Homeरिपोर्टअंतरराष्ट्रीयकोविड काल में दुनिया को मुश्किल में डालने वाले डॉ फौसी पर किया खुलासा...

कोविड काल में दुनिया को मुश्किल में डालने वाले डॉ फौसी पर किया खुलासा तो तुलसी गबार्ड को ही निशाना बनाने लगा वॉशिंगटन पोस्ट: हिंदूवादी ट्रस्ट को बताया ‘कल्ट’, पढ़ें लेख में कैसे परोसी हिंदुओं से घृणा

WaPo ने हिंदुओं के प्रति नफरत फैलाने वाले एक नए लेख में अमेरिका की पूर्व DNI तुलसी गबार्ड और उनके आध्यात्मिक गुरु पर हमला करने की कोशिश की है। इसमें SIF के साथ उनके पहले से ज्ञात संबंधों का 'खुलासा' करने का दावा करते हुए संगठन को 'पंथ' बताया गया है।

पूर्व अमेरिकी खुफिया प्रमुख तुलसी गैबार्ड पर 21 जून 2026 को द वाशिंगटन पोस्ट ने एक ‘विशेष’ रिपोर्ट छापा है, जिसमें उन्हें एक पंथ से जुड़े होने और उनके धार्मिक बैकग्राउंड को उजागर करने का दावा किया गया है।

जॉन स्वेन द्वारा लिखित ‘तुलसी गैबार्ड, उनके गुरु और रहस्यमय संदेश जिन्होंने उनके राजनीतिक करियर में मदद की’ शीर्षक वाला यह लेख, हिंदू-विरोधी मानसिकता और विदेशियों से नफरत को दर्शाता है। यह अमेरिका में आम तौर होता है। इसमें हिंदू के साथ उनके स्थायी संबंधों को ‘उजागर’ करने का दावा किया गया, जिसे एक ‘पंथ’ के रूप में प्रस्तुत किया गया।

इस लेख में हिन्दू धर्म के साथ उनके जुड़ाव को एक घोटाले के रूप में पेश करने की कोशिश की गई, जिससे पता चलता है कि यह एक तरह का धोखा और आम लोगों के विश्वास को तोड़ने जैसा था। गौरतलब है कि गैबार्ड अपने 78 वर्षीय आध्यात्मिक गुरु, जगद्गुरु सिद्धस्वरूपानंद परमहंस के साथ अपने संबंध को लेकर बेहद पारदर्शी रही हैं। सिद्धस्वरूपानंद परमहंस को क्रिस बटलर के नाम से भी जाना जाता है।

उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने आध्यात्मिक गुरू की चर्चा की है और अपने जीवन के बारे में बताया है। उनका पालन-पोषण हवाई स्थित ‘साइंस ऑफ आइडेंटिटी फाउंडेशन’ (SIF) में हुआ। यह संगठन की स्थापना उनके आध्यात्मिक गुरु बटलर ने ‘हरे कृष्णा आंदोलन’ से अलग होकर की थी। तुलसी के माता-पिता इसके प्रमुख सदस्य थे। उस समुदाय में उनका पालन-पोषण हुआ। इसके पर्याप्त दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं।

दिलचस्प बात यह है कि यह लेख तुलसी गबार्ड के खुफिया प्रमुख पद से इस्तीफे के बाद प्रकाशित हुआ। उन्होंने अपने पति के रेयर बोन कैंसर की जानकारी मिलने के बाद अमेरिकी राष्ट्रीय खुफिया निदेशक के पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने हाल ही में आधिकारिक तौर पर कोविड-19 की उत्पत्ति से संबंधित जानकारी सार्वजनिक की थी।

इसमें तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार डॉ. एंथोनी फौसी के बारे में सनसनीखेज खुलासे थे। इसमें कहा गया, “डॉ. एंथोनी फौसी ने वुहान प्रयोगशाला में खतरनाक गेन-ऑफ-फंक्शन अनुसंधान को आर्थिक मदद के तौर पर अमेरिकी करदाताओं के लाखों डॉलर दे दिए। अपने कार्यों की सच्चाई को दबाने और वायरस के प्रयोगशाला-लीक मूल को छिपाने के लिए खुफिया एजेंसी के भीतर ‘राजनीतिक तत्वों’ के साथ काम किया और 2024 में शपथ लेकर कॉन्ग्रेस से झूठ बोला।”

