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चाचा शिवपाल और माता प्रसाद जैसे वरिष्ठों को किनारे कर अखिलेश ने PK को बना लिया ‘राजनीतिक गुरु’, बैकडोर से I-पैक का काम शुरू: 2017 से नहीं लिया सबक?

अखिलेश ने दिसंबर 2025 में दिल्ली में आई-पैक टीम से मुलाकात की थी। ममता बनर्जी और एमके स्टालिन ने सलाह दी थी। विश्लेषक इसे सपा की कार्यशैली में बड़े परिवर्तन का संकेत मान रहे हैं।

समाजवादी पार्टी (सपा) की 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच एक ऐसा रणनीतिक फेरबदल हो रहा है, जो न केवल पार्टी की आंतरिक संरचना बल्कि उसकी पूरी चुनावी संस्कृति को बदलने का संकेत दे रहा है। अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल सिंह यादव और वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय जैसे अनुभवी, पारंपरिक और परिवार से जुड़े चेहरों को रणनीतिक रूप से दरकिनार करते हुए प्रशांत किशोर (पीके) और उनकी संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी (आई-पैक) को अपना नया ‘राजनीतिक गुरु’ बना लिया है।

हालाँकि सूत्रों की मानें तो पीके खुलकर सामने नहीं आएँगे, बल्कि बैकडोर से अखिलेश को आधुनिक, डेटा-आधारित और माइक्रो-मैनेजमेंट वाली चुनावी राजनीति का नया ‘ककहरा’ सिखाएँगे। यह बदलाव सपा के पारंपरिक समाजवादी-परिवारवादी मॉडल से पेशेवर-कॉर्पोरेट मॉडल की ओर संक्रमण का प्रतीक है।

पारंपरिक नेतृत्व को अखिलेश यादव ने ‘लगाया’ किनारे

शिवपाल सिंह यादव सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं। 2016-17 में अखिलेश-शिवपाल कलह ने पार्टी को बुरी तरह विभाजित किया था। शिवपाल ने कैबिनेट से इस्तीफा दिया, नई पार्टी बनाई (प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया), लेकिन 2022-23 में उनकी सपा में वापसी हुई। जनवरी 2023 में उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। वे जसवंतनगर से छठी बार विधायक हैं। इसके बावजूद 2027 क चुनावी रणनीति में शिवपाल की कोई प्रमुख भूमिका दिखाई नहीं दे रही। अखिलेश ने 2017 की याद में शिवपाल की नाराजगी को पहले ही किनारे कर लिया है। तब शिवपाल की बगावत ने सपा को भारी नुकसान पहुँचाया था। अब पेशेवर टीम पर भरोसा बढ़ने से पुराने कार्यकर्ता और परिवारिक अनुभव दरकिनार हो रहे हैं।

माता प्रसाद पाण्डेय (81 वर्ष) सपा के वरिष्ठ ब्राह्मण चेहरा हैं। सात बार विधायक, पूर्व मंत्री और स्पीकर रहे हैं। जुलाई 2024 में अखिलेश ने उन्हें विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया था, जो भाजपा के ऊपरी जाति वोट को काटने की रणनीति की तरह रही।

हालाँकि इस बार इन वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिस्टेमैटिक है। अखिलेश का फोकस अब ‘पेड प्रोफेशनल टीम’ पर है, जिसमें उच्च पैकेज वाले सलाहकार, डेटा एनालिस्ट और डिजिटल एक्सपर्ट शामिल हैं। ऐसे में पारंपरिक कार्यकर्ता, जो दशकों से पार्टी का झंडा उठाते रहे वे खुद को निर्णयाक प्रक्रिया से बाहर महसूस कर रहे हैं। पार्टी अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, असंतोष पनप रहा है, हालाँकि अभी ये खुलकर सामने नहीं आया है, लेकिन चुनाव नजदीक आते-आते सबकुछ साफ दिखने लगेगा।

सपा की चुनावी यात्रा: 2022 की हार से 2024 की उम्मीद तक

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 111 सीटें जीतीं, लेकिन भाजपा के 255 के मुकाबले सत्ता से दूर रही। 2024 लोकसभा चुनाव में सपा ने इंडिया गठबंधन के सहारे 37 सीटें हासिल कीं, यह उसकी सबसे बड़ी वापसी थी। अखिलेश यादव ने बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और महँगाई जैसे मुद्दों पर हमला तेज किया। पार्टी के अंदर यह धारणा मजबूत हुई कि 2027 ‘डू ऑर डाई’ की लड़ाई है।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अखिलेश ने दिसंबर 2025 में दिल्ली में आई-पैक टीम (प्रतिक जैन सहित) से मुलाकात की। पश्चिम बंगाल यात्रा के दौरान और बातचीत हुई। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सलाह दी कि उच्च दाँव वाली लड़ाई के लिए आई-पैक को शामिल किया जाए। 28 मार्च 2026 को नोएडा से पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) भागीदारी रैली के साथ अभियान शुरू होगा, वो भी चुनाव से लगभग एक साल पहले ही।

सपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किरणमय नंदा ने मनीकंट्रोल को बताया, “आई-पैक की टीम यूपी में मैदान पर काम शुरू कर चुकी है। वे विभिन्न स्तरों पर स्टेकहोल्डर्स से मिल रही है, पार्टी कार्यकर्ताओं, सामाजिक समूहों और स्थानीय प्रभावशाली लोगों से बात कर रही है तथा जिला-वार राजनीतिक हकीकत का मानचित्रण कर रही है। वे जिला और बूथ स्तर पर अभियान को बेहतर बनाने, आउटरीच प्लान सुझाने, स्पष्ट मैसेजिंग और रोजमर्रा के मुद्दों से जुड़े आकर्षक नारे गढ़ने में मदद करेंगी। फोकस अंतिम मतदाता तक पार्टी का संदेश पहुंचाने और चुनाव से बहुत पहले मजबूत ग्राउंड कनेक्ट बनाने पर है।”

यह स्पष्ट है कि अखिलेश अब पारंपरिक ‘सड़क पर उतरकर’ अभियान के साथ-साथ डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल नैरेटिव और पेशेवर माइक्रो-मैनेजमेंट पर भरोसा कर रहे हैं। पार्टी सूत्रों में हजार करोड़ रुपये तक के खर्च की चर्चा है, हालाँकि खर्चे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई।

पीके और I-पैक, अब बैकडोर गुरु की रणनीति पर भरोसा

प्रशांत किशोर ने आई-पैक की स्थापना की थी। अब यह प्रतीक जैन के नेतृत्व में है। पीके खुद जन सुराज पार्टी के जरिए 2025 बिहार चुनाव में उतरे, लेकिन शून्य सीटें मिलीं, ये उनकी अब तक की सबसे बड़ी असफलता है। इसी चुनाव में उन्होंने जेडीयू को 25 से कम सीटें देने का दावा किया, लेकिन जेडीयू ने 85 सीटें जीत ली। ऐसे में उनका हालिया प्रदर्शन बेहद खराब ही कहा जाएगा और फिर बात करें यूपी में उनके अतीत के काम की, तो वो भी फेल ही रही है।

दरअसल, यूपी 2017 में कॉन्ग्रेस के लिए दिया उनका ’27 साल यूपी बेहाल’ नारा विफल रहा। तब आई-पैक और सपा की टीमें जगन्नाथ मिश्र ट्रस्ट बिल्डिंग में साथ बैठती थीं, लेकिन गठबंधन के बावजूद सपा 47 और कॉन्ग्रेस 7 सीटों पर सिमट गई थी।

लेकिन जानकारों का कहना है कि अब पीके सामने से काम करने की जगह बैकडोर से काम करेंगे। वे खुलकर नहीं आएँगे, लेकिन रणनीति, नैरेटिव, स्लोगन और बूथ-लेवल माइक्रो-मैनेजमेंट सिखाएँगे। जिसमें वो अखिलेश को सोशल मीडिया से परे, डेटा-ड्रिवन टारगेटिंग, स्विंग एरिया आइडेंटिफिकेशन और मुद्दों (बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था) पर नैरेटिव सेट करने का ‘नया ककहरा’ सिखाएँगे। वैसे, खुद पीके बिहार चुनाव के समय कह चुके हैं कि वो ‘सलाह’ देने के बदले करोड़ों रुपए लेते हैं, वही पैसे वो बिहार में खर्च कर रहे हैं।

पार्टी के अंदर असमंजस और चुनौतियाँ

पीके और आईपैक के समाजवादी पार्टी से जुड़ने की खबरों से पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष स्पष्ट है। हजारों कार्यकर्ता जो रैलियाँ, बैठकें और बूथ संभालते आए हैं, अब वो ‘पेड टीम’ के सामने ‘सेकेंडरी’ महसूस कर रहे हैं। ऐसे में भारी बजट (अटकलें हजार करोड़ की) और आकर्षक पैकेज वाले एक्सपर्ट्स से ‘अंदरखाने’ बेचैनी बढ़ी है।

अखिलेश का यह कदम साहसी है, लेकिन जोखिम भरा भी है। पारंपरिक अनुभव और परिवारिक नेतृत्व को दरकिनार कर पीके को ‘गुरु’ बनाना सपा को नई ऊँचाई दे सकता है या गहरी दरार, ये एक बड़ा सवाल है। ऐसे में साल 2027 के विधानसभा चुनाव के नतीजे तय करेंगे कि बैकडोर गुरु का ‘ककहरा’ सपा को सत्ता दिला पाएगी या ये भी सिर्फ एक प्रयोग साबित होगा।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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