Homeरिपोर्टअंतरराष्ट्रीयकंगाली से जूझते बांग्लादेश को 'काले धन' का सहारा, विदेश में जमा ₹21.8 लाख...

कंगाली से जूझते बांग्लादेश को ‘काले धन’ का सहारा, विदेश में जमा ₹21.8 लाख करोड़ पर नजर: बर्बादी की कगार पर कपड़ा उद्योग, कभी इसी ‘मॉडल’ से मोदी सरकार को कोसते थे वामपंथी

बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के 15 साल के शासनकाल के दौरान कथित तौर पर देश से बाहर भेजी गई 230 अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति वापस लाने की कोशिशें तेज कर रही है। बांग्लादेश उन संपत्तियों का पता लगाने की कोशिश कर रहा है जो ब्रिटेन, अमेरिका, UAE और सिंगापुर सहित कई देशों में मौजूद हैं।

बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के 15 साल के शासनकाल के दौरान कथित तौर पर देश से बाहर भेजी गई 230 अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति वापस लाने की कोशिशें तेज कर रही है। इससे पहले मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने कहा था कि बांग्लादेश से 234 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम ‘चोरी‘ की गई थी। सरकार ने यह भी कहा था कि इस धन की वापसी में मदद करना ब्रिटेन की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ है।

लेकिन अब मौजूदा सरकार इस 230 अरब डॉलर की राशि को वापस लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। वहीं पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के कारण बांग्लादेश की आर्थिक चुनौतियाँ और बढ़ गई हैं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने यह भी कहा था कि शेख हसीना के शासन के अंतिम वर्षों में हर साल लगभग 16 अरब डॉलर बांग्लादेश से बाहर भेजे जा रहे थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, नई सरकार ने विदेशों में भेजी गई संपत्तियों को वापस लाने के प्रयास और तेज कर दिए हैं। तारिक रहमान सरकार इस मामले में अंतरराष्ट्रीय सहयोग हासिल करने की कोशिश कर रही है और बड़े उद्योगपतियों व शेख हसीना के शासनकाल से जुड़े लोगों के खिलाफ कानूनी मामले भी दर्ज कर रही है।

हालाँकि, सरकार इस धन को वापस लाने के लिए बेहद उत्सुक है, लेकिन उसे इस बात का भी एहसास है कि यह काम आसान नहीं है। बांग्लादेश के पास विदेशों में छिपाई गई संपत्तियों का पता लगाने और उनसे जुड़े जटिल कानूनी मामलों को संभालने का पर्याप्त अनुभव नहीं है। यह काम भूसे के ढेर में सुई ढूँढने जैसा माना जा रहा है।

बांग्लादेशी अधिकारियों का कहना है कि अगर कोई बड़ी रकम वापस मिलती भी है तो इसमें कई साल, बल्कि दशकों तक लग सकते हैं। वहीं, शेख हसीा के सत्ता से हटने और देश छोड़ने के बाद से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भी काफी कमजोर हो गई है।

बांग्लादेश सरकार के अधिकारी खुद मानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है। हाल की रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश का बैंकिंग क्षेत्र लगभग ढहने की स्थिति में पहुँच गया है। बैंकों को खराब कर्ज (NPL) कुल ऋण का करीब 30 से 35 प्रतिशत तक पहुँच गए हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक स्तरों में से एक है। कई बैंक आर्थिक रूप से इतने कमजोर (Insolvent) हो गए हैं कि वे अपने दम पर चलने की स्थिति में नहीं हैं। कुछ बैंकों को दूसरे बैंकों में मिलाना (Merge) पड़ा है।

वहीं बांग्लादेश का विदेश मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve), जो 2021 में शेख हसीना सरकार के दौरान लगभग 48 अरब डॉलर तक पहुँच गया था, 2024 तक घटकर 20 अऱब डॉलर के स्तर पर आ गया। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे खराब प्रबंधन और वित्तीय गड़बड़ियाँ भी एक बड़ा कारण है।

इसके अलावा वित्त वर्ष 2024-25 में बांग्लादेश की GDP वृद्धि दर घटकर 3.49 प्रतिशत रह गई। हालाँकि, 2025-26 के वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था के 4.6 से 4.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।

