गुजरात के 2016 के चर्चित ऊना कांड में पाँच आरोपितों को दोषी ठहराया गया और उन्हें पाँच साल कारावास की सजा सुनाई गई। कोर्ट ने सबूतों के अभाव में 35 आरोपितों को बरी कर दिया। गिर सोमनाथ जिला न्यायालय ने मंगलवार (17 मार्च 2016) को ये फैसला सुनाया।
इस मामले में कुल 41 आरोपित थे। इनमें से एक की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई। कोर्ट ने पाँच को दोषी पाया गया। इनमें से चार दोषियों ने मुकदमे के दौरान ही पाँच साल से अधिक की सजा काट ली है, जबकि एक दोषी ने चार साल और दो महीने की सजा काटी है।
कोर्ट के फैसले के मुताबिक, 4 दोषियों को जेल से रिहा कर दिया जाएगा और एक को शेष 10 महीनें की सजा पूरी करने के लिए जेल में रहना होगा। कोर्ट ने पाँच व्यक्तियों को IPC की धारा 323 (जानबूझकर चोट पहुँचाना), 324 (हथियार के प्रयोग से चोट पहुँचाना), 342 (अवैध कारावास), 504 (जानबूझकर अपमान करना) और SC/ST अधिनियम की धारा 3(1), (घ), 3(1)(ङ), (आर), (एस), (यू) के तहत दोषी ठहराया।
आरोपितों को दंगा, हत्या के प्रयास, आपराधिक साजिश और महिला अपमान जैसे गंभीर आरोपों से बरी कर दिया गया था, क्योंकि ये आरोप सिद्ध नहीं हुए। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 35 आरोपितों के मुकदमे के दौरान कोई स्पष्ट भूमिका सामने नहीं आई। गवाहों के बयान भी विरोधाभाषी थे, इसलिए सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया गया। कोर्ट ने दोषियों की सजा कैसे निर्धारित की और आरोपों की पुष्टि तथा बरी करने के कारणों को भी विस्तार से बताया।
आइए विस्तार से समझते हैं कि कोर्ट ने फैसले में क्या कहा, उसे किन आरोपों के तहत दोषी ठहराया गया और संगीन आरोप क्यों हटा दिए गए।
घटना घटी, लेकिन पाँच को छोड़कर बाकी आरोपितों की भूमिका स्पष्ट नहीं – कोर्ट
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि घटना घटी थी। 11 जुलाई 2016 को ऊना के मोटा समाधियाला गाँव में दलित समुदाय के कुछ लोग एक मृत गाय की खाल उतार रहे थे, तभी कुछ आरोपित वहाँ पहुँचे और उनकी बेरहमी से पिटाई कर दी।
इसके बाद पीड़ितों को जबरन एक कार में बैठाकर ले जाया गया, सार्वजनिक रूप से कार से बाँधकर उनके कपड़े उतार दिए गए, उन्हें पीटा गया और घुमाया गया। अंत में उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया।
घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिससे गुजरात ही नहीं बल्कि पूरे देश में आक्रोश फैल गया। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए, दलित संगठनों ने धरना दिया और राजनीतिक नेताओं ने ऊना का दौरा शुरू कर दिया।
इस मामले को जिग्नेश मेवाणी और उनके साथियों ने भी जोर-शोर से उठाया और विभिन्न जगहों पर रैलियाँ कीं। बाद में पीड़ित वशराम सरवैया की शिकायत पर स्थानीय पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया।
जाँच के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों पर लापरवाही और जानबूझकर अनदेखी करने के आरोप लगे, जिसके चलते स्थानीय पुलिस निरीक्षक समेत चार कर्मचारियों को भी आरोपित बनाया गया। सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते जाँच के लिए उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया।
वर्ष 2018 में यह केस गिर सोमनाथ जिला न्यायालय में ट्रांसफर कर दिया गया, जहाँ करीब आठ साल तक सुनवाई चली और अंततः 16 मार्च 2026 को कोर्ट ने फैसला सुनाया।
कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह स्पष्ट रूप से साबित हो गया है कि पाँचों दोषियों ने पीड़ितों की पिटाई की और जाति के आधार पर उनका अपमान किया। हालाँकि, यह साबित नहीं हो सका कि सभी 41 आरोपितों ने पहले से कोई साजिश रची थी या एक ही मकसद से अलग-अलग जगहों पर दंगा भड़काने के इरादे से यह घटना की गई थी।
इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि दोषियों के खिलाफ लगाए गए कुछ गंभीर आरोप, जैसे हत्या के प्रयास आदि, सबूतों के अभाव में साबित नहीं हो पाए, इसलिए इन आरोपों को हटा दिया गया।
IPS की धारा 307 (हत्या के प्रयास) को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों को चोटें जरूर आई थीं, लेकिन वे इतनी गंभीर नहीं थीं कि उनसे मौत हो सकती थी। कोर्ट में उन डॉक्टरों के बयान दर्ज किए गए थे, जिन्होंने पीड़ितों का इलाज किया था। डॉक्टरों ने बताया कि पीड़ितों को पाइप और लाठियों से पिटाई के कारण चोटें आई थीं, लेकिन वे जानलेवा नहीं थीं और किसी को भी फ्रैक्चर नहीं हुआ था।
क्यों हटाए गए ‘हत्या की कोशिश’ जैसे गंभीर आरोप
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी बताया कि शिकायतकर्ता वशराम सरवैया समेत चार लोगों को पहले ऊना अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उन्हें जूनागढ़ रेफर किया गया, लेकिन वे वहाँ न जाकर राजकोट अस्पताल पहुँचे।
बाद में वहाँ से छुट्टी मिलने के बाद अगले दिन उन्हें अहमदाबाद सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों के बयानों के आधार पर कोर्ट ने कहा कि चारों में से किसी के शरीर पर ऐसी कोई गंभीर चोट नहीं थी, जिससे मौत हो सकती हो।
कोर्ट ने आगे कहा कि राजकोट और अहमदाबाद के अस्पतालों में इलाज को लेकर जो बातें कही गईं, उनमें ठोस तथ्य नजर नहीं आते। फैसले में यह भी उल्लेख किया गया कि ऐसा प्रतीत होता है कि घायलों को इलाज के नाम पर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि उस समय आरोपित न्यायिक हिरासत में थे और जमानत याचिका पर सुनवाई चल रही थी।
कोर्ट के अनुसार, संभव है कि कानूनी सलाह के बाद घायलों ने करीब 20 दिनों तक अस्पताल में रहकर यह दिखाने की कोशिश की कि वे गंभीर रूप से घायल हैं, जिससे समाज में चल रहे आंदोलन और प्रदर्शनों को बल मिल सके।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि अहमदाबाद सिविल अस्पताल में भर्ती होने के पीछे असली मकसद इलाज कराना नहीं लगता, बल्कि इसका उद्देश्य कुछ और हो सकता है। पीड़ितों ने जिस शारीरिक परेशानी की बात कही थी, वह जाँच में सही नहीं पाई गई।
कोर्ट ने माना कि आरोपितों ने हमले के दौरान हथियारों का इस्तेमाल किया था, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि उस समय बॉम्बे पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत कोई अधिसूचना लागू थी।
इसी कारण से कोर्ट ने इस धारा को हटा दिया। हालाँकि, यह साबित हो गया कि पीड़ितों को कुछ चोटें घातक हथियारों से लगी थीं, इसलिए कोर्ट ने IPC की धारा 324 (हथियार से चोट पहुँचाना) लागू की। साथ ही, चूँकि कुछ चोटें बिना हथियार के भी लगी थीं, इसलिए IPC की धारा 323 (साधारण चोट पहुँचाना) भी आरोपितों पर लागू की गई।
महिलाओं का अपमान करने वाली धारा क्यों हटाई गई?
