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विकिपीडिया ने अपने को-फाउंडर पर लगाया कम्युनिटी बैन, वामपंथी सेंसरशिप पर बेबाक विचार और हिन्दू विरोधी भावनाओं का किया था लैरी सैंगर ने विरोध: जानिए क्या है पूरा मामला

यह प्रतिबंध सैंगर के CNN-News18 इंटरव्यू और 'विकिप्रोजेक्ट इंटेलेक्चुअल डाइवर्सिटी' के प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद लगाया गया। साथ ही विकिपीडिया के एडिटर्स ने बार-बार OpIndia का मुद्दा उठाया और ऑनलाइन कम्युनिटी की कार्यवाही के दौरान सैंगर ने जब ऑपइंडिया का बचाव किया तो ये उनके खिलाफ सबूत के तौर पर पेश किया गया।

22 जून 2026 को विकिपीडिया ने अपने को-फाउंडर लैरी सैंगर पर कम्युनिटी बैन लगा दिया। एडिटर्स के एक ग्रुप ने उन पर ऑफ़-विकि कैन्वसिंग (विकिपीडिया के बाहर प्रचार करने), प्लेटफॉर्म को विचारधारा की लड़ाई का अखाड़ा बनाने और मौजूदा कंटेंट सिस्टम के खिलाफ यूजर्स को एकजुट करने की कोशिश करने का आरोप लगाया था, जिसके बाद उन्हें इनसाइक्लोपीडिया में बदलाव करने से रोक दिया गया।

इस पर अंतिम फैसला एडमिनिस्ट्रेटर्स के बीच लंबी बातचीत के बाद लिया गया, जिसमें सैंगर पर बैन लगाने को लेकर ‘सहमति’ बनी। फैसला सुनाने वाले एडमिनिस्ट्रेटर का कहना था कि सैंगर ने विकी के बाहर कैंपेनिंग (ऑफ-विकी कैनवासिंग) की थी, वे ‘एनसाइक्लोपीडिया को रचनात्मक’ बनाने वाले लोगों में नहीं थे और उन्होंने गुमनाम एडिटर्स की पहचान उजागर करने (आउटिंग) की माँग की थी और इसको लेकर चिंता जताया था। इसे भी ‘नियम का उल्लंघन’ माना गया।

शुरुआत में एक एडमिनिस्ट्रेटर ने सैंगर को तभी बैन कर दिया, जब उनके मुद्दे पर 72 घंटे की चर्चा खत्म भी नहीं हुई थी। हालाँकि इस कार्रवाई को वापस ले लिया गया। इसके बाद प्रक्रिया के पूरे होने का इंतजार किया गया । इसके बाद एक दूसरे एडमिनिस्ट्रेटर ने औपचारिक तौर पर कम्युनिटी बैन की सजा को लागू कर दिया।

यह कार्रवाई सैंगर के CNN-News18 पर आने और विकिपीडिया के साफ तौर पर वामपंथी झुकाव, हिंदू-विरोधी मानसिकता और उसके सोर्स-कंट्रोल सिस्टम के बारे में बात करने के बाद लिया गया। उन्होंने खुल कर कंजर्वेटिव और गैर-वामपंथी प्रकाशनों को बाहर रखने के तरीके के बारे में बताया था । इसके कुछ दिनों बाद ही उनपर बैन लगाने की कार्रवाई हुई।

दरअसल इस इंटरव्यू का जिक्र विकिपीडिया की आंतरिक कार्यवाही में किया गया और उन्हें हटाने की माँग करने वाले एडिटर्स ने इसका इस्तेमाल किया। गौरतलब है कि सैंगर विकिपीडिया के मुखर आलोचक रहे हैं और उन्होंने कई बार आरोप लगाया है कि इस पर वामपंथी विचारधारा का कब्जा हो गया है। 2020 में OpIndia के साथ बातचीत के दौरान भी उन्होंने ऐसा ही कहा था।

कब शुरू हुआ ये मामला

यह विवाद सैंगर के ‘विकिप्रोजेक्ट इंटेलेक्चुअल डाइवर्सिटी’ (WPID) का प्रस्ताव रखने और सोशल मीडिया के जरिए बाहर से लोगों को इस चर्चा में शामिल होने के लिए कहने पर शुरू हुआ। उन्होंने मानना था कि यह एडिटर्स का ऐसा ग्रुप होगा, जो निष्पक्ष फैसला लेने, सच्ची जानकारी देने, ज्यादा सोर्स का इस्तेमाल करने, एडमिनिस्ट्रेटिव जवाबदेही के साथ-साथ उन नजरियों को जगह देगा, जिन्हें विकिपीडिया से बाहर कर दिया गया है।

इस प्रोजेक्ट में एक ‘पॉलिसी स्कैनर’ भी शामिल था जो 90 से ज्यादा पॉलिसी पेजों, नोटिसबोर्ड और अंदरूनी चर्चाओं पर नजर रखता। सैंगर ने कहा कि यह सिर्फ यूजर्स को जरूरी बहसों के बारे में अलर्ट करेगा और किसी को यह नहीं बताएगा कि क्या लिखना है या कैसे वोट करना है।

हालाँकि विकिपीडिया एडिटर्स का दावा था कि इस प्रोजेक्ट का मकसद आर्टिकल को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि एक लॉबिंग ग्रुप की तरह काम करना था। उनका दावा था कि स्कैनर एक जैसी सोच वाले एडिटर्स को पॉलिसी विवादों की ओर ले जा सकता है, जिससे विकिपीडिया की ‘आम सहमति’ प्रभावित हो सकती है। उन्होंने WPID की ‘भरोसेमंद सोर्स’, ‘उचित महत्व’ और ‘दरकिनार किए गए विचारों’ से जुड़े नियमों पर फिर से विचार करने की माँग पर भी आपत्ति जताई।

