गुजरात की आर्थिक राजधानी माने जाने वाला अहमदाबाद आज सिर्फ अपने विकास के लिए ही नहीं बल्कि अपने इतिहास को लेकर भी चर्चा में है। विश्व हिंदू परिषद द्वारा शहर का पुराना नाम ‘कर्णावती’ वापस करने की माँग के बाद अब इसकी प्राचीन पहचान, संस्कृति और इतिहास को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
खास तौर पर सुल्तान अहमद शाह के समय हुए बदलावों और शहर की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान में आए परिवर्तन पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी संदर्भ में कर्णावती की नगरदेवी माता भद्रकाली से जुड़ा इतिहास एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कई ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि अहमदाबाद में कभी नगरदेवी माता भद्रकाली का एक भव्य मंदिर हुआ करता था लेकिन अब इसे मस्जिद में बदल दिया गया है।
बताया जाता है कि अहमद शाह ने इस मंदिर को तुड़वाकर उसकी जगह मस्जिद का निर्माण करवाया और इसे अपनी इस्लामी जीत का प्रतीक बनाया। इसे केवल एक मंदिर का टूटना नहीं बल्कि स्थानीय हिंदू पहचान, संस्कृति और नगरदेवी के सम्मान पर हमला माना जाता है। आज भी जामा मस्जिद के 100 से ज्यादा खंभों पर हिंदू शैली की नक्काशी साफ देखी जा सकती है। वहीं, भद्र किला का नाम भी इसी मंदिर के नाम पर रखा गया बताया जाता है। यह इतिहास केवल अहमदाबाद का ही नहीं बल्कि हिंदू विरासत पर हुए हमलों का इतिहास है।
भद्रकाली: अहमदाबाद की नगरदेवी और हिंदू विरासत का जीवंत प्रतीक
प्राचीन समय से हर गाँव और नगर में उस स्थान की रक्षा करने वाली देवी-देवता का मंदिर बनाने की परंपरा रही है। यह वैदिक काल से चली आ रही है। वैदिक संस्कृति में कई तरह के देवता बताए गए हैं जैसे इष्टदेवता, देवता, फिर नगरदेवता-नगरदेवी, ग्रामदेवता और लोकदेवता। यह परंपरा केवल आस्था तक सीमित नहीं थी बल्कि समाज की संस्कृति और सामूहिक पहचान से भी गहराई से जुड़ी थी।
जैसे आज भी काशी में कालभैरव को रक्षक देवता माना जाता है, वैसे ही कर्णावती में माता भद्रकाली को नगरदेवी का विशेष स्थान प्राप्त रहा है। आज के आधुनिक अहमदाबाद में भी माता भद्रकाली को नगरदेवी के रूप में माना जाता है।
सोलंकी-परमार काल में कर्णावती का माता भद्रकाली मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं था बल्कि पूरे नगर की पहचान और आस्था का केंद्र था। माना जाता है कि यह भव्य मंदिर 9वीं से 14वीं शताब्दी के बीच परमार वंश के समय बना था।
माता भद्रकाली को शक्ति स्वरूप में पूजा जाता था और स्थानीय हिंदुओं के लिए यह मंदिर आस्था, संस्कृति और एकता का प्रतीक बन गया था। यहाँ सिर्फ पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन के कई सांस्कृतिक पहलू भी फले-फूले। माता भद्रकाली का मंदिर कर्णावती की हिंदू पहचान और परंपरा का एक जीवंत प्रतीक था।
अहमद शाह का आक्रमण और मंदिर का विध्वंस
1411 में अहमद शाह ने कर्णावती पर हमला किया और उस पर कब्जा कर लिया। इसके बाद उसने शहर का नाम बदलकर ‘अहमदाबाद’ कर दिया। इसी के साथ उसने पूरे शहर का इस्लामीकरण करने पर जोर दिया। कई मंदिरों और हिंदू इमारतों को या तो तोड़ा गया या उन्हें इस्लामी ढाँचे में बदल दिया गया।
इसी दौरान अहमद शाह ने माता भद्रकाली के मंदिर को भी निशाना बनाया। माना जाता है कि उसने हिंदू नगरदेवी के इस मंदिर को गिराकर अपनी जीत का प्रतीक स्थापित करने के लिए उसकी जगह नया इस्लामी ढाँचा खड़ा किया। इस कदम को इस रूप में देखा जाता है कि शहर की पहचान बदलने का स्पष्ट संदेश दिया गया।
कहा जाता है कि 1411 से 1442 के अपने शासनकाल में अहमद शाह ने 1424 के आसपास भद्रकाली माता के मंदिर को तुड़वाकर उसी स्थान पर जामा मस्जिद का निर्माण कराया और मंदिर के अवशेषों पत्थरों और खंभों का इस्तेमाल किया। ‘मीरात-ए-अहमदी’ में अहमदाबाद और भद्र किले के निर्माण के वर्णन में आसपास के हिंदू स्थलों का भी उल्लेख मिलता है।
