इस्लामी और वामपंथी सोच के लोग हमेशा से किसी न किसी तरह हिंदुओं का विरोध करते आए हैं, कभी खुलकर तो कभी दबे छिपे तरीके से। ये लोग भारतीय सेना को भी लगातार अपना निशाना बनाते रहते हैं। कश्मीर में जब हमारी सेना आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करती है, तो ये लोग सेना को ही विलेन यानी विद्रोही साबित करने में जुट जाते हैं। ये बिना सोचे-समझे सेना पर यह झूठा आरोप भी लगाते हैं कि सेना हिंदुओं के पक्ष में राजनीति कर रही है।
इनका असली मकसद सिर्फ इसलिए सेना को बदनाम करना है क्योंकि सेना इनके मनमुताबिक बनी नकली धर्मनिरपेक्षता की बातों को नहीं मानती। इसी तरह के एक नए विवाद में ‘The Wire’ नाम की वेबसाइट ने अली अहमद नाम के एक लेखक की बातों को बढ़ावा दिया है। इस लेखक ने भारतीय सेना को चेतावनी देते हुए कहा है कि सेना का हिंदी भाषा और हिंदुत्व की तरफ बढ़ता झुकाव देश के लिए ठीक नहीं है।
सेना में ‘हिंदी और हिंदुत्व’ के बहाने हिंदू नफरत का खेल- The Wire में दावा
‘The Wire’ नाम की वेबसाइट का कहना है कि भारतीय सेना पर हिंदुत्व का असर बढ़ रहा है, इसीलिए वहाँ हिंदी भाषा और हिंदू धर्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेखक अली अहमद ने अपने लेख में ‘हिंदी और हिंदुत्व’ शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत निकालने के लिए किया है। 24 जून को छपे उसके लेख की हेडलाइन यानि शीर्षक था कि भारतीय सेना का हिंदी और हिंदुत्व के प्रति नया लगाव गंभीर नतीजे ला सकता है।

‘The Wire’ के इस लेख में दावा किया गया कि सेना अपनी बातचीत और दफ्तरों में जो हिंदी का इस्तेमाल कर रही है, वह सरकार के राजनीतिक कंट्रोल का इशारा है। लेखक अली अहमद के मुताबिक सेना पर जबरन हिंदी थोपकर उसका हिंदूकरण करने की बड़ी साजिश चल रही है। अपनी बात को सही दिखाने के लिए अली अहमद ने सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल हरचरणजीत सिंह पनाग के एक पुराने लेख का सहारा लिया।
पनाग ने लिखा था कि जनता भारतीय सेना पर इसलिए भरोसा करती है क्योंकि वह हमेशा से धर्मनिरपेक्ष रही है और राजनीति से दूर रही है। वैसे तो देश की जनता हमेशा से सेना की इस समझदारी और राजनीति से दूरी की तारीफ करती है, लेकिन सेना की यह खूबी वैसी धर्मनिरपेक्षता बिल्कुल नहीं है जैसी इस्लामी-वामपंथी लोग चाहते हैं। इन हिंदू-विरोधी लोगों की नजर में धर्मनिरपेक्षता का असली मतलब सिर्फ यह है कि सरकारी दफ्तरों या नीतियों में गैर-हिंदू, खासकर मुस्लिम मान्यताओं और परंपराओं को जगह मिले।
अगर सेना या राजनीति में कहीं भी हिंदू धर्म की छोटी सी झलक भी दिख जाए, तो ये लोग तुरंत चिल्लाने लगते हैं कि लोकतंत्र खत्म हो गया और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है। यहाँ यह जानना बहुत जरूरी है कि HS पनाग वही पूर्व फौजी अफसर हैं जिन्होंने साल 2019 में एक बहुत विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोबारा चुनाव जीतकर आते हैं, तो सरकार के खिलाफ तख्तापलट कर देना चाहिए।
मोदी और हिंदुत्व के प्रति पनाग की यह नफरत इंटरनेट पर कई बार देखी जा चुकी है। सितंबर 2021 में उन्होंने ‘बीटिंग रिट्रीट’ कार्यक्रम का एक Video पोस्ट किया था, जिसमें सेना का बैंड एक हिंदू आरती की धुन बजा रहा था। पनाग ने इस Video को एक मजाक उड़ाने वाले और झूठे शीर्षक के साथ शेयर किया ताकि लोगों को लगे कि मोदी सरकार सेना के कार्यक्रमों में जबरन हिंदू रीति-रिवाज थोप रही है, जबकि सच्चाई यह है कि सेना में आरती की धुन बजाने की यह परंपरा बहुत पुरानी है।
