ब्रिटेन के अखबार ‘द गार्जियन’ ने एक रिपोर्ट छापी, जिसमें न्यू जर्सी में बने BAPS स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर के निर्माण को लेकर पुराने आरोपों को दोबारा उठाया गया। इस रिपोर्ट के सामने आते ही फिर से बहस शुरू हो गई है, जबकि अमेरिका की अदालत ने इस पूरे मामले की सितंबर 2025 में ही गहराई से जाँच कर ली थी और उसमें किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं पाई गई थी।
द गार्जियन ने अपनी रिपोर्ट मे दावा किया कि मंदिर के निर्माण के दौरान मजदूरों के साथ गलत व्यवहार हुआ और चिकित्सा पहुँचाने में लापरवाही भी बरती गई। लेकिन सच यह है कि ये वही आरोप हैं, जिनकी जाँच अमेरिकी एजेंसियाँ पहले ही कर चुकी हैं और उन्हें खारिज भी कर चुकी हैं।

दुनिया भर के स्वयंसेवकों ने बनाया एक भव्य मंदिर
न्यू जर्सी के रॉबिन्सविल में बना BAPS स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर माना जाता है। साल 2023 में बना यह भव्य मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना की जगह नहीं है, बल्कि दुनियाभर के हिंदू श्रद्धालुओं की आस्था और गर्व का प्रतीक भी है।
इस मंदिर की सबसे खास बात है कि इसके निर्माण में लोगों की बड़े स्तर पर भागीदारी। करीब 12 साल में उत्तर अमेरिका और दूसरे देशों से आए 12,500 से ज्यादा स्वयंसेवकों ने मिलकर इसे बनाया। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई लोगों का निर्माण कार्य से कोई प्रोफेशनल अनुभव भी नहीं था। लेकिन मंदिर प्रशासन हमेशा से यह कहता आया है कि यह काम उन्होंने ‘सेवा’ यानी श्रद्धा और भक्ति के भाव से किया।
मंदिर की खूबसूरत नक्काशी, हाथ से तराशे गए पत्थर और इसका विशार परिसर इसे खास बनाते हैं। खुलने के बाद से ही यह जगह न सिर्फ धार्मिक बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी लोगों के लिए बड़ा आकर्षण बन गई है।
द गार्जियन के दोबारा मढ़े गए आरोप
अपनी रिपोर्ट में द गार्जियन ने दावा किया कि इस भव्य मंदिर की चमक-दमक के पीछे एक ‘अँधेरी कहानी’ भी छिपी हुई है, जिसमें मजदूरों के शोषण जैसे आरोप शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2015 से 2023 के बीच मंदिर निर्माण के दौरान मजदूरों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा, जैसे कि उनके साथ ‘गलत व्यवहार, वीजा से जुड़े गड़बड़झाले और इलाज में लापरवाही।’
रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि कुछ मजदूरों का मानना है कि कम से कम दो मजदूर रमेश मीणा और देवी लाल की मौत सिलिकोसिस नाम की फेफडो़ं की बीमारी से हुई। यह बीमारी पत्थर की नक्काशी के दौरान उठने वाली बारीक धूल को साँस के जरिए भीतर लेने से होती है। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी जिक्र है कि कई मजदूर टीबी और क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस जैसी साँस से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे।
कुछ गुमनाम मजदूरों के हवाले से रिपोर्ट में काम करने की कठिन परिस्थितियों का भी जिक्र किया गया है। दावा किया गया है कि उनसे हफ्ते में 90 घंटे तक काम करवाया जाता था और उन्हें करीब 1.20 डॉलर प्रति घंटे यानी लगभग ₹112 के हिसाब से बेहद कम मजदूरी दी जाती थी। इतनी ही नहीं, यह भी कहा गया कि मजदूरों के पासपोर्ट अपने पास रख लिए जाते थे और उन्हें अपने परिवार से संपर्क करने की भी ज्यादा आजादी नहीं दी जाती थी।
रिपोर्ट में सुरक्षा इंतजामों को लेकर भी कई आरोप लगाए गए हैं, जिनमें कहा गया है कि मजदूरों को सही सेफ्टी इक्विपमेंट नहीं दिए गए। इसमें यह दावा भी किया गया कि धूल भरे माहौल में काम करते समय कुछ मजदूर N95 मास्क की जगह सिर्फ कपड़े या साधारण सर्जिकल मास्क का इस्तेमाल कर रहे थे। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मेडिकल सुविधाएँ ठीक नहीं थीं और मजदूरों को बाहर जाकर इलाज कराने से हतोत्साहित किया जाता था।
आर्टिकल में एक और बड़ा दावा यह किया गया कि करीब 200 दलित मजदूरों को राजस्थान से न्यू जर्सी मंदिर निर्माण के लिए लाया गया था, जो भारत की सामाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर माने जाते हैं। दलित समुदाय ऐतिहासिक रूप से सामाजिक और आर्थिक तौर पर काफी हाशिए पर रहा है और अक्सर उन्हें सबसे जोखिम भरे और कम वेतन वाले काम करने पड़ते हैं। रिपोर्ट में आगे यह भी आरोप लगाया गया कि इन दलित मजदूरों को उनकी नीची जाति की वजह से मंदिर में पूजा करने की अनुमति भी नहीं नहीं दी जाती।
हालाँकि, मंदिर प्रबंधन ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्होंने हर काम कानून और धार्मिक परंपराओं के मुताबिक ही किया है। साथ ही उन्होंने अमेरिका के एक कानूनी प्रावधान ‘मिनिस्ट्रियल एक्सेप्शन’ का भी हवाला दिया, जिसके तहत धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक कामकाज और भूमिकाओं में बाहरी दखल से सुरक्षा मिलती है।
BAPS संस्था ने शुरू से ही इन आरोपों को गलत बताया है। उनका कहना है कि जो लोग मंदिर के निर्माण में लगे थे, वे मजदूर नहीं बल्कि स्वयंसेवक थे, जो ‘सेवा’ यानी धार्मिक भावना से काम कर रहे थे। संस्था के नेताओं का कहना है कि कारीगरों ने यह काम अपनी आस्था और परंपरा से प्रेरित होकर किया, न कि किसी दबाव या मजबूरी में। उन्होंने यह भी बताया कि केस में शामिल कुछ लोगों ने बाद में खुद ही मुकदमा छोड़ दिया था और कहा था कि उन्हें इसमें शामिल होने के लिए गुमराह किया गया था।
इन सब सफाईयों के बावजूद द गार्जियन की इस नई रिपोर्ट ने एक बार फिर उन्हीं पुराने आरोपों को हवा दे दी है, जो पहले ही लंबे समय तक कानूनी और मीडिया बहस का हिस्सा रह चुके हैं।
अमेरिकी एजेंसियाँ पहले ही बंद कर चुकी हैं मामला
यह नया विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिकी एजेंसियाँ इस पूरे मामले की पहली ही विस्तार से जाँच कर चुकी हैं और केस को बंद भी कर चुकी हैं। पिछले साल 18 सितंबर 2025 को अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट (DOJ) और न्यू जर्सी के US अटॉर्नी ऑफिस में ने मंदिर निर्माण से जुड़ी जाँच को आधिकारिक तौर पर खत्म कर दिया था।
DOJ ने इस मामले की जाँच कई पूर्व मजदूरों के आरोपों के आधार पर की थी। उनका कहना था कि उन्हें भारत से धार्मिक वीजा पर लाया गया, उनसे मंदिर निर्माण में लंबे समय तक काम कराया गया और उन्हें सिर्फ करीब ₹112 प्रति घंटे की बेहद कम मजदूरी दी गई।
इस सिविल केस में शामिल कई लोग भारत के दलित समुदाय से थे, जिन्हें सामाजिक रूप से पिछड़ा माना जाता है। इन लोगों ने मई 2021 में शिकायत दर्ज कराई थी, उसी दिन जब फेडरल एजेंसियों ने रॉबिन्सविल स्थित मंदिर परिसर पर छापा मारा था।
उस समय जारी बयानों के मुताबिक, यह जाँच करीब 4 साल तक चली और आखिर में बिना किसी आरोप तय किए ही इसे बंद कर दिया गया। इसे मंदिर बनाने वाली संस्थान, बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (BAPS) के लिए एक बड़ी राहत के तौर पर देखा गया।
इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए अबु धाबी में BAPS हिंदू मंदिर के प्रमुख स्वामी ब्रह्माविहारिदास ने इन आरोपों को सख्ती से खारिज किया और केस बंद होने का स्वागत किया था। उन्होंने कहा, ” सत्यमेव जयते! हम प्यार, आस्था, भक्ति और सेवा की भावना से मंदिर बनाते हैं… कुछ लोग अपने छोटे-छोटे स्वार्थ के लिए मंदिर निर्माण और कारीगरी को लेकर झूठे आरोप लगाते हैं।”
#WATCH | Abu Dhabi, UAE | BAPS Swaminarayan Mandir saint Swami Brahmaviharidas says, "Nobody had imagined and even historians told us that a beautiful temple in this region is unthinkable… His Holiness Pramukh Swami Maharaj, who has built over 1200 temples across the world, had… pic.twitter.com/IoFtQXbpWg
— ANI (@ANI) September 18, 2025
उन्होंने आगे कहा, “अमेरिकी सरकार ने 4 साल तक मंदिर की जाँच की और आखिर में इसे बंद कर दिया, यह कहते हुए कि कोई आरोप साबित नहीं हुआ और न ही कोई आरोप सही पाया गया। इससे न्याय व्यवस्था पर भरोसा और मजबूत होता है।”
अपने आधिकारिक बयान में BAPS ने यह भी कहा कि अमेरिकी सरकार का यह फैसला उनके लंबे समय से रखे गए रुख का ‘साफ और मजबूत संदेश’ देता है। संस्था ने मंदिर को ‘शांति, सेवा और भक्ति का स्थान’ बताया, जिसे हजारों स्वयंसेवकों की मेहनत और समर्पण से बनाया गया है। संस्था ने अपनी आध्यात्मिक सोच पर जोर देते हुए कहा कि मुश्किल हालात में भी वह ‘आस्था, सहयोग, विनम्रता और सच्चाई के प्रति प्रतिबद्धता’ बनाए रखती है।
विदेशी मीडिया में आरोपों का सिलसिला, हिंदुओं को बाँटने की कोशिश?
यह पहली बार नहीं है जब विदेशी मीडिया ने इस मंदिर को लेकर सवाल उठाए हैं। इससे पहले भी ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसे बडे़ विदेशी अखबारों में ऐसी खबरें छप चुकी हैं, जिनमें जबरन मजदूरी, जातिगत भेदभाव और खराब कामकाजी हालात जैसे आरोप लगाए गए थे।
साल 2023 में छपी एक रिपोर्ट में ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स‘ ने दावा किया था कि साल 2021 में कुछ मजदूरों की शिकायतों के बाद फेडरल एजेंसियों ने मंदिर निर्माण स्थल पर छापा मारा था। हालाँकि, बाद में कई लोगों ने यह भी बताया कि छापे और लंबी जाँच के बावजूद इस मामले में कोई आरोप साबित नहीं हुआ और न ही किसी के खिलाफ केस दर्ज किया गया।
इन रिपोर्ट्स के समय को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स का एक आर्टिकल अक्टूबर 2023 में मंदिर के भव्य उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद आया था। उस समय दुनियाभर में हिंदू समुदाय इस मंदिर के बनकर तैयार होने की खुशी मना रहा था।
मई 2021 में अमेरिका में काम कर रहे कुछ भारतीय कारीगरों ने एक मुकदमा दायर किया था, जिसमें उन्होंने मानव तस्करी और जबरन मजदूरी के आरोप लगाए थे। उनका दावा था कि उन्हें न्यू जर्सी के रॉबिन्सविल में बन रहे स्वामीनारायण मंदिर के निर्माण में बंद रखकर काम कराया गया और उन्हें सिर्फ 1 डॉलर प्रति घंटे तक की बेहद कम मजदूरी दी गई। BAPS पर यह भी आरोप लगा था कि उसने भारत से मजदूरों को लालच देकर अमेरिका बुलाया और उनसे न्यू जर्सी के अलावा अटलांटा, शिकागो, ह्यूस्टन और लॉस एंजेलिस जैसे शहरों में मंदिर निर्माण के काम करवाए, जहाँ उन्हें सिर्फ 450 डॉलर महीने दिए जाते थे।
उस समय BAPS ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि ‘सेवा’ के जरिए पूजा करना उनके धर्म में भक्ति का अहम हिस्सा है और दुनियाभर से स्वयंसेवक इसमें योगदान देते हैं। संस्था ने यह भी कहा था कि मंदिर निर्माण में शामिल ये स्वयंसेवक वहाँ आने वाले लोगों से लगातार मिलते-जुलते रहते हैं और अपने परिवार वालों से भई नियमित संपर्क में रहते हैं।
यह भी याद रखने वाली बात है कि न्यू जर्सी के इस BAPS मंदिर को द न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे वामपंथी झुकाव वाले अखबार ने भी निशाना बनाया था। अक्टूबर 2023 में छपे एक लेख में NYT ने दावा किया था, “फेडरल एजेंसियों ने 2021 में मंदिर निर्माण स्थल पर छापा मारा था, जब कुछ मजदूरों ने आरोप लगाया कि मंदिर बनाने वाली एक प्रमुख हिंदू संस्था, जिसका भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी से संबंध बताया गया, मजदूरों से जबरन काम करा रही है, कम वेतन दे रही है और काम की स्थितियाँ खराब हैं।”
आर्टिकल में आगे यह भी कहा गया था, “उनके वकीलों का कहना है कि दलित समुदाय से आने वाले मजदूरों को खास तौर पर निशाना बनाया गया। इस मामले में फेडरल स्तर पर आपराधिक जाँच चल रही है और वेतन को लेकर भी एक मुकदमा जारी है।”
हालाँकि, यह सब उस समय कहा जा रहा था, जब साल 2021 में अक्षरधाम महामंदिर के निर्माण स्थल पर पड़े छापे को दो साल बीत चुके थे और तब तक कोई भी आरोप साबित नहीं हो पाया था। जुलाई 2023 में, न्यू जर्सी के BAPS मंदिर के खिलाफ दायर केस में शामिल एक दर्जन से ज्यादा कारीगरों ने अपने नाम वापस ले लिए थे। उस समय राजस्थान हाई कोर्ट के वकील आदित्य एसबी सोनी ने भारतीय मजदूर संघ और पत्थर गढ़ाई संघ की ओर से एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा था कि कारीगरों पर दबाव बनाया गया था कि वे इस गहरी साजिश का हिस्सा बनें, जिसका मकसद इस भव्य हिंदू मंदिर के निर्माण को रोकना था।
छवि और नैरेटिव को लेकर बड़ी बहस
बार-बार सामने आ रहे इन आरोपों और उनकी कवरेज ने एक बड़ी बहस छेड़ दी है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में हिंदू संस्थाओं को किस तरह दिखाया जाता है। ऐसे कई रिपोर्ट्स पर यह सवाल उठता है कि वे सिर्फ विवादों पर ही ध्यान देती हैं और गलत या अधूरी जानकारी फैलाती हैं, जबकि अक्षरधाम जैसे प्रोजेक्ट्स में लाखों लोगों की सेवा भावना और उसकी सांस्कृतिक अहमियत को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
द गार्जियन की ताजा रिपोर्ट ने एक बार फिर न्यू जर्सी के BAPS स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर को सुर्खियों में ला दिया है। हालाँकि, इसमें जिन आरोपों का जिक्र किया गया है, वे नए नहीं हैं। इनकी पहले ही अमेरिकी एजेंसियों द्वारा कई सालों तक जाँच की जा चुकी है, जो आखिर में बिना किसी आरोप तय हुए खत्म हो गई थी।
जैसे-जैसे यह बहस आगे बढ़ रही है, यह मामला कुछ अहम सवाल भी खड़े करता है। खासतौर पर इस बात को लेकर कि जब किसी मुद्दे पर आधिकारिक जाँच हो चुकी हो, तब उसे किस तरह से दोबारा पेश किया जाता है और रिपोर्ट किया जाता है। कई लोगों के लिए यह मंदिर आज भी आस्था, एकता और सामूहिक मेहनत का प्रतीक है। वहीं कुछ लोगों के लिए यह अब भी सवालों और चर्चा का विषय बना हुआ है।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)


