Homeविविध विषयअन्यभारत में 45°C झेलने वाले हैरान, यूरोप में 43°C तापमान पर पिघल रहीं सड़कें:...

भारत में 45°C झेलने वाले हैरान, यूरोप में 43°C तापमान पर पिघल रहीं सड़कें: समझें कैसे ठंडे मौसम के लिए बने उनके घर ही बन गए सबसे बड़ी मुसीबत

यूरोप और भारत में 43°C तापमान एक जैसा होने के बावजूद इसका असर अलग-अलग दिखाई देता है। इसका कारण सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि नमी, हवा, रात का तापमान, शहरों की बनावट और जीवनशैली है। यूरोप की कम तैयारी और ठंड आधारित ढाँचा इसे ज्यादा खतरनाक बना देता है।

यूरोप का नाम आते ही आम तौर पर बर्फ से ढके पहाड़, खूबसूरत शहर और सुहावना मौसम याद आता है। लेकिन इस समय महाद्वीप की तस्वीर बिल्कुल अलग है। फ्रांस से लेकर जर्मनी और स्पेन से लेकर ब्रिटेन तक, कई देश भीषण गर्मी की चपेट में हैं। हालात ऐसे हैं कि सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो दुनिया भर का ध्यान खींच रहे हैं।

हालात इस कदर बदतर हो चुके हैं कि कई देशों से सड़कों और ट्रैफिक लाइटों के पिघलने के वीडियो सामने आ रहे हैं। लोग गर्मी से राहत पाने के लिए नदियों और झीलों का रुख कर रहे हैं। हीटवेव के बीच अतिरिक्त मौतों के आँकड़ों ने चिंता और बढ़ा दी है। इन तस्वीरों के बीच भारत में एक अलग बहस छिड़ गई है।

सवाल उठ रहा है कि जब भारत के कई शहर हर साल 45 डिग्री या उससे ज्यादा तापमान का सामना करते हैं, तो यूरोप में 40 से 43 डिग्री सेल्सियस पर हालात इतने गंभीर क्यों दिखाई दे रहे हैं? क्या वहाँ की गर्मी अलग है, या फिर सिर्फ तापमान के आधार पर तुलना करना ही गलत है?

यही सवाल हमें उस फर्क तक ले जाता है, जो थर्मामीटर पर नहीं बल्कि भूगोल, शहरों की बनावट, घरों की डिजाइन और जलवायु के साथ समाज की तैयारी में छिपा है।

यूरोप में गर्मी का कहर

यूरोप में इस बार की गर्मी को सिर्फ एक सामान्य मौसमीय घटना नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे हाल के वर्षों की सबसे गंभीर और व्यापक हीटवेव घटनाओं में गिना जा रहा है। कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच गया और उसके साथ स्वास्थ्य, परिवहन और बुनियादी ढाँचे पर दबाव भी तेजी से बढ़ने लगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, 21 जून के बाद से यूरोप में अत्यधिक गर्मी से जुड़ी 1300 से ज्यादा अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि वास्तविक असर इससे बड़ा हो सकता है क्योंकि हीटवेव से जुड़ी मौतों का पूरा आँकड़ा अक्सर बाद में सामने आता है।

कई देशों में तापमान ने पुराने रिकॉर्ड भी तोड़े। जर्मनी के कुछ हिस्सों में तापमान 41 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच गया और नए रिकॉर्ड दर्ज किए गए। मध्य यूरोप के कई क्षेत्रों में जून के आखिरी दिनों में ऐसी गर्मी देखी गई जो सामान्य मौसमीय पैटर्न से बाहर मानी जा रही है।

कुछ देशों में स्वास्थ्य सेवाओं को अतिरिक्त सतर्कता अपनानी पड़ी, स्कूलों और सार्वजनिक गतिविधियों पर असर पड़ा और ऊर्जा व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा।

फ्रांस उन देशों में शामिल रहा जहाँ असर सबसे ज्यादा दिखाई दिया। वहाँ अपेक्षा से अधिक मौतों की रिपोर्ट की गई और स्वास्थ्य एजेंसियों ने बताया कि प्रभावित लोगों में बड़ी संख्या बुजुर्गों की थी। कई मौतें घरों के भीतर हुईं, जिसने एक और सवाल खड़ा किया कि क्या समस्या सिर्फ बाहर की धूप नहीं बल्कि रहने की व्यवस्था भी है?

