कभी गेंडा (Rhino), कभी कौआ, कभी कॉकरोच… सुनने में ये सब किसी सर्कस का हिस्सा या इंटरनेट का कोई मीम लग सकता है। लेकिन यकीन मानिए, इनके नाम से किए जाने वाले प्रयोग और उनके नतीजे इतने गहरे हैं कि ये टाइम टाइम पर दुनिया भर की सरकारों की अटेंशन हासिल करने में कामयाब रहे हैं..
साल 1984 की बात है, कनाडा में एक सैटायरिकल पार्टी जन्म लेती है – ‘राइनोसेरोस पार्टी’। उनका चुनावी वादा था कि अगर वे सत्ता में आए, तो ‘ग्रेविटी (Gravity) का नियम ही बैन कर देंगे!’ ये सुनकर हँसी आपको भी आई होगी कि कोई पॉलिटिकल पार्टी फिजिक्स के नियमों को कैसे झूठा साबित कर सकती है? लेकिन जब नतीजे आए, तो पूरी दुनिया हैरान थी। इस मजाकिया पार्टी को जनता ने इतने बंपर ‘प्रोटेस्ट वोट’ दिए कि यह कनाडा की चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। यही प्रयोग पोलैंड में ‘बियर लवर्स पार्टी’ के साथ हुआ। और कुछ ऐसा ही आजकल भारत की राजनीति में भी आप सुन रहे होंगे.. मैं बात कर रहा हूँ कॉकरोच जनता पार्टी की.. और इस वीडियो में मैं आपको इस पार्टी के आइडिया बनने से लेकर आखिरकार 2026 में इसकी ऑफिशियल घोषणा के बीच क्या क्या हुआ …
यूट्यूब लिंक | Chapter 1 : The ‘Cockroach’ Blueprint: How CJP is Hacking Indian Politics | Cockroach Janata Party explained by Ashish Nautiyal
साल 2016 की बात है… एक तरफ भारत की राजनीति में आम आदमी पार्टी का विस्तार हो रहा था, और दूसरी तरफ दिल्ली के एक बंद कमरे में एक विदेशी मास्टरमाइंड के साथ भारत के एक जाने-माने एक्टिविस्ट बैठे थे- ये एक्टिविस्ट थे योगेंद्र यादव। आपको लग सकता है कि ये कोई साधारण मीटिंग थी, लेकिन ऐसा नहीं था। योगेंद्र यादव, जो पिछले एक दशक में कई कंट्रोवर्शियल एंटी-इंडिया मोमेंट्स और अराजकता फैलाने वाले इवेंट के केंद्र में रहे हैं, वहां कुछ “सीक्रेट फॉर्मूले” समझा रहे थे। और जानते हैं इस बातचीत में क्या तय होता है? तीन ऐसे सीक्रेट फॉर्मूले… जो दुनिया की किसी भी चुनी हुई सरकार को घुटनों पर ला सकते हैं। उस वक्त किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह मुलाकात, ठीक 10 साल बाद, यानी आज, जून 2026 में भारत की राजनीति में सबसे बड़ी डिबेट बन जाएगी.. जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) को आज सरकार ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा’ बता रही है, क्या वह वाकई अचानक पैदा हुई है? या फिर यह योगेंद्र यादव और उसी पुराने ‘एक्टिविस्ट-नेक्सस’ का एक नया डिजिटल अवतार है?
क्या देश की मोदी सरकार का भी अब वही हाल होने वाला है जो कभी ‘अरब स्प्रिंग’ में वहाँ की सरकारों का हुआ था? क्या वाकई हमारे देश में, पर्दे के पीछे से Regime Change का एक ऐसा इंटरनेशनल ब्लूप्रिंट एक्टिवेट हो चुका है, जो सरकार को सीधे घुटनों पर ले आएगा?
क्या कोई ऐसी राजनीतिक पार्टी की कल्पना कर सकता है, जो बिना किसी जमीनी रैली के, बिना किसी चुनावी फंड के, महज 7 दिनों के भीतर 2 करोड़ से ज्यादा युवाओं को अपने साथ जोड़ लेती है? एक ऐसी पार्टी जो देश की सबसे बड़ी रूलिंग पार्टी को सोशल मीडिया फॉलोअर्स के मामले में पीछे छोड़ देती है?
सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा लगता है। लेकिन मई 2026 में भारत ने इस थ्योरी को सच होते देखा। और इसका नाम है – कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)।
सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया। मंत्रियों ने कहा कि इसके पीछे पाकिस्तान और जॉर्ज सोरोस का हाथ है। और हर कोई ये तमाम बातें सुनकर हंस रहा था। आपको भी हँसी आई होगी.. लोगों का कहना है कि कॉकरोच नेशनल सिक्योरिटी के लिए खतरा कैसे हो सकता है? लेकिन इंटरनेट पर CJP की वेबसाइट और सोशल मीडिया हैंडल्स को रातों-रात ब्लॉक कर दिया गया। सवाल यह है कि क्या यह गुस्सा वाकई अचानक फूटा था? या फिर इसके पीछे एक ऐसा ग्लोबल मॉडल काम कर रहा था, जिसकी स्क्रिप्ट सालों पहले लिखी जा चुकी थी?
आज इस वीडियो में हम इस पूरी क्रोनोलॉजी और इसके पीछे के मैकेनिज्म को स्टेप-बाय-स्टेप डिकोड करेंगे। हम समझेंगे कि कैसे सत्ता को चुनौती देने के लिए एक ‘मजाकिया लहजे’, नौटंकी और मीम्स को हथियार बनाया जाता है, जिसे होशियार लोग नाम देते हैं, Laughtivism (हास्य-विरोध)। हम समझेंगे कि फिलीपींस मॉडल के जरिए पब्लिक मेंडेट को कैसे मैनिपुलेट किया जाता है, और सबसे बड़ा सवाल… कि इस पूरे खेल के केंद्र में कहीं वो चेहरा तो नहीं, जिसे इंटरनेट पर बरसों से एक खास नाम से ट्रोल किया जा रहा था, और जो आज अचानक व्लॉगिंग की आड़ में खुद को इस जाल से अलग दिखाने की कोशिश कर रहा है?