ईरान के खिलाफ अमेरका और इजरायल के युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट का भी बांग्लादेश पर गंभीर असर पड़ा है। बांग्लादेश अपनी तेल और ईंधन की जरूरतों का लगभग 95 प्रतिशत आयात करता है, इसीलिए बढ़ती ऊर्जा कीमतों ने उसकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव डाला है। बांग्लादेश के वित्त मंत्री आमिर खोसरो महमूद चौधरी ने हाल ही में कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के कारण पिछले तीन महीनों में देश के खजाने को लगभग 4 अरब डॉलर का ‘नुकसान’ हुआ है।

आर्थिक दबाव बढ़ने के कारण बांग्लादेश को अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से 3 अरब डॉलर का कर्ज माँगना पड़ा है। इसके लिए देश के IMF, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक (ADB) जैसे संस्थानों से सहायता की माँग की है। यह कदम तब उठाया गया जब चालू वित्त वर्ष में देश का राजकोषीय घाटा बढ़कर अनुमानित 3.6 प्रतिशत तक पहुँच गया।

इस बीच वित्त मंत्री महमूद चौधरी ने कहा कि BNP के नेतृत्व वाली सरकार उन संपत्तियों को वापस लाने के प्रयास और तेज कर रही है, जिन्हें वह ‘लूटी गई संपत्ति’ बताती आई है। उन्होंने कहा, “इस समय जब देश गंभीर वित्तीय समस्याओं का सामना कर रहा है, तब जितनी भी रकम वापस मिल सके, वह हमारे लिए मददगार साबित होगी।”

इस साल अप्रैल में प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने बांग्लादेश की संसद को बताया कि विदेशों में भेजी गई संपत्तियों को वापस लेने के प्रयास और मजबूत किए जा रहे हैं। इसके लिए संबंधित देशों के साथ जानकारी साझा करने, संपत्तियों की पहचान करने और कानूनी सहयोग बढ़ाने पर काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विदेशों में जमा या भेजी गई अवैध संपत्तियों को वापस लाना उनकी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है।

बांग्लादेश उन संपत्तियों का पता लगाने की कोशिश कर रहा है जो ब्रिटेन, अमेरिका, UAE और सिंगापुर सहित कई देशों में मौजूद हैं। इसके लिए नए केंद्रीय बैंक गवर्नर मोहम्मद मुस्ताकुर रहमान की अगुवाई में एक विशेष टास्क फोर्स भी बनाई गई है, जिसका काम विदेशों में मौजूद बांग्लादेसी धन का पता लगाना और उसे वापस लाना है।

वित्त मंत्री आमिर खोसरो महमूद चौधरी ने कहा कि वित्तीय गड़बड़ियों के कारण कई बैंकों की वित्तीय स्थिति बेहद खराब हो गई है। उनके अनुसार, कुछ बैंकों की बैलेंस शीट ‘शून्य या घाटे’ में पहुँच गई, जिसके चलते सरकार को उनमें फिर से पूँजी डालनी पड़ी। चौधरी ने कहा, “शेख हसीना से जुड़े कारोबारी और राजनेता लगभग 234 अरब डॉलर देश से बाहर ले गए, जिससे बैंकिंग क्षेत्र गंभीर संकट में आ गया।”

इसी कारण जून 2026 में रहमान सरकार को बैंकिंग क्षेत्र को संभालने और उसे फिर से मजबूत बनाने के लिए 3.2 अरब डॉलर का आपातकालीन सहायता पैकेज देने का फैसला करना पड़ा।

महँगाई भी बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। नए केंद्रीय बैंक गवर्नर द्वारा कई महीनों तक सख्त मौद्रित नीतियाँ अपनाने के बावजूद महँगाई दर 8 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है, जो दक्षिण एशिया में सबसे अधिक मानी जा रही है। मई 2026 तक बांग्लादे की महँगाई दर 9.42 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अप्रैल 2026 में 9.04 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि एक महीने में महँगाई और बढ़ गई, जिससे लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च भी बढ़ता जा रहा है।

