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1971 में पाकिस्तानी फौज ने चुन-चुनकर मारे हिंदू, अमेरिकी संसद में ‘बांग्लादेश’ के नरसंहार पर आया प्रस्ताव: जानें- क्या हैं माँग

अमेरिकी संसद 'सीनेट' में 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी फौज द्वारा की गई हत्याओं को नरसंहार के रूप में मान्यता देने को लेकर प्रस्ताव पेश किया गया है। इसमें पाकिस्तान का साथ देने के लिए इस्लामी कट्टरपंथी राजनीतिक संगठन 'जमात-ए-इस्लामी' को कठघरे में लाने की बात कही गई।

अमेरिकी संसद ‘सीनेट’ में 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी फौज द्वारा की गई हत्याओं को नरसंहार के रूप में मान्यता देने को लेकर प्रस्ताव पेश किया गया है। शुक्रवार (20 मार्च 2026) को अमेरिकी कॉन्ग्रेस के सांसद ग्रेग लैंड्समैन ने निचले सदन में यह प्रस्ताव पेश किया, जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान का यह ऑपरेशन संयुक्त राष्ट्र (UN) की नरसंहार की परिभाषा को पूरा करता है।

लैंड्समैन ने पाकिस्तान का साथ देने के लिए इस्लामी कट्टरपंथी राजनीतिक संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ को कठघरे में लाने की बात कही। सांसद ने यह भी कहा कि अमेरिका को बहुत पहले ही इसे नरसंहार घोषित कर देना चाहिए था।

उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी माँग की। प्रस्ताव में कहा गया है कि 25 मार्च 1971 को घोषित ऑपरेशन सर्चलाइट के दौरान पागकिस्तानी फौज और उनके इस्लामी सहयोगियों ने अत्याचार किए। उस समय सभी धर्मों के बंगाली मूल के लोगों को हमलों में निशाना बनाया गया था। हिंदुओं का सफाया किया गया और उनका नरसंहार किया गया।

प्रस्ताव में क्या कहा गया?

अमेरिकी संसद में पेश किए गए प्रस्ताव में 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को इतिहास की दर्दनाक घटनाओं में से एक बताया है, जिसे न्याय और वैश्विक मान्यता नहीं मिल सकी है। इस प्रस्ताव में उस दौर की घटनाओं को याद करते हुए न सिर्फ नरसंहार के रूप में पहचान देने की बात कही गई है, बल्कि बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है।

प्रस्ताव में कहा गया कि इस दौरान पश्चिम पाकिस्तान की सरकार में पंजाबी नेताओं की संख्या अधिक थी, जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) को नजरअंदाज किया। पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों को कमतर समझा गया।

ऑपरेशन सर्चलाइट और नरसंहार की शुरुआत

1970 के चुनाव में शेख मुजिबुर रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग को बहुमत हासिल होने के बाद भी हालात नहीं सुधरे। रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान को अधिक स्वायत्तता देने का वादा किया था, लेकिन पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आगा मोहम्मद याह्या खान, जुलफिकर अली भुट्टो के साथ उनकी बातचीत विफल हो गई और 25 मार्च 1971 की रात पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।

इसके बाद ही जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा से प्रेरित इस्लामी समूहों के साथ मिलकर पाकिस्तानी फौज ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ नाम से पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की। इस दौरान आम नागरिकों का नरसंहार किया गया।

प्रस्ताव में माना गया कि इस नरसंहार का एक बेहद दर्दनाक पहलू महिलाओं के साथ हुई हिंसा है। अनुमान है कि 2 लाख से अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। सामाजिक कलंक के कारण असली संख्या शायद कभी सामने नहीं आ पाएगी और कई पीड़ितों की पहचान इतिहास में दर्ज नहीं हो सकी।

हिंदुओं को बनाया गया निशाना

प्रस्ताव में कहा गया कि नरसंहार में विशेष तौर पर हिंदुओं को निशाना बनाया गया। 28 मार्च 1971 को ढाका में अमेरिकी कौंसुल जनरल आर्चर ब्लड ने वॉशिंगटन को भेजे संदेश में इसे ‘चयनात्मक नरसंहार’ बताया और कहा कि पाकिस्तानी फौज के समर्थन से गैर-बंगाली मुस्लिम समूह गरीब इलाकों में बंगालियों और हिंदुओं पर हमले कर रहे हैं। 6 अप्रैल 1971 को भेजे गए ‘ब्लड टेलीग्राम’ में अमेरिकी अधिकारियों ने अपनी सरकार की चुप्पी पर आपत्ति जताई और इस स्थिति को नरसंहार बताया। 8 अप्रैल के एक अन्य संदेश में ब्लड ने साफ कहा कि हिंदुओं को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है।