CHAPTER 1: आइडिया सीडिंग – ग्लोबल प्लेबुक (सर्बिया से भारत का कनेक्शन)
Ch 1: Global Playbook: Ideology Seeding
इस कहानी की शुरुआत मई 2026 से नहीं, बल्कि अमेरिका के एक राजनीतिक विचारक से होती है। नाम था जीन शार्प (Gene Sharp)। जीन शार्प कोई ऑन-ग्राउंड क्रांतिकारी नहीं थे, न ही कोई राजनीतिक नेता थे। उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन आधुनिक राजनीतिक आंदोलनों की दुनिया में उनका प्रभाव इतना बड़ा है कि कई लोग उन्हें ‘अहिंसक प्रतिरोध का मैकियावेली’ कहते हैं। (The Machiavelli of Non-Violent Resistance)
Sharp का एक बहुत बड़ा और बेसिक विचार था: सत्ता सिर्फ पुलिस, सेना और संसद से नहीं चलती। सत्ता चलती है जनता की ‘सहमति’ और उसके ‘सहयोग’ से। और अगर जनता सहयोग देना बंद कर दे… तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली शासन भी ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है। इसी विचार को उन्होंने अपनी किताब From Dictatorship to Democracy में लिखा, जो बाद में दुनिया भर के छात्र आंदोलनों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की गाइड बुक बन गई।
CHAPTER 2: सर्बिया – जहाँ पहला प्रयोग हुआ
Ch 2: Serbia’s “Otpor”: Birth of Laughtivism
जीन शार्प के इस विचार का जमीन पर पहला बड़ा प्रयोग हुआ आज से 28 साल पहले, साल 1998 में, सर्बिया में। उस समय सर्बिया पर स्लोबोदान मिलोशेविच (Slobodan Milošević) का शासन था। देश थका हुआ था, आर्थिक संकट में था और युवाओं में भारी असंतोष था। यहीं पर जन्म हुआ एक छात्र आंदोलन का, जिसका नाम था; ‘ओटपोर’ (Otpor), जिसका हिंदी में अर्थ होता है: प्रतिरोध (Resistance)
उन्होंने कोई पारंपरिक विरोध नहीं किया। उन्होंने बंदूकों या लाठियों के सामने सिर्फ नारेबाजी नहीं की। उन्होंने एक बिल्कुल नया हथियार चुना- उन्होंने लोगों को हँसाया, सत्ता का मजाक उड़ाया और व्यंग्य को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
जब पूरी दुनिया गंभीर राजनीतिक भाषण दे रही थी, तब Otpor के Activist सड़कों पर एक बड़ा ड्रम रख देते थे, जिस पर तानाशाह की तस्वीर होती थी। वो आम लोगों से कहते थे कि इसमें सिक्का डालो और सर्बिया के लीडर के सिर पर डंडा मारो। लोग हँसते थे, मजे लेते थे, फोटो खिंचवाते थे। नतीजा क्या हुआ? जनता के भीतर से सत्ता का वो खौफनाक डर धीरे-धीरे खत्म होने लगा..
यहीं से उभरता है इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड; स्र्द्जा पोपोविच (Srdja Popović)। पोपोविच ने महसूस किया कि अगर आप बंदूक के सामने गुस्सा दिखाएंगे, तो सत्ता आपको कुचल देगी। लेकिन अगर कोई सरकार मीम, पोस्टर, व्यंग्य और चुटकुलों से डरने लगे… तो वह खुद जनता की नजरों में हास्यास्पद और कमजोर दिखने लगती है। इसी विचार को उन्होंने नाम दिया- Laughtivism (Laugh + Activism), यानी हँसी को राजनीतिक हथियार में बदल देना।
CHAPTER 3: डिलेमा एक्शन और ‘lose lose’ कंडीशन
Ch 3: Dilemma Action: Trap Tactics
पोपोविच ने साल 2013 के अपने ‘फॉरेन पॉलिसी’ मैगजीन के लेख और अपनी चर्चित किताब “Blueprint for Revolution” में एक Theory दी; जिसे कहते हैं ‘डिलेमा एक्शन’ (Dilemma Action)।
भारतीय लोकतंत्र में सर्बिया की थ्योरी एवं ‘डिलेमा एक्शन’ अप्लाई करने की विवेचना करते हुए योगेंद्र यादव का बयान इस लिंक पर सुन सकते हैं
यह एक ऐसी कंडीशन है जहाँ आप सरकार के सामने एक ऐसा जाल बुनते हैं कि वह जो भी फैसला ले, नुकसान उसी का होगा। अगर सरकार इस मजाक या मीम्स की अनदेखी करती है, तो आंदोलन को और खुली जगह मिलती है और वह बड़ा होता जाता है। और अगर सरकार इस पर गुस्सा होकर कानूनी कार्रवाई या दमन करती है, तो वह दुनिया और जनता की नजरों में बेहद क्रूर, असहिष्णु और डरपोक दिखाई देने लगती है। इसे कहते हैं ‘बैकफायर इफेक्ट’। साल 2000 में इसी थ्योरी के दम पर सर्बिया के तानाशाह का पतन हो गया।
उन्होंने ब्रिटेन के एक पॉपुलर सर्कस ग्रुप मोंटी पाइथन से प्रेरित होकर सड़कों पर नाटक किए, लोगों के मुद्दों से आसानी से जुड़ने वाले हँसी-मजाक किए और सत्ता का जमकर मजाक बनाया… और इसका परिणाम क्या हुआ? साल 2000 में सर्बिया के लीडर मिलोशेविच का पतन हो गया।
CHAPTER 4: Otpor से CANVAS का ग्लोबल नेक्सस
Ch 4: CANVAS: The Global Revolution School
सर्बिया की सफलता के बाद स्र्द्जा पोपोविच ने एक संगठन बनाया- CANVAS (Centre for Applied Nonviolent Action and Strategies)। नाम बहुत सीधा-साधा लगता है, लेकिन इसका असली मकसद था दुनिया भर के एक्टिविस्ट्स को यह सिखाना कि इस थ्योरी के दम पर आंदोलन कैसे खड़े किए जाते हैं। यह दुनिया भर के एक्टिविस्ट्स के लिए एक पाठशाला की तरह काम करता है