वाशिंगटन पोस्ट ने उन सनसनीखेज खुलासों को नजरअंदाज किया, जिसने न केवल लाखों अमेरिकियों बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित किया। अखबार ने सच्चाई को सामने लाने वाली महिला को बदनाम करने का विकल्प चुना। लोकप्रिय टीवी हस्ती मेघन मैक्केन ने भी इसी मुद्दे को उठाते हुए लेख को ‘पूरी तरह से देशद्रोही, घृणित और घटिया हमला’ बताया।

उन्होंने आरोप लगाया, “वे डॉ. एंथोनी फौसी या बायो लैब पर हुए खुलासे को कवर नहीं करेंगे। ये दोनों ही बातें अमेरिकी लोगों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है, लेकिन वे इस घिसी-पिटी, हिंदू-विरोधी, कट्टरपंथी बकवास को फैलाने में समय बर्बाद करेंगे।”

हिंदू-विरोधी भावना को खोजी पत्रकारिता का नाम दिया गया

वॉशिंगटन पोस्ट ने दावा किया कि ‘कुछ पूर्व सदस्यों ने इस समूह को एक पंथ बताया था’ और इसके अनुयायी बाकी दुनिया से कटे हुए थे। संगठन ने इन आरोपों का पुरजोर खंडन किया है। लेखक ने आगे आरोप लगाया कि बटलर अपने अनुयायियों के जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों पर नियंत्रण रखता था और उसकी आज्ञा का पालन करने पर जोर देता था।

वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, उन्होंने राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए वर्षों गँवाए। वाशिंगटन में गबार्ड का उदय उसी प्रयास का परिणाम था। पूरी रिपोर्ट एसआईएफ की पूर्व सदस्य रेबेका साल्ट्जबर्ग के बयानों पर आधारित है, जो गबार्ड के अभियानों में शामिल थीं।

पूरी कहानी गबार्ड के खिलाफ साजिश नजर आती है जो उनके उल्लेखनीय करियर की बात नहीं करता, बल्कि एक ‘सत्ता-लोभी हिंदू गुरु द्वारा रची गई साजिश का नतीजा’ बताने की कोशिश की गई। इतनी बात वॉशिंगटन पोस्ट ने बिना किसी ठोस सबूत के कही गई।

जो तथ्य काफी समय से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थे, उन्हें हिंदू धर्म के प्रति घृणा फैलाने के लिए शातिर तौर पर इस्तेमाल किया गया। स्वेन ने अपने लेख में सवाल किया क्या कोई एकांतप्रिय गुरु गुप्त रूप से गबार्ड के सार्वजनिक कार्यकाल को निर्देशित करने की कोशिश कर रहा था? इसका उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय के एक राजनेता के प्रति घृणा को बढ़ावा देना था।

लेख में कहा गया है कि अगर बटलर गबार्ड के राजनीतिक करियर का मार्गदर्शन कर रहे थे, तो उन दोनों ने इसे गुप्त रखा होगा। हालाँकि इसमें यह भी माना है कि बटलर और गबार्ड दोनों ने बार-बार कहा कि उन्होंने न तो उन्हें यह निर्देश दिया कि किसे वोट देना है और न ही उन्हें राजनीतिक सलाह प्रदान की।

बटलर के पिता को ‘कट्टर वामपंथी चिकित्सक’ कहा गया। एक ऐसी विचारधारा जिसकी मुख्यधारा मीडिया में आमतौर पर प्रशंसा की जाती है, लेकिन जाहिर तौर पर तब नहीं जब यह उनके एजेंडे के विपरीत हो।

वाशिंगटन पोस्ट ने कहा कि ‘इंडिपेंडेंट्स फॉर गॉडली गवर्नमेंट’ नामक एक पार्टी उभरी, जिसमें बटलर के अनुयायी शामिल थे। इन्होंने आह्वान किया था कि ‘अयोग्य राजनेताओं को उनके पदों से हटा दिया जाना चाहिए’ और उनकी जगह ‘संतों जैसे व्यक्तियों’ को नियुक्त किया जाना चाहिए।

