पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार ने सोमवार (22 जून 2026) को राज्य विधानसभा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपना पूर्ण बजट पेश किया। इस बजट में निवेश, बुनियादी ढाँचे और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कई उपायों की घोषणा की गई।
वहीं गुरुवार (25 जून 2026) को प्रकाशित SBI रिसर्च की विस्तृत विषयगत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट के अनुसार, यह बजट निवेश-आधारित विकास और दीर्घकालिक आर्थिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है।
SBI की इस रिपोर्ट में केवल नवीनतम बजट के प्रावधानों का ही विश्लेषण नहीं किया गया, बल्कि पश्चिम बंगाल की आर्थिक यात्रा को व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भी रखा गया।
विश्लेषण में बताया गया कि कभी भारत के सबसे मजबूत आर्थिक प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल रहा पश्चिम बंगाल, पिछले कई दशकों में धीरे-धीरे अपनी स्थिति खोता गया और अब उसके सामने राष्ट्रीय औसत के बराबर पहुँचने की चुनौती है।
SBI रिपोर्ट ने पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था का इतिहास बताया
SBI रिसर्च रिपोर्ट का सबसे उल्लेखनीय पहलुओं में से एक पश्चिम बंगाल की दीर्घकालिक आर्थिक यात्रा का विश्लेषण है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दशक के शुरुआती वर्षों में पश्चिम बंगाल ने मजबूत आर्थिक वृद्धि दर्ज की थी।
वर्ष 2012-13 में राज्य की नॉमिनल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) वृद्धि दर 13.6% तक पहुँच गई थी, जो 2013-14 में बढ़कर 14.4% हो गई। हालाँकि देश के अन्य हिस्सों की तरह पश्चिम बंगाल को भी कोविड-19 महामारी के दौरान गंभीर झटका लगा। वर्ष 2020-21 में आर्थिक गतिविधियाँ लगभग ठप हो जाने के कारण राज्य की नाममात्र और वास्तविक दोनों वृद्धि दरें नकारात्मक स्तर पर पहुँच गई थीं।

लॉकडाउन की अवधि के बाद राज्य की अर्थव्यवस्था में मजबूत सुधार देखने को मिला। वर्ष 2021-22 में नाममात्र नॉमिनल वृद्धि दर बढ़कर 17.4% हो गई, जबकि वास्तविक वृद्धि दर 11.6% तक पहुँच गई। इसके बाद से आर्थिक वृद्धि स्थिर बनी हुई है।
साल 2025-26 के संशोधित अनुमानों के अनुसार, नॉमिनल वृद्धि दर 9.9% और वास्तविक वृद्धि दर 7.6% रहने का अनुमान है। वहीं वर्ष 2026-27 के बजट अनुमान में नॉमिनल वृद्धि दर 7.9% रहने का अनुमान लगाया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र पर आधारित है, जिसका ग्रोस वैल्यू ऐडेड-GVA (Gross Value Added-GVA) में 58.3% योगदान है। उद्योग क्षेत्र का योगदान 21.6% है, जबकि कृषि क्षेत्र अभी भी 20.1% की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखता है।
हालाँकि विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा प्रति व्यक्ति आय से जुड़ा है। SBI रिसर्च के अनुसार, वित्त वर्ष 1977-78 में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय 1266 रुपए थी, जो उस समय राष्ट्रीय औसत 1194 रुपए से अधिक थी। उस समय प्रति व्यक्ति आय के मामले में राज्य देश के सभी राज्यों में पांचवें स्थान पर था।
हालाँकि इसके बाद के दशकों में राज्य की सापेक्ष स्थिति लगातार कमजोर होती गई। वित्त वर्ष 2011-12 तक पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय 56693 रुपए रह गई और इस आधार पर राज्य भारतीय राज्यों में 21वें स्थान पर पहुँच गया।