वैसे, इतिहास गवाह है कि जिन भी आंदोलनों के नाम के आगे ‘नॉन-वायलेंस’ या ‘अहिंसा’ का ठप्पा होता है, अक्सर उनका इस्तेमाल एनार्की (अराजकता) को छुपाने के लिए किया जाता है। चाहे फ्रांस की क्रांति हो या कोई और जन-आंदोलन, इतिहास हमें सिखाता है कि इन प्रयोगों के नाम पर अंततः जान और माल का नुकसान सिर्फ आम आदमी का होता है।
खैर, CANVAS ने अलग-अलग देशों के कार्यकर्ताओं और छात्र समूहों को ट्रेनिंग देना शुरू किया। और यह प्रयोग सर्बिया से निकलकर दुनिया भर में फैल गया। चलिए क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर में इसके कुछ बड़े उदाहरण देखते हैं।
CHAPTER 5: इटली, आइसलैंड, ग्रीस और स्पेन – नेपाल का ‘डिजिटल एक्सपेरिमेंट’
Ch 5: Digital Experiments: Tech-Driven Disruptions
अगर आपको लगता है कि भारत में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसा प्रयोग पहली बार हुआ है, तो आपको साल 2009 का इटली देखना चाहिए। वहाँ एक स्टैंड-अप कॉमेडियन था बेप्पे ग्रिलो (Beppe Grillo)। उसने देखा कि लोग मेनस्ट्रीम मीडिया से दूर जा रहे हैं और इंटरनेट पर समय बिता रहे हैं। बेप्पे ग्रिलो का पूरा करियर सिस्टम का मज़ाक उड़ाने में बीता था। उसने एक ब्लॉग शुरू किया, ऑनलाइन कम्युनिटी बनाई और सिस्टम का मजाक उड़ाते हुए प्रोटेस्ट रैलियां शुरू कीं। नतीजा क्या हुआ? साल 2009 में जनम हुआ Five Star Movement का। यह दुनिया का पहला ‘इंटरनेट-नेटिव’ राजनीतिक आंदोलन था, जिसने साबित किया कि एक ब्लॉग और सोशल नेटवर्क मिलकर एक बड़ी राजनीतिक शक्ति बन सकते हैं।
लेकिन ऐसा नहीं है कि राजनीतिक सिस्टम का मजाक उड़ाकर वोट बटोरने का यह तरीका नया है। इसका सबसे क्लासिक ऐतिहासिक उदाहरण है कनाडा की ‘राइनोसेरोस पार्टी’ (Rhinoceros Party)। जिसका उदाहरण मैंने शुरू में ही आपको दिया था कि सटायर के नाम पर शुरू की गई पार्टी ने वाक़ई में पूरे देश के पॉलिटिकल सिस्टम को हिला दिया और बिना एक भी सीट जीते देश की चौथी सबसे बड़ी ताकत बन गई। यानी जब-जब जनता को भड़काने के लिए मुद्दों की तलाश होती है, तब-तब व्यंग्य और नौटंकी को सबसे बड़ा सियासी हथियार बना लिया जाता है।
यही पैटर्न साल 2008 के आर्थिक संकट के दौरान आइसलैंड में दिखा, जहाँ फेसबुक के जरिए लोगों ने सरकार और संसद को चुनौती दी। साल 2010 में ग्रीस के कर्ज संकट में पहली बार दुनिया ने एक नई ताकत देखी- Outrage Amplification, यानी स्मार्टफोन, फेसबुक और ट्विटर के एल्गोरिदम के जरिए जनता के आक्रोश का कई गुना विस्तार कर देना। साल 2011 में स्पेन में भी यही सेम प्लेबुक अपनाई गई, जहाँ सोशल मीडिया आधारित 15-M आंदोलन से बाद में Podemos नाम की एक मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी का जन्म हुआ..
सिर्फ सर्बिया, इटली या कनाडा ही नहीं, हमारे पड़ोसी देश नेपाल में भी पिछले कुछ टाइम में एक ऐसी ही राजनीतिक सुनामी देखी गई। वहाँ के युवाओं ने पुरानी राजनीतिक पार्टियों और दशकों से जमे हुए नेताओं से तंग आकर एक बिल्कुल नया रास्ता चुना – ‘रैपर पॉलिटिक्स’ का रास्ता।
साल 2022 के काठमांडू म्युनिसिपल चुनाव में, एक युवा रैपर, बालेन शाह (Balen Shah), ने किसी बड़ी राजनीतिक मशीनरी का सहारा नहीं लिया। उन्होंने सोशल मीडिया, फेसबुक लाइव और अपने गानों के जरिए युवाओं से सीधा कनेक्ट किया। उनका कोई जमीनी कार्यकर्ता नहीं था, न ही कोई पारंपरिक रैली। फिर भी, उन्होंने काठमांडू के मेयर का चुनाव एक भारी अंतर से जीता।
नतीजा यह हुआ कि नेपाल की राजनीति के ‘बड़े खिलाड़ी’ जो सालों से राज कर रहे थे, वे पूरी तरह धराशायी हो गए। यह नेपाल की जनता का एक ऐसा ‘प्रोटेस्ट वोट’ था जिसने साबित कर दिया कि इंटरनेट के दौर में अगर आप जनता की भाषा (चाहे वो रैप हो या मीम) बोलते हैं, तो आप सिस्टम को ‘रिबूट’ कर सकते हैं। बालेन शाह की जीत ने पूरे दक्षिण एशिया के राजनीतिक रणनीतिकारों को एक नया सबक दिया: भाषण की जगह नैरेटिव्स ने ले ली..
नेपाल का यह प्रयोग भी CJP जैसे आंदोलनों के लिए एक ब्लूप्रिंट की तरह काम कर रहा है, जहाँ एक गैर-राजनीतिक चेहरा, सिस्टम के प्रति जनता के गुस्से को ‘वोट’ में बदल देता है लेकिन नेपाल में जहाँ यह एक ‘ऑर्गेनिक’ जन-आक्रोश था, वहीं भारत में CJP जैसी पार्टियाँ उसी ‘पैटर्न’ को कॉपी करके एक ‘मैन्युफैक्चर्ड’ आंदोलन खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं। यह ऑर्गेनिक और आर्टिफिशियल के बीच का सबसे बड़ा फर्क है।
CHAPTER 6: अरब स्प्रिंग – क्रांति या रेजिम चेंज का टूल?