इसके बाद स्वेन ने गबार्ड की राजनीति में असाधारण प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा, “उन्होंने भगवद-गीता हाथ में लेकर शपथ ली थी और कहा था कि उन्हें कॉन्ग्रेस की पहली हिंदू अमेरिकी सदस्य होने पर गर्व है।” ताकि वे अपने धर्म के प्रति अपनी निष्ठा को रेखांकित कर सकें। बाद में 2012 में ओक्लाहोमा में उनसे घर खरीदने वाली कंपनी की खोज करते समय उन्हें एक ईमेल पता “@nineisles.com” मिला। इससे उन्हें वाशिंगटन में दुष्ट ‘हिंदू गुरु’ और उसके शिष्य के बारे में ज्यादा पुख्ता जानकारी मिली।

लेख में लिखा था, “हिंदी में नौ द्वीप नवद्वीप कहलाता है, जो भारत के पश्चिम बंगाल क्षेत्र का एक शहर है और हरे कृष्ण भक्तों के लिए एक तीर्थ स्थल के रूप में कार्य करता है।”

एसआईएफ ने अखबार का विरोध करते हुए इसे उसकी छवि को नुकसान पहुँचाने वाला बताया है। एसआईएफ की अध्यक्ष जेनी बिशप ने लेखक से कहा, “मुझे नहीं लगता कि वाशिंगटन पोस्ट के पाठक डीएनआई के धर्म पर एक और अविश्वसनीय, कट्टरपंथी हमले में रुचि लेंगे।”

संगठन ने स्वाइन के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि दो लोगों ने बटलर को एक चरमपंथी ‘पंथ’ के नेता के रूप में पेश करने के लिए अपनी जान देने की इच्छा जताई थी।

“यह सब हिंदू-विरोधी भावना और धार्मिक कट्टरता है। जब कोई हिंदू सार्वजनिक शख्सियत किसी हिंदू धार्मिक व्यक्ति से आध्यात्मिक गुरु वाला रिश्ता रखता है या उसके विचारों से सहमत होता है, तो इसे ही गुप्त नियंत्रण का सबूत मान लिया जाता है।” एसआईएफ के एक अन्य प्रतिनिधि ने साल्ट्जबर्ग की आलोचना करते हुए कहा है कि वह संगठन से पैसे ऐंठना चाहता है और मना करने पर ‘प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने’ की धमकी देता है। उन्होंने आगे कहा, “मुझे लगता है कि इससे इन आरोपों को देखने और उनका मूल्यांकन करने का नजरिया पूरी तरह बदल जाता है।”

यह उल्लेखनीय है कि साल्ट्जबर्ग को ऑस्टिन के पास बच्चों की हिरासत से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था। उसने बटलर के एक वरिष्ठ शिष्य से ‘मेरे और मेरे बच्चों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए’ 250000 डॉलर की माँग की। उसने जोर देकर कहा कि बटलर ने उससे ‘भागे हुए बच्चे की रक्षा करने’ का अनुरोध किया था, लेकिन पुलिस के हस्तक्षेप के बाद उसने अपनी कहानी बदल दी, जिसके कारण उसे दो साल की जेल की सजा और भारी जुर्माना का सामना करना पड़ सकता है। हालाँकि बटलर ने उससे बातचीत करने से इनकार कर दिया और उसे वरिष्ठ शिष्य के पास जाने के लिए कहा।

लेख में कहा गया है, “जिस क्षण साल्टजबर्ग ने मुझे बताया कि उसे किशोर भगोड़े मामले में गिरफ्तार किया गया है और एसआईएफ नेताओं से उसका मतभेद हो गया है, मुझे आशंका थी कि एसआईएफ उसकी विश्वसनीयता पर हमला कर सकता है। ऐसा हुआ भी, लेकिन उस तरह से नहीं जैसा मैंने सोचा था।” लेख में इस बात पर जोर दिया गया कि उस पर हिन्दू आध्यात्मिक संगठन की आलोचना करने के कारण हमला किया गया। इस बात को ध्यान में रखे बिना कि उसकी स्थिति किसी व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रभावित हो सकती है।

सुनील खेमानी ने भी तुलसी और बटलर पर हमला करने की निंदा की। लेख में उन्हें बटलर का दाहिना हाथ बताया गया है। ऐसा लगता है, मानो वे एक आध्यात्मिक गुरु के बजाय एक आपराधिक गिरोह चला रहे हों।