इसके बाद राज्य की स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ। वित्त वर्ष 2024-25 में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय बढ़कर लगभग 1.81 लाख रुपए हो गई, जिससे उसकी रैंकिंग सुधरकर 19वें स्थान पर पहुँच गई। इसके बावजूद यह राष्ट्रीय औसत 2.35 लाख रुपए से काफी पीछे है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय अखिल भारतीय औसत से लगभग 23% कम है।
वित्त वर्ष 2011-12 से 2024-25 के बीच पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय में 3.20 गुना वृद्धि हुई, जबकि इसी अवधि में राष्ट्रीय स्तर पर यह वृद्धि 3.28 गुना रही। इससे संकेत मिलता है कि राज्य अब भी देश की समग्र आर्थिक प्रगति की गति से पीछे चल रहा है।
पश्चिम बंगाल ने अपनी आर्थिक बढ़त कैसे खो दी
यह गिरावट कई दशकों में फैले राजनीतिक, औद्योगिक और संरचनात्मक कारकों का संयुक्त परिणाम है। स्वतंत्रता के समय और 1960 के दशक तक पश्चिम बंगाल भारत के इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल सेंटर में से एक था। कोलकाता वित्त, मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग, चाय और जूट उद्योगों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।
स्थिति में बदलाव 1970 और 1980 के दशक के दौरान शुरू हुआ। राजनीतिक अस्थिरता, श्रमिक अशांति, लगातार हड़तालें, घेराव और बिजली की कमी ने कारोबार के लिए माहौल को लगातार मुस्किल बना दिया। इसके चलते कई बड़े औद्योगिक घरानों ने अपने ऑपरेशन महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ट्रांसफर कर दिए।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 1977 में सत्ता में आई वाम मोर्चा (लेफ्ट फ्रंट) सरकार ने ऑपरेशन बर्गा जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भूमि सुधार और ग्रामीण विकास पर विशेष जोर दिया। हालाँकि इन नीतियों से कृषि उत्पादकता में सुधार हुआ और ग्रामीण आजीविका मजबूत हुई, लेकिन बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण सीमित ही रहा।
इसके परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल उस मैन्युफैक्चरिंग उछाल का पूरा लाभ नहीं उठा सका, जिसने देश के कई पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
समय के साथ राज्य की अर्थव्यवस्था सेवा क्षेत्र पर अधिक निर्भर होती चली गई। हालाँकि बैंकिंग, रिटेल और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) जैसे क्षेत्रों में वृद्धि हुई, लेकिन यह इतनी नहीं थी कि अन्य राज्यों की तुलना में समान गति से आय बढ़ाने के लिए आवश्यक बड़े पैमाने पर हाई सैलरी वाले रोजगार पैदा किए जा सकें।
केंद्रीय फंड पर बनी हुई है निर्भरता ज्यादा
SBI की रिपोर्ट पश्चिम बंगाल के वित्तीय ढाँचे के एक और महत्वपूर्ण पहलू को भी सामने लाती है, जो केंद्र सरकार से मिलने वाले धन पर राज्य की लंबे समय से चली आ रही निर्भरता है।
विश्लेषण के अनुसार, पश्चिम बंगाल को अपने कुल रेविन्यू का 50% से अधिक हिस्सा लगातार केंद्र सरकार से करों में हिस्सेदारी और ग्रांट के रूप में मिलता रहा है।
वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमानों के अनुसार, केंद्र से प्राप्त करों में राज्य की हिस्सेदारी कुल राजस्व प्राप्तियों का 34% रहने का अनुमान है, जबकि केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान का योगदान 22% है। इस प्रकार, दोनों को मिलाकर राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का 56% हिस्सा केंद्र सरकार से आने का अनुमान है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल का खुद का कर पिछले कई वर्षों से लगभग स्थिर बना हुआ है। साल 2010-11 में राज्य के अपने कर संग्रह का योगदान कुल राजस्व प्राप्तियों में 45% था। वहीं एक दशक से अधिक समय बाद भी वित्त वर्ष 2026-27 के बजट अनुमानों में यह आंकड़ा घटकर 41% पर ही है।

नॉन टैक्स रेविन्यू के मामले में स्थिति और भी अधिक उल्लेखनीय है। रिव्यू पीरियड के अधिकांश वर्षों में राज्य का स्वयं का गैर-कर राजस्व कुल प्राप्तियों का लगभग 3% ही बना रहा है।
समय के साथ राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों टोटल रेवेन्यू रैपिटस रिसिप्ट में निश्चित रूप से वृद्धि हुई है। यह साल 2010-11 में 47264 करोड़ रुपए से बढ़कर साल 2026-27 में अनुमानित 3.2 लाख करोड़ रुपए तक पहुँचने का अनुमान है। इसके बावजूद, SBI के आंकड़े बताते हैं कि राज्य अब भी अपने रेवेन्यू बेस का उल्लेखनीय विस्तार करने में संघर्ष कर रहा है और केंद्र सरकार से मिलने वाले वित्तीय हस्तांतरण पर काफी हद तक निर्भर बना हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार, सालों से केंद्र सरकार से पर्याप्त वित्तीय सहायता मिलने के बावजूद पश्चिम बंगाल अब भी भारी कर्ज के बोझ का सामना कर रहा है।
बजट की भाषा अब कल्याण से विकास की ओर बढ़ती दिखी
SBI अध्ययन के सबसे दिलचस्प हिस्सों में से एक पिछले 16 साल में प्रस्तुत किए गए बजट भाषणों का विषयगत विश्लेषण है। रिपोर्ट के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार के दौरान पेश किए गए शुरुआती बजटों का मुख्य फोकस कल्याणकारी और पुनर्वितरण आधारित नीतियों पर रहा। कई बजट चक्रों में सामाजिक कल्याण सबसे प्रमुख विषय बना रहा है।
हालाँकि मौजूदा भाजपा सरकार द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2026-27 का बजट प्राथमिकताओं में एक उल्लेखनीय बदलाव को दर्शाता है। SBI ने इस बदलाव को पुनर्वितरण से क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक आर्थिक विकास लॉंग टर्म इकोनॉमिक डेवलपमेंट की दिशा में संक्रमण बताया है।
इस बदलाव का सबसे स्पष्ट संकेत निवेश पर बढ़ते जोर से मिलता है। वर्ष 2026-27 के बजट भाषण में निवेश विषय का उल्लेख अब तक के सर्वोच्च स्तर 4.5% पर पहुँच गया, जो पिछले कुछ वर्षों के स्तर की तुलना में काफी अधिक है।

गवर्नेंस और राजकोषीय प्रबंधन फिस्कल मैनेजमेंट भी एक बार फिर बजट की प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में उभरे हैं। बजट विमर्श में इनकी हिस्सेदारी बढ़कर 2.1% हो गई है, जो सार्वजनिक पब्लिक फिनान्स और प्रशासनिक दक्षता में सुधार पर नए सिरे से दिए जा रहे जोर को दर्शाती है।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि कई नए विषय उभरकर सामने आए हैं, जिन्हें पहले के वर्षों में कम महत्व मिला था।
पर्यटन और संस्कृति का उल्लेख रिकॉर्ड स्तर 1% तक पहुँच गया। जलवायु और पर्यावरण का हिस्सा बढ़कर 0.8% हो गया, जो उपलब्ध आंकड़ों की श्रृंखला में सबसे अधिक है। वहीं शिक्षा का हिस्सा भी 0.8% रहा, जबकि स्वास्थ्य का योगदान 0.7% दर्ज किया गया।
टेक्नोलॉजी एण्ड आर्टफिशल इन्टेलिजन्स का उल्लेख बढ़कर 0.6% तक पहुँच गया, जो हाल के वर्षों में लगातार बढ़ते रुझान को दर्शाता है। वहीं आन्ट्रप्रनर्शिप की हिस्सेदारी 0.4% के उच्च स्तर पर बनी रही।
SBI के अनुसार, ये रुझान एक व्यापक विकासवादी दृष्टिकोण की ओर संकेत करते हैं, जिसका केंद्र आर्थिक क्षमता निर्माण, निवेश सृजन और करियर ओरिएंटेड क्षेत्रों के विकास पर है।
सीरीज में सबसे ज्यादा उम्मीद जगाने वाला बजट
रिपोर्ट में बजट भाषणों का भाषाई विश्लेषण भी किया गया है। इसके लिए सकारात्मक और नकारात्मक शब्दों के संतुलन को मापने हेतु बिंग सेंटिमेंट लेक्सिकॉन का उपयोग किया गया।