करीब 5 दिनों में 113 एडिटर्स ने 396 कमेंट्स किए, जिसके बाद प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया। क्लोजिंग नोट में कहा गया कि WPID मुख्य रूप से एक एडवोकेसी और पॉलिसी-लॉबिंग ग्रुप के तौर पर काम करेगा और इसके स्कैनर और लोगों को जोड़ने की कोशिशों से ‘ऑर्गनाइज़्ड कैनवासिंग या वोट-स्टैकिंग’ (संगठित तरीके से वोट जुटाने या हेरफेर करने) का खतरा है।

विकिपीडिया एडिटर्स ने जिस तरह से WPID के खिलाफ विरोधी तेवर अपनाए, वह उम्मीद के मुताबिक ही था। विकिपीडिया के को-फाउंडर सैंगर इस प्लेटफॉर्म पर ज्यादा स्पष्टता और जवाबदेही लाना चाहते थे, जो वामपंथी प्रोपेगैंडा का अड्डा बन गया है। विकिपीडिया अक्सर अपने फैसलों को आम सहमति की तरह पेश करता है, लेकिन जब एक ग्रुप ने उस सहमति के पीछे की वैचारिक मान्यताओं पर सवाल उठाने की कोशिश की, तो उसे खतरनाक माना गया।

CNN-News18 का इंटरव्यू सैंगर के खिलाफ सबूत बन गया

सैंगर 20 जून 2026 को CNN-News18 के ‘प्लेन स्पीक’ पॉडकास्ट में शामिल हुए। इंटरव्यू के दौरान, सैंगर ने कहा कि विकिपीडिया की मुख्य समस्या यह है कि वह किसे भरोसेमंद सोर्स मानता है, इस पर उसका कंट्रोल है। उन्होंने बताया कि प्लेटफॉर्म ज्यादातर वामपंथी और पहले से तय सोर्स को चुनता है, जबकि कंजर्वेटिव या दक्षिणपंथी झुकाव वाले पब्लिकेशन को बाहर रखता है। ऐसे में आर्टिकल को निष्पक्ष कैसे कहा जा सकता है, इसमें सिर्फ घोषित सोर्स के पहलू को सही ढंग से दिखाया जाता है।

भारत के बारे में बात करते हुए सैंगर ने कहा कि उनका मानना ​​है कि विकिपीडिया का हिंदू-विरोधी झुकाव एक सच्चाई है, हालाँकि उन्होंने माना कि वे इसकी ‘असली वजह’ को पक्के तौर पर साबित नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि पश्चिमी वामपंथी पत्रकार अक्सर मुसलमानों का नजरिया दिखाने की कोशिश करते हैं और उसकी ओर झुके होते हैं। यही विचारधारा विकिपीडिया के स्रोतों के जरिए आ गई है।

सैंगर ने यह भी कहा कि वामपंथियों ने विकिपीडिया पर भी उसी तरह कब्जा कर लिया है, जैसे उन्होंने दूसरे सांस्कृतिक संस्थानों पर किया था। उनके मुताबिक, 2010 तक विकिपीडिया का झुकाव BBC और ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ जैसा होने लगा था । ब्रेक्जिट और डोनाल्ड ट्रंप के पहले चुनाव के बाद यह और भी साफ हो गया।

जब उनसे पूछा गया कि जो भारतीय और हिंदू विकिपीडिया को पक्षपाती मानते हैं, वे क्या कर सकते हैं, तो सैंगर ने उन्हें विकिपीडिया और WPID से जुड़ने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि सक्रिय रूप से एडिट करने वाले लोगों का समुदाय ज्यादातर पाठकों की सोच से कहीं छोटा है। उनका मानना है कि भारत में इतने पढ़े-लिखे लोग हैं कि वे कई काबिल लेखक तैयार कर सकते हैं जो यह सीख सकें कि यह प्लेटफॉर्म कैसे काम करता है।
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इसी बात से विकिपीडिया के एडिटर्स नाराज हो गए। उन्होंने इन बातों को ‘कैन्वसिंग’ (समर्थन जुटाने की कोशिश) का सबूत बताया। उन्होंने इस निमंत्रण को भारतीय या हिंदू एडिटर्स का ग्रुप तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा, ताकि अंदरूनी हालात को बदला जा सके। ऐसे एडिटर्स उस गलत जानकारी को ठीक कर सकते हैं जो भारत और हिन्दुओं के खिलाफ फैलाई जा रही है। इसलिए इसे विकिपीडिया के अस्तित्व के लिए खतरा बता दिया गया।

विकिपीडिया ने उन्हें बैन क्यों किया?

OpIndia ने उस चर्चा को देखा जिसका लिंक सैंगर ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर शेयर किया था। एडमिनिस्ट्रेटर्स की चर्चा सिर्फ एक सोशल-मीडिया पोस्ट या एक टीवी इंटरव्यू से कहीं अधिक थी।

सैंगर ने कहा कि विकिपीडिया से जुड़े लोग इस बात पर बहस कर रहे थे कि क्या WPID को मंजूरी दी जानी चाहिए। कई लोगों ने इसका विरोध किया तो कुछ ने समर्थन। एडिटर्स का तर्क था कि अपने 90000 से ज्यादा फॉलोअर्स को बेवजह परेशान करने जैसा है, क्योंकि इसमें विकिपीडिया के बाहर उन्हें ‘पक्षपातपूर्ण जानकारी’ मिलेगी।