अब अगर अली अहमद के उसी झूठ पर वापस आएँ जिसे उसने सेना में ‘हिंदी और हिंदुत्व’ का नाम दिया है, तो पहली बात यह है कि सेना की बातचीत, ट्रेनिंग सेंटरों या स्मारकों में हिंदी को अभी जबरन शामिल नहीं किया गया है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी पूरे देश की राजभाषा है, हालांकि इसके साथ सरकारी कामों में अंग्रेजी इस्तेमाल करने की भी पूरी छूट दी गई है।
भारतीय सेना में हिंदी भाषा का इस्तेमाल आजादी के तुरंत बाद से ही शुरू हो गया था। साल 1951 से ही तत्कालीन सरकार ने सेना के तीनों अंगों में देवनागरी लिपि वाली हिंदी का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया था। उस समय देश में हिंदुत्व की विचारधारा वाली सरकार नहीं थी। सैन्य अधिकारियों के लिए हिंदी की परीक्षाएँ पास करना जरूरी था और जवानों को देवनागरी लिपि सिखाई जाती थी।
मार्च 1951 से आर्मी एजुकेशन कोर ने सभी सैन्य कर्मियों और प्रशिक्षकों को हिंदी सिखाने के लिए खास कोर्स शुरू किए थे। साल 1952 में थल सेना, नौसेना और वायुसेना के अधिकारियों के साथ मिलकर एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई गई थी ताकि हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में लागू किया जा सके।
भारत जैसे विविधता वाले देश में हिंदी को अपनाना देश के एकीकरण का एक बड़ा हिस्सा था। इसका मकसद अंग्रेजी के उस प्रभाव को खत्म करना था जो ब्रिटिश गुलामी की पहचान था। मौजूदा मोदी सरकार ने सेना से औपनिवेशिक काल की पुरानी परंपराओं को हटाने के लिए कई कदम जरूर उठाए हैं। इसके बावजूद सेना में हिंदी के इस्तेमाल को एक नया राजनीतिक बदलाव बताना बिल्कुल गलत है, जैसा कि अली अहमद और ‘The Wire’ पेश कर रहे हैं।
सेना की कई टुकड़ियों में अलग-अलग राज्यों के सैनिक होते हैं, जिनके बीच आपसी तालमेल और ट्रेनिंग के लिए हिंदी एक संपर्क भाषा का काम करती है। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि सेना दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं से नफरत करती है या उन पर रोक लगाती है। हिंदी को जोड़ने वाली भाषा के रूप में इस्तेमाल करने की यह नीति दशकों पुरानी है।
यहाँ कुछ सीधे सवाल उठते हैं कि आखिर इस्लामी-वामपंथी लोग सेना में हिंदी के इस्तेमाल का विरोध क्यों करते हैं? अगर हिंदी का प्रसार हो भी रहा है तो इसमें गलत क्या है? क्या हिंदी एक भारतीय भाषा नहीं है जिसे देश के करीब 43 फीसदी लोग बोलते हैं? इन सभी सवालों का जवाब ‘The Wire’ के उस दावे में छिपा है जिसमें उन्होंने हिंदी के प्रसार को हिंदुत्व के एजेंडे और हिंदूकरण से जोड़ दिया है।
इसका सीधा मतलब यह है कि ये इस्लामी-वामपंथी लोग हिंदी को सिर्फ हिंदुओं की भाषा मानते हैं और इसीलिए सेना में इसके इस्तेमाल को हिंदूकरण का नाम देते हैं। यह सच है कि हिंदी की जड़ें संस्कृत में हैं और संस्कृत का जुड़ाव हिंदू धर्म से है, भले ही इतिहास में सभी हिंदू संस्कृत या हिंदी नहीं बोलते थे।
