पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार इलाके में एक चौंकाने वाला साइबर और बैंकिंग फ्रॉड सामने आया है। यहाँ एक विधवा महिला के नाम पर करीब 18 करोड़ रुपए का फर्जी लोन ले लिया गया। मामला वर्ष 2012 का है, जब 55 वर्षीय ऊषा रानी ने अपने 4 फ्लैट्स में से 2 फ्लैट किराए पर दिए थे।
किराएदारों सचिन, संजय और उनके सहयोगी संजीव दीक्षित ने खुद को एक मेटल ट्रेडिंग कंपनी से जुड़ा बताकर फ्लैट किराए पर लिया था। इसके बाद ऊषा रानी सेठी के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर करीब 18 करोड़ रुपए का बैंक लोन उठा लिया और रकम को शेल कंपनियों के जरिए घुमा दिया।
मामले की शुरुआत जून 2012 में हुई, जब ऊषा रानी ने अपने दो फ्लैट किराए पर सचिन और संजय को दिए थे। सचिन ने खुद को जगदंबा मेटल्स का मालिक बताया, जबकि संजय को उसका सहयोगी बताया गया। दोनों कुछ समय तक फ्लैट में रहे और बाद में अचानक चले गए।
पुलिस जाँच में सामने आया कि उनका असली उद्देश्य किराए पर रहना नहीं था, बल्कि संपत्ति और मालिक के दस्तावेज हासिल करना था। इसी दौरान उन्होंने रेंट एग्रीमेंट और अन्य कागजातों के आधार पर ऊषा रानी की पहचान से जुड़े दस्तावेज इकट्ठा कर लिए।
फर्जी पहचान से ₹18 करोड़ का बैंक फ्रॉड
मामले का खुलासा तब हुआ जब 2013 में अचानक उनके घर सुप्रीम कोर्ट के वकील पहुँचे और उन्हें बताया कि उन पर 70 लाख रुपए का बैंक लोन बकाया है। यह सुनकर ऊषा रानी हैरान रह गईं और उन्होंने तुरंत पुलिस से संपर्क किया।
जाँच शुरू होने पर खुलासा हुआ कि उनके नाम पर केवल 70 लाख नहीं, बल्कि करीब 18 करोड़ रुपए का लोन अलग-अलग बैंकों से लिया गया था। जाँच में सामने आया कि आरोपितों ने ऊषा रानी के पहचान दस्तावेजों का दुरुपयोग करते हुए फर्जी PAN कार्ड और अन्य कागजात तैयार किए।
इसके अलावा एक महिला को सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में ऊषा बनाकर भेजा गया, जिसने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर और संपत्ति हस्तांतरण की प्रक्रिया को अंजाम दिया। इस पूरे घोटाले में 11 शेल कंपनियों का इस्तेमाल कर पैसों को इधर-उधर घुमाया गया। पुलिस के अनुसार, मुख्य आरोपित ने पहले से ही फर्जीवाड़े की योजना बनाई थी।
संजीव दीक्षित पुलिस और CBI द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका है और वह फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद है, जबकि सचिन और संजय अभी फरार हैं और उनकी तलाश जारी है।