उन्होंने एक पुरानी पोस्ट का भी जिक्र किया, जिसमें सैंगर ने लिखा था कि वामपंथियों ने विकिपीडिया पर कब्जा कर लिया है और कोई वजह नहीं है कि दूसरे लोग ‘वापस कब्जा’ न कर सकें। सैंगर ने बाद में ऐसी भाषा के इस्तेमाल पर अफसोस जताया, लेकिन वे अपनी बात पर अड़े रहे कि विकिपीडिया पर विचारधारा के आधार पर कब्जा कर लिया गया है।

अन्य आरोपों में यह दावा भी शामिल था कि उन्होंने हाल के दिनों में बहुत कम आर्टिकल एडिट किए हैं। अपना ज्यादातर वक्त विकिपीडिया में सुधार लाने में लगाई हैं। गुमनाम एडमिनिस्ट्रेटर्स की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि ताकतवर और ऊँचे पदों पर बैठे लोगों की पहचान सार्वजनिक होनी चाहिए। इसका उनके विरोधियों ने ‘डॉक्सिंग’ (किसी की निजी जानकारी सार्वजनिक करना) की तरह पेश किया। हालाँकि सैंगर ने इस आरोप को खारिज कर दिया।

सैंगर बुरी नीयत से निजी जानकारी उजागर करने और पॉलिसी बना कर उन्हें सार्वजनिक करने के बीच फर्क बताया। उन्होंने तर्क दिया कि गुमनाम यूजर्स जवाबदेही के बिना लाखों लोग जिस कंटेंट को पढ़ते हैं, उसे तय कर सकते हैं, इसमें योगदान देने वालों को ब्लॉक कर सकते हैं। लोगों की साख पर असर डाल सकते हैं, लेकिन पहचान उजागर नहीं कर सकते, ये कैसा इंसाफ है।

सैंगर ने इस पूरी प्रक्रिया को ‘मॉब ट्रायल’ कहा

सैंगर ने अपने एक बयान में कहा कि विकिपीडिया अब निष्पक्ष नहीं रहा और यह पूरी तरह से एक गुमनाम ‘भीड़’ के नियमों से चलने वाली ‘अराजक’ बन गया है। उन्होंने कहा कि विकिपीडिया के प्रशासकों ने उन्हें हटाने से पहले कोई औपचारिक आरोप तय नहीं किए, कोई उचित प्रक्रिया नहीं अपनाई और मनमाने ढंग से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। उन्होंने कहा कि जो लोग उनका बचाव कर सकते थे, उन्हें डराया-धमकाया गया था।

कैन्वसिंग (समर्थन जुटाने की कोशिश) के बारे में उन्होंने तर्क दिया कि विकीप्रोजेक्ट के आवेदकों से प्रतिभागियों को जोड़ने की उम्मीद की जाती थी और उन्हें ऐसा कोई नियम नहीं मिला जो स्पष्ट रूप से विकी के बाहर लोगों को जोड़ने (रिक्रूटमेंट) पर रोक लगाता हो। उन्होंने कहा कि CNN-News18 वाली अपील विकिपीडिया से जुड़ने का निमंत्रण थी, न कि किसी खास फैसले को प्रभावित करने की कोशिश।

उन्होंने पॉलिसी में बदलाव की माँग करने के अपने अधिकार का भी बचाव किया। सैंगर विकिपीडिया की मूल निष्पक्षता नीति (न्यूट्रैलिटी पॉलिसी) बनाने में मुख्य रूप से शामिल थे। उन्होंने तर्क दिया कि उसकी नीति पर सवाल उठाने का मतलब इनसाइक्लोपीडिया पर हमला नहीं माना जा सकता।

हालाँकि उनके बचाव से एडिटर्स का ग्रुप संतुष्ट नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि विकिपीडिया कोई अदालत नहीं है, चेतावनियाँ एडमिनिस्ट्रेटर्स की तरफ से ही आएँ, ऐसा जरूरी नहीं है और उनके लंबे-चौड़े जवाब खुद ही उनके विघटनकारी व्यवहार का सबूत था।

जिमी वेल्स ने अनिश्चितकालीन प्रतिबंध को ‘बेतुका’ बताया

विकिपीडिया के सह-संस्थापक जिमी वेल्स ने सार्वजनिक तौर पर प्रस्तावित अनिश्चितकालीन प्रतिबंध का कड़ा विरोध किया। सैंगर का समर्थन उन्होंने तब आया जब दोनों के बीच बातचीत बंद थी और एक समय उन्होंने सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को ब्लॉक भी कर दिया था। अपने बयान में सैंगर ने कहा कि उन्होंने वेल्स को पहले ही अनब्लॉक कर दिया था और उनसे भी ऐसी ही उम्मीद थी।

वेल्स ने कहा कि विकिपीडिया के लिए बौद्धिक विविधता जरूरी है और चेतावनी दी कि इस मामले से निष्पक्षता कमजोर हो सकती है। उन्होंने इस विचार को ‘बेतुका’ बताया कि सैंगर के व्यवहार के कारण उन पर अनिश्चित काल के लिए प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए, और एडिटर्स से आग्रह किया कि वे थोड़ा सोचें कि वे क्या कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि वह सैंगर के बौद्धिक विविधता और सोर्सिंग नीतियों पर विचार रखने के अधिकार का बचाव करने को तैयार हैं, भले ही वह उन सभी विचारों से सहमत न हों। वेल्स के अनुसार, एडिटर्स को बात सुननी चाहिए, सम्मानपूर्वक असहमति जतानी चाहिए, प्रस्तावों पर बहस करनी चाहिए और अगर उन्हें WPID से कोई दिक्कत हो, तो उसे खारिज कर देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि इस तरह से किसी पर प्रतिबंध लगाना गलत है। दिलचस्प बात यह है कि वेल्स लंबे समय से विकिपीडिया पर लोगों या स्रोतों पर प्रतिबंध लगाने का समर्थन करते रहे हैं। OpIndia भी इसका शिकार हुआ है, क्योंकि विकिपीडिया इस मीडिया हाउस को ‘विश्वसनीय’ स्रोत नहीं मानता, जबकि ‘द वायर’ जैसे फेक-न्यूज फैलाने वाले और प्रोपेगैंडा प्लेटफॉर्म को अपनी विश्वसनीय सूची में रखता है।