ईरान युद्ध से पहले, उसके दौरान और उसके बाद भी बांग्लादेश में आम लोगों के लिए भोजन, ईंधन, किराया और अन्य जरूरी सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं। देश अभी कोविड-19 महामारी के असर से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि राजनीतिक अस्थिरता ने उसकी मुश्किलें और बढ़ा दीं।

बांग्लादेश में गरीबी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। देश की कुल गरीबी दर 27.9 प्रतिशत है, जबकि 9.3 प्रतिशत लोग सबसे ज्यादा गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। इसका मतलब है कि देश की एक चौथाई से भी अधिक आबादी राष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है।

इसके अलावा कई ऐसे परिवार जो पहले गरीबी रेखा से ‘थोड़ा ऊपर’ थे, अब बढ़ती महँगाई के कारण फिर से गरीबी की ओर बढ़ रहे हैं। उनकी आय कीमतों में हो रही बढ़ोतरी के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रही है।

सरकारी कर्ज भी बांग्लादेश के लिए चिंता का विषय बन गया है। देश पर कुल सार्वजनिक कर्ज 22 लाख करोड़ टका से अधिक हो चुका है, जो उसकी GDP का लगभग 40 से 42 प्रतिशत है। इस महीने बांग्लादेशी मीडिया की रिपोर्ट्स में कहा गया कि अगर सरकार अगले वित्त वर्ष में कोई नया कर्ज भी नहीं लेती, जो कि संभव नहीं माना जा रहा, “तब भी उसे पहले से लिए गए कर्ज के मूलधन और ब्याज की अदायगी के लिए लगभग 4.35 ट्रिलियन टका खर्च करने पड़ेंगे।”

पिछले दो वर्षों में राजनीति में उथल-पुथल के कारण बांग्लादेश में निवेश में बड़ी गिरावट आई है। नई सरकार विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन देश में समय-समय पर होने वाली सांप्रदायिक हिंसा और अशांति के कारण निवेशकों का भरोसा पूरी तरह बन पा रहा है। इसलिए कई निवेशक नया पैसा लगाने या नई परियोजनाएँ शुरू करने से बच रहे हैं।

बात करें बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग की, जो कभी उसकी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, आज मुश्किल दौर में गुजर रहा है। करीब 23 अरब डॉलर कीमत वाला यह उद्योग तैयार रेडीमेड गारमेंट्स के क्षेत्र को धागा और अन्य सामग्री उपलब्ध कराता है। रेडीमेड गारमेंट्स क्षेत्र बांग्लादेश की कुल निर्यात आय का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा देता है। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और भारत के साथ बढ़े तनाव ने इस उद्योग की समस्याओं को और बढ़ा दिया है।

वहीं, भारत यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिससे भारतीय कपड़ा और परिधान उद्योग को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। अमेरिका पहले से ही भारतीय कपड़ा उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार है, जहाँ हर साल लगभग 10.5 से 11 अरब डॉलर के उत्पाद निर्यात किए जाते हैं।

फरवरी 2025 में मोदी सरकार ने कपड़ा मंत्रालय का बजट बढ़ाकर 5,272 करोड़ रुपए कर दिया, जो पिछले वित्त वर्ष के 4,417 करोड़ रुपए से अधिक था। माना गया कि यह कदम उन कंपनियों को आकर्षित करने के लिए उठाया गया, जो बांग्लादेश से अपना कारोबार दूसरी जगह ले जाना चाहती थीं। इससे बांग्लादेश की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ गईं।

मई 2025 में भारत ने बांग्लादेशी सामानों पर कुछ बंदरगाह प्रतिबंध लगाए। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कदम मुहम्मद यूनुस के भारत के प्रति सख्त रुख के ‘जवाब’ में उठाया गया था। इन प्रतिबंधों से बांग्लादेश को 77 करोड़ डॉलर से अधिक का नुकसान होने का अनुमान है।

हालाँकि शेख हसीना के शासनकाल में भी बांग्लादेश कोई आदर्श आर्थिक मॉडल नहीं था, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि 2022 से 2025 के बीच देश ने कई क्षेत्रों में पीछे की ओर कदम बढ़ाए हैं। इसका मतलब है कि गरीबी कम करने और आर्थिक सुधार के क्षेत्र में हुई कई वर्षों की प्रगति कमजोर पड़ती दिखाई दी।