लेखक अली अहमद ने यहाँ भाषा का सांप्रदायिकरण करके देश को बाँटने की पुरानी चाल चली है। ‘हिंदी हिंदुओं की और उर्दू मुसलमानों की भाषा है’ का यह विवाद 19वीं और 20वीं शताब्दी के हिंदी-उर्दू विवाद से जुड़ा है। 19वीं सदी में उत्तर-पश्चिम प्रांतों के मुस्लिम एलीट वर्ग, खासकर सर सैयद अहमद खान ने अदालतों और प्रशासन में हिंदी का विरोध किया था।
सर सैयद अहमद खान वही व्यक्ति हैं जिन्होंने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की नींव रखी, जिसके कारण आगे चलकर धर्म के नाम पर भारत का हिंसक बँटवारा हुआ। उन्होंने फारसी-अरबी लिपि वाली उर्दू को मुस्लिम पहचान और मुस्लिम शासन से जोड़कर बढ़ावा दिया और देवनागरी लिपि में हिंदी के इस्तेमाल को हिंदुओं का प्रयास बताया। इसके जवाब में हिंदुओं ने देवनागरी हिंदी को अपनी मूल और आम लोगों के लिए आसान भाषा के रूप में आगे बढ़ाया।
यह पूरा विवाद साल 1837 में तब शुरू हुआ जब अंग्रेजों ने उत्तर भारत की अदालतों और प्रशासन में फारसी की जगह उर्दू को आधिकारिक भाषा बना दिया। चूंकि मुस्लिम वर्ग उर्दू जानता था, इसलिए यह नीति उनके फायदे में थी। लेकिन हिंदू समुदाय को उर्दू लिपि की जानकारी न होने के कारण नुकसान हो रहा था, जबकि उनकी आबादी ज्यादा थी।
इसके विरोध में वाराणसी और पूरे क्षेत्र के हिंदुओं ने देवनागरी लिपि लागू करने की माँग की। साल 1867 तक आते-आते सैयद अहमद खान इस सोच को बढ़ावा देने लगे कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते और मुसलमानों के लिए एक अलग देश होना चाहिए। हालाँकि बाद में साल 1900 में अंग्रेजों ने हिंदी और उर्दू दोनों को कागजों पर बराबर का दर्जा दे दिया, लेकिन यह विवाद कभी सिर्फ भाषा का नहीं था, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक और सांप्रदायिक इरादे थे।
धर्मनिरपेक्षता के दोहरे पैमाने और सेना पर झूठे आरोप
उस दौर में मुसलमानों ने प्रशासनिक व्यवस्था में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए उर्दू को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया था। वहीं दूसरी तरफ हिंदू सिर्फ उस भाषा को पहचान दिलाना चाहते थे जिसे वे आसानी से पढ़ और लिख सकते थे। महात्मा गाँधी ने दोनों पक्षों को शांत करने के लिए हिंदी और उर्दू को मिलाकर ‘हिंदुस्तानी’ भाषा का एक सेक्युलर विकल्प दिया था, लेकिन इससे भी दोनों पक्षों का विवाद खत्म नहीं हुआ।
आजादी और विभाजन से पहले मुस्लिम नेताओं ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए भाषाओं का सांप्रदायिकरण किया। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने मुस्लिम पहचान के रूप में उर्दू को अपनी राष्ट्रीय भाषा चुना, जबकि वहाँ की बड़ी आबादी के हिसाब से पंजाबी को यह दर्जा मिलना चाहिए था। वहीं दूसरी तरफ भारत ने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में अपनाया।
यह सच है कि हिंदी की जड़ें संस्कृत में हैं और 19वीं सदी में मुसलमानों द्वारा उर्दू को अपनी खास पहचान बनाने के जवाब में हिंदी का उभार हुआ था। इसके बावजूद हिंदी सिर्फ हिंदुओं की या उनके लिए कोई विशेष भाषा नहीं है। उत्तर भारत में एक बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, जिसमें से पढ़े-लिखे लोग बिना किसी दबाव के उर्दू के साथ-साथ हिंदी भी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं।