वेल्स ने उन वैचारिक समूहों तक पहुँचने का भी बचाव किया जो खुद को विकिपीडिया से अलग-थलग महसूस करते थे। उन्होंने कहा कि अगर कंजर्वेटिव लोगों को यह यकीन हो जाए कि विकिपीडिया सिर्फ वामपंथी प्रोपेगैंडा है, तो वे इससे दूर रहेंगे, जिससे अंदरूनी तौर पर चर्चाओं में कंजर्वेटिव आवाजें नहीं होंगी और पक्षपात का खतरा बढ़ जाएगा।

उन्होंने असंतुष्ट यूजर्स को भाग लेने के लिए आमंत्रित करने और वोट में बाधा डालने या दुर्व्यवहार करने के लिए लोगों को शामिल करने के बीच अंतर बताया। वेल्स ने यह भी कहा कि सैंगर का व्यवहार और अधिक शालीन हो सकता था और उन्हें कुछ बातों के लिए माफी माँगनी चाहिए।

महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने सीधे हस्तक्षेप करने के लिए संस्थापक-स्तर के किसी अधिकार का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया, जबकि अगर उन्हें सच में लगता कि सैंगर को जवाबदेही की माँग करने का पूरा अधिकार है, तो उन्हें ऐसा करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि उनका कोई प्रशासनिक कार्रवाई करने का इरादा नहीं था और वह केवल एडिटर्स को विकिपीडिया के मूल्यों की याद दिलाने के लिए वहाँ मौजूद थे। आखिरकार उनकी आपत्ति को नजरअंदाज कर दिया गया और प्रतिबंध लगा दिया गया।

सैंगर के खिलाफ मामला बनाते समय विकिपीडिया एडिटर्स ने OpIndia को निशाना बनाया

विकिपीडिया एडिटर्स ने कार्यवाही के दौरान बार-बार OpIndia को निशाना बनाया और लैरी सैंगर ने जब इस पब्लिकेशन का समर्थन किया, तो उसे बैन करने के लिए ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल किया।

सैंगर के CNN-News18 इंटरव्यू का जिक्र करते हुए विकिपीडिया एडिटर Newslinger ने OpIndia को ‘एक धुर-दक्षिणपंथी मुस्लिम-विरोधी वेबसाइट बताया, जिसे 2020 में एक विकिपीडिया एडिटर की निजी जानकारी सार्वजनिक करने (डॉक्सिंग) के लिए ब्लैकलिस्ट किया गया था।’ एडिटर ने आगे बताया कि सैंगर ने OpIndia और Swarajya को हिंदू धार्मिक सिद्धांतों को समझने के लिए ‘महत्वपूर्ण धार्मिक स्रोतों’ में से एक बताया था।

(स्रोत-विकिपीडिया)

सैंगर के खिलाफ कार्रवाई का समर्थन कर रहे एडिटर Newslinger ने सैंगर पर आरोप लगाया कि उन्होंने ‘उन वेबसाइट्स को फिर से शामिल करने की वकालत की थी जिन्हें एडिटर्स की निजी जानकारी सार्वजनिक करने (डॉक्सिंग) के कारण ब्लैकलिस्ट किया गया था, जिनमें ब्रेटबार्ट न्यूज और ऑपइंडिया शामिल हैं।’

(स्रोत-विकिपीडिया)

OpIndia पर ध्यान देना कोई इत्तेफ़ाक नहीं था। विकिपीडिया के एडिटर्स ने इस पब्लिकेशन के लिए सैंगर के बचाव को इस बात के सबूत के तौर पर पेश किया कि वह कथित तौर पर ‘भरोसेमंद न माने जाने वाले सोर्स’ को प्लेटफॉर्म पर वापस लाना चाहते थे। असल में एक भारतीय पब्लिकेशन, जिसने विकिपीडिया के हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी पक्षपात को बड़े पैमाने पर डॉक्यूमेंट किया था, उसी का इस्तेमाल उस व्यक्ति के खिलाफ सबूत के तौर पर किया गया, जिसने वैचारिक गेटकीपिंग पर सवाल उठाए थे।

OpIndia को सालों से विकिपीडिया की दुश्मनी का सामना करना पड़ा है। इस पब्लिकेशन को तब ब्लैकलिस्ट कर दिया गया जब उसने विवादित विकिपीडिया पेजों को कंट्रोल करने वाले लोगों की जाँच की। प्रभावशाली एडिटर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स की भूमिका को डॉक्यूमेंट किया और यह उजागर किया कि कैसे असुविधाजनक तथ्यों को जोड़ने की कोशिशों को अक्सर रोक दिया जाता था।

2020 में सैंगर के साथ OpIndia के पिछले इंटरव्यू के दौरान एडिटर-इन-चीफ नूपुर जे शर्मा ने बताया था कि विकिपीडिया ने पूरी वेबसाइट को तब ब्लैकलिस्ट कर दिया था, जब उन्होंने उन एडिटर्स और एडमिनिस्ट्रेटर्स के बारे में लिखा था, जो पक्षपाती पेजों को लॉक कर रहे थे और यह सुनिश्चित कर रहे थे कि उन्हें सही करने की कोशिश न हो सके।

