उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने बुधवार (11 फरवरी 2026) को वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 9.12 लाख करोड़ का ऐतिहासिक बजट पेश किया, यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 12.9% अधिक है। यह राज्य का अब तक का सबसे बड़ा बजट है। राज्य में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे समय में आमतौर पर सरकारों से उम्मीद की जाती है कि वे लोकलुभावन घोषणाओं की झड़ी लगा दें। नई सब्सिडी, मुफ्त योजनाएँ, कर्ज माफी और कैश जैसी चीजों की घोषणा की जाए।
हालाँकि, योगी सरकार ने बजट में ‘रेवड़ी संस्कृति’ की जगह अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली ठोस योजनाओं पर जोर दिया है। यह बजट इस बात का संकेत है कि जो सरकारें लगातार काम करती हैं, उन्हें चुनाव से ठीक पहले जनता को लुभाने के लिए अस्थायी राहत का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं होती। उनके पास दिखाने के लिए काम होता है, दिशा होती है और भविष्य की स्पष्ट योजना होती है।
योगी सरकार ने कैसे दी अर्थव्यवस्था को धार
2017 में जब योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो हालात आज के जैसे नहीं थे। यूपी पर ‘बीमारू राज्य’ का ठप्पा लगा था, कानून-व्यवस्था की हालात खस्ता थी और लगता था कि गरीबी-बदहाली ही राज्य के लोगों का भविष्य है। निवेशक यहाँ आने से हिचकिचाते थे, उद्योगों का अभाव था और बेरोजगारी एक बड़ी समस्या थी।
जब दूसरे प्रदेशों में उद्योग धंधों को आगे बढ़ाया जा रहा, इन्फ्रा से लेकर रोजगार तक बढ़ाने पर जोर था तब यूपी में मुख्तार अंसारी और अतीक अहदम जैसे लोगों को प्रश्रय देकर गुंडा राज को बढ़ावा दिया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में स्थिति बदली है। योगी सरकार ने कानून-व्यवस्था को सुधारने, बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने और निवेश का माहौल बनाने पर लगातार काम किया। योगी सरकार ने माफियाओं के कब्जे से 65,000 एकड़ से अधिक जमीन मुक्त कराकर लैंड बैंक बनाया है।
योगी सरकार के प्रयासों का ही नतीजा है कि 1960 के दशक के बाद पहली बार यूपी का राष्ट्रीय GDP में हिस्सा बढ़ा है। 1960 के बाद अन्य राज्य लगातार आगे बढ़ते गए और यूपी पिछड़ता गया। एक के बाद एक साल आता रहा और उत्तर प्रदेश का शेयर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में कम होता गया। 1960-61 में यूपी का राष्ट्रीय जीडीपी में हिस्सा 14.4% था जो गिरते-गिरते 2017-18 में 8.6% रह गया था लेकिन अब 2024-25 में बढ़कर 9.1% हो गया है।
इकोनॉमी को मजबूत करने का सबसे बड़ा तरीका है इंफ्रा का विकास। सरकार ने एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर पर लगातार फोकस किया, जो न सिर्फ कनेक्टिविटी बढ़ाते हैं बल्कि रोजगार भी पैदा करते हैं। इससे राज्य की GDP बढ़ रही है और निवेश खुद-ब-खुद आ रहा है, बिना फ्री स्कीम्स के लालच दिए। योगी सरकार ने यूपी में कई इन्वेस्टमेंट समिट का आयोजन कराया जिसमें हजारों करोड़ के निवेश प्रस्ताव आए और धरातल पर उतरे भी। इस बजट में उसी नीति की निरंतरता दिखाई देती है।
जनता और सरकार के बीच विश्वास का बजट
यह बजट इस बात का संकेत है कि सरकार को जनता पर पूरा भरोसा है और जनता को CM योगी के नेतृत्व पर। चुनाव से पहले आमतौर पर सरकारें लोकलुभावन घोषणाओं का सहारा लेती हैं लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इसकी वजह स्पष्ट है कि सरकार को अपने काम पर विश्वास है। जब सरकार जानती है कि उसने पूरे कार्यकाल में लगातार विकास किया है, तो उसे वोट पाने के लिए अतिरिक्त वादों की जरूरत नहीं पड़ती। यह बजट बताता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भरोसे का एक नया आधार तैयार हुआ है, जहाँ विकास ही सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है।
मुफ्तखोरी नहीं, विकास की सोच