शिकायत में दलित परिवार की एक महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपित ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर उसका अपमान किया। इसके आधार पर FIR में IPC की धारा 354 जोड़ी गई थी। हालाँकि, मुकदमे के दौरान इस आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत सामने नहीं आए, इसलिए कोर्ट ने इस धारा को हटा दिया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि घटना के समय शिकायतकर्ता महिला के साथ एक अन्य महिला भी मौजूद थी, लेकिन उसने अपने बयान में ऐसे किसी दुर्व्यवहार का जिक्र नहीं किया। वहीं, महिला के बेटों और पति ने इस संबंध में आरोप लगाए, लेकिन कोर्ट ने माना कि संभव है आरोपों को अधिक गंभीर दिखाने के लिए ऐसा कहा गया हो।
इन्हीं कारणों के चलते कोर्ट ने SC/ST अधिनियम की धारा 3(1)(डब्ल्यू)(1)(2) के साथ-साथ IPC की धारा 354 और 509 को भी निरस्त कर दिया।
दंगे से संबंधित धारा हटाने को लेकर कोर्ट ने क्या कहा
कोर्ट ने IPC की धारा 146 और 147 (दंगा) को भी खारिज कर दिया। इन धाराओं के तहत अगर कोई भीड़ एक समान उद्देश्य से हिंसा करती है, तो उसमें शामिल हर व्यक्ति को दोषी माना जाता है।
लेकिन कोर्ट ने कहा कि भले ही भीड़ में से कुछ लोगों ने पीड़ितों की पिटाई की, यह साबित नहीं हो सका कि सभी 41 लोगों का एक जैसा इरादा था, जैसे मारपीट करना, सार्वजनिक रूप से अपमानित करना और उन्हें अर्धनग्न हालत में घुमाना।
कोर्ट ने यह भी बताया कि घटना के दौरान पहले चार लोग पहुँचे थे और बाद में अन्य लोग मोटरसाइकिल से वहाँ आए। यह भी सामने आया कि जीवित गायों के हत्या की खबर फैलने के बाद भीड़ जमा हुई थी और कुछ लोग जुलूस के रूप में इकट्ठा हुए थे। ऐसे में यह साबित नहीं होता कि वहाँ मौजूद सभी लोगों का मकसद दंगा करना ही था।
इसके अलावा, IPC की धारा 505(1)(ख) के तहत जनशांति भंग करने या लोगों में डर फैलाने के इरादे से किया गया कृत्य अपराध माना जाता है। इस पर कोर्ट ने कहा कि यह माना जा सकता है कि आरोपितों का इरादा गौहत्या जैसे कृत्य करने वालों में डर पैदा करना था।
लेकिन यह साबित नहीं हुआ कि उन्होंने व्यापक स्तर पर जनशांति भंग करने या अलग-अलग जगहों पर दंगे भड़काने के उद्देश्य से यह काम किया। चूँकि अभियोजन पक्ष इस संबंध में ठोस सबूत पेश नहीं कर सका, इसलिए कोर्ट ने इस धारा को भी हटा दिया।
पुलिस को क्लीन चिट मिल गई
इस मामले में पुलिस पर लापरवाही और पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिसके चलते चार पुलिस अधिकारियों को भी आरोपित बनाया गया था। पीड़ितों ने आरोप लगाया था कि पुलिस निरीक्षक और अन्य कर्मचारियों ने राजनीतिक प्रभाव में आकर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और ऐसा काम किया जिससे शिकायतकर्ता को नुकसान और आरोपित को फायदा हुआ।
हालाँकि, कोर्ट ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर पाया कि यह साबित नहीं हो सका कि किसी भी पुलिसकर्मी ने जानबूझकर अपने कानूनी कर्तव्यों की अनदेखी की या किसी को नुकसान पहुँचाने के इरादे से काम किया। साथ ही, यह भी सिद्ध नहीं हुआ कि उन्होंने फर्जी दस्तावेज तैयार किए थे, इसलिए कोर्ट ने IPC की धारा 466 और 177 को हटा दिया।
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि घटना के करीब दस दिन बाद, जब पीड़ितों से जाति के नेताओं, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों और उनके वकीलों ने मुलाकात की, तब पुलिस के सामने दिए गए बयानों में कई नए और अतिरिक्त आरोप जोड़े गए।
इनके आधार पर पहली बार यह कहा गया कि पुलिस ने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया या लापरवाही बरती। इसके बाद सरकार ने मामले की जाँच स्थानीय पुलिस से लेकर DSP को सौंप दी, जिन्होंने अपनी जाँच में निष्कर्ष निकाला कि पुलिसकर्मियों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है और न ही उन्होंने अपने कर्तव्यों में लापरवाही बरती या रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की।