इसलिए हिंदी को केवल हिंदुओं की भाषा कहना पूरी तरह गलत है। सेना या किसी भी सरकारी विभाग में हिंदी का इस्तेमाल होना किसी भी तरह से सेना का ‘हिंदूकरण’ नहीं है। ‘The Wire’ को इस बात से भी बड़ी परेशानी है कि थल सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी मंदिरों में दर्शन करने क्यों जाते हैं।
लेखक अली अहमद ने लिखा कि जनरल द्विवेदी का मंदिर जाना देश के राजनीतिक बदलाव को जानबूझकर समर्थन देने जैसा है। लेखक ने सवाल उठाया कि क्या उन्होंने यह सब अपने निजी फायदे के लिए किया या फिर सैन्य नेतृत्व को सरकार से ऐसा करने का कोई गुप्त इशारा मिला है। यह देखना काफी हैरान करने वाला है कि यही इस्लामी-वामपंथी गुट तब चुप रहता है जब सेना के अधिकारी कश्मीर में लोगों से जुड़ने के लिए नमाज में शामिल होते हैं।
तब उनके लिए वह नमाज शांति और सद्भाव का प्रतीक बन जाती है, लेकिन जब सेना प्रमुख जगन्नाथ मंदिर जाते हैं, तो उसे सेना का हिंदूकरण और बहुसंख्यकवाद का नाम दे दिया जाता है। अगर देश में सचमुच हिंदुत्व के आधार पर सेना का हिंदूकरण हो रहा होता, तो अली अहमद जैसे मुस्लिम लेखक को वर्तमान सेना प्रमुख की निष्ठा पर सवाल उठाने और उनके धार्मिक अधिकारों पर हमला करने के लिए जेल में डाल दिया जाता।
अपने इस लेख में ‘The Wire’ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर भी निशाना साधा और यह झूठा दावा किया कि संघ खुद को हिंदू धर्म का पर्याय मानता है। लेखक ने RSS पर विविधता को खत्म करने का आरोप लगाया। इसके साथ ही भाजपा की चुनावी जीत पर दुख जताते हुए लेखक ने रोना रोया कि सेना ने अपनी ताकत और सम्मान को बहुसंख्यक राजनीति के पक्ष में झुका दिया है। लेखक का दावा है कि पहले के धर्मनिरपेक्ष दौर में सेना राजनीति से दूर थी, लेकिन अब एक ही पार्टी के बढ़ते प्रभाव के कारण सेना का राजनीति से अलग रहना बेअसर हो गया है।

सेना के शौर्य और परंपराओं पर वामपंथी एजेंडे का हमला
लेखक अली अहमद ने मौजूदा हिंदू-समर्थक सरकार के प्रति अपनी नफरत के कारण भारतीय सेना की निष्पक्षता और उसके पेशेवर अंदाज पर भी खुलेआम सवाल उठाए हैं। उनके इस पूरे लेख का कुल मिलाकर यही मतलब है कि भारतीय सेना के बड़े अधिकारी अब मंदिरों में जा रहे हैं। उनका दावा है कि सेना में कथित तौर पर हिंदी और हिंदुत्व को बढ़ावा देकर उसके धर्मनिरपेक्ष यानी सेक्युलर स्वरूप को खत्म किया जा रहा है।
असल में भारत एक अनोखा देश है जिसका आधुनिक ढांचा धर्मनिरपेक्ष है। यह धर्मनिरपेक्षता सिर्फ इसलिए बची हुई है क्योंकि यहाँ बहुसंख्यक आबादी हिंदू है और इस देश की आत्मा हिंदू सनातन धर्म से जुड़ी हुई है। हिंदू धर्म को कभी भी देश की राजनीति या सैन्य व्यवस्था से अलग नहीं किया जा सकता। भारतीय सेना विदेशी हमलों और दुश्मनों से देश की रक्षा करते समय किसी नागरिक का धर्म नहीं पूछती, भले ही सामने वाले दुश्मन अक्सर मुस्लिम देश से हों और पीड़ित होने वाले ज्यादातर हिंदू हों।
धर्मनिरपेक्षता का मतलब अपने धर्म को छोड़ देना नहीं होता, बल्कि इसका मतलब यह है कि आपका धार्मिक विश्वास आपके सरकारी काम के बीच में न आए। भारतीय सेना कश्मीर में आम जनता तक पहुँच बनाने के लिए उर्दू और स्थानीय कश्मीरी भाषा का भी इस्तेमाल करती है। तो क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि मोदी सरकार के राज में हमारी सेना का इस्लामीकरण हो रहा है?