सेंगर ने जवाब दिया, “उनमें कोई तहजीब नहीं है। मैं क्या कहूँ? मैं लंबे समय से इस तरह की बातें कह रहा हूँ, लेकिन हालात और खराब हो गए हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि 2015 के आसपास से विकिपीडिया में ‘तेजी से गिरावट’ आई है। चाहे वह पक्षपातपूर्ण रवैया हो या फिर इसकी एडिटिंग कम्युनिटी का बंद हो जाना।

हाल की घटनाओं से साफ पता चला कि यह सिस्टम कैसे काम करता है। विकिपीडिया एडिटर्स ने OpIndia की जो छवि बनाई, उसे ही अंतिम सच मान लिया गया। जब सेंगर ने उस पहचान पर सवाल उठाए, तो इसे गलत व्यवहार का सबूत मान लिया गया। इस बात पर कोई गंभीरता से विचार नहीं किया गया कि क्या OpIndia को इसलिए ब्लैकलिस्ट किया गया था क्योंकि उसकी जाँच-पड़ताल ने विकिपीडिया के जमे-जमाए एडिटर्स के अधिकार और गुमनामी को चुनौती दी थी।

इस तरह प्लेटफॉर्म के एडिटर्स ने उस आलोचक और उस पब्लिकेशन दोनों को निशाना बनाया, जिन्होंने विकिपीडिया की समस्या को उजागर किया था। सैंगर पर OpIndia का बचाव करने को गलत तरीके से लिया गया और Wikipedia के एडिटोरियल गुट के बारे में OpIndia के खुलासों का इस्तेमाल उन्हें बैन लगाने के लिए किया गया।।

Wikipedia का हिंदू-विरोधी रवैया

Wikipedia के बारे में सैंगर की आलोचना OpIndia द्वारा 2024 में प्रकाशित 187 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट के नतीजों से मेल खाती है। इस रिसर्च में Wikipedia की आंतरिक चर्चाओं, एडिटिंग हिस्ट्री, सोर्स-क्लासिफिकेशन सिस्टम, एडमिनिस्ट्रेटर हायरार्की, फाइनेंशियल डिस्क्लोजर और विकिमीडिया फाउंडेशन के फंडिंग संबंधों की जाँच की गई, जिसमें भारत और हिंदू-संबंधी विषयों पर खास ध्यान दिया गया।

इस रिपोर्ट ने Wikipedia के उस दावे को चुनौती दी गई, जिसमें कहा जाता है कि ओपन इनसाइक्लोपीडिया है जिसे बिना किसी केंद्रीय संपादकीय हस्तक्षेप के बिना पैसे लिए काम करने वाले वॉलंटियर्स स्वतंत्र रूप से लिखते हैं। इसमें बताया गया कि कैसे एडमिनिस्ट्रेटर्स और प्रभावशाली एडिटर्स का एक छोटा समूह यह तय करता है कि किन सोर्स का हवाला दिया जा सकता है, किन तथ्यों को आर्टिकल में रखा जा सकता है, विवादित विषयों में कौन भाग ले सकता है और किन कंट्रीब्यूटर्स को प्लेटफॉर्म से ब्लॉक किया जा सकता है।

रिसर्च के समय दुनिया भर में Wikipedia के केवल 435 एक्टिव एडमिनिस्ट्रेटर्स थे। ये एडमिनिस्ट्रेटर्स यूजर्स को ब्लॉक कर सकते थे, एडिटिंग पर रोक लगा सकते थे, विवादित पेजों को सुरक्षित कर सकते थे, आर्टिकल हटा सकते थे, विवादों को सुलझा सकते थे और प्रतिबंध लागू कर सकते थे। इनके ऊपर आर्बिट्रेशन कमेटी थी, जो असल में Wikipedia की सबसे बड़ी आंतरिक निर्णय लेने वाली संस्था के तौर पर काम करती है।

इनमें से ज्यादातर प्रभावशाली यूजर्स छद्म नामों (pseudonyms) से काम करते थे। उनकी पहचान, जुड़ाव, नियोक्ता और हितों के संभावित टकराव के बारे में जनता को पता नहीं था, जबकि उनके फैसलों का असर उन आर्टिकल्स पर पड़ता था जिन्हें लाखों लोग पढ़ते थे। यह स्ट्रक्चर लोगों की सामूहिक समझ से चलने वाला कोई खुला सिस्टम नहीं था। यह एक संपादकीय पदानुक्रम (editorial hierarchy) था जिसमें गुमनाम लोगों के पास वैसी ही शक्तियां थीं, जैसी पारंपरिक पब्लिशिंग संस्थाओं में एडिटर्स के पास होती हैं।

‘विश्वसनीय सोर्स’ का सिस्टम कैसे पक्षपातपूर्ण होता है

Wikipedia खास तौर पर कंटेंट को कंट्रोल करता है। एक बार जब किसी पब्लिकेशन को प्रतिबंधित या ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है, तो उसकी रिपोर्ट का इस्तेमाल आमतौर पर Wikipedia के आर्टिकल्स में जानकारी के समर्थन के लिए नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब है कि तथ्य के तौर पर सही रिपोर्ट, एक्सक्लूसिव बयान या सीधे उद्धरण (direct quotation) को भी सिर्फ इसलिए खारिज किया जा सकता है, क्योंकि Wikipedia के एडिटर्स ने उस पब्लिकेशन पर रोक लगा रखी है, जिसमें वह जानकारी है। डोजियर में बताया गया है कि OpIndia और Swarajya को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था, जबकि The Wire, Scroll, Newslaundry और The Print जैसे वामपंथी झुकाव वाले प्रकाशनों को स्वीकार्य माना गया। Al Jazeera, BBC, The Guardian, CNN और The New York Times जैसे अंतरराष्ट्रीय आउटलेट्स के साथ भी कहीं बेहतर व्यवहार किया गया।ो

इससे Wikipedia यह दावा कर पाता है कि कोई लेख निष्पक्ष रूप से अपने स्रोतों को दिखाता है, जबकि उसके एडिटर्स पहले ही दूसरे पक्ष को दिखाने वाले स्रोतों को हटा चुके होते हैं।

एक उदाहरण भारत की नौसेना क्षमताओं पर The Wire की रिपोर्टिंग से जुड़ा है। रिटायर्ड कमोडोर जयदीप माओलंकर ने प्रकाशन पर आरोप लगाया कि उसने भारतीय नौसेना की उपलब्धियों को कम दिखाने के लिए उनकी बातों को गलत तरीके से पेश किया। OpIndia ने उनके बयान को कवर किया, लेकिन Wikipedia के एडिटर्स ने The Wire के लेख में इस विवाद को शामिल करने से इनकार कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि माओलंकर का अपना स्पष्टीकरण खुद से प्रकाशित स्रोत था, जबकि OpIndia का हवाला नहीं दिया जा सकता था, क्योंकि उसे पहले ही ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था।

सही जानकारी को शामिल नहीं किया गया, ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि वह गलत थी, बल्कि Wikipedia के स्रोत-नियंत्रण सिस्टम ने उस प्रकाशन को ही हटा दिया था, इस वजह से हुआ।

डोजियर में The Wire से जुड़े गलत जानकारी वाले अन्य विवादों के प्रति Wikipedia के रवैये की जाँच करते समय भी इसी तरह का विरोध देखा गया। असहज तथ्यों को जोड़ने के प्रयासों में देरी की गई, उन्हें कमजोर किया गया या खारिज कर दिया गया। जबकि गैर-वामपंथी प्रकाशनों के बारे में नकारात्मक विवरणों को उसी वैचारिक समूह द्वारा स्वीकृत स्रोतों का उपयोग करके प्रमुखता से पेश किया गया।

लेखों में हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी नैरेटिव

डोजियर में भारत से संबंधित कई लेखों की जाँच की गई, जिनमें 2020 के दिल्ली दंगे, गोधरा ट्रेन अग्निकांड, ‘जय श्री राम’ का नारा, ‘हिंदू आतंकवाद’, नरेंद्र मोदी, प्रेस की स्वतंत्रता और भारतीय लोकतंत्र से जुड़े लेख शामिल थे।

इसमें दर्ज किया गया कि कैसे हिंदू पीड़ितों, इस्लामी हिंसा और वामपंथी नैरेटिव को बनाए रखने के लिए ‘असहज’ सबूतों को कम करके आँका गया। उसे दबा दिया गया। जबकि एक्टिविस्ट संगठनों और विदेशी प्रकाशनों के दावों को Wikipedia के आधिकारिक नैरेटिव में प्रमुखता दी गई।

गोधरा ट्रेन अग्निकांड पर लेख में OpIndia ने पाया कि हिंदू यात्रियों की सुनियोजित हत्या को ऐसी भाषा और नैरेटिव के जरिए कम करके दिखाया गया, जिसमें विवादित थ्योरी को प्रमुखता दी गई थी। ‘हिंदू आतंकवाद’ से जुड़े लेखों में बरी होने के फैसलों, सबूतों की कमी और अभियोजन पक्ष के कई दावों को गलत साबित कर आरोपों और राजनीतिक शब्दावली को अधिक प्रमुखता दी गई।

गोधरा ट्रेन जलाने पर आर्टिकल में, OpIndia ने पाया कि हिंदू यात्रियों की सुनियोजित हत्या को भाषा और फ्रेमिंग के जरिए कमजोर किया गया, जिससे विवादित थ्योरीज सामने आईं। ‘हिंदू आतंकवाद’ से जुड़े आर्टिकल में, आरोपों और पॉलिटिकल टर्मिनोलॉजी को बरी होने, सबूतों की नाकामी और कई प्रॉसिक्यूशन क्लेम के फेल होने से ज्यादा अहमियत मिली।

OpIndia ने ‘जय श्री राम’ के ट्रीटमेंट की भी जाँच की, यह तर्क देते हुए कि विकिपीडिया हिंदू धार्मिक अभिव्यक्ति को हिंसा और धमकी से जोड़ने वाली दुश्मनी भरी रिपोर्टों पर बहुत ज्यादा निर्भर था। इसके नतीजे में बने आर्टिकल में सिर्फ नारे से जुड़े विवादों के बारे में ही नहीं बताया गया, बल्कि अभिव्यक्ति को ही एक नेगेटिव पॉलिटिकल और कम्युनल नजरिए से दिखाने में मदद की गई।

ये बातें इसलिए मायने रखती हैं, क्योंकि विकिपीडिया सिर्फ अपनी वेबसाइट तक ही सीमित नहीं रहता। इसके आर्टिकल Google पर खास तौर पर दिखाए जाते हैं, नॉलेज पैनल में इस्तेमाल किए जाते हैं, आर्टिफिशियल-इंटेलिजेंस सिस्टम द्वारा कोट किए जाते हैं और पत्रकारों, छात्रों और रिसर्चर्स द्वारा बैकग्राउंड मटीरियल के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं।

जून 2024 में भारत को विकिमीडिया प्रोजेक्ट्स पर लगभग 796 मिलियन पेज व्यू मिले, जबकि भारतीय इंग्लिश विकिपीडिया में कंट्रीब्यूट करने वालों के सबसे बड़े ग्रुप में शामिल थे। भारतीय आम चुनाव, नरेंद्र मोदी, NDA, लोकसभा और भारत के बारे में आर्टिकल को लाखों व्यूज मिले। इसलिए, विकिपीडिया पर एक गलत एंट्री यह तय कर सकती है कि दुनिया भर में किसी भारतीय इवेंट, ऑर्गनाइजेशन या पब्लिक फिगर को कैसे समझा जाएगा।

विकिमीडिया ने उस एडिटर को फंड दिया जिसने सेंगर और ऑपइंडिया को टारगेट किया

डॉसियर में विकिपीडिया के एडिटर और एडमिनिस्ट्रेटर के लिए विकिमीडिया फाउंडेशन के आर्थिक सपोर्ट की भी जाँच की गई। इसमें न्यूजलिंगर के मामले को हाईलाइट किया गया, वही एडिटर जिसने बाद में सेंगर को टारगेट करने में अहम भूमिका निभाई।

न्यूजलिंगर ने विकिपीडिया की हमेशा चलने वाली सोर्स लिस्ट पर बहुत काम किया था। प्लेटफॉर्म के भरोसे के इंटरनल असेसमेंट के अनुसार पब्लिकेशन को क्लासिफाई करती है। बाद में उन्हें सोर्सर नाम के एक प्रोजेक्ट के लिए विकीक्रेड प्रोग्राम के जरिए फंडिंग मिली।

प्रपोजल में सोर्सर को एक ब्राउजर एक्सटेंशन और एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस के तौर पर बताया गया था, जो विकिपीडिया की सोर्स रेटिंग को इनसाइक्लोपीडिया से भी आगे ले जाएगा। इसे इंटरनेट यूजर्स को उनके पढ़े जा रहे पब्लिकेशन की क्वालिटी के बारे में बताने और डेवलपर्स को विकिपीडिया के भरोसेमंद क्लासिफिकेशन को दूसरी टेक्नोलॉजी में शामिल करने की इजाजत देने के लिए डिजाइन किया गया था।

अपने प्रपोजल में, न्यूजलिंगर ने कहा कि उन्होंने 20 महीने तक हमेशा चलने वाली सोर्स लिस्ट को बनाए रखा और बताया कि हजारों एडिटर्स ने इसका इस्तेमाल यह तय करने के लिए किया कि पब्लिकेशन विकिपीडिया पर दावों का समर्थन कर सकते हैं या नहीं। डॉसियर में तर्क दिया गया कि इसलिए विकिमीडिया एक सोर्स-क्लासिफिकेशन सिस्टम के इंस्टीट्यूशनलाइजेशन और बड़े पैमाने पर फैलाव के लिए फंडिंग कर रहा था, जिसे पहले से ही विचारधारा से प्रेरित एडिटर्स ने बनाया था।

उसी एडिटर ने बाद में सेंगर के CNN-News18 इंटरव्यू को विकिपीडिया कंट्रीब्यूटर की तरफ से देखी गई सबसे गलत हरकतों में से एक बताया। उन्होंने सेंगर पर भारतीयों को उकसाने का आरोप लगाया, ऑपइंडिया की ब्लैकलिस्टिंग का बचाव किया और कम्युनिटी बैन की माँग की।

डॉसियर में विकिपीडिया को पब्लिशर मानने की सिफारिश क्यों की गई

डॉसियर में, ऑपइंडिया ने यह नतीजा निकाला कि विकिपीडिया को अब खुद को एक पैसिव बिचौलिए के तौर पर पेश करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

इसके एडिटर सोर्स चुनते हैं, जानकारी हटाते हैं, खास तरह के कंटेंट को कमीशन या प्रमोट करते हैं, पेज लॉक करते हैं, एक एडिटोरियल लाइन लागू करते हैं और उन कंट्रीब्यूटर को बाहर कर देते हैं जो उस लाइन को चुनौती देते हैं। विकिमीडिया फाउंडेशन एडिटिंग, सोर्स असेसमेंट, कम्युनिटी प्रोजेक्ट और टेक्नोलॉजिकल टूल्स से जुड़े ग्रांट भी देता है जो जानकारी को पेश करने के तरीके पर असर डालते हैं।

OpIndia ने सुझाव दिया कि विकिपीडिया को भारत में कानूनी तौर पर एक पब्लिशर माना जाए और उसके प्लेटफॉर्म पर दिखने वाले कंटेंट के लिए सीधे तौर पर जवाबदेह बनाया जाए। इसने भारत में विकिमीडिया के फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन, ग्रांट और एक्टिविटी की जाँच की भी माँग की, खासकर इसलिए क्योंकि फाउंडेशन भारतीयों से डोनेशन इकट्ठा करता है और देश से जुड़े प्रोजेक्ट को फंड करता है, बिना अपने असर के बराबर कोई सीधी ऑफिशियल मौजूदगी बनाए।

OpIndia ने आगे एक भारतीय ब्राउजर एक्सटेंशन की सिफारिश की, जो विकिपीडिया आर्टिकल में भेदभाव और गलत जानकारी की पहचान कर सके और इस बात की जाँच की जाए कि क्या गूगल-विकिमीडिया का रिश्ता भारतीय पब्लिकेशन के लिए एंटी-कॉम्पिटिटिव नतीजे पैदा करता है। जब विकिपीडिया किसी भारतीय सोर्स को ब्लैकलिस्ट करता है और गूगल उसी समय घटनाओं के विकिपीडिया के वर्जन को ऊपर उठाता है, तो प्रभावित पब्लिकेशन न केवल रिप्रेजेंटेशन खो देता है बल्कि विजिबिलिटी, क्रेडिबिलिटी, ट्रैफिक और रेवेन्यू भी खो देता है।

डोसियर में विकिपीडिया को पब्लिशर मानने की सलाह क्यों दी गई?

डोसियर में OpIndia ने यह निष्कर्ष निकाला कि विकिपीडिया को अब खुद को एक पैसिव इंटरमीडियरी (निष्क्रिय मध्यस्थ) के तौर पर पेश करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

इसके एडिटर सोर्स चुनते हैं, जानकारी हटाते हैं, खास तरह के कंटेंट को बढ़ावा देते हैं या तैयार करवाते हैं, पेज लॉक करते हैं, एक एडिटोरियल लाइन तय करते हैं और उस लाइन को चुनौती देने वाले योगदानकर्ताओं को बाहर कर देते हैं। विकिमीडिया फाउंडेशन एडिटिंग, सोर्स के मूल्यांकन, कम्युनिटी प्रोजेक्ट्स और तकनीकी टूल से जुड़े ग्रांट भी देता है, जो इस बात पर असर डालते हैं कि जानकारी कैसे पेश की जाती है।

OpIndia ने सलाह दी कि भारत में विकिपीडिया को कानूनी तौर पर एक पब्लिशर माना जाए और उसके प्लेटफॉर्म पर दिखने वाले कंटेंट के लिए उसे सीधे तौर पर जवाबदेह बनाया जाए। इसने भारत में विकिमीडिया के वित्तीय लेन-देन, ग्रांट और गतिविधियों की जाँच की भी माँग की, खासकर इसलिए क्योंकि फाउंडेशन भारतीयों से दान इकट्ठा करता है और देश से जुड़े प्रोजेक्ट्स को फंड देता है, जबकि उसका कोई सीधा आधिकारिक अस्तित्व नहीं है जो उसके प्रभाव के बराबर हो।

OpIndia ने आगे एक ऐसे भारतीय ब्राउज़र एक्सटेंशन की भी सलाह दी जो विकिपीडिया लेखों में पक्षपात और गलत जानकारी की पहचान कर सके, और इस बात की जाँच की भी माँग की कि क्या Google-विकिमीडिया का रिश्ता भारतीय प्रकाशनों के लिए प्रतिस्पर्धा-विरोधी नतीजे पैदा करता है। जब विकिपीडिया किसी भारतीय सोर्स को ब्लैकलिस्ट करता है और Google साथ ही साथ घटनाओं के विकिमीडिया वाले वर्शन को ऊपर लाता है, तो प्रभावित प्रकाशन न केवल अपना प्रतिनिधित्व खो देता है, बल्कि उसकी दृश्यता, विश्वसनीयता, ट्रैफिक और राजस्व भी कम हो जाता है।

सेंजर पर लगे बैन ने अब डोसियर की मुख्य चेतावनी को सही साबित कर दिया है। विकिपीडिया का पक्षपात किसी एक वॉलंटियर की कभी-कभार होने वाली गलती नहीं है। इसे इसके सोर्स लिस्ट, गुमनाम एडमिनिस्ट्रेटर, आंतरिक प्रतिबंधों, ग्रांट और बिग टेक से मिलने वाले ज़बरदस्त प्रचार के जरिए सुरक्षित रखा जाता है।

वामपंथी कब्जे से इनकार करना हुआ मुश्किल

यह पूरा घटनाक्रम ने उस समस्या का जीता-जागता उदाहरण है, जिसका जिक्र सेंजर सालों से करते आ रहे हैं। एक ऐसा प्लेटफॉर्म जो दावा करता है कि कोई भी इसे एडिट कर सकता है, उसने अपने ही एक एडिटर को तब बैन कर दिया जब उन्होंने कम प्रतिनिधित्व वाले विचार के लोगों को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। विविधता की बात करने वाली कम्युनिटी ने बौद्धिक विविधता को एक संगठित खतरे के तौर पर देखा। निष्पक्ष होने का दावा करने वाले सिस्टम ने हिंदू-विरोधी पक्षपात के बारे में दिए गए एक इंटरव्यू का इस्तेमाल सबूत के तौर पर किया। इसमें सिस्टम को लेकर आवाज उठाने वाला व्यक्ति यहाँ बने रहने के लायक नहीं था।

विकिपीडिया के एडिटर इस बात पर जोर देते हैं कि सेंजर को उनके व्यवहार के लिए बैन किया गया था, न कि उनकी राय के लिए। फिर भी पूरी प्रक्रिया यह बताती है कि मुख्यधारा के सोर्स की आलोचना, OpIndia के बचाव में दिए गए तर्क, हिंदुओं और कंजर्वेटिव लोगों के शामिल होने के बारे में उनकी राय, और मौजूदा वैचारिक व्यवस्था द्वारा बनाए गए नियमों को उनकी चुनौती, इस बैन की मुख्य वजह है।

नतीजा यह है कि विकिपीडिया की कंटेंट मशीनरी उन विरोधी स्वर से बची रहती है, जो उसके पक्षपात को उजागर कर सकती हैं। इसके को-फ़ाउंडर को अब उसी संस्था से हटा दिया है, जिसे बनाने में उन्होंने मदद की थी। उन्हें इसलिए नहीं हटाया गया कि उन्होंने लेखों में तोड़-फोड़ की या मनगढ़ंत जानकारी डाली, बल्कि इसलिए हटाया गया कि उन्होंने खुलकर उस ‘लेफ्टिस्ट गेटकीपिंग’ को चुनौती दी जो यह तय करती है कि दुनिया के ‘सबसे प्रभावशाली ऑनलाइन इनसाइक्लोपीडिया’ पर कौन-से तथ्य, स्रोत और नजरिए मौजूद रह सकते हैं।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Anurag
Anuraghttps://lekhakanurag.com
Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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