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जॉर्ज सोरोस की फंडिंग, पक्षपाती पैनल और ‘हिंदुत्व’ विरोध का पूरा अध्याय: लीसेस्टर हिंसा में हिंदुओं को दोषी ठहराने वाली SOAS रिपोर्ट की खुली पोल, हिंदू संगठनों ने बताया भ्रामक

SOAS रिपोर्ट में 2022 की हिंसा के लिए हिंदुओं और 'हिंदुत्व' को जिम्मेदार ठहराया गया है, जबकि जमीनी हकीकत और पुलिस के रिकॉर्ड इसके बिल्कुल उलट हैं। इस रिपोर्ट को लीसेस्टर के हिंदू समुदाय और 'हिंदू कम्युनिटी ऑर्गनाइजेशन ग्रुप' (HCOG) ने सिरे से खारिज कर दिया है।

लंदन के लीसेस्टर (Leicester) में साल 2022 में हुई हिंसा को लेकर हाल ही में SOAS (स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज) यूनिवर्सिटी द्वारा जारी एक रिपोर्ट ‘बेटर टुगेदर’ (Better Together) ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। रिपोर्ट में 2022 की हिंसा के लिए हिंदुओं और ‘हिंदुत्व’ को जिम्मेदार ठहराया गया है, जबकि जमीनी हकीकत और पुलिस के रिकॉर्ड इसके बिल्कुल उलट हैं। इस रिपोर्ट को लीसेस्टर के हिंदू समुदाय और ‘हिंदू कम्युनिटी ऑर्गनाइजेशन ग्रुप’ (HCOG) ने सिरे से खारिज कर दिया है।

50,000 से अधिक हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करने वाले इस समूह HCOG का आरोप है कि यह रिपोर्ट तथ्यों पर आधारित नहीं है, बल्कि हिंदुओं को निशाना बनाने के उद्देश्य से लिखी गई है। जमीनी हकीकत यह थी कि लीसेस्टर में हिंदुओं के घरों, मंदिरों और व्यक्तियों पर कट्टरपंथी भीड़ ने सुनियोजित हमले किए थे, लेकिन इस रिपोर्ट ने सारा दोष हिंदू पीड़ितों पर ही मढ़ दिया है।

जॉर्ज सोरोस की फंडिंग और पक्षपाती पैनल: निष्पक्षता पर बड़ा सवाल

हिंदू संगठनों ने सबसे बड़ा हमला इस रिपोर्ट की फंडिंग और इसकी संरचना पर किया है। रिपोर्ट खुद स्वीकार करती है कि इसे ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस’ से फंडिंग मिली है। HCOG के अनुसार, इस जाँच के लिए £620,000 (लगभग 6.5 करोड़ रुपए) का अनुदान जॉर्ज सोरोस की संस्था से आया है।

जॉर्ज सोरोस को दुनिया भर में भारत और हिंदू विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। जब पैसा ही ऐसे स्रोत से आए, तो जाँच की निष्पक्षता का दावा करना अपने आप में हास्यास्पद लगता है। लीसेस्टर के हिंदू समुदाय ने इसीलिए इस ‘कमीशन’ का बहिष्कार किया था, क्योंकि इसका नतीजा पहले से तय लग रहा था।

इसके अलावा, इस जाँच के लिए जो पैनल बनाया गया, उसमें शामिल लोगों का ट्रैक रिकॉर्ड हिंदू-विरोधी गतिविधियों से भरा रहा है। सुरेश ग्रोवर और चेतन भट्ट जैसे लोग इस पैनल का हिस्सा थे, जिन्होंने जाँच शुरू होने से पहले ही सार्वजनिक तौर पर हिंदुओं को दोषी ठहरा दिया था।

सुरेश ग्रोवर ने तो हिंदू धर्म के पवित्र प्रतीक ‘ॐ’ (Aum) को नाजी चिन्ह के साथ जोड़कर अपमानित करने का प्रयास किया था। वहीं पैनल के प्रमुख जुआन मेंडेज हमेशा भारत के खिलाफ खड़े रहे हैं, लेकिन पड़ोसी देशों में हिंदुओं पर होने वाले जुल्मों पर कभी कुछ नहीं बोलते। ऐसे पूर्वाग्रही लोगों द्वारा तैयार रिपोर्ट कभी भी सच नहीं दिखा सकती।