उन्होंने कहा, “एक दशक से भी अधिक समय पहले की इन सामग्रियों का अधिकांश भाग मेरे और दूसरे सलाहकारों ने दिए हैं, जिनमें तिलसी गबार्ड के पिता और राज्य सीनेटर माइक गबार्ड भी शामिल हैं। मैंने कई वर्षों तक मीडिया, भाषणों और नीतिगत संदेशों पर उनके साथ काम किया है। इनमें से एक या दो सामग्री बटलर से प्राप्त हुई होंगी, विशेष रूप से भगवद-गीता, हिंदू धर्म और वैदिक गुरु प्रणाली की शिक्षाओं से जुड़ी सामग्री।”

उन्होंने आगे कहा, “इस दावे का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं है कि यह सारा काम बटलर से संबंधित है। फाइल के नाम,उसके चुनिंदा अंश इसे साबित नहीं करते हैं।”

गबार्ड के चीफ ऑफ स्टाफ ने भी रिपोर्ट को ‘एक असंतुष्ट पूर्व स्वयंसेवक द्वारा व्यक्तिगत लाभ के लिए की गई 250000 डॉलर की जबरन वसूली की असफल कोशिश से जुड़े आरोप’ बताया। उन्होंने कहा, “उनकी आस्था और निष्ठा पर किए गए हमले न केवल झूठे हैं, बल्कि हिंदू विरोधी कट्टरता का स्पष्ट उदाहरण हैं।”

स्वाइन ने इस पूरे लेख में यह साबित करने की कोशिश करते रहे कि गबार्ड को बटलर नियंत्रित और निर्देशित करते थे और उन्हें बटलर से ही संदेश प्राप्त होते थे। हालाँकि उन्होंने समय के साथ अपने राजनीतिक रुख में बदलाव किया, जिसमें समलैंगिकता पर उनके विचार भी शामिल हैं, जो एसआईएफ के विचारों के विपरीत हैं।

अमेरिकी राजनीति के विशेषाधिकार प्राप्त ईसाई चेहरे

संयुक्त राज्य अमेरिका में, ईसाइयत या इब्राहीमी से मेल न खाने वाली किसी भी सोच या धर्म को वर्जित या पंथ के रूप में वर्गीकृत करने की प्रवृत्ति है। तुलसी गबार्ड और बटलर के खिलाफ वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट इसी घटना का एक उदाहरण है। प्रसिद्ध टीवी प्रचारक, पादरी पाउला व्हाइट-केन को पिछले साल ‘नवनिर्मित व्हाइट हाउस फेथ ऑफिस के विशेष सरकारी कर्मचारी और वरिष्ठ सलाहकार’ के रूप में नियुक्त किया गया था ।

व्हाइट पिछले दो दशकों से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आध्यात्मिक सलाहकार रही हैं। उन्होंने ट्रम्प की तुलना यीशु मसीह तक से कर दी थी , जिसका भारी विरोध हुआ। नकदी धोखाधड़ी में शामिल होने के कारण उनके ईसाई आलोचकों ने उन्हें ‘ झूठी टीचर’ कहा था। उन्होंने 1000 डॉलर के बदले एक निजी देवदूत की नियुक्ति सहित ‘सात अलौकिक आशीर्वाद’ देने का वादा किया था। उन्होंने 2016 में 1144 डॉलर में ‘पुनरुत्थान के बीज’ भी बेचे थे। उन्होंने दावा किया कि ईश्वर ने उन्हें यह दी थी।

व्हाइट और उनके पति ने ‘विदाउट वॉल्स इंटरनेशनल चर्च’ की स्थापना की थी। दोनों को कई विवादों और निजी जेट पर किए गए खर्च सहित धन के दुरुपयोग के आरोपों का सामना करना पड़ा था। वह मंच पर अपने अजीबोगरीब कारनामों और अपने भाषणों के दौरान नस्ल और आप्रवासन पर विवादास्पद टिप्पणियां करने के लिए भी कुख्यात हैं।

ट्रंप की करीबी होने और लंबे समय से साथ रहने खासकर उनके प्रशासन में शामिल होने के बाद भी उन पर ट्रंप के प्रभाव को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया जाता है।

ये घृणित हमले अमेरिका में केवल हिंदू धर्म तक ही सीमित नजर आते हैं। अमेरिका में ऐसे कई अन्य लोग भी हैं, जिनका रिकॉर्ड संदिग्ध है, लेकिन ईसाई होने के कारण उन्हें इस तरह की शत्रुता का सामना नहीं करना पड़ता।