इन्हीं आधारों पर कोर्ट ने IPC की धारा 166A, 167, 177, 204, 294(B), 466 और SC/ST अधिनियम की धारा 3(2)(6) व 3(2)(7) के तहत पुलिस अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर दिया और माना कि अभियोजन पक्ष इन आरोपों को साबित करने में असफल रहा।
41 आरोपितों में से 5 दोषी पाए गए
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पूरे मामले में केवल पाँच आरोपितों की ही सक्रिय भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आई है। इन पाँचों के खिलाफ यह साबित हुआ कि उन्होंने पीड़ितों की पिटाई की, उन्हें अधनंगा किया और जातिसूचक शब्दों से उनका अपमान किया।
इसी आधार पर कोर्ट ने उन्हें IPS और अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया। वहीं, बाकी आरोपितों की भूमिका स्पष्ट नहीं हो सकी और उनके खिलाफ अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया, इसलिए उन्हें बरी कर दिया गया।
सजा सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि दोषियों ने दलित समुदाय के लोगों के साथ गंभीर और अमानवीय अत्याचार किया है, जिससे न केवल पीड़ितों बल्कि समाज के अन्य लोगों को भी मानसिक आघात पहुँचा है।
इसी को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने आरोपितों पर किसी तरह की नरमी नहीं दिखाई और अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम के तहत अधिकतम पाँच साल की सजा सुनाई।
पीड़ित ने अपने समाज की स्थिति को समझने की कोशिश नहीं की- कोर्ट
कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि शिकायतकर्ताओं द्वारा कुछ परिस्थितियों को अलग तरीके से पेश किए जाने से दलित समुदाय में गहरा आक्रोश और पीड़ा पैदा हुई, जिसके गंभीर परिणाम सामने आए।
कोर्ट ने उल्लेख किया कि शिकायतकर्ता के पिता स्वयं एम्बुलेंस से इलाज के लिए गिरगधा अस्पताल गए थे, लेकिन बाद में दिए गए बयान में उन्होंने कहा कि वे बेहोश हो गए थे और सरकारी अस्पताल में होश में आए, जबकि ऐसा वास्तव में नहीं हुआ था।
कोर्ट ने आगे कहा कि शिकायतकर्ता और उसके भाई की हालत बहुत गंभीर नहीं थी, फिर भी समाज में यह दिखाने की कोशिश की गई कि उनकी स्थिति बेहद नाजुक है और उनकी मृत्यु हो सकती है।
फैसले में यह भी कहा गया कि ठीक होने के बावजूद उन्हें जानबूझकर अहमदाबाद के अस्पताल में भर्ती कराया गया और स्थिति को ज्यादा गंभीर दिखाने के लिए विभिन्न तरीकों से दुष्प्रचार किया गया।
कोर्ट के अनुसार, इन घटनाओं का असर इतना गहरा था कि दलित समुदाय में भावनात्मक उबाल आ गया और 23 लोगों ने जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की, जिनमें से एक व्यक्ति की मौत भी हो गई।
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ताओं के इस व्यवहार से समुदाय के लोग भावुक हुए और आत्मघाती कदम उठाने के लिए प्रेरित हुए। इससे एक परिवार को अपने सदस्य की मौत का दुख झेलना पड़ा और इसके बाद अन्य अपराध भी सामने आए। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि इस पूरे घटनाक्रम से ऐसा लगता है कि पीड़ित पक्ष ने समुदाय के अन्य लोगों के दर्द को समझने का प्रयास नहीं किया।
मुकदमे में देरी के लिए दिए गए तर्क भी खारिज कर दिए गए
कोर्ट ने मुकदमे में देरी के आरोपों को भी खारिज कर दिया। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने स्वयं 12 अक्टूबर 2023 को साक्ष्य पेश किए थे और एक अन्य गवाह ने जनवरी 2026 में बयान दिया था, इसके बावजूद शिकायतकर्ता द्वारा विभिन्न मंचों और मीडिया में यह प्रचारित किया गया कि इतने वर्षों के बाद भी उसे न्याय नहीं मिला।
कोर्ट ने माना कि इस तरह के बयानों से न्यायालय की छवि को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की गई। फैसले में देरी के लिए केवल न्यायिक प्रक्रिया को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