Ch 6: Arab Spring: Regime Change Tool
लेकिन इस प्लेबुक का सबसे बड़ा और खौफनाक चेहरा दिखा साल 2011 में, जिसे दुनिया ने नाम दिया- अरब स्प्रिंग (Arab Spring)। ट्यूनीशिया, मिस्र, लीबिया, यमन, सीरिया… हर जगह ‘फेसबुक और ट्विटर रिवोल्यूशन’ जैसे शब्द गूंजने लगे। और ठीक इसी दौर में स्र्द्जा पोपोविच और उनका CANVAS नेटवर्क अचानक ग्लोबल चर्चा के केंद्र में आ गए।
कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और जांचों में यह बात सामने आई कि मिस्र के ‘अप्रैल 6 यूथ मूवमेंट’ के एक्टिविस्ट ने पहले ही सर्बिया जाकर Otpor और CANVAS के मॉडल्स की बाकायदा ट्रेनिंग ली थी।
व्यंग्य, डिसेंट्रलाइज्ड ऑर्गेनाइजेशन और डिजिटल नेटवर्क को हथियार बनाना… ये सब इसी ट्रेनिंग का हिस्सा थे। ‘6 अप्रैल यूथ मूवमेंट’ जैसे अरब क्रांतिकारियों ने CANVAS (पोपोविच) से सो कॉल्ड non वायलेंस की Toolkit सीखी, लेकिन पोपोविच का मानना है कि तानाशाह को हटाने से ज्यादा मुश्किल Stable Democracy बनाना है। अरब स्प्रिंग की शुरुआत में भले ही सोशल मीडिया और स्थानीय गुस्सा मुख्य कारण दिखे हों, लेकिन परदे के पीछे पोपोविच और CANVAS की पालिसी ने अरब के युवा क्रांतिकारियों को एक टूलकिट दे दी थी..
यहीं से कहानी सबसे विवादास्पद हो जाती है। आलोचकों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने सवाल उठाए कि CANVAS को फंड या सपोर्ट करने वाली संस्थाओं के तार अक्सर USAID, NED और जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी जैसे पश्चिमी नेटवर्कों से क्यों जुड़े मिलते हैं? जो संस्थाएं दुनिया भर में ‘लोकतंत्र और सिविल सोसाइटी’ को बढ़ावा देने का दावा करती हैं, उनका नाम जॉर्जिया, यूक्रेन, वेनेजुएला और मिस्र जैसे देशों में ‘रेजिम चेंज’ (सत्ता पलटने) की कहानियों से क्यों जुड़ जाता है? यानी, यह प्लेबुक सिर्फ एक Organic गुस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक पूरा ग्लोबल ट्रेनिंग मैकेनिज्म काम करता है।
CHAPTER 7: फिलीपींस – सोशल मीडिया का ‘पेशेंट जीरो’
Ch 7: Philippines: The Troll Army Model
अगर अरब स्प्रिंग ने यह दिखाया था कि सोशल मीडिया कैसे सत्ता को उखाड़ सकता है… तो फिलीपींस ने इस स्ट्रेटेजी को एक क़दम आगे जाकर इस्तेमाल किया… और यहाँ से डिजिटल मॉब साइकोलॉजी के प्रयोग देखने को मिले.. साल 2016 के फिलीपींस चुनाव में रोड्रिगो दुतेर्ते ने एक ऐसा खतरनाक मॉडल तैयार किया जो आज हर देश की राजनीति का हिस्सा बन चुका है। दुतेर्ते के अभियान ने लगभग 2 लाख डॉलर खर्च करके 400 से 500 पेशेवर साइबर सैनिकों यानी एक संगठित ‘ट्रोल आर्मी’ (Troll Army) की फौज तैयार की थी।
जिस तरह फिलीपींस में डिजिटल ट्रोल आर्मी का इस्तेमाल जनता की राय को मैनिपुलेट करने के लिए किया गया था, ठीक वही ‘डिजिटल मॉब’ अब भारत में एक ‘पढ़े लिखे Woke युवाओं की पार्टी’ का लबादा ओढ़कर आ गई है।
प्रसिद्ध लेखक पीटर पोमेरांतसेव ने अपनी किताब ‘This Is Not Propaganda’ में इस आधुनिक इंफॉर्मेशन वॉर को अच्छे से समझाया है। वो कहते हैं कि पुरानी तानाशाही जानकारी को ‘छिपाती’ थी, सेंसर करती थी। लेकिन आज की आधुनिक राजनीति जानकारी को छिपाती नहीं, बल्कि इंटरनेट पर सूचनाओं की ऐसी बाढ़ ला देती है, इतने विरोधाभासी नैरेटिव और Conspiracy Theories बाजार में छोड़ देती है कि आम नागरिक पूरी तरह भ्रमित हो जाता है। वह सच और झूठ का फर्क ही भूल जाता है।
फिलीपींस का सबसे बड़ा सबक यही है कि कोई भी देश क्यों न हो, जहाँ कहीं भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल ‘Weaponization of Information’ के लिए हुआ है, वहां का एक ही पैटर्न रहा है, हजारों फेक अकाउंट्स के जरिए एक डिजिटल Manufactured Outrage पैदा करना। भारत में CJP का इस्तेमाल भी ठीक इसी तरह के डिजिटल इकोसिस्टम के जरिए किया जा रहा है..
CHAPTER 8: भारत में गिरोह – द CANVAS नेक्सस
Ch 8: India: The CANVAS Nexus Uncovered
और यहीं से हमारे दिमाग़ में एक सवाल भी आता है कि क्या भारत में मई 2026 में उभरी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का इस ग्लोबल प्लेबुक से कोई सीधा संबंध है? चलिए कड़ियों को जोड़ते हैं। और जानते हैं कि क्या रेजिम चेंज के इन तमाम प्रयागों के बाद अब बारी भारत की थी…?
साल 2016 में पोपोविच भारत आते हैं, LSE इंडिया समिट में। वहाँ उनकी मुलाकात होती है आम आदमी पार्टी (AAP) के सह-संस्थापक और राजनीतिक सिद्धांतकार योगेन्द्र यादव से। पिछले कुछ सालों में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स यानी LSE वैश्विक स्तर पर Anti-India Narrative गढ़ने का एक नया और सबसे बड़ा मंच बनकर उभरा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मंच के तार सीधे भारतीय आंदोलनों के चेहरों से जुड़े हैं? मुकुलिका बनर्जी, LSE के इसी इकोसिस्टम और वहाँ के साउथ एशिया सॉलिडैरिटी ग्रुप्स में ये मुकुलिका बनर्जी बेहद सक्रिय रही हैं।
जब घर का ही कोई सदस्य उस विदेशी यूनिवर्सिटी के थिंक-टैंक में बैठा हो जो नैरेटिव तय करता है, तो कड़ियाँ जोड़ना आसान हो जाता है।
आपको याद होगा, अप्रैल 2023 में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) के छात्र करण कटारिया का मामला काफी चर्चा में रहा था.. करण कटारिया LSE स्टूडेंट यूनियन के चुनाव में GS की पोजीशन के लिए उम्मीदवार थे। लेकिन उनके खिलाफ एक स्मीयर कैंपेन चलाया गया, करण कटारिया ने कहा था कि कैंपस में उनके खिलाफ नफरत फैलाने के लिए सोशल मीडिया और पर्चों का इस्तेमाल किया गया। उन्हें एक्स्ट्रिमिस्ट हिंदू बताकर चुनाव प्रक्रिया से Disqualified कर दिया गया।
और जब LSE में करण कटारिया नाम के हिंदू छात्र के ख़िलाफ़ कैंपेन चलाया गया था, तब उस पूरे नैरेटिव को लीड कौन कर रहा था? LSE की प्रोफ़ेसर मुकुलिका बनर्जी। और मुकुलिका बनर्जी कौन हैं? योगेन्द्र यादव की पत्नी मधुलिका बनर्जी की बहन।
यानी हर बार ‘नॉन-वायलेंट मूवमेंट’, ‘डेमोक्रेसी’, ‘रेज़िस्टेंस’ और ‘सिविल सोसाइटी’ के नाम पर जो नेटवर्क एक्टिव दिखता है, उसके सेंटर में कहीं न कहीं योगेन्द्र यादव और उनसे जुड़े लोग दिखाई देते हैं।
यही वजह है कि साल 2016 में जब CANVAS का मास्टरमाइंड स्र्द्जा पोपोविच भारत आता है, तो उसके स्वागत के लिए इसी LSE इंडिया समिट का मंच चुना जाता है। और वहाँ उसकी सीधी मुलाकात होती है आम आदमी पार्टी के सह-संस्थापक योगेन्द्र यादव से। दोनों के बीच एक लंबी, रिकॉर्डेड बातचीत होती है जिसमें पोपोविच आंदोलन के तीन मुख्य कोर सिद्धांत समझाते हैं…
- 1- आंदोलन का वैयक्तिकरण (Personalization): संघर्ष ऐसा हो जिसे आम आदमी व्यक्तिगत रूप से महसूस करे..
- 2- न्यूनतम प्रवेश बाधाएं (Low Entry Barriers): आंदोलन से जुड़ना इतना आसान और भय-मुक्त हो कि कोई भी शामिल हो सके- जैसे सिर्फ एक मीम शेयर करना या दीवार पर ग्राफिटी बना देना।
- 3- वर्चुअल से रियल का सफर: सोशल मीडिया के व्यूज को जमीनी एक्टिविस्ट/वॉलंटियर्स में बदलना।
कॉकरोच – CJP भी एकदम यही कर रही है
योगेंद्र यादव और पोपोविच की उस मुलाकात में जो तीन ‘कोर सिद्धांत’ तय हुए थे, वो आज CJP की हर हरकत में साफ नजर आते हैं। Gene Sharp की मशहूर हैंडबुक, ‘From Dictatorship to Democracy’, जिसे दुनिया भर में ‘रेजिम चेंज’ की बाइबल माना जाता है, उसे ही CJP ने अपना वर्किंग मॉडल बनाया है।
पोपोविच का सबसे घातक हथियार रहा है ‘हँसी को शस्त्रीकरण (Weaponizing Humor)’। उन्होंने अपनी वर्कशॉप्स में एक्टिविस्ट्स को सिखाया कि कोई भी सत्ता मजाक को गंभीरता से नहीं लेती, और यहीं से वो अपनी कमजोरी दिखा बैठती है।
CJP इसीलिए कोई अचानक से भड़का हुआ जन-आक्रोश नहीं है, असल में यह पोपोविच की उस ‘हैंडबुक’ का एक आधुनिक डिजिटल अपडेट है, जिसे ‘कॉकरोच’ के नाम से भारत में लागू किया जा रहा है.. और उसके 2016 में बताए हुए ये तीनों सिद्धांत यहाँ कैसे फिट होते हैं – इस क्रोनोलॉजी को समझिए।
जो योगेन्द्र यादव इस पूरे मैकेनिज्म को समझ रहे थे, उन्हीं की पार्टी यानी ‘आम आदमी पार्टी’ के लिए साल 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में Meme-based campaign कौन संभाल रहा था? उनका एक यंग वॉलंटियर था – अभिजीत दिपके। जो बाद में बॉस्टन यूनिवर्सिटी में PR की पढ़ाई करने चला जाता है… ध्यान देने वाली बात है कि इस आंदोलन के रणनीतिकार खुद डिजिटल मीडिया और कंटेंट क्रिएशन की दुनिया से हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि एल्गोरिदम के साथ कैसे खेलना है और किसी भी छोटे से मुद्दे को Global Narrative कैसे बनाना है।
योगेंद्र यादव और पोपोविच की उस मीटिंग को एक ‘पॉलिटिकल लैब’ की तरह समझिए। उस मीटिंग के तुरंत बाद, CANVAS के सिद्धांतों का पहला प्रयोग भारत में AAP के जरिए किया गया। और यहाँ हर जगह एक सूत्रधार था – योगेंद्र यादव – अगर आप पिछले 5-6 सालों की क्रोनोलॉजी देखें, तो एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है:
- टेस्टिंग फेज (CAA-किसान आंदोलन): शाहीन बाग और किसान आंदोलनों के दौरान हमने पहली बार ‘विदेशी टूलकिट’ और संदिग्ध फंडिंग का मैकेनिज्म देखा। ED की जांच में यह खुलासा हुआ था कि कैसे कुछ विपक्षी नेताओं के तार सीधे उन नेटवर्क्स (जैसे PFI) से जुड़े थे, जिन्होंने देश में एनार्की फैलाने के लिए कैश रूट किया था। यह सिर्फ़ प्रोटेस्ट नहीं था, यह पोपोविच की ‘सॉफ्टवेयर ट्रेनिंग’ का भारतीय जमीन पर बीटा-टेस्टिंग था। किसान आंदोलन में भी योगेंद्र यादव फ्रंट फुट पर थे..
- नैरेटिव बिल्डिंग (राहुल गांधी का सहारा): इन आंदोलनों को जब मुख्यधारा के नेताओं, जैसे राहुल गांधी और AAP के संजय सिंह, का समर्थन मिला, तो इन्हें ‘पॉलिटिकल ऑक्सीजन’ मिली। जांच एजेंसियों ने बताया था कि AAP के संजय सिंह के तार सीधे PFI, के उस मनी-ट्रेल नेटवर्क से जुड़े हुए थे, जो शाहीन बाग और दिल्ली के एंटी-CAA प्रोटेस्ट में पीछे से ‘फाइनेंशियल फ्यूल’ झोंक रहा था। और इस पूरे खेल का अल्टीमेट गोल क्या था? जमीन पर एक ऐसा भारी असंतोष और अराजकता का माहौल खड़ा कर देना, जिससे देश की सरकार पूरी तरह बैकफुट पर आ जाए।
यहाँ से यह क्लियर हो गया कि विदेशी स्ट्रैटेजी और विपक्षी नैरेटिव एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं। और योगेंद्र यादव राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा का भी एक चेहरा थे..
- मास्टरी (लॉफ़्टिविज़्म और AAP): अरविंद केजरीवाल की राजनीति को याद कीजिए, वो रेनॉल्ड्स पेन, वो वैगन-आर कार और वो नौटंकी वाला अंदाज़.. तब लोगों ने इसे महज ‘ड्रामा’ समझा, लेकिन असल में यह CANVAS की ‘लॉफ़्टिविज़्म’ (Laughtivism) ट्रेनिंग का हिस्सा था। सत्ता का मजाक उड़ाकर खुद को ‘आम आदमी’ से जोड़ना और फिर उसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना। इस AAP पार्टी के तो शुरुआती मेंबर्स में से एक योगेंद्र यादव ख़ुद ही थे.. और इसी AAP के डिजिटल वॉलंटियर थे अभिजीत दीपके।
अभिजीत दिपके जैसे वॉलंटियर्स इसी ‘टैलेंट पाइपलाइन’ का हिस्सा थे। उन्हें पता था कि मीम्स और सोशल मीडिया के जरिए जनता के सेंटीमेंट को कैसे कैप्चर करना है।
और यहीं से एंट्री होती है उस पीढ़ी की, जिसने ‘डिजिटल वॉरफेयर’ को अपना पेशा बना लिया। अभिजीत दिपके जैसे युवा, जो उस वक्त AAP के वॉलंटियर थे, उन्हें उसी हैंडबुक की ट्रेनिंग दी गई।
दिपके नाम का ये वॉलंटियर उस ‘टैलेंट पाइपलाइन’ का पहला प्रोडक्ट था जो सीधे उस ग्लोबल नेक्सस से जुड़ा था। यह कोई इत्तेफाक नहीं है कि जिस व्यक्ति ने 2020 में AAP के लिए मीम-कैंपेन की कमान संभाली, वही आज CJP के पीछे का मास्टरमाइंड है। ये कड़ियां दिखाती हैं कि कैसे पोपोविच की थ्योरी को पहले ‘टेस्ट’ किया गया और अब उसे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के जरिए एक बड़े पैमाने पर लॉन्च किया गया है..
CHAPTER 9: द ट्रिगर – अपमान का शस्त्रीकरण और CJP का उदय
Ch 9: CJP: Weaponizing Youth Insecurity
यानी ग्लोबल इंस्टीट्यूशन की ट्रेनिंग, विपक्ष का नैरेटिव और देश में टाइम टाइम पर एनार्की भड़काने के लिए आने वाली फंडिंग का यह पूरा आर्किटेक्चर पर्दे के पीछे पहले से ही लोड था। बस इंतजार था तो भारतीय जमीन पर एक ऐसे ‘लाइव ट्रिगर’ का, जिसे पब्लिक सेंटीमेंट के साथ जोड़कर ब्लास्ट किया जा सके।
और वो सटीक ट्रिगर मिला 15 मई 2026 को।
सुप्रीम कोर्ट में सीनियर लॉयर्स के पदनाम को लेकर एक PIL (संजय दुबे बनाम रजिस्ट्रार जनरल) की सुनवाई चल रही थी। बार-बार दायर होने वाली वाहियात PIL पर नाराजगी जताते हुए CJI सूर्यकांत ने एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि जो युवा अपने पेशे में रोजगार नहीं पाते, वे ‘कॉकरोच की तरह’ आरटीआई एक्टिविज्म, सोशल मीडिया और पत्रकारिता की ओर मुड़ जाते हैं और व्यवस्था पर हमला करने वाले ‘समाज के परजीवी’ बन जाते हैं।
भले ही, अगले ही दिन कोर्ट ने लिखित सफाई दी कि यह बयान सिर्फ फर्जी डिग्री धारकों के लिए थी, न कि सामान्य युवाओं के लिए। लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था। अभिजीत दिपके के लिए यह एक परफेक्ट ‘अपॉर्च्यूनिटी मोमेंट’ था। उसने युवाओं के इस कथित ‘अपमान’ और उनकी दबी-कुचली इनसिक्योरिटी को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया। ठीक अगले दिन, 16 मई 2026 को उसने गठन कर दिया- ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का।
CJP ने खुद को एक ‘व्यंग्यात्मक नागरिक सामूहिक’ कहा। इसकी सदस्य बनने की शर्तें सीधे युवाओं की हताशा से रिलेट करती थीं: आप बेरोजगार हों, शारीरिक रूप से आलसी हों लेकिन वैचारिक रूप से सक्रिय हों, और दिन में 11 घंटे इंटरनेट पर बिताते हों। उसने सटायर किया लेकिन लोगों ने इसे पर्सनलाइज किया, और ख़ुद से रिलेट करने लगे – इस उम्र में हर कोई दिन में दस बार याद दिलाता है कि तुम किसी काम के नहीं हो – और CJP ने इस फैक्टर को इस्तेमाल कर लिया..
हर जनरेशन में ऐसे युवाओं की कमी नहीं होती जिन्हें समाज में यूजलेस फील कराया जाता है। घर से लेकर स्कूल-कॉलेज तक इस age में दिनभर में करीब करीब 2-4 बार तो रोज़ ही बच्चों को ये सुनने को मिलता है कि तुम यूजलेस हो.. CJP ने इस यूजलेस होने की भावना को ही युवाओं की ताकत और ‘कूल फैक्टर’ बना दिया।
नतीजा क्या हुआ? एक जैकपॉट। 48 घंटे में 40,000 सदस्य और हैशटैग #MainBhiCockroach वायरल। 5 दिनों में 1 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स और 7 दिनों में 2 करोड़ फॉलोअर्स! दावा किया गया कि इन्होंने देश की रूलिंग पार्टी (BJP) के ऑफिशियल इंस्टाग्राम हैंडल को भी पीछे छोड़ दिया।
CHAPTER 10: घोषणापत्र का जाल और सरकार की दुविधा
Ch 10: Manifesto Trap: Government Under Siege
लेकिन क्या यह सिर्फ एक मजाक था? नहीं। इस मजाक के पीछे जो मेनिफेस्टो तैयार किया गया था, वह लोगों को इस तरह से बताया गया जैसे ये समस्याएं देश में पहले कभी थी ही नहीं और सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन से ही इनको ठीक किया जा सकता है –
और इस बहाने जो सपना इनके मेनिफेस्टो में बेचा जा रहा है वो क्या है?
- न्यायिक सुधार – Judicial Reform: किसी भी रिटायर्ड चीफ जस्टिस को तुरंत राज्यसभा की सीट या सरकारी पदनाम नहीं मिलेगा
- चुनावी जवाबदेही – Electoral Integrity : अगर किसी नागरिक का वैध वोट बिना वजह काटा गया, तो मुख्य चुनाव आयुक्त पर सीधे UAPA लगेगा।
- मीडिया की स्वतंत्रता: बड़े कॉर्पोरेट घरानों (अडानी-रिलायंस) के मीडिया हाउसों के लाइसेंस रद्द होंगे और पक्षपातपूर्ण एंकरों के बैंक खातों की जांच होगी।
इसके साथ ही, सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज के इनपुट पर यह जोड़ा गया कि यह पार्टी पूरी तरह से RTI के दायरे में होगी और पीएम केयर्स की तर्ज पर कोई गोपनीय फंड नहीं बनाएगी।
इस घोषणापत्र ने सरकार को ठीक उसी ‘डिलेमा एक्शन’ में डाल दिया, जिसका सिद्धांत स्र्द्जा पोपोविच ने दिया था। सरकार इन बातों पर हंस भी नहीं सकती थी, और इसे नजरअंदाज करना भी भारी पड़ सकता था।
CJP के मेनिफेस्टो की इन बातों को आप देखेंगे तो आपको लगेगा कि ये सभी बातें हर किसी को आकर्षित करती हैं, क्रांतिकारी किस्म की बातें हैं सभी.. लेकिन अगर आप देखेंगे तो राहुल गांधी तो ख़ुद लंबे टाइम से इन्हीं संस्थाओं पर हमला कर रहा है – और वो लगातार फेल भी होते रहे हैं – चाहे चुनाव आयोग को लेकर झूठ बोलते जाना या CEC पर वर्बल अटैक करना – न्यायपालिका को भी राहुल गांधी लगातार बिका हुआ कहते रहे हैं ताकि उसको भी डिस्क्रेडिट कर सकें.. और मीडिया के ख़िलाफ़ तो राहुल गांधी और उनके दरबारी लगातार लगे हुए हैं… आप देखेंगे तो CJP वाले कोई नई बात नहीं कर रहे हैं क्योंकि इन तीनो मुद्दों पर राहुल गांधी लंबे टाइम से हमलावर ही है..
उदाहरण के लिए मीडिया की आजादी की ही बात को ले लो- कांग्रेस काल में क्या थी मीडिया की आजादी? पत्रकारों को जेल में डाल दिया जाता था, राइटर और सिंगर्स को कांग्रेस के टाइम पे सेंसर किया जाता था? मजरूह सुल्तानपुरी को तो नेहरू के ख़िलाफ़ नज़्म लिखने के लिए ही जेल में डाल दिया था… PM केयर्स से लेकर ये सब मुद्दे क्रांतिकारी और बड़े न्यूट्रल लगते हैं – लेकिन कोर में इन सबके सिर्फ़ और सिर्फ़ किसी भी तरह एनार्की क्रिएट कर के सत्ता हासिल करना ही होता है…
और वही हुआ जो पोपोविच के मॉडल में लिखा था। सरकार ने पैनिक होकर दमनकारी कदम उठाए। केंद्रीय मंत्रियों ने आरोप लगाया कि CJP के 49% फॉलोअर्स पाकिस्तान से हैं और इसके पीछे जॉर्ज सोरोस का हाथ है।
आख़िर में खुफिया ब्यूरो (IB) की रिपोर्ट पर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर CJP के एक्स हैंडल को ब्लॉक कर दिया, वेबसाइट उड़ा दी गई। लेकिन यहाँ सरकार अनजाने में ‘बैकफायर इफेक्ट’ का शिकार हो गई। जैसे ही सेंसरशिप लागू हुई, युवाओं के बीच यह संदेश और पुख्ता हो गया कि सत्ता वाकई एक डिजिटल मीम से डर गई है। आंदोलन को और जन-सहानुभूति मिल गई..
CHAPTER 11: ध्रुव राठी और कॉकरोच का कनेक्शन
Ch 11: The Rathee-Cockroach Connection Revealed
अब आते हैं इस पूरी इनवेस्टिगेशन के सबसे दिलचस्प और अंतिम पड़ाव पर। इस पूरे विवाद के बीच एक और समानांतर ट्रैक चल रहा है। भारत के सबसे बड़े यूट्यूबर्स में से एक- ध्रुव राठी, जिनके 36 मिलियन से ज्यादा सब्सक्राइबर्स हैं, उन्होंने भी इस CJP आंदोलन का खुलकर समर्थन किया.. और हमें यहाँ से पता चलेगा कि आखिर यह ‘कॉकरोच’ शब्द आया कहाँ से और CJP के पीछे ध्रुव राठी का क्या कनेक्शन है?
इसे महज एक राजनीतिक आंदोलन समझना भूल होगी, यह एक ‘बिजनेस मॉडल’ है। बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ जब डिजिटल वॉरफेयर के लिए कंपनियों को हायर करती हैं, तो वे उनसे ‘डेमो’ मांगती हैं कि आप कैसे रातों-रात नैरेटिव सेट कर सकते हैं?
लेकिन यहाँ एक बहुत गहरी क्रोनोलॉजी और छुपा हुआ पैटर्न है, जिस पर आपका ध्यान जाना बेहद जरूरी है।
बहुत सारे सोशल मीडिया हैंडल्स पिछले कई सालों से ध्रुव राठी को काउंटर करने के लिए एक खास नाम से ट्रोल करते थे और वो नाम क्या था? ‘जर्मन कॉकरोच’। जरा सोचिए, इस नई उभरी पार्टी का नाम और Symbol क्या है? कॉकरोच! क्या यह महज एक इत्तेफाक है कि जिस नाम का इस्तेमाल एक कंटेंट क्रिएटर को ‘ट्रोल’ करने के लिए किया जा रहा था, ठीक उसी नाम और कीड़े को एक वेल प्लानंड पॉलिटिकल इवेंट का चेहरा बना दिया गया? ताकि उस गाली को एक ‘मेडल’ में बदला जा सके?