यह भी कहा जाता है कि भद्र किले का नाम इसी मंदिर से पड़ा और आज भी यह इलाका ‘भद्र’ के नाम से जाना जाता है जो उस प्राचीन परंपरा की याद दिलाता है। इस घटना को केवल निर्माण कार्य नहीं बल्कि स्थानीय हिंदू पहचान को खत्म करने की एक सुनियोजित कोशिश के रूप में देखा जाता है।
वास्तुकला और साफ नजर आती हिंदू छाप
जामा मस्जिद की बनावट को ध्यान से देखने पर सबसे पहले उसके खंभे और उनकी संरचना ध्यान खींचती है। इन खंभों पर बनी नक्काशी, कमल की आकृतियाँ और अन्य चिह्न हिंदू और जैन मंदिरों की शैली से मिलते-जुलते हैं। यह समानता इतनी गहरी है कि इनके मूल स्रोत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

मस्जिद के हॉल में 100 से ज्यादा खंभे हैं जिन पर हिंदू शैली की नक्काशी साफ दिखाई देती है। इनमें कमल, बेल-बूटे, मंडल, हाथी, कुंडलिनी सर्प, नृत्य करती अप्सराएँ, घंटियाँ और फूल जैसे कई पारंपरिक चिह्न बने हुए हैं। इस्लामी वास्तुकला में इन नक्काशियों को हराम माना जाता है और ये स्पष्ट रूप से यह साबित करती हैं कि यह मस्जिद कोई नई इमारत नहीं है बल्कि इसे एक प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेषों और खंभों से बनाया गया है।

ये खंभे मस्जिद के हॉल के बीच में स्थित हैं जो नमाज के लिहाज से भी सामान्य नहीं माने जाते। इसे पुराने ढाँचे के पुन: उपयोग का एक अहम संकेत माना जाता है। इन खंभों की तस्वीरें और दस्तावेज ‘Reclaim Temples’ और ‘Booksfact’ जैसे स्रोतों पर भी हैं जो इस दावे को और मजबूती देते हैं।
ब्रिटिश गैजेटियर और अन्य ऐतिहासिक संदर्भ
19वीं सदी के ब्रिटिश सर्वे में भी इस स्थान के हिंदू मूल का उल्लेख मिलता है। ‘गैजेटियर ऑफ बॉम्बे प्रेसिडेंसी: अहमदाबाद (1879)’ में साफ लिखा है कि यहाँ पहले माता भद्रकाली का मंदिर था जिसे अहमद शाह ने तुड़वाकर जामा मस्जिद बनवाई। ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने जाँच के दौरान हिंदू प्रतीकों को देखा और उन्हें दर्ज भी किया। ये विवरण बॉम्बे गैजेटियर के वॉल्यूम IV में दिए गए हैं।
ऐसा कहा जाता है कि यह देवी भद्रकाली का मंदिर था। अहमद शाह ने इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया और उसकी जगह एक मस्जिद का निर्माण करवाया। इसके अलावा, ‘मिरात-ए-अहमदी’ में भी जामा मस्जिद का जिक्र मिलता है जिसमें कहा गया है कि यह मस्जिद अहमद शाह और इस्लाम की विजय का प्रतीक है यानी इसे हिंदुओं की रक्षक देवी, माता भद्रकाली के मंदिर को तोड़कर बनाया गया था। ये सभी स्रोत इस बात को प्रमाणित करते हैं कि यह विध्वंस कोई आकस्मिक घटना नहीं थी बल्कि एक सुनियोजित हमला था।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अहमदाबाद के बीचों-बीच आज भी भद्र किला मौजूद है, जिसका नाम सीधे भद्रकाली मंदिर से जुड़ा माना जाता है। ब्रिटिश गजेटियर में यह भी लिखा है कि इस किले का नाम पाटन (अन्हिलवाड़) के प्राचीन भद्र किला और भद्रकाली मंदिर से प्रेरित है। कहा जाता है कि अहमद शाह ने इस किले का नाम नहीं बदला जबकि कई जगह यह भी उल्लेख मिलता है कि इस किले का निर्माण भी उसी के समय हुआ।
कुछ वामपंथी इतिहासकार सीधे यह नहीं कहते कि जामा मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई बल्कि यह कहते हैं कि अहमद शाह ने किसी पुराने हिंदू मंदिर के अवशेषों का इस्तेमाल किया। लेकिन सवाल वही रहता है कि ये अवशेष आए कहाँ से? इसका सीधा जवाब यही माना जाता है कि मंदिर को तोड़कर ही ये सामग्री ली गई होगी।
आज भी भद्र इलाके में माता भद्रकाली का मंदिर मौजूद है और ‘भद्र’ नाम लगातार चला आ रहा है। यह इस बात का संकेत माना जाता है कि इस जगह की पुरानी पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। स्थानीय मान्यताएँ और सांस्कृतिक यादें बताती हैं कि भले ही इमारतें बदल गई हों लेकिन पहचान पूरी तरह मिटती नहीं है।
इतिहास में यह एक आम प्रक्रिया मानी जाती है कि नई इस्लामी सत्ता पुराने हिंदू प्रतीकों की जगह ले लेती थी लेकिन वे किसी न किसी रूप में समाज की यादों में बने रहते हैं। भद्रकाली का संदर्भ भी ऐसी ही एक स्मृति का हिस्सा माना जाता है जो समय के साथ बदली जरूर है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)