विश्लेषण के परिणाम बताते हैं कि वर्ष 2026-27 के बजट में पूरे उपलब्ध डेटा सेट के दौरान सबसे अधिक आशावादी भाषा का प्रयोग किया गया है।
SBI रिसर्च के अनुसार, नवीनतम बजट में साल 2010-11 से ट्रैकिंग शुरू होने के बाद का सबसे अधिक नेट सेंटिमेंट स्कोर दर्ज किया गया है। बजट भाषण में सकारात्मक शब्दों की हिस्सेदारी भी अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गई, जो विस्तारवादी और अत्यधिक महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण को दर्शाती है।
विश्लेषण यह भी दिखाता है कि कोविड-19 महामारी से उत्पन्न व्यवधानों के बाद साल 2021-22 से इस दिशा में स्पष्ट रूप से लगातार बढ़ता हुआ रुझान देखने को मिला है।

इस श्रृंखला में सबसे कम सेंटिमेंट स्कोर कोविड-19 महामारी के तुरंत बाद वाले साल 2021-22 में दर्ज किया गया था। इसके बाद से हर साल सेंटिमेंट में लगातार सुधार हुआ और अंततः साल 2026-27 के बजट में अब तक के सबसे अधिक आशावाद को दर्शाने वाला रिकॉर्ड-उच्च स्तर दर्ज किया गया।
SBI के अनुसार, इससे संकेत मिलता है कि नीति-निर्माता अब राज्य के भविष्य को संकट प्रबंधन के बजाय आर्थिक वृद्धि, निवेश और लॉंग टर्म ट्रैन्स्फर्मैशन के इर्द-गिर्द अधिक मजबूती से दिखा रहे हैं।
पिछली रिपोर्ट्स में TMC राज में आर्थिक गिरावट की कही गई थी बात
SBI की यह रिपोर्ट पश्चिम बंगाल के दीर्घकालिक आर्थिक प्रदर्शन को लेकर पहले सामने आ चुके विश्लेषणों की पृष्ठभूमि में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिनमें राज्य की अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई थी।
इससे पहले ऑपइंडिया ने फिन्स्केप्टिक्स द्वारा प्रकाशित एक वित्तीय रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया था कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार के शासनकाल के दौरान पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय संरचनात्मक गिरावट देखने को मिली।
उस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि बीच-बीच में आर्थिक वृद्धि के कुछ दौर आने के बावजूद, अन्य प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना में पश्चिम बंगाल की समग्र आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई।
रिपोर्ट में राज्य की औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट, राष्ट्रीय औसत की तुलना में प्रति व्यक्ति आय की धीमी वृद्धि और केंद्र सरकार से मिलने वाले फाइनैन्शल ट्रांसफर पर बढ़ती निर्भरता को प्रमुख कारणों के रूप में रेखांकित किया गया था।
नई SBI रिसर्च रिपोर्ट इन राजनीतिक निष्कर्षों पर कोई टिप्पणी नहीं करती, लेकिन उसका ऐतिहासिक विश्लेषण भी यह दर्ज करता है कि प्रति व्यक्ति आय के आधार पर वित्त वर्ष 1977-78 में देश का पाँचवाँ सबसे समृद्ध राज्य रहा पश्चिम बंगाल आज 19वें स्थान पर पहुँच चुका है।
साथ ही SBI के आकलन के अनुसार साल 2026-27 का बजट निवेश, सुशासन सुधार, प्रौद्योगिकी को अपनाने और आर्थिक क्षमता निर्माण पर अधिक जोर देकर इस आर्थिक दिशा को बदलने का प्रयास करता हुआ दिखाई देता है।
हालाँकि यह बदलाव कई दशकों से चली आ रही इस सापेक्ष गिरावट को वास्तव में पलट पाएगा या नहीं, इसका स्पष्ट उत्तर आने वाले सालों में ही मिलेगा। फिलहाल यह रिपोर्ट एक ऐसे राज्य की विस्तृत तस्वीर पेश करती है, जो कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित आर्थिक ढाँचे से आगे बढ़कर विकास और आर्थिक वृद्धि केंद्रित मॉडल की ओर बढ़ने का प्रयास कर रहा है, लेकिन साथ ही अपनी लंबी आर्थिक यात्रा से पैदा हुई चुनौतियों का भी सामना कर रहा है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