हिंदू घरों और मंदिरों पर हमले को किया गया नजरअंदाज

SOAS की रिपोर्ट ने सबसे बड़ी चालाकी यह की है कि उसने हिंदुओं पर हुए सुनियोजित हमलों को बहुत छोटा करके दिखाया है या पूरी तरह दबा दिया है। सितंबर 2022 में लगातार तीन रातों तक लीसेस्टर में हिंदू घरों, कारों और व्यक्तियों को निशाना बनाया गया था। एक हिंदू मंदिर के ऊपर से झंडा उतारने और मंदिर में तोड़फोड़ की घटना पूरी दुनिया ने देखी थी।

हिंदू युवाओं को सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। लेकिन रिपोर्ट इन घटनाओं पर चुप्पी साधे हुए है और सारा दोष ‘हिंदुत्व’ के मत्थे मढ़ रही है। इसमें एक पूरा चैप्टर हिंदुत्व पर लिखा गया है ताकि यह साबित किया जा सके कि हिंदू ही आक्रामक थे।

यह रिपोर्ट उन दावों को भी हवा देती है कि लंदन से बसों में भर-भर के हिंदू लीसेस्टर आए थे। जबकि कोच ऑपरेटर ने अपने जीपीएस डेटा के साथ साबित कर दिया था कि उसकी कोई भी बस उस सप्ताहांत लीसेस्टर नहीं गई थी। रिपोर्ट ने कट्टरपंथी भीड़ द्वारा फैलाई गई हिंसा को तो ‘प्रतिक्रिया’ बताया, लेकिन हिंदुओं के शांतिपूर्ण बचाव को ‘चरमपंथ’ का नाम दे दिया। यह दोहरा मापदंड ही इस रिपोर्ट की असलियत बताता है।

झूठे दावों और मजीद फ्रीमैन का प्रोपेगेंडा

2022 की लीसेस्टर हिंसा के दौरान और उसके बाद हिंदू समुदाय को बदनाम करने के लिए कई तरह की झूठी कहानियाँ गढ़ी गईं और कैसे कट्टरपंथी तत्वों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर हिंदुओं को अपराधी साबित करने की कोशिश की।

एक घटना क्रिकेट मैच के बाद की बताई गई, जिसमें दावा किया गया कि हिंदू क्रिकेट प्रेमियों ने मुसलमानों पर हमला किया। जबकि हकीकत यह थी कि वह एक निजी झगड़ा था जो शराब के नशे में एक भारतीय मूल के व्यक्ति और क्रिकेट प्रशंसकों के बीच हुआ था, जिसमें धर्म का कोई लेना-देना नहीं था और किसी भी मुसलमान को निशाना नहीं बनाया गया था। इसी तरह मजीद फ्रीमैन जैसे कट्टरपंथियों ने सोशल मीडिया पर चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि ‘मुसलमानों को मौत’ के नारे लगाए गए। पुलिस ने पूरी जाँच के बाद स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी नारे का कोई सबूत नहीं मिला, फिर भी इस रिपोर्ट ने इन अफवाहों को तवज्जो दी।

एक और भयानक झूठ यह फैलाया गया कि तीन भारतीय पुरुषों ने एक 15 साल की मुस्लिम लड़की के अपहरण की कोशिश की। इस खबर ने शहर में भारी तनाव पैदा कर दिया था। पुलिस ने जब इसकी तहकीकात की, तो पता चला कि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं थी। जिस हिंदू युवक पर आरोप लगाया गया था, वह तो उस समय ब्रिटेन में था भी नहीं। इसी तरह, मस्जिदों पर हमले की खबरें फैलाई गईं, जिन्हें पुलिस ने मौके पर जाकर गलत पाया। इन सभी घटनाओं को जानबूझकर इसलिए हवा दी गई ताकि दुनिया की नजरों में हिंदुओं को ‘आक्रामक’ दिखाया जा सके और कट्टरपंथियों द्वारा की गई वास्तविक हिंसा को छुपाया जा सके। लेकिन SOAS की रिपोर्ट इन पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज कर वही पुराना और फर्जी नैरेटिव दोबारा जिंदा करने की कोशिश कर रही है।

