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पानी पर तैरते ‘न्यूक्लियर प्लांट’ बदलेंगे भारत के ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर, जानें कैसे काम करते हैं रूस के ‘स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर’?

भारत और रूस का यह SMR और फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर वाला सहयोग ऐसा है जैसे देश एक ही जगह बने विशाल बिजलीघरों से हटकर छोटे, पोर्टेबल और बेहद सुरक्षित बिजलीघरों की ओर बढ़ रहा हो, जिन्हें जरूरत के हिसाब से कहीं भी लगाया जा सके।

दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक के बाद भारत और रूस ने कुल 19 बड़े समझौते किए। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) की है। इसमें सहयोग और भारत में फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने का प्रस्ताव शामिल है। रूस ने भारत को न सिर्फ SMR टेक्नोलॉजी देने की पेशकश की है, बल्कि भारत के समुद्री क्षेत्रों में एक तैरता हुआ न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने की भी बात कही है।

कुडनकुलम के बाद भारत अब न्यूक्लियर ऊर्जा के अगले दौर में कदम रखना चाहता है। एक ऐसा दौर जिसमें छोटे, सुरक्षित, मोबाइल और किफायती परमाणु रिएक्टर भारत की बिजली जरूरतें पूरी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। अब हम समझेंगे कि ये स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर क्या होते हैं, कैसे काम करते हैं, फ्लोटिंग प्लांट क्यों खास हैं और भारत को इससे क्या मिलने वाला है।

SMR क्या है: छोटे लेकिन शक्तिशाली परमाणु रिएक्टर

भारत और रूस के बीच इस बार सहयोग का सबसे बड़ा और नया कदम है ‘SMR’ यानी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर पर साथ काम करना। दुनिया तेजी से ऐसी न्यूक्लियर तकनीक की ओर बढ़ रही है जो आकार में छोटी हो, लेकिन सुरक्षा, लागत और समय तीनों मामलों में बड़ी सुविधाएँ दे। SMR को आप बड़े न्यूक्लियर प्लांट का छोटा, स्मार्ट और अधिक सुरक्षित संस्करण समझ सकते हैं। ये परंपरागत रिएक्टरों से लगभग एक-तिहाई आकार के होते हैं, लेकिन बिजली उतनी ही भरोसेमंद और साफ पैदा करते हैं।

SMR की सबसे खास बात यह है कि इन्हें फैक्ट्री में पहले से तैयार मॉड्यूल के रूप में बनाया जाता है और बाद में साइट पर जोड़ दिया जाता है। इससे इनकी इंस्टॉलेशन में वर्षों का इंतजार नहीं करना पड़ता। इन्हें उन जगहों पर भी लगाया जा सकता है जहाँ बड़े न्यूक्लियर प्लांट बनाना न तो संभव है और न ही आर्थिक रूप से ठीक। छोटे शहरों, दूर-दराज के इलाकों और कम जगह वाले औद्योगिक क्षेत्रों में SMR आसानी से फिट हो सकते हैं।

रूस इस तकनीक में दुनिया का सबसे अनुभवी देश है। उसका बनाया ‘अकादमिक लोमोनोसोव’ दुनिया का पहला फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर प्लांट है। एक ऐसा जहाज जो समुद्र में तैरते हुए आर्कटिक इलाके को बिजली और हीटिंग देता है। अब यही मॉडल भारत के लिए भी प्रस्तावित किया गया है।

भारत के लिए SMR इसलिए और भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि आने वाले वर्षों में देश के औद्योगिक क्षेत्रों- जैसे रेल प्रोजेक्ट, डेटा सेंटर, खनन क्षेत्र, बड़े पोर्ट, तटीय उद्योग और पहाड़ी राज्यों को स्थानीय, भरोसेमंद और क्लीन बिजली की बड़ी जरूरत पड़ेगी। SMR इस जरूरत को सीधे यहीं पर पूरा कर सकते हैं, बिना किसी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की माँग किए।

सीधे शब्दों में कहें तो SMR भारत को तेज, सुरक्षित, स्थानीय और भविष्य के लिए तैयार ऊर्जा देने वाली तकनीक है और रूस इसके लिए सही साझेदार है।

SMR कैसे काम करते हैं?

स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर सामान्य न्यूक्लियर प्लांट की तरह ही परमाणु ईंधन का उपयोग करके गर्मी पैदा करते हैं, लेकिन उनका पूरा ढाँचा सोचा-समझा और कॉम्पैक्ट होता है। यह पारंपरिक VVER या PHWR जैसे बड़े रिएक्टरों की तुलना में छोटे होते हैं, इसलिए इनकी सुरक्षा और नियंत्रण प्रणाली भी अधिक प्रभावी होती है। इनके अंदर कई पैसिव सेफ्टी फीचर होते हैं, यानि बिना बिजली या इंसानी दखल के भी ये खुद को सुरक्षित तरीके से बंद कर सकते हैं। यह उन्हें ज्यादा भरोसेमंद बनाता है।

भारत ऐसे समय में SMR अपनाना चाहता है जब देश बड़े पैमाने पर अक्षय ऊर्जा (सौर और पवन) जोड़ रहा है। लेकिन इन स्रोतों में एक समस्या है, ये हमेशा एक समान उत्पादन नहीं देते। ऐसे में बैकअप के लिए एक भरोसेमंद ‘बेस लोड’ बिजली चाहिए जो हमेशा स्थिर चले। यही काम SMR कर सकते हैं। भारत के लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि 2047 तक 100 गीगावॉट न्यूक्लियर क्षमता का लक्ष्य रखा गया है और अकेले बड़े प्लांट इस लक्ष्य तक पहुँचने में समय ले सकते हैं। SMR कम समय में स्थापित होकर इस रोडमैप को तेज कर सकते हैं।

कई भारतीय संस्थान पहले से ही SMR के उपयोग पर विचार कर रहे हैं- जैसे कि भारतीय रेलवे की परियोजनाएँ, ऊर्जा-भूखे डेटा सेंटर और महाराष्ट्र में मजगांवकों–रॉसएटम परियोजना। भारत का एक लक्ष्य यह भी है कि इन SMR में थोरियम आधारित ईंधन का उपयोग हो सके, जिसके विशाल भंडार भारत के पास हैं। इस दिशा में रूस, भारत के साथ तकनीकी साझेदारी को आगे बढ़ाना चाहता है। SMR भारत को ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण बढ़त दे सकते हैं।

फ्लोटिंग न्यूक्लियर प्लांट: समुद्र में तैरता बिजलीघर कैसे काम करता है?

फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर प्लांट सुनने में किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन रूस ने इसे सच में बनाकर चला भी लिया है। ‘अकादमिक लोमोनोसोव’ दुनिया का पहला ऐसा न्यूक्लियर प्लांट है जो एक बड़ी बार्ज पर बनाया गया है और जिसे जहाज की तरह पानी में खींचकर आर्कटिक तट पर लगा दिया गया। यह वहाँ बिजली भी देता है और कड़ाके की ठंड में हीटिंग भी करता है।

अब रूस यही तकनीक भारत को देने की पेशकश कर रहा है। भारत जैसे बड़े तटीय देश के लिए यह आइडिया काफी उपयोगी हो सकता है, खासकर तब जब जमीन पर नया प्लांट लगाने में दिक्कत आती है। ऐसे तैरते हुए प्लांट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें जरूरत के हिसाब से कहीं भी ले जाया जा सकता है, लगाया जा सकता है और काम पूरा होने पर हटाया भी जा सकता है। यानी यह एक तरह का ‘मोबाइल न्यूक्लियर पावर स्टेशन’ बन जाता है।

यह मॉडल उन इलाकों के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है जहाँ बिजली की कमी रहती है, जहाँ उद्योग तेजी से फैल रहे हैं या जहाँ प्राकृतिक कारणों से स्थिर बिजली उपलब्ध कराना मुश्किल होता है। भारत का तटीय क्षेत्र बहुत लंबा और व्यापक है। केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और भविष्य में पोर्ट आधारित उद्योगों के लिए ऐसे फ्लोटिंग प्लांट नई ऊर्जा उपलब्ध कराने का नया रास्ता खोल सकते हैं।

हालाँकि, पर्यावरण से जुड़े संगठनों ने इस मॉडल को लेकर चिंता भी जताई है। ग्रीनपीस ने तो लोमोनोसोव (Lomonosov) को ‘Chernobyl on Ice’ यानि ‘बर्फ पर चेरनोबिल’ तक कहा। लेकिन रूस का कहना है कि इस प्लांट को बेहद सख्त सुरक्षा मानकों के साथ बनाया गया है और इसे प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखने के खास इंतजाम किए गए हैं। भारत किसी भी ऐसे प्रस्ताव पर आगे बढ़ने से पहले इसकी पूरी तकनीकी जाँच और सुरक्षा समीक्षा जरूर करेगा।

भारत–रूस न्यूक्लियर साझेदारी का भविष्य: SMR से VVER-1200 तक

कुडनकुलम प्लांट भारत-रूस न्यूक्लियर साझेदारी की रीढ़ की हड्डी है। दोनों देश कई सालों से मिलकर यहाँ रिएक्टर बना रहे हैं। पहले दो रिएक्टर चल रहे हैं, तीसरे–चौथे पर काम तेज है और अब पाँचवे-छठे यूनिट के लिए भी बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है। इसी के साथ रूस ने भारत को अगली पीढ़ी के VVER-1200 रिएक्टर देने की भी पेशकश की है। ये दुनिया में सबसे सुरक्षित, आधुनिक और ज्यादा बिजली बनाने वाले रिएक्टरों में गिने जाते हैं।

अब साझेदारी सिर्फ रिएक्टर सप्लाई तक सीमित नहीं है। भारत और रूस मिलकर न्यूक्लियर उपकरण बनाने, ईंधन असेंबली तैयार करने और पूरी हाई-टेक सप्लाई चेन को भारत में ही स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में ‘SMR’ यानी छोटे लेकिन ताकतवर मॉड्यूलर रिएक्टर, इस पूरे विजन को गति दे सकते हैं। रूस इस तकनीक को आज की तारीख में सबसे बेहतर तरीके से समझता है, क्योंकि वही दुनिया का पहला देश है जिसने SMR और फ्लोटिंग न्यूक्लियर प्लांट दोनों को वास्तविक रूप से चलाया है और भारत वह बड़ा देश है जिसे आने वाले दशकों में भारी मात्रा में साफ, सस्ती और लगातार मिलने वाली बिजली की जरूरत पड़ेगी। इसलिए यह सहयोग दोनों देशों के लिए बिल्कुल स्वाभाविक, संतुलित और फायदेमंद है।

भारत ने 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर क्षमता हासिल करने का जो बड़ा लक्ष्य रखा है, उसमें SMR एक तरह से ‘फास्ट ट्रैक रास्ता’ हैं। बड़े रिएक्टरों को बनाने में कई साल लगते हैं, लेकिन SMR को कम समय में इंस्टॉल किया जा सकता है और इन्हें जरूरत के हिसाब से कहीं भी लगाया जा सकता है। इसी वजह से विशेषज्ञ मान रहे हैं कि SMR और रूस के साथ नया सहयोग भारत-रूस न्यूक्लियर इतिहास का सबसे अहम मोड़ बन सकता है।

भारत का भविष्य: सुरक्षित, स्वच्छ, स्थिर न्यूक्लियर ऊर्जा की ओर

रूस के SMR और फ्लोटिंग न्यूक्लियर प्लांट भारत को एक ऐसी राह दिखाते हैं, जहाँ बिजली न सिर्फ लगातार और किफायती होगी, बल्कि साफ ऊर्जा के मिशन का मजबूत आधार भी बनेगी। भारत की सबसे बड़ी जरूरत ‘सुरक्षित, भरोसेमंद और बड़े पैमाने पर उपलब्ध ऊर्जा है। न्यूक्लियर ऊर्जा इसका सबसे टिकाऊ रास्ता मानी जाती है। ऐसे में रूस के साथ यह नई साझेदारी भारत को न सिर्फ नई ऊर्जा तकनीक देगी, बल्कि उसे एक उभरती हुई तकनीकी ताकत के रूप में भी आगे बढ़ाएगी।

भारत अब उस दौर में कदम रख रहा है, जहाँ न्यूक्लियर ऊर्जा सिर्फ बड़े-बड़े प्लांट तक सीमित नहीं रहेगी। छोटे, तेजी से स्थापित होने वाले, स्थानीय जरूरतों के लिए बने SMR आने वाले समय की ऊर्जा व्यवस्था का केंद्र बनने वाले हैं। रूस के साथ हुए नए समझौते इसी बड़े बदलाव की शुरुआत हैं, जो आने वाले वर्षों में भारत के ऊर्जा ढाँचे को पूरी तरह बदल सकते हैं।

भारत और रूस का यह SMR और फ्लोटिंग न्यूक्लियर पावर वाला सहयोग ऐसा है जैसे देश एक ही जगह बने विशाल बिजलीघरों से हटकर छोटे, पोर्टेबल और बेहद सुरक्षित बिजलीघरों की ओर बढ़ रहा हो, जिन्हें जरूरत के हिसाब से कहीं भी लगाया जा सके। भारत में जिस तेजी से बिजली की माँग बढ़ रही है, SMR उसी जरूरत को समझदारी और सुरक्षित तरीके से पूरा करने की क्षमता रखते हैं। रूस इस तकनीक में सबसे आगे है और भारत इसका उपयोग कर अपनी क्षमता कई गुना बढ़ा सकता है। आने वाले 10-20 वर्षों में भारत की ऊर्जा कहानी का बड़ा हिस्सा इसी नई तकनीक से लिखा जाएगा।

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