और दूसरा बड़ा विरोधाभास देखिए। ध्रुव राठी, जो हमेशा सरकार विरोधी पोलिटकल प्रॉपगैंडा वीडियो बनाने के लिए जाने जाते हैं, वो ठीक इसी टाइमलाइन के आस-पास अचानक से ‘लाइफस्टाइल व्लॉगिंग’ और ट्रेवल व्लॉगिंग करने लगते हैं। वो खुद को एक न्यूट्रल, पारिवारिक व्लॉगर के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं। आखिर क्यों?
क्या यह अचानक हुआ हृदय परिवर्तन है? या फिर यह खुद को इस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के सीधे ऑर्गेनाइज्ड लिंक से दूर दिखाने की एक सोची-समझी रणनीति है? क्योंकि कोई भी समझदार व्यक्ति जानता है कि भारत जैसे विशाल देश में, 2 करोड़ युवाओं की सेना रातों-रात सिर्फ एक अदालती बयान पर खड़ी नहीं हो सकती। इसकी तैयारी, इसके पीछे के ग्लोबल मॉडल्स की समझ इस पूरे इकोसिस्टम के पास पहले से मौजूद थी। ध्रुव राठी इस इकोसिस्टम के शीर्ष पर बैठे ‘डिजिटल एम्प्लीफायर’ हैं।
और आप देखिए, विजेता दहिया नाम का ये हिंदुओं को गाली देने वाला आदमी, जो ध्रुव राठी के वीडियो की स्क्रिप्ट लिखता है, वो आज इस कॉकरोच जानता पार्टी का प्रवक्ता बन गया है? ये सब सिर्फ़ कोसिंस्डेंस नहीं था.. बस एक मौके की तलाश थी..
लेकिन ध्रुव राठी इस बार सामने आकर सीधे संगठन का ठप्पा क्यों नहीं लगाना चाहते? इसके पीछे एक बैकस्टोरी है। पिछले लंबे समय से वो जिस Gen Z को अपनी ताकत मानकर चल रहे थे, उसने उन्हें निराश किया था। कुछ महीनों पहले ही, न्यू ईयर की शाम को; जब यही एज ग्रुप; पार्टी और एंजॉय करने के मूड में होता है, गिग वर्कर्स के नाम पर मार्केट ठप्प करने और अनरेस्ट पैदा करने की कोशिश की गई थी। उन्हें लगा था कि युवाओं का गुस्सा भड़केगा और सरकार बैकफुट पर आ जाएगी। इसके पीछे भी वही डिजिटल टूलकिट काम कर रही थी जिसे ध्रुव राठी जैसे इन्फ्लुएंसर्स ने ऑनलाइन हवा दी थी।
लेकिन हुआ क्या? ग्राउंड पर कोई प्रोटेस्ट पकड़ ही नहीं पाया और वो सिर्फ सोशल मीडिया पर एक हैशटैग बनकर रह गया। यही वजह है कि इस बार, उन्होंने खुद को ‘न्यूट्रल व्लॉगर’ के मास्क के पीछे छुपा लिया, ताकि सीधे नैरेटिव का ठप्पा न लगे और बैक-एंड से मॉडल को अप्लाई किया जा सके।
तो इस पूरी इनवेस्टिगेशन से हमें क्या समझ आता है? इसके तीन बड़े निष्कर्ष हैं:
1- जब सिस्टम किसी नाराज वर्ग को ‘कॉकरोच’ या ‘परजीवी’ कहता है, तो मॉडर्न कम्यूनिकेशन स्ट्रेटेजी उसी नाम को अपना हथियार बना लेती है। CJP ने ‘कॉकरोच’ शब्द को एक ऐसे जीव के रूप में री-ब्रांड कर दिया जो परमाणु हमले में भी सरवाइव कर सकता है, यानी कभी न खत्म होने वाला रेजिस्टेंस।
2- स्ट्रक्चरल रिजीडिटी का नुकसान: सरकार जब एक व्यंग्यात्मक डिजिटल आंदोलन को दबाने के लिए सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा और आईटी एक्ट की धारा 69(ए) जैसे गंभीर टूल का इस्तेमाल करती है, तो वह अनजाने में पोपोविच के ‘डिलेमा एक्शन’ के जाल में फंसकर उसे सही साबित कर देती है। यानी सरकार ने अगर एक्शन लिया, तो आंदोलन और बढ़ेगा, और आंदोलन को वैधता मिलेगी.. और अगर कोई एक्शन ना लिया, तो ये लोग अपनी हरकतों को रिपीट करते ही रहेंगे.. और इसे ही कहते हैं चित भी मेरी पट भी मेरी..
3- लोकतंत्र का नुकसान: सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसमें जीत किसकी हो रही है? सच तो यह है कि इसमें देश के आम नागरिक और लोकतंत्र का नुकसान हो रहा है। फिलीपींस मॉडल की ही तरह, आज भारतीय राजनीति भी ‘आक्रोश के एल्गोरिदम’ (Outrage Algorithms) के जाल में उलझ चुकी है। जहाँ युवाओं को यह सिखाया जा रहा है कि केवल मीम्स, डिजिटल ट्रोलिंग और सोशल मीडिया हैशटैग के दम पर ‘रेजिम चेंज’ किया जा सकता है।
नतीजा यह है कि गंभीर सामाजिक और नीतिगत मुद्दे; जैसे शिक्षा सुधार, वास्तविक रोजगार और पेपर लीक, पीछे छूट गए हैं, और उनकी जगह डिजिटल मीम्स, ट्रोल आर्मी और फॉरेन फंडिंग के डिजिटल बहस ने ले ली है।
यह खेल सत्ता हासिल करने या उसे बचाने का हो सकता है, और इसे चलाने वाले लोगों के मकसद और टूल्स वही हैं जो सर्बिया में थे, जो नेपाल में थे, जो बांग्लादेश में थे… और अब हमारे देश में अजमाए जा रहे हैं। अभिजीत दिपके और ध्रुव राठी का यह इकोसिस्टम, जिसे हम ‘कैनवास नेक्सस’ कह रहे हैं, उन सभी मॉडल्स को भारत में उतारने की कोशिश की, जहाँ डिजिटल शोर के जरिए सत्ता पलटी जाती है, लेकिन भारत के लोकतंत्र में विदेशी जमीन पर तैयार की गई ये डिजिटल प्लेबुक हमेशा फेल साबित हुई है। क्योंकि इस देश के वोटर का मिजाज कोई विदेशी एल्गोरिदम तय नहीं कर सकता।