सुनियोजित प्रोपेगेंडा और फर्जी दावों की लंबी फेहरिस्त

हिंदुओं के खिलाफ केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर दुष्प्रचार किया गया। एक झूठा दावा यह भी किया गया कि लंदन से बसों में भरकर हिंदू गुंडे लीसेस्टर आ रहे हैं। इस खबर के कारण कई हिंदू बस ऑपरेटरों को धमकियाँ तक मिलीं। बाद में जब बस ऑपरेटरों ने अपने जीपीएस डेटा और रिकॉर्ड पेश किए, तो साबित हो गया कि उस दौरान उनकी कोई भी बस लीसेस्टर नहीं गई थी। यह केवल हिंदुओं के प्रति नफरत भड़काने की एक चाल थी।

इसके अलावा, एक ट्रैफिक वार्डन ने दावा किया कि ड्यूटी के दौरान हिंदुओं ने उस पर हमला किया। पुलिस जाँच में यह मामला पूरी तरह फर्जी निकला और वार्डन ने खुद स्वीकार किया कि उसने गलत रिपोर्ट दर्ज कराई थी। मजीद फ्रीमैन जैसे कट्टरपंथी लोगों ने यह तक दावा किया कि हिंदुओं ने कई मुसलमानों को चाकू मार दिया है। सच्चाई यह थी कि उस रात चाकूबाजी की कोई घटना हुई ही नहीं थी और न ही किसी हिंदू के पास हथियार होने का कोई सबूत मिला। फिर भी SOAS की रिपोर्ट ने इन पुलिस द्वारा खारिज किए गए दावों को ‘हिंदू उग्रवाद’ के अध्याय में जगह दी, जो यह बताता है कि यह रिपोर्ट केवल हिंदुओं को बदनाम करने के लिए लिखी गई थी।

मंदिरों पर हमले और असली हिंसा को दबाने का प्रयास

2022 की हिंसा का सबसे काला पक्ष वह था जिसे इस रिपोर्ट ने पूरी तरह अनदेखा कर दिया। लीसेस्टर में लगातार तीन रातों तक हिंदू घरों, कारों और मंदिरों को निशाना बनाया गया। कट्टरपंथी भीड़ ने एक हिंदू मंदिर की दीवार फाँदकर उसके ऊपर से पवित्र ध्वज को नीचे गिरा दिया और तोड़फोड़ की। हिंदू युवाओं को उनके धर्म के कारण सड़कों पर पीटा गया। लेकिन SOAS की इस रिपोर्ट में इन घटनाओं को बहुत छोटा करके दिखाया गया है।

हैरानी की बात यह है कि रिपोर्ट ने सारा दोष ‘हिंदुत्व’ के मत्थे मढ़ने के लिए एक अलग अध्याय समर्पित कर दिया। रिपोर्ट में हिंदुत्व को राजनीतिक इस्लामवाद के बराबर खतरनाक बताने की सिफारिश की गई है। यह उन हिंदुओं के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है जो खुद हिंसा के शिकार हुए थे। ब्रिटिश सरकार की आधिकारिक जाँच और हेनरी जैक्सन सोसाइटी की रिपोर्ट में हिंदुओं के खिलाफ हुए इन सुनियोजित हमलों का जिक्र है, लेकिन SOAS की रिपोर्ट ने केवल एकतरफा नैरेटिव को बढ़ावा दिया है।

सच को दबाने की अंतरराष्ट्रीय साजिश

SOAS की यह रिपोर्ट केवल एक अकादमिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह हिंदुओं को वैश्विक स्तर पर अपराधी बनाने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। जब ब्रिटिश सरकार खुद एक आधिकारिक जाँच कर रही थी, तब SOAS ने जॉर्ज सोरोस के पैसों पर अपनी अलग जाँच क्यों बिठाई? इसका सीधा जवाब है- सरकारी जाँच में तथ्यों और पुलिस रिकॉर्ड को देखा जाता है, जबकि इस प्राइवेट जाँच का मकसद केवल ‘हिंदू फोबिया’ को बढ़ावा देना था।

मजीद फ्रीमैन जैसे कट्टरपंथियों को ‘शांतिदूत’ की तरह पेश करने की कोशिश की गई है, असल में वही लोग थे जिन्होंने आग में घी डालने का काम किया था। लीसेस्टर की पुलिस ने बार-बार इन अफवाहों का खंडन किया, लेकिन SOAS ने पुलिस की बातों से ज्यादा महत्व कट्टरपंथी दावों को दिया। यह रिपोर्ट हिंदुओं के मानवाधिकारों का हनन है क्योंकि यह असली पीड़ितों को ही कटघरे में खड़ा करती है। हिंदू समुदाय ने इसे खारिज करके यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अब अपनी बदनामी को और बर्दाश्त नहीं करेंगे।

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