इस गर्मी का असर सिर्फ लोगों तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया और स्थानीय रिपोर्टों में सड़कों, परिवहन सेवाओं और शहरी ढाँचे पर दबाव की तस्वीरें भी सामने आईं। इससे एक बात साफ हुई कि यूरोप की बड़ी चुनौती सिर्फ ऊँचा तापमान नहीं, बल्कि वह तैयारी है जो लंबे समय तक ठंडे मौसम के हिसाब से बनाई गई थी।

43°C पर इतना संकट क्यों?

डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, 43 डिग्री सेल्सियस तापमान अपने आप में हर जगह खतरनाक होता है, लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि मानव शरीर उसे किस तरह से प्रोसेस कर पा रहा है। सिर्फ तापमान का आँकड़ा यह नहीं बताता कि शरीर पर वास्तविक दबाव कितना है।

जनरल फिजिशियन और हीट-रिलेटेड बीमारियों पर काम करने वाले विशेषज्ञ बताते हैं कि मानव शरीर का तापमान नियंत्रित करने का सबसे बड़ा तरीका पसीना है। जब शरीर गर्म होता है तो पसीना निकलता है और उसके वाष्पीकरण से शरीर ठंडा होता है। लेकिन अगर बाहरी वातावरण इस प्रक्रिया में बाधा डालता है, तो शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता।

विशेषज्ञों के अनुसार, तीन मुख्य स्थितियाँ इस प्रक्रिया को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं, हवा की गति, नमी और लगातार बना रहने वाला तापमान। अगर हवा स्थिर हो, नमी अधिक हो, या रात में भी तापमान कम न हो, तो शरीर पर गर्मी का असर तेजी से बढ़ता है। ऐसे हालात में शरीर लगातार ‘हीट स्ट्रेस’ की स्थिति में बना रहता है।

डॉक्टर यह भी बताते हैं कि लगातार कई दिनों तक उच्च तापमान रहने पर शरीर की थर्मोरेगुलेशन क्षमता कमजोर पड़ने लगती है। इसका मतलब है कि शरीर धीरे-धीरे गर्मी से निपटने की अपनी क्षमता खोने लगता है। यही कारण है कि हीटवेव के दौरान अचानक थकान, चक्कर, डिहाइड्रेशन और गंभीर मामलों में हीट स्ट्रोक जैसी स्थितियाँ सामने आती हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, एक और महत्वपूर्ण कारक रात का तापमान है। अगर रात में पर्याप्त ठंडक नहीं मिलती, तो शरीर को रिकवरी का समय नहीं मिलता। यह लगातार तनाव जैसी स्थिति बनाता है, जो खासकर बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों के लिए ज्यादा खतरनाक होता है।

सूरज और भौगोलिक स्थिति का असर

यूरोप और भारत की गर्मी को समझने के लिए सिर्फ तापमान देखना काफी नहीं है। इसके पीछे भौगोलिक स्थिति और सूरज की भूमिका को समझना जरूरी है। यही वह हिस्सा है जो पहली नजर में दिखाई नहीं देता, लेकिन गर्मी के अनुभव को बहुत बदल देता है।

भारत भूमध्य रेखा के अपेक्षाकृत करीब स्थित है और यहाँ सालों से ऊँचा तापमान जीवन का सामान्य हिस्सा रहा है। दूसरी तरफ यूरोप काफी उत्तर में स्थित है। इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ सूरज कम तेज होता है, बल्कि गर्मियों में सूरज का व्यवहार अलग हो जाता है। यूरोप के कई हिस्सों में गर्मियों के दौरान दिन बहुत लंबे हो जाते हैं।

कई देशों में 15 से 16 घंटे तक धूप बनी रहती है। यानी तापमान चाहे भारत के बराबर दिखे, लेकिन जमीन, सड़कें और इमारतें लंबे समय तक लगातार गर्मी सोखती रहती हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि यूरोप के शहरों में इस लंबे सोलर एक्सपोजर का असर देर शाम तक बना रहता है।

दिनभर धूप खाने वाली कंक्रीट, डामर और इमारतें रात में धीरे-धीरे वही गर्मी छोड़ती रहती हैं। नतीजा यह होता है कि रात में भी तापमान पर्याप्त नीचे नहीं गिरता और शरीर को रिकवरी का समय नहीं मिलता। यही वजह है कि कई लोग दिन की तुलना में रात की गर्मी को ज्यादा थकाने वाला अनुभव बताते हैं।

