महिला आरक्षण बिल पर विपक्ष का रुख विरोधाभाषी है। कॉन्ग्रेस पहले तुरंत लागू करने की माँग कर रही थी, लेकिन अब प्रोसेस से जुड़ी आपत्तियाँ उठा रही है। वहीं कई विपक्षी पार्टियाँ ‘लागू करने के समय’ पर सवाल उठा रही हैं। इसके विपरीत सरकार का कहना है कि वह सही सलाह-मशविरा करके आगे बढ़ रही है और बड़े पैमाने पर आम सहमति बनाना चाहती है।
केंद्रीय संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने 3 अप्रैल 2026 (शुक्रवार) को बताया कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण बिल पर 16 से 18 अप्रैल तक संसद के विशेष सेशन में चर्चा होगी। उन्होंने कहा, “हम 16 अप्रैल को संसद बुला रहे हैं। हम तब महिला आरक्षण बिल पर चर्चा करेंगे। महिलाओं को मजबूत बनाना हमारा वादा है। हमें महिलाओं को मजबूत बनाने के लिए एक साथ आना चाहिए, राजनीति नहीं करनी चाहिए।” इस घोषणा पर विपक्षी पार्टियों की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया आई।
विपक्ष ने चुनौती दी और सरकार ने जवाब दिया
इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस ने आदर्श आचार संहिता के संभावित उल्लंघन की शिकायत की और केंद्र पर विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगाया। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि उन्होंने 29 अप्रैल के बाद दो बार ऑल-पार्टी मीटिंग की माँग की।
उन्होंने आरोप लगाया, “हम महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं। हम इसे लाने वाले लोग हैं। यह हमारे समर्थन से ही सर्वसम्मति से बना है। ये लोग जब चाहें क्रेडिट ले लेते हैं। सब सहमत हैं, लेकिन किस समय, कैसे लाना है और कैसे करना है। इस पर राजनीति मत करो। अगर आपको यह करना ही था, तो आप इसे इस सत्र की शुरुआत में क्यों नहीं लाए? हमने तीन दिन तक ग्रामीण विकास पर चर्चा की। क्या हम इस पर चर्चा नहीं कर सकते थे? आप राज्यों में चुनाव के बाद सत्र बुलाएँ। हम सहयोग करेंगे। चुनाव से पहले क्रेडिट मत लो।”
खड़गे के सवाल का जवाब केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने दिया। उन्होंने कहा, “आप इसे 30 साल में पास नहीं कर पाए। हम पहले ही इसका क्रेडिट ले चुके हैं। आप हमेशा हर चीज को राजनीति के नजरिए से देखते हैं, इंसानियत के नजरिए से नहीं।”
राज्यसभा MP जयराम रमेश ने भी जोर देकर कहा, “खड़गे ने तब माँग की थी कि इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए। उस वक्त आपको जनगणना और परिसीमन की याद आ रही थी। लेकिन अब बगैर जनगणना के भी लागू करने में दिक्कत नहीं है। 30 महीने तक सोते रहे। इस स्पेशल सेशन का एकमात्र मकसद पॉलिटिकल फायदा उठाना और तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनावों पर असर डालना है। क्या इसे 15 दिन बाद नहीं बुलाया जा सकता था?”
हालाँकि रिजिजू ने बताया कि इस जरूरी मुद्दे पर 80% से ज्यादा पार्टियों के साथ पहले ही चर्चा हो चुकी है। इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस ने सरकार को लिखकर विधानसभा चुनावों के बाद पार्लियामेंट सेशन बुलाने के लिए कहा था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार सभी पार्टियों और सांसदों से सलाह-मशविरा कर रही है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि उन्होंने मनमाने तरीके से इसे लागू करने के लिए कदम नहीं बढ़ाया है, बल्कि आरक्षण को सर्वसम्मति से संसद की मंजूरी मिलनी चाहिए।
उन्होंने कहा, “हमारे लिए, इसका किसी खास राज्य के चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। हमें प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होगा, क्योंकि वक्त बीता जा रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी ने हमें लिखकर आग्रह किया है कि 29 अप्रैल के बाद मीटिंग बुलाएँ, हमें दिक्कत नहीं है।”
कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार के महिला आरक्षण को लेकर की जा रही कवायद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘वेपन्स ऑफ मास डायवर्जन’ का एक और हिस्सा बताया। उनका कहना है कि मोदी सरकार की विदेश नीति की नाकामियों की वजह से देश को LPG (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) और एनर्जी संकट का देश को सामना करना पड़ रहा है।”
In September 2023, the new Parliament House was inaugurated by the passage of the Nari Vandan Adhiniyam, 2023 that amended the Constitution to provide for one-third reservation of women in the Lok Sabha and Vidhan Sabhas and also provided for one-third reservation for women in…
— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) March 25, 2026
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 5 अप्रैल को कहा कि प्रस्तावित बिल का आधार ही ‘निराधार’ है, क्योंकि यह 15 साल पहले इकट्ठा किए गए डेटा पर आधारित है। उन्होंने आगे कहा कि सही प्रतिनिधित्व पाने के लिए सही आबादी का पता चलना चाहिए, जो जनगणना के आधार पर ही पता चलेगा। जब महिलाओं की जनसंख्या के लिए 2011 के पुराने आँकड़ों को आधार बनाएँगे, तो महिला आरक्षण की आधार भूमि ही गलत होगी।
उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “जब गिनती ही गलत है, तो आरक्षण सही कैसे हो सकता है? जब नेक इरादों की बात हो तो शक नहीं होना चाहिए।”
जब गिनती ही गलत होगी तो आरक्षण कैसे सही होगा।
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) April 5, 2026
अगर किसी काम को करने की सही मंशा होती है, तो शंका नहीं होती है।
दरअसल महिला आरक्षण बिल का तो आधार ही निराधार है। आरक्षण का आधार अगर कुल सीटों का 1/3 (एक तिहाई) है तो इसका मतलब हुआ कि ये गणित का विषय है और गणित का आधार अंक होते हैं,… pic.twitter.com/3I8c7lfOnQ
यादव ने कहा, “इसीलिए हमारी सबसे बड़ी आपत्ति यही है कि पहले जनगणना कराई जाए फिर महिला आरक्षण की बात उठाई जाए। जो सरकार महिलाओं को गिनना नहीं चाहती है, वो भला उन्हें आरक्षण क्या देगी। महिलाओं के साथ भाजपा और उनके संगी-साथी जो धोखा करना चाहते हैं, महिलाओं के साथ वो छलावा हम नहीं होने देंगे। कुल मिलाकर सरकार से हमारा ये कहना है कि जब तक जनगणना नहीं, तब तक महिला आरक्षण पर बहस करना नहीं!”
लोकसभा में कॉन्ग्रेस के व्हिप और तमिलनाडु के विरुधुनगर से सांसद मणिकम टैगोर ने जोर देकर कहा कि भारतीय जनता पार्टी का इरादा महिला कोटे में OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) को आरक्षण देने से मना करना है। उन्होंने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए आरोप लगाया, “क्योंकि जाति-आधारित जनगणना से OBC आबादी पर साफ डेटा मिलेगा, इससे महिला कोटे में OBC के सही प्रतिनिधित्व की माँग उठेगी। BJP का छिपा हुआ एजेंडा OBC महिलाओं को आरक्षण देने से रोकना है, इसलिए प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है।”
उन्होंने आगे कहा कि निचले सदन की सीटों में अनुमानित 50% की बढ़ोतरी से प्रतिनिधित्व में असमानता आ सकती है। इसके पीछे उनका तर्क है कि हालाँकि दक्षिणी राज्यों को ज्यादा सदस्य मिल सकते हैं, लेकिन संसद में उनकी तुलनात्मक ताकत उत्तरी राज्यों की तुलना में कम हो सकती है। खास बात यह है कि PM मोदी पहले ही भरोसा दिला चुके हैं कि आने वाले परिसीमन की प्रक्रिया में दक्षिणी राज्यों को कोई सीट नहीं गँवानी पड़ेगी।
जल्दी लागू करने की चाह से लेकर विरोध करने तक: विपक्ष के कई यू-टर्न
देश की सबसे पुरानी पार्टी की अगुवाई वाले विपक्ष ने लोगों में भय फैलाना शुरू कर दिया है कि कई राज्यों, खासकर दक्षिण, उत्तर-पूर्व और उत्तर-पश्चिम के राज्यों के परिसीमन और आरक्षण के लिए संविधान में बदलाव की कोशिश काफी ‘जल्दबाजी’ में की जा रही है। इसके ‘खतरनाक नतीजे’ सामने आ सकते हैं।
बिल का क्रेडिट लेने के लिए सत्ताधारी पार्टी पर हमला करने वाली कॉन्ग्रेस ने इसे अपना आइडिया करार दिया। पार्टी ने 2023 में इसे पास होने के तुरंत बाद लागू न करने के लिए सरकार की भी आलोचना की। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी फिलहाल सरकार पर हमला करने के लिए रणनीति बनाने में बिजी है। पार्टी कह रही है कि परिसीमन और जनगणना से पहले आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता। हालाँकि कॉन्ग्रेस पहले परिसीमन, जनगणना की बात न कर, तुरंत महिला आरक्षण लागू करने की बात कही थी।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने कहा कि बिल अगली सुबह पास हो सकता है, क्योंकि सभी पार्टियों में आम सहमति है।” आपको बस इतना बताना है कि लोकसभा और विधानसभा दोनों में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित होंगी। यह बहुत सीधा है। इसके अलावा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर BJP सच में इसके लिए कमिटेड होती, तो वे इसे लागू करते। महिलाओं को रिज़र्वेशन देने और जनगणना या डिलिमिटेशन के बीच कोई रिश्ता नहीं है। तीनों जुड़े हुए नहीं हैं।
उन्होंने परिसीमना और जनगणना के नाम पर महिला आरक्षण कानून को बेवजह 10 साल तक बढ़ाने के लिए सरकार पर आरोप लगाए। दूसरे नेताओं ने भी यही बात कही।
ऑल इंडिया महिला कॉन्ग्रेस अध्यक्ष अलका लांबा ने कहा, “हम माँग करते हैं कि हाल ही में पास हुआ महिला आरक्षण बिल 2024 के चुनाव से लागू हो। BJP सरकार ने जो भी रुकावटें डाली हैं, पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन होगा और फिर आरक्षण लागू होगा। हम चाहते हैं कि ये शर्तें हटाई जाएँ। हम चाहते हैं कि बिल तुरंत लागू हो।” उन्होंने उस समय कहा, “हम चाहते हैं कि जनगणना हो, लेकिन जनगणना को महिला रिजर्वेशन से जोड़ना अन्याय है।”
पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और सांसद सोनिया गाँधी ने कहा कि देश की महिलाएँ पिछले 13 सालों से अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों का इंतजार कर रही हैं, और सरकार उन्हें सालों इंतजार करने के लिए कह रही है। उन्होंने कहा, “वे और कितने साल यह सब सहेंगी? क्या भारतीय महिलाओं के साथ ऐसा बर्ताव सही है? कॉन्ग्रेस बिल को तुरंत लागू करने की माँग करती है।”
प्रियंका गाँधी वाड्रा ने भी इसी तरह जोर देते हुए कहा कि सरकार बिल का क्रेडिट ले रही है, लेकिन कम से कम दस साल तक इसे लागू करने का उसका कोई इरादा नहीं है। उन्होंने कहा था, “हम, भारत की महिलाओं के पास अब और समय बर्बाद करने के लिए नहीं है। राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा लेना हमारा अधिकार है। मैं माँग करती हूँ कि हमारे काम की तारीफ और सम्मान किया जाए।”
पार्टी ने कहा, “हम अपनी माँग से पीछे नहीं हटेंगे। बिल को तुरंत लागू किया जाए, जिसमें OBC महिलाओं के लिए रिज़र्वेशन का प्रावधान हो।” इस मामले में ‘मोदी सरकार को एक्सपोज करने के लिए 15 शहरों में 15 प्रेस कॉन्फ्रेंस’ करने का दावा किया।
The Congress party held 15 press conferences in 15 cities to expose the Modi govt's double standards on the women's reservation bill.
— Congress (@INCIndia) September 29, 2023
We won't back down on our demand-
Immediate implementation of the Bill, with provision for reservation for OBC women. pic.twitter.com/nhXSgwRrAG
कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि जनगणना और परिसीमन की वजह से यह बिल 2029 तक लागू नहीं होगा और यह “जुमला” 2024 के आम चुनाव में हारने के डर से दिया गया है।
दूसरी राजनीतिक पार्टियाँ भी सरकार पर ऐसे ही आरोप लगा रही थीं, उनका कहना था कि वह महिलाओं को उनका हक नहीं दे रही है। AAP के राज्यसभा सांसद और दिल्ली एक्साइज पॉलिसी स्कैम में आरोपी संजय सिंह के मुताबिक, रिज़र्वेशन एक दिखावा है, क्योंकि सरकार हमेशा अपने वादों से पीछे रही है।
उन्होंने कहा, “इस बार महिलाओं को उन्होंने गुमराह किया है। यह उनका नया जुमला है। हमें यह भी नहीं पता कि बिल पास होने में कितना समय लगेगा, या यह कभी अप्रूव होगा भी या नहीं।” AAP की एक और नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री, आतिशी मार्लेना ने इस बिल को महिलाओं को बेवकूफ बनाने का एक तरीका बताया, क्योंकि यह आरक्षण 2024 के आम चुनाव के लिए नहीं था, बल्कि यह जनगणना और डिलिमिटेशन पर निर्भर करेगा। इसलिए, यह कम से कम अगले कुछ सालों तक लागू नहीं होगा।
ऑल इंडिया तृणमूल कॉन्ग्रेस की लोकसभा सांसद महुआ मोइत्रा ने भी बिल को ‘जुमला’ बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि जनगणना और परिसीमन की तारीखें तय नहीं थीं। इसलिए बिल 2029 तक भी लागू नहीं हो सका। उन्होंने मजाक उड़ाया कि यह ‘महिला रिज़र्वेशन रीशेड्यूलिंग बिल’ है और इसका नाम उसी के अनुसार होना चाहिए।
विपक्ष हर मुद्दे पर सरकार का विरोध करती है। इस ट्रैक रिकॉर्ड के साथ विपक्ष अपनी हरकतें फिर से शुरू कर दी हैं। उन्होंने सरकार पर आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़कर महिलाओं को गुमराह करने का आरोप लगाया है। अब सरकार ने वह घोषणा कर दी है, जिसकी माँग की जा रही थी। लेकिन, अब विपक्ष को दिक्कत महसूस हो रही है। पहले तुरंत लागू करने की जिद करने वाली विपक्षी पार्टियाँ अब असेंबली इलेक्शन का रोना रो रही है।
भारत एक बहुत बड़ा देश है और हर साल अलग-अलग राज्यों में इलेक्शन होते हैं। इसलिए जरूरी फैसलों को देश के किसी हिस्से में हो रहे विधानसभा चुनाव का बंधक नहीं बनाया जा सकता। विपक्षी पार्टियाँ एक तरह ‘एक देश, एक इलेक्शन’ का विरोध करती हैं। इनका मानना है कि इससे बीजेपी को फायदा होगा। इसलिए सच में विपक्ष के पास महिला आरक्षण बिल को टालने का कोई तर्क नहीं है। सिर्फ राजनीतिक चालों के लिए विरोध हो रहा है।
(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


