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बऊबाजार ब्लास्ट के ‘मास्टरमाइंड’ की रिहाई पर SC की रोक, कोलकाता में ‘हिंदुओं को मारना’ चाहता था राशिद खान: पढ़ें- कैसे ममता सरकार ने की थी समय से पहले रिहाई के लिए पैरवी

1993 बऊबाजार विस्फोट के दोषी राशिद खान की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई, अब दिल्ली हाई कोर्ट के रिमिशन आदेश की वैधता पर सुनवाई होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (22 जून 2026) को दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें 1993 के बऊबाजार विस्फोट मामले के दोषी मोहम्मद राशिद खान को रिहा करने और उसकी सजा में छूट देने का निर्देश दिया गया था। राशिद को पश्चिम बंगाल सरकार ने इस साजिश का मास्टरमाइंड बताया था।

गौरतलब है कि दिसंबर 1992 में अयोध्या स्थित विवादित ढाँचे के विध्वंस के बाद पैदा हुए सांप्रदायिक तनाव के बीच खान ने बम बनाने के लिए पैसे दिए थे। जिसका मकसद मुस्लिमों के जरिए बमों का इस्तेमाल कर कलकत्ता के हिंदुओं को मारना था।

हालाँकि, बम बनाने वाली जगह पर हुए विस्फोट में 69 लोगों की मौत हो गई, जिनमें कोई भी हिंदू नहीं था। इस हादसे में दर्जनों लोग घायल हुए और कोलकाता के घनी आबादी वाले मध्य क्षेत्र बऊबाजार में कई इमारतें ढह गई थीं।

न्यायमूर्ति पी के मिश्रा और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने बंगाल सरकार द्वारा 5 जून को दिए गए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान यह अंतरिम आदेश पारित किया।

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने तर्क दिया कि इतने बड़े विस्फोट और भारी जनहानि वाले मामले में हाई कोर्ट द्वारा दंड के सुधारात्मक सिद्धांत (रिफॉर्मेटिव थ्योरी ऑफ पनिशमेंट) पर भरोसा करना सही नहीं है। वहीं, खान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एम आर शमशाद ने उसकी लंबी कैद, जेल में अच्छे आचरण, बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य का हवाला दिया। उन्होंने मार्च 2014 में सह-दोषी पन्नालाल जैसवारा को मिली रिहाई का भी उल्लेख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खान के मामले को अलग माना कि वह इस पूरी साजिश का मास्टरमाइंड था। जब शमशाद ने दलील दी कि खान को कई बार पैरोल मिली और वह हर बार वापस जेल लौटा, तब अदालत ने टिप्पणी की कि उसे जिस अपराध के लिए सजा दी गई, वह लगभग एक आतंकवादी कृत्य था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अपील पर विचार होने से पहले खान को रिहा कर दिया गया, तो राज्य सरकार की चुनौती निरर्थक हो सकती है। इसी आधार पर अदालत ने उसकी रिहाई पर रोक लगा दी। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को निर्धारित की गई है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने माफी दी और तुरंत रिहाई का दिया आदेश

दिल्ली हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने 5 जून को खान की याचिका स्वीकार करते हुए आदेश दिया था कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

हाई कोर्ट ने माना कि बऊबाजार विस्फोट कोई व्यक्तिगत अपराध नहीं था बल्कि इसका व्यापक प्रभाव पूरे समाज पर पड़ा था। इसके बावजूद अदालत ने कहा कि अपराध की गंभीरता को ही सजा में छूट (रिमिशन) से इनकार करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब लागू नीति में टाडा के तहत दर्ज मामलों या राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले अपराधों को स्पष्ट रूप से छूट के दायरे से बाहर नहीं रखा गया हो।

फरवरी 2020 में प्रेसिडेंसी करेक्शनल होम के अधीक्षक द्वारा जारी चरित्र प्रमाण पत्र में खान के व्यवहार को बहुत-बहुत अच्छा बताया गया था। खान ने बिना पुलिस एस्कॉर्ट के 93 दिन पैरोल पर बिताए थे और तय समय के भीतर वापस लौट आया था। इस दौरान उसके खिलाफ किसी तरह की धमकी देने या सांप्रदायिक तनाव फैलाने की कोई शिकायत भी सामने नहीं आई। अदालत के सामने यह भी बताया गया कि खान कई बीमारियों से पीड़ित है।

हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि खान के दोबारा किसी अपराध में शामिल होने की संभावना बहुत कम है। अदालत ने कहा कि 33 साल से अधिक समय जेल में बिताने के बाद उसे और अधिक समय तक कैद में रखने का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं रह जाता।

हाई कोर्ट ने मामले को दोबारा विचार के लिए सरकार के पास भेजने के बजाय स्वयं ही खान को सजा में छूट दे दी। अदालत ने कहा कि जब उपलब्ध परिस्थितियाँ उसकी रिहाई को उचित ठहराती हैं, तब मामले को पुनर्विचार के लिए कार्यपालिका (सरकार) के पास वापस भेजने का कोई उद्देश्य नहीं रह जाता।

