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‘हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस बिल 2025’ लाएगी सरकार: तंबाकू उत्पादों पर 70% सेस के साथ अब तक का सबसे सख्त टैक्स ढाँचा, जानें इससे क्या बदलेगा?

नए कानून में सभी निर्माताओं के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन की शर्त रखी गई है। हर कंपनी को मासिक रिटर्न दाखिल करना होगा, जिसमें उत्पादन क्षमता और सेस भुगतान का ब्यौरा दर्ज रहेगा। सरकारी अधिकारी कभी भी फैक्ट्री का निरीक्षण, जाँच या ऑडिट कर सकेंगे ताकि नियमों का पालन सुनिश्चित हो सके।

केंद्र सरकार गुटखा और पान मसाला उद्योग पर सख्ती बढ़ाने जा रही है। इसके लिए ‘हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस बिल 2025’ लाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य और सुरक्षा पर अतिरिक्त फंड जुटाना है। संसद का शीतकालीन सत्र आज यानी सोमवार (1 दिसंबर 2025) से शुरू हुआ है, जिसमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण यह बिल लोकसभा में पेश करेंगी।

नए बिल में तंबाकू उत्पादों पर 40% GST के अलावा 70% या उससे अधिक सेस लगाने का प्रावधान है। वहीं, सिगरेट पर अलग से प्रति 1000 स्टिक पर 2,700 रुपए से लेकर 11,000 रुपए तक विशेष सेस लगाया जाएगा, जो उनकी लंबाई पर निर्भर होगा।

सरकार का मानना है कि ओवरऑल सेस व्यवस्था को बदलने का यह कदम जरूरी है, ताकि आने वाले समय में कंपेंसेशन सेस खत्म होने के बाद भी टैक्स राजस्व में कमी न आए।

क्या कहता है बिल और क्यों लाया गया?

सरकार का मानना है कि गुटखा, पान मसाला और तंबाकू उत्पादों के कारण होने वाली बीमारियों और उससे जुड़े राष्ट्रीय स्वास्थ्य खर्च में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। इसी चुनौती से निपटने और सुरक्षा-संबंधी जरूरतों के लिए अतिरिक्त राजस्व जुटाने के उद्देश्य से इस बिल को शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की तैयारी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण यह बिल लोकसभा में पेश करेंगी।

सरकार का दावा है कि यह कदम तंबाकू नियंत्रण की दिशा में अब तक की सबसे सख्त वित्तीय नीति हो सकती है, जिसके जरिए न केवल स्वास्थ्य जोखिम कम होंगे बल्कि सुरक्षा ढाँचे को मजबूत करने के लिए भी धन उपलब्ध होगा।

सेस कैसे लगेगा और क्या बदलेगा?

इस बिल के तहत सेस मौजूदा GST व्यवस्था में बदलाव के साथ लागू किया जाएगा। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब टैक्स उत्पादन की वास्तविक मात्रा पर नहीं बल्कि मशीन की अधिकतम उत्पादन क्षमता पर आधारित होगा।

यानि चाहे फैक्ट्री कम उत्पादन करे या अधिक, भुगतान मशीन की क्षमता के आधार पर करना होगा। इसका अर्थ है कि टैक्स चोरी या कम उत्पादन दिखाकर बच निकलने की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी।

हाथ से बनने वाले पान मसाला और गुटखे पर भी पहले की तरह मात्रा आधारित टैक्स के बजाय हर महीने एक निश्चित राशि का सेस देना अनिवार्य होगा। यह मॉडल पहले बीड़ी उद्योग में लागू किया गया था और अब इसे इस सेक्टर में लागू किया जा रहा है।

नियम, सजा और छूट के प्रावधान

नए कानून में सभी निर्माताओं के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन की शर्त रखी गई है। हर कंपनी को मासिक रिटर्न दाखिल करना होगा, जिसमें उत्पादन क्षमता और सेस भुगतान का ब्यौरा दर्ज रहेगा। सरकारी अधिकारी कभी भी फैक्ट्री का निरीक्षण, जाँच या ऑडिट कर सकेंगे ताकि नियमों का पालन सुनिश्चित हो सके।

यदि कोई निर्माता नियमों का उल्लंघन करता है, गलत जानकारी देता है या टैक्स चोरी करता है, तो उस पर 5 साल तक की जेल और भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके बावजूद कंपनियों को अपीलीय अधिकारियों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी अपील का अधिकार दिया जाएगा

बिल में एक राहत का प्रावधान भी शामिल किया गया है। यदि कोई मशीन या उत्पादन यूनिट लगातार 15 दिन या उससे अधिक बंद रहती है, तो उस अवधि के लिए सेस में छूट दी जाएगी। इससे मौसमी या छोटे उत्पादकों को कुछ राहत मिल सकती है।

इसके अलावा, सरकार के पास जरूरत पड़ने पर इस सेस को दोगुना करने का अधिकार भी होगा, जो आने वाले समय में इस उद्योग की लागत को और भारी बना सकता है।

उद्योग, बाजार और उपभोक्ताओं पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बिल का सबसे सीधा असर गुटखा और पान मसाला उद्योग की लागत पर पड़ेगा। छोटे निर्माताओं के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है और कई स्थानीय यूनिटें बंद होने की संभावना है। बड़े ब्रांड शायद इस बढ़े हुए खर्च को कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में ग्राहकों पर डाल देंगे।

हालाँकि, सरकार को उम्मीद है कि कीमत बढ़ने से इन उत्पादों की खपत घटेगी, जिससे जन स्वास्थ्य को फायदा होगा। साथ ही, सेस से जुटाई गई राशि राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजनाओं और स्वास्थ्य योजनाओं पर खर्च की जाएगी, जो इसे दोहरे फायदे वाला कदम बनाती है।

निष्कर्ष

‘हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस बिल 2025’ तंबाकू उत्पाद उद्योग पर सरकार का अब तक का सबसे गंभीर वित्तीय हस्तक्षेप माना जा रहा है। यह केवल राजस्व जुटाने का तरीका नहीं बल्कि एक हेल्थ-केयर नीति है। इसके जरिए उपभोग पर नियंत्रण, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देगी।

हालाँकि, इससे उद्योग पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा और छोटे निर्माताओं के लिए चुनौतियाँ बढ़ेंगी लेकिन लंबे समय में यह कदम स्वास्थ्य-हानिकारक उत्पादों की उपलब्धता और खपत में कमी ला सकता है।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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