कुछ विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत के कई हिस्सों में वातावरण में मौजूद धूल और अन्य सूक्ष्म कण सूरज की ऊर्जा को कुछ हद तक फैला देते हैं, जबकि यूरोप के कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत साफ आसमान और सीधी धूप गर्मी को ज्यादा तीखा महसूस करा सकती है। इसलिए सिर्फ तापमान देखकर यह मान लेना कि दोनों जगह असर समान होगा, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

लेकिन इस बार सिर्फ सूरज और लंबे दिन ही वजह नहीं थे। यूरोप के ऊपर बना एक विशेष मौसमीय पैटर्न भी गर्मी को असामान्य स्तर तक ले गया। इसे ओमेगा ब्लॉक कहा जाता है। ओमेगा ब्लॉक तब बनता है जब वायुमंडल में एक हाई-प्रेशर सिस्टम लंबे समय तक एक क्षेत्र पर टिक जाता है और उसके दोनों तरफ लो-प्रेशर सिस्टम बने रहते हैं।

मौसम के नक्शे पर इसकी आकृति ग्रीक अक्षर ‘Ω’ जैसी दिखाई देती है, इसलिए इसे ओमेगा ब्लॉक कहा जाता है। सामान्य स्थिति में तेज हवाएं और जेट स्ट्रीम मौसम को आगे बढ़ाती रहती हैं, लेकिन इस स्थिति में मौसम जैसे एक जगह अटक जाता है। यूरोप में इस बार यही हुआ।

हाई-प्रेशर सिस्टम लंबे समय तक बना रहा और मौसम बदलने वाली हवाएँ कमजोर पड़ गईं। इसके कारण अफ्रीका की तरफ से आने वाली गर्म और सूखी हवा यूरोप के ऊपर फँसती चली गई। ठंडी हवाओं और बादलों की एंट्री सीमित हो गई। यहीं से हीट डोम जैसी स्थिति बनने लगी।

जब ऊपर हाई-प्रेशर मौजूद रहता है तो गर्म हवा ऊपर उठकर बाहर नहीं निकल पाती। वह वापस नीचे दबती है और और ज्यादा गर्म हो जाती है। इससे जमीन और तेजी से गर्म होती जाती है। बादल कम होने की वजह से सूरज की सीधी ऊर्जा लगातार सतह तक पहुँचती रहती है।

इस पूरी प्रक्रिया ने मिलकर यूरोप में ऐसी गर्मी पैदा की जिसमें सिर्फ तापमान नहीं बढ़ा, बल्कि गर्मी लगातार जमा होती चली गई। कम हवा, लंबे दिन, लगातार धूप, गर्म सतहें और रुका हुआ मौसम, इन सबने मिलकर वही हालात बनाए जिनकी तस्वीरें इन दिनों पूरी दुनिया देख रही है।

घरों की बनावट बनी मुसीबत

यूरोप में इस बार की गर्मी को समझने के लिए सिर्फ बाहर का तापमान देखना काफी नहीं है। एक बड़ी वजह उन घरों और इमारतों की बनावट भी है, जिनमें लोग रहते हैं। यूरोप के ज्यादातर हिस्सों में लंबे समय तक सबसे बड़ी मौसमीय चुनौती ठंड रही है, इसलिए वहाँ घरों को इस तरह डिजाइन किया गया कि सर्दियों में अंदर की गर्मी बाहर न निकले।

इसी सोच के कारण कई घरों में मोटी दीवारें, मजबूत इंसुलेशन, छोटी खिड़कियाँ और सीमित क्रॉस-वेंटिलेशन रखा गया। ठंड के मौसम में यह व्यवस्था बेहद कारगर होती है क्योंकि इससे घर अपेक्षाकृत गर्म रहते हैं और ऊर्जा की बचत होती है। लेकिन जब वही ढाँचा लगातार कई दिनों तक 40 डिग्री से ऊपर तापमान झेलता है, तो यही डिजाइन समस्या बनने लगता है।

दिनभर धूप और गर्म हवा से गर्म हुई दीवारें, छतें और खिड़कियाँ घर के अंदर गर्मी जमा करने लगती हैं। रात होने के बाद भी यह गर्मी जल्दी बाहर नहीं निकलती। नतीजा यह होता है कि घरