता को खतरा है। क्या तमिल लोग इस धोखे को समझेंगे? या वोटबैंक की राजनीति फिर जीत जाएगी? ये तो वक्त बताएगा, लेकिन सनातनी अब सतर्क हो चुके हैं।