ओक्लाहोमा के एक चर्च पादरी जैक्सन लाहमियर ने ‘पास्टर्स फॉर ट्रंप’ की स्थापना की थी। उससे विवाहेतर संबंध का खुलासा हुआ, जिसके बाद ओक्लाहोमा से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की सीट के लिए हुए दूसरे दौर के चुनाव से उसे हटना पड़ा। हालाँकि राष्ट्रपति ट्रंप ने उनका समर्थन किया था और उन्हें ‘MAGA (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन)’ योद्धा के रूप में सराहा था।

हालाँकि, ओक्लाहोमा के पहले कॉन्ग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से उनकी उम्मीदवारी उस समय धराशायी हो गई जब डेली मेल ने कैटलिन सिमंस की को भेजे गए उनके रोमांटिक टेक्स्ट मैसेज जारी कर दिए। कैटलिन पूर्व मिस ओक्लाहोमा यूएसए हैं और उन्होंने चुनाव प्रचार के लिए चंदा इकट्ठा करने का काम किया था।

डेली वायर की लेखिका और रिपब्लिकन रणनीतिकार कार्ली बर्ड ने लाहमियर को ‘एक अहंकारी और घिनौना व्यक्ति’ करार दिया। उन्होंने कहा, “वह जानते हुए भी कि उसका अफेयर चल रहा था, चुनाव में इसलिए बना रहा क्योंकि उसे लगा कि वह बच जाएगा। उसने पहले इनकार किया, लेकिन फिर चुनाव से हट गया और फिर डेली मेल यूएस को एक इंटरव्यू दिया।”

लाहमियर ने स्वीकार किया कि उसका अफेयर था और उन्होंने उस महिला को चूमा था। उनके अनुसार, “चुनाव के दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध नहीं बने। हालाँकि उन्होंने 2022 में उसके साथ यौन संबंध बनाने की बात कबूल की। उन्होंने माना कि वो अपनी पत्नी को धोखा दे रहे थे।

हालाँकि उनके गंभीर अपराध के कारण उन्हें ‘पंथ’ का नेता घोषित नहीं किया गया और न ही इससे उनके संगठन पर देश के प्रेस द्वारा कड़ी निगरानी रखी गई। यह पैटर्न उन सभी मामलों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है जहाँ आरोपी द्वारा अपनाए गए धर्म का पालन करने पर धर्म या समूह का कोई उल्लेख नहीं होता।

वाशिंगटन पोस्ट ने अपने दावों में सच्चाई की परवाह किए बिना, गबार्ड पर राजनीतिक रूप से प्रेरित हमला करते हुए एक विशेष धर्म को नीचा दिखाने की कोशिश की। इसके लिए उसकी आलोचना की ही जानी चाहिए। हालाँकि इससे कोई बदलाव नहीं आएगा, क्योंकि व्हाइट हाउस से लेकर अखबारों के दफ्तरों तक हिंदू विरोधी भेदभाव गहराई से समाया हुआ है।

यही कारण है कि उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने अपने MAGA समर्थकों को संतुष्ट करने के लिए अपनी हिंदू पत्नी के धर्म परिवर्तन की उम्मीद जताई और स्वाइन ने एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी की राजनीति पर चर्चा करते समय धर्म का मुद्दा बीच में लाया। यही वजह है कि हिंदू समूहों को पंथ कहा जाता है, जबकि ईसाई संगठनों के लिए ऐसी शब्दावली का प्रयोग कभी नहीं किया जाता।

(यह लेख मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Rukma Rathore
Rukma Rathore
Accidental journalist who is still trying to learn the tricks of the trade.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

‘बलूचिस्तान की शेरनी’ को आतंकी घोषित कर पाकिस्तान ने दी उम्रकैद की सजा, आवाज दबाने के लिए बनाया फर्जी केस: जानें डॉ महरंग बलोच...

महरंग बलोच को उम्रकैद की पाकिस्तान कोर्ट ने सजा दी है। उनके संगठन का पूरे बलूचिस्तान में सबसे ज्यादा असर है। उनकी एक आवाज पर लोग मरने-मारने के लिए तैयार रहते हैं।

लखनऊ अग्निकांड के दौरान आखिरी कॉल्स, धुएँ में घुटती साँसें और 15 जिंदगियों का अंत: पढ़ें पीड़ित परिवारों की दर्दनाक दास्तां

लखनऊ के अलीगंज इलाके में उषा मेहता मार्ग स्थित उस तीन मंजिला इमारत में लगी भीषण आग में 15 लोगों की मौत ने कई परिवार उजाड़ दिए।
- विज्ञापन -