इसके बाद पश्चिम बंगाल की शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

ममता सरकार के बोर्ड ने 2015 में किया था खान की रिहाई का समर्थन

साल 2007 में CPI-M के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने खान की समय से पहले रिहाई की प्रक्रिया शुरू की थी। जेल विभाग ने 14 साल की सजा पूरी करने के बाद उसके मामले की सिफारिश की थी लेकिन यह प्रस्ताव रिहाई तक नहीं पहुँच सका था। बाद में 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि टाडा के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति को रिमिशन देने का अधिकार राज्य नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के पास है।

इसके बाद ममता बनर्जी सरकार ने इस प्रयास को फिर आगे बढ़ाया। मार्च 2015 में स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड ने 32 मामलों की समीक्षा कर खान सहित पाँच आजीवन कारावास भुगत रहे दोषियों की समय पूर्व रिहाई की सिफारिश की। इस दौरान मीडिया में भी खान को अच्छा व्यक्ति बताने की कोशिशें हुईं।

हालाँकि, उसकी रिहाई का औपचारिक आदेश जारी नहीं हो सका, क्योंकि वी श्रीहरन मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुछ श्रेणियों के मामलों में राज्य सरकारों द्वारा रिमिशन की शक्ति के प्रयोग पर अस्थायी रोक लगा दी थी।

इसके बाद खान का मामला इस कानूनी विवाद में उलझ गया कि टाडा जैसे केंद्रीय कानून के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति को रिमिशन देने का अधिकार राज्य सरकार के पास है या केंद्र के पास।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 2015 की सिफारिश खान के किसी बाद के दुराचार के कारण वापस नहीं ली गई थी। अदालत ने बाद में रिमिशन से इनकार किए जाने को अधिकार क्षेत्र को लेकर कानूनी भ्रम के कारण आया हृदय परिवर्तन बताया।

हालाँकि, बाद के सालों में पश्चिम बंगाल सरकार का रुख बदल गया। कोलकाता पुलिस की कड़ी आपत्तियों के बाद राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने 29 मई 2017 और 8 अगस्त 2018 को खान की रिहाई की माँग खारिज कर दी। पुलिस ने अपराध की गंभीरता, उसके सामाजिक प्रभाव और खान की भूमिका को आधार बनाया था।

फरवरी 2019 में बंगाल सरकार ने केंद्र को प्रतिकूल सिफारिश भेजी। इसके बाद गृह मंत्रालय ने उसके रिहाई की माँग ठुकरा दी। दिलचस्प रूप से, जिस पश्चिम बंगाल सरकार के सजा समीक्षा बोर्ड ने 2015 में खान की रिहाई की सिफारिश की थी।

उसी राज्य सरकार ने 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट के रिहाई आदेश को रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इस बीच सबसे बड़ा बदलाव यह था कि राज्य की सत्ता TMC के बजाय BJP के नेतृत्व वाली सरकार के हाथों में आ चुकी थी।

खान ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया?

खान के बेटे ने 2016 में सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत लंबित रिमिशन प्रक्रिया की जानकारी माँगी। बंगाल सरकार ने जवाब में पुष्टि की कि राज्य सजा समीक्षा बोर्ड ने 25 मार्च 2015 को खान की समयपूर्व रिहाई की सिफारिश की थी।

हालाँकि कुछ मामलों में राज्यों की रिमिशन शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई रोक के कारण इस निर्णय की दोबारा समीक्षा की गई। जुलाई 2016 में एक अन्य RTI जवाब में भी कहा गया कि राज्य सरकार इस सिफारिश को लागू नहीं कर सकी थी।

इसके बाद 8 अगस्त 2016 को खान ने अपने सह-दोषी की रिहाई और बंगाल सरकार की पूर्व सिफारिश का हवाला देते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिमिशन के लिए आवेदन दिया। उसके बेटे ने कई बार रिमाइंडर भेजे जबकि गृह मंत्रालय ने सितंबर और नवंबर 2017 में बताया कि आवेदन अभी विचाराधीन है।

आखिरकार खान ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया। उसका तर्क था कि टाडा एक केंद्रीय कानून है, इसलिए रिमिशन पर फैसला लेने का अधिकार नई दिल्ली स्थित केंद्र सरकार के पास है। उसने राज्य सजा समीक्षा बोर्ड द्वारा 2017 और 2018 में उसकी रिहाई की माँग खारिज किए जाने को चुनौती दी और समय पूर्व रिहाई के निर्देश की माँग की।

बऊबाजार में सट्टा अड्डे के ऊपर बम बनाए गए

यह मामला 16 मार्च 1993 की रात मध्य कोलकाता के बऊबाजार स्थित 266-268A और 267 बी बी गांगुली स्ट्रीट क्षेत्र में हुए भीषण विस्फोट से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार, यह स्थान खान से जुड़े अवैध सट्टा अड्डों के ऊपर या आसपास संचालित एक गुप्त बम निर्माण केंद्र था।

अदालती दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, मोहम्मद खालिद ने खान के निर्देश पर नाइट्रोग्लिसरीन और बम व ग्रेनेड बनाने में इस्तेमाल होने वाले अन्य रसायनों की व्यवस्था की थी। इन विस्फोटक सामग्रियों की खरीद और प्रसंस्करण के लिए वित्तीय सहायता खान ने उपलब्ध कराई थी।

अभियोजन के अनुसार, खान का सट्टा कारोबार इस गतिविधि की आड़ बना। सट्टेबाजी से जुड़े लोगों की आवाजाही, शोर-शराबे और देर रात तक चलने वाली गतिविधियों के कारण विस्फोटक सामग्री लाना और बम तैयार करना बिना संदेह पैदा किए संभव हो सका।

सत्र न्यायालय में सुनवाई के दौरान जाँच एजेंसियों ने बताया कि आरोपितों ने अत्यधिक मात्रा में विस्फोटक पदार्थ जमा कर लिए थे, जिन्हें सुरक्षित रूप से संभालना या रखना संभव नहीं था। खालिद को मुख्य बम निर्माता बताया गया जबकि खान को इस पूरी साजिश का वित्तपोषक, आयोजक और संचालन करने वाला मुख्य व्यक्ति बताया गया।

अभियोजन पक्ष का कहना था कि ये बम भविष्य में आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल किए जाने के लिए बनाए जा रहे थे। बऊबाजार विस्फोट स्वयं नियोजित हमला नहीं था बल्कि बम फैक्ट्री में जमा विस्फोटकों और तैयार उपकरणों के आकस्मिक विस्फोट का परिणाम था।

बताया गया कि शुरुआती चिंगारी के बाद वहाँ रखी विस्फोटक सामग्री में एक के बाद एक धमाके हुए। विस्फोट की तीव्रता से लैब पूरी तरह तबाह हो गई और आसपास की इमारतें भी ध्वस्त हो गईं। घनी आबादी, संकरी गलियों और एक-दूसरे से सटी इमारतों के कारण जनहानि का दायरा और बढ़ गया।

इस प्रकार बऊबाजार विस्फोट किसी सार्वजनिक स्थान को निशाना बनाकर किए गए टाइम-बम हमले से अलग था। अभियोजन के अनुसार, यह घटना एक सक्रिय बम फैक्ट्री का पर्दाफाश थी, जहाँ भविष्य में इस्तेमाल के लिए तैयार किए जा रहे विस्फोटक समय से पहले ही फट गए थे।

69 लोग मारे गए और इमारतें मलबे में तब्दील हो गईं

17 मार्च 1993 को दर्ज किए गए FIR में शुरुआत में 40 लोगों की मौत और कई अन्य के गंभीर रूप से घायल होने का उल्लेख किया गया था। बाद में मृतकों की संख्या बढ़ गई। बाद की न्यायिक कार्यवाही में राज्य सरकार ने बताया कि इस विस्फोट में कुल 69 लोगों की मौत हुई और 46 लोग घायल हुए। आठ इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गईं या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुईं।

मामले की शुरुआत में IPC की धारा 120B (आपराधिक साजिश), 436, 326 और 307 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धाराओं के तहत हुई थी। बाद में मृतकों की संख्या बढ़ने पर हत्या की धाराएँ भी जोड़ दी गईं।

अभियोजन के अनुसार, मलबे की फोरेंसिक जाँच में विस्फोटक अवशेष, तार, टुकड़े और बम निर्माण से जुड़ी अन्य सामग्री बरामद हुई। जाँच एजेंसियों ने यह संभावना खारिज कर दी कि तबाही किसी गैस रिसाव या सामान्य दुर्घटना का परिणाम थी। गवाहों के बयान और घटनास्थल से मिले सबूतों ने भी इस स्थान को खान के अवैध सट्टा कारोबार से जोड़ दिया। मई 1993 में मामले में टाडा की धाराएँ जोड़ी गईं।

टाडा कोर्ट ने खान और उसके साथियों को दोषी ठहराया

2001 में टाडा की नामित अदालत ने मोहम्मद राशिद खान और उसके कई सहयोगियों को दोषी ठहराया। खान को हत्या, आपराधिक साजिश, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के उल्लंघन तथा टाडा के तहत अलग-अलग अपराधों का दोषी पाया गया।

अभियोजन पक्ष ने मोहम्मद खालिद को बम बनाने वाला प्रमुख व्यक्ति बताया, जबकि खान को पूरी साजिश का आयोजक, वित्तपोषक और संचालन करने वाला मुख्य व्यक्ति बताया गया। बाद के सालों तक पश्चिम बंगाल सरकार ने खान को इस मामले का मास्टरमाइंड बताते हुए उसकी समय से पूर्व रिहाई का विरोध किया।

इसके बाद खान और अन्य दोषियों द्वारा दायर अपीलों को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया तथा उनकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा।

अब यह मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है, जहाँ यह तय किया जाएगा कि राशिद खान को दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा रिमिशन (सजा में छूट) देना उचित था या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर विस्तार से सुनवाई करेगा। तब तक मोहम्मद राशिद खान जेल में ही रहेगा, क्योंकि शीर्ष अदालत द्वारा लगाई गई अंतरिम रोक के चलते उसकी रिहाई संबंधी दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को फिलहाल लागू नहीं किया जा सकता।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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