अमेरिकी सीनेटर एडवर्ड एम. केनेडी की अध्यक्षता वाली समिति ने 1 नवंबर 1971 को अपनी रिपोर्ट में कहा कि 25 मार्च 1971 से पाकिस्तानी फौज ने सुनियोजित आतंकी अभियान चलाया, जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान हिंदू समुदाय को हुआ। उनकी जमीनें छीनी गईं, उन्हें चिन्हित कर मार डाला गया और यह सब इस्लामाबाद से लागू मार्शल लॉ के तहत किया गया। 1972 में इंटरनेशनल कमीशन ऑफ जूरिस्ट्स की एक रिपोर्ट में भी कहा गया कि हिंदुओं को सिर्फ उनके धर्म के कारण मारा गया और उनके गाँव तबाह कर दिए गए।

प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र (UN) का रुख भी साफ किया कि UN ने नरसंहार रोकथाम और सजा संबंधी कन्वेंशन के अनुसार, किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूरी तरह या आंशिक रूप से खत्म करने की मंशा से किए गए कृत्य नरसंहार माने जाते हैं।

प्रस्ताव में क्या है माँगें?

प्रस्ताव में कहा गया है कि संसद का निचला सदन 25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सुरक्षाबलों द्वारा बांग्लादेश के लोगों पर किए गए अत्याचारों की कड़ी निंदा करता है। इसमें माना गया है कि पाकिस्तानी फौज और उसके इस्लामी सहयोगियों ने बिना भेदभाव के बंगाली लोगों की बड़े पैमाने पर हत्या की, चाहे उनका धर्म या लिंग कुछ भी हो।

उन्होंने राजनीतिक नेताओं, बुद्धिजीवियों, पेशेवरों और छात्रों को मार डाला और हजारों महिलाओं को जबरन यौन दासी बनाया। खासतौर पर हिंदू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए उनके खिलाफ नरसंहार, सामूहिक बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन और उन्हें उनके घरों से निकालने जैसे अत्याचार किए गए।

प्रस्ताव में यह भी स्वीकार किया गया कि किसी भी पूरे समुदाय या धार्मिक समूह को कुछ लोगों के अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। प्रस्ताव में अपील की गई कि वे 1971 में पाकिस्तानी फौज और उसके सहयोगी जमात-ए-इस्लामी द्वारा बंगाली हिंदुओं के खिलाफ किए गए इन अत्याचारों को मानवता के खिलाफ अपराध, युद्ध अपराध और नरसंहार के रूप में मान्यता दें।

प्रस्ताव पास होने का माफी माँगेगा पाकिस्तान?

अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता है तो सबसे पहले पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा। अमेरिकी संसद का यह कदम भले की प्रतीकात्मक हो, लेकिन इससे दुनिया भर में 1971 की घटनाओं को नरसंहार के रूप में देखने की सोच मजबूत होगी। इसके बाद पाकिस्तान को अमेरिकी अधिकारियों से मानवाधिकार से जुड़े सवालों का सामना करना पड़ेगा।

इससे दोनों देशों के बीच बातचीत में यह मुद्दा बार-बार उठेगा और रिश्तों में तनाव आएगा। साथ ही बांग्लादेश और हिंदू समुदाय की आवाज भी मजबूत होगी, जिससे वैश्विक मीडिया में पाकिस्तान की छवि खराब हो सकती है।

इसके अलावा अमेरिका की विदेश नीति में पाकिस्तान को लेकर ज्यादा सावधानी बरती जाएगी। इससे आर्थिक मदद और सैन्य सहयोग जैसे मुद्दों पर बहस तेज हो सकती है। आगे चलकर यह प्रस्ताव दूसरे देशों को भी प्रेरित कर सकता है, जैसे यूरोपीय संघ और कनाडा, जहाँ ऐसे ही प्रस्ताव लाए जा सकते हैं। इससे पाकिस्तान पर माफी माँगने या जवाब देने का दबाव बढ़ेगा। कुल मिलाकर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान होगा और भविष्य में होने वाले समझौतों में यह पुराना मुद्दा परेशानी खड़ी कर सकता है।

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