साफ हो गया है कि आज बांग्लादेश गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। इसी कारण सरकार विदेशों में भेजी गई 230 अरब डॉलर की संपत्तियों को वापस लाने की कोशिश कर रही है।

दिलचस्प बात यह है कि यही बांग्लादेश कभी भारत के कुछ उदारवादी टिप्पणीकारों द्वारा एक सफल आर्थिक मॉडल के रूप में पेश किया जाता था। उनका कहना था कि आकार में छोटा होने के बावजूद आर्थिक विकास के मामले में ‘बांग्लादेश भारत से आगे’ निकल रहा है। जर्मनी में रहने वाले यूट्यूबर ध्रुव राठी, मोदी विरोधी राजनीतिक दलों और कुछ वामपंथी मीडिया संस्थानों ने भी समय-समय पर ऐसे दावे किए।

कुछ भारतीय उदारवादी टिप्पणीकार और राजनीतिक समूह ‘बांग्लादेश चमत्कार’ की कहानी को बढ़ावा देते रहे, ताकि मोदी सरकार की आलोचना की जा सके। लेकिन वे भारत और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्थाओं, आबादी और राजनीतिक परिस्थितियों के बड़े अंतर को नजरअंदाज करते रहे। जहाँ बांग्लादेश की GDP लगभग 450 अरब डॉलर है, वहीं भारत की अर्थव्यवस्था करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की है, जो उससे 8-9 गुना बड़ी है।

यह सच है कि भारत ने पहले अपने कपड़ा उद्योग की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं किया था और इस क्षेत्र में बांग्लादेश को बढ़त हासिल थी। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी और विविध है, इसलिए अब वह इस क्षेत्र में भी तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।

कुछ भारतीय उदारवादी यह भी कहते रहे हैं कि प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) के मामले में बांग्लादेश भारत से थोड़ा आगे है। उनके अनुसार बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय 2,911 डॉलर है, जबकि भारत की 2,812 डॉलर। वे इसे भारत के लिए चिंता का विषय बताते हैं। हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह अंतर कई बार मुद्रा विनिमय दरों और बांग्लादेश की निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था के कारण दिखाई देता है।

केवल कुछ चुनिंदा आँकड़ों को देखने के बजाए पूरी तस्वीर पर ध्यान देना चाहिए। भारत की अर्थव्यवस्था आकार, संपत्ति और विविधता के मामले में बांग्लादेश से कहीं बड़ी है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जबकि बांग्लादेश चावल, बिजली और अन्य जरूरी वस्तुओं के लिए काफी हद तक भारत पर निर्भर है।

लेकिन मोदी सरकार और भाजपा का विरोध करने वाले राजनीतिक और वैचारिक कारणों से भारत की उपलब्धियों को कम करके दिखाते हैं। पहले भी इन्होंने यह तर्क दिया था कि ‘तालिबान शासित अफगानिस्तान की मुद्रा भी भारतीय रुपए से मजबूत है’, जिसे उन्होंने भ्रामक तुलना बताया है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

Shraddha Pandey
Shraddha Pandey
Senior Sub-Editor at OpIndia. Email: [email protected]

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

ना NOC, ना इमरजेंसी EXIT और बेसमेंट में क्लासेस… लखनऊ कोचिंग अग्निकांड के बाद सख्त हुए CM योगी, 100+ संस्थान सील: पढ़ें- अब तक...

लखनऊ कोचिंग अग्निकांड पर CM योगी ने निर्देश दिया। UP में 100+ संस्थानों को सील किया। इनके पास फायर NOC, अवैध निर्माण जैसी खामियाँ पाई गई।

साँप की मिस्ट्री, बाली की ट्रिप और लोहागढ़ का किला: 20 साल की सिया ने 3 बार रची थी मंगेतर केतन को मारने की...

पुणे की सिया ने मंगेतर केतन अग्रवाल को तीन बार मारने की साजिश रची। पुलिस ने जाँच में साँप की मिस्ट्री का भी खुलासा किया। लोहागढ़ किला जाने से पहले सिया ने बाली की ट्रिप भी कैंसिल की थी।
- विज्ञापन -