सच तो यह है कि भारतीय सेना की कई रेजिमेंटों के युद्धघोष (वार क्राई) और उनके आदर्श वाक्य दशकों पुराने हैं, जो हिंदू देवी-देवताओं और सिख गुरुओं के नाम पर आधारित हैं। इन्हें किसी भी तरह से मौजूदा सरकार का कोई ‘हिंदूकरण एजेंडा’ नहीं कहा जा सकता। भारतीय सेना में सैनिक युद्ध के मैदान में अपना हौसला बढ़ाने के लिए हमेशा से अपने भगवान को याद करते आए हैं। इसके कई बड़े उदाहरण हमारे सामने हैं।
जैसे राजपूताना राइफल्स का युद्धघोष ‘राजा रामचंद्र की जय’ है, तो राजपूत रेजिमेंट ‘बोल बजरंग बली की जय’ का नारा लगाती है। इसी तरह डोगरा रेजिमेंट ‘ज्वला माता की जय’, सिख रेजिमेंट ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’, गढ़वाल राइफल्स ‘बद्री विशाल लाल की जय’, कुमाऊं रेजिमेंट ‘कालिका माता की जय’ और जम्मू-कश्मीर राइफल्स ‘दुर्गा माता की जय’ के नारे के साथ आगे बढ़ती है।
इस सब को देखते हुए अगर आने वाले समय में अली अहमद या ‘The Wire’ इस बात पर भी सवाल उठा दें कि सेना में ‘अल्लाह’ के नाम पर कोई युद्धघोष क्यों नहीं है, तो इसमें कोई हैरानी नहीं होगी। सेना में हिंदू परंपराओं का पालन सैनिक पूरी श्रद्धा के साथ करते हैं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण राजस्थान का तनोट माता मंदिर है, जिसकी देखरेख साल 1965 से सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवान कर रहे हैं।
इस मंदिर की कहानी यह है कि भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित होने के बावजूद साल 1965 और 1971 के युद्धों में पाकिस्तान की भारी गोलाबारी से इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ था। मंदिर परिसर में गिरे पाकिस्तानी बम फटे ही नहीं और वे आज भी मंदिर में दर्शन के लिए रखे हुए हैं। हमारे जवान आज भी वहाँ रोज आरती करते हैं।
इसी तरह सिख रेजिमेंट बड़ी धूमधाम से बैसाखी मनाती है जहाँ सैनिक सम्मान के साथ गुरु ग्रंथ साहिब जी को सिर पर रखकर पाठ करते हैं। इसके साथ ही भारतीय सेना के बैंड आज भी ‘अबाइड विद मी’ नाम की पारंपरिक ईसाई प्रार्थना की धुन बजाते हैं, जो दिखाता है कि सेना सभी परंपराओं का सम्मान करती है।
भारतीय सेना में सैनिकों को समय-समय पर आध्यात्मिक मार्गदर्शन देने के लिए हर धर्म के धार्मिक गुरुओं या शिक्षकों की भर्ती की जाती है। इन गुरुओं में पंडित, मौलवी, ग्रंथी, पादरी और बौद्ध भिक्षु सभी शामिल हैं। मौजूदा सरकार या सैन्य नेतृत्व ने इनमें से किसी भी परंपरा पर रोक नहीं लगाई है। ऐसे में लेखक अली अहमद का यह दावा पूरी तरह गलत साबित होता है कि सेना बहुसंख्यक राजनीति के दबाव में आकर हिंदुत्व का एजेंडा चला रही है और अपनी पुरानी परंपराओं को छोड़ रही है।
लेखक अली अहमद जिसे सेना का ‘राजनीतिकरण’ कह रहे हैं, वह असल में भारत के सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक नेतृत्व के बीच बढ़ा हुआ बेहतर तालमेल और सहयोग है। यह बदलाव किसी निजी फायदे के लिए नहीं आया है। यह बदलाव भाजपा सरकार के उस मजबूत रुख के कारण आया है जो पिछली कॉन्ग्रेस सरकार से बिल्कुल अलग है।
साल 2008 में मुंबई के 26/11 हमलों में जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने कई भारतीयों को मार डाला था, तब तत्कालीन सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया था। सच तो यह है कि एक राष्ट्रवादी सरकार स्वाभाविक रूप से सेना की जरूरतों और उसकी भावनाओं को बेहतर तरीके से समझती है। वह उन्हें तेजी से पूरा करती है जिससे दोनों के बीच एक बेहतरीन तालमेल बनता है।
इसे राजनीति से प्रेरित नहीं कहा जा सकता। एक मजबूत और जीवित लोकतंत्र में पेशेवर सेना और चुनी हुई सरकार इसी तरह मिलकर काम करती हैं। हालाँकि जो लोग भाषाओं पर धर्म का ठप्पा लगाते हैं और सेना प्रमुख के हिंदू होने पर सवाल उठाते हैं, वे भारतीय सेना की छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे लोग इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि भारत अब उस पुराने और दिखावे वाले ‘धर्मनिरपेक्षता’ के ढर्रे को छोड़ रहा है। उस पुराने ढर्रे में सिर्फ हिंदू मान्यताओं को दबाया जाता था और दूसरे धर्मों के दिखावे को ही शांति, भाईचारा और देश की असली पहचान मान लिया जाता था।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