जब सरकार को अपने काम पर भरोसा होता है, तब उसकी प्राथमिकता मुफ्त योजनाएँ नहीं बल्कि स्थायी विकास होता है। योगी सरकार के बजट में यही सोच दिखाई देती है। यहाँ तात्कालिक लाभ देने वाली घोषणाओं की जगह ऐसी योजनाओं पर ध्यान दिया गया है, जो लंबे समय तक प्रदेश को मजबूत करें। इंफ्रास्ट्रक्चर, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों पर जोर इस बात का प्रमाण है कि सरकार भविष्य की नींव मजबूत करना चाहती है।
सरकार ने मुफ्तखोरी के बजाय ठोस काम पर जोर दिया है। 2026-27 में कुल कैपिटल एक्सपेंडिचर ₹2.52 लाख करोड़ रखा गया है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास से जुड़ा है। यानी कुल बजट का करीब 22% विकास कार्यों पर खर्च किया जाना है जो बताता है कि सरकार लंबे वक्त के लिए उत्तर प्रदेश को तैयार कर रही है।
चुनाव नहीं, भविष्य को ध्यान में रखकर बनाया गया बजट
यह बजट चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश को आगे ले जाने के उद्देश्य से बनाया गया है। बड़े-बड़े शहरों और तीर्थनगिरयों के विकास के लिए हजारों करोड़ की योजानओं को प्राथमिकता दी गई है। इनका असर तुरंत नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में दिखाई देगा।
आमतौर पर चुनावी बजट में अल्पकालिक लाभ देने वाली घोषणाएँ होती हैं लेकिन यहाँ लंबे समय के लिए यूपी को विकास की पटरी पर दौड़ाने की सोच दिखाई देती है। साफ है कि योगी सरकार का लक्ष्य केवल सत्ता में बने रहना नहीं बल्कि प्रदेश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को मजबूत करना है। यह बजट विकास की उस दिशा को दर्शाता है, जो स्थायी और दूरगामी है।
सरकार ने वोट के लिए फ्री पैसा देने की नहीं सोची बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि जैसे सेक्टर को और मजबूत करने पर जोर दिया है। बजट में शिक्षा को रिकॉर्ड 12.4% हिस्सा मिला है, जो करीब ₹1.13 लाख करोड़ बैठता है और यह 2016-17 के मुकाबले लगभग चार गुना ज्यादा है। कृषि क्षेत्र के लिए ₹1 लाख करोड़ का प्रावधान है जो करीब 11% होता है। वहीं, स्वास्थ्य विभाग को रिकॉर्ड ₹37,956 करोड़ आवंटित हुए जो योगी सरकार आने से पहले इससे 4.5 गुना कम था।
परिवारवाद और क्षेत्रवाद से ऊपर बजट
यह बजट परिवारवाद या क्षेत्रवाद की राजनीति से अलग एक नई सोच को दर्शाता है। इसमें किसी खास क्षेत्र या राजनीतिक समूह को विशेष लाभ देने की कोशिश नहीं दिखाई देती। इसके बजाय पूरे उत्तर प्रदेश को एक इकाई के रूप में देखा गया है। सरकार का ध्यान इस बात पर है कि विकास का लाभ प्रदेश के हर कोने तक पहुँचे। यह दृष्टिकोण बताता है कि नीति निर्माण में व्यक्तिगत या क्षेत्रीय हितों की जगह राज्य के भविष्य को प्राथमिकता दी जा रही है। यह बजट उत्तर प्रदेश को एक साझा भविष्य की ओर ले जाने का प्रयास है।
यूपी का बजट किसे एक क्षेत्र जिले के विकास पर केंद्रित नहीं है प्रदेश के हर हिस्से तक विकास पहुँचाने का बीड़ा सरकार ने उठाया है। राजधानी लखनऊ में कैंसर हॉस्पिटल और कुकरैल वन क्षेत्र में नाइट सफारी पार्क के लिए 500 करोड़ का ऐलान है तो लखनऊ डेवलपमेंट एरिया व अन्य डेवलपमेंट अथॉरिटी के लिए बजट में 800 करोड़ रुपए का प्रावधान है।
मेरठ, मथुरा-वृंदावन और कानपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी में विकास योजनाओं के लिए 750 करोड़ रुपए दिए गए हैं। वहीं, अयोध्या के विकास के लिए 100 करोड़ रुपए के फंड का ऐलान किया गया है। इसके साथ ही, मिर्जापुर, मुरादाबाद, बलरामपुर, शाहजहाँपुर और भदोही में विश्वविद्यालयों के निर्माण के लिए करीब 200 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।
योगी सरकार के बजट से यह स्पष्ट होता है कि निर्णय राजनीति के आधार पर नहीं बल्कि नीति के आधार पर लिए जा रहे हैं। लोकलुभावन वादों से बचकर योगी सरकार ने आर्थिक अनुशासन और जिम्मेदार शासन का संदेश दिया है। बजट में किसी के लिए बेशक रेवड़ियाँ नहीं है लेकिन ग्रामीण और शहरी, किसान और उद्योग, युवा और बुजुर्ग सभी वर्गों की जरूरतों को ध्यान में रखा गया है। यह बजट दिखाता है कि सरकार ने लोकप्रियता की जगह व्यावहारिकता को चुना है और सरकार केवल वर्तमान नहीं बल्कि भविष्य की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखकर फैसले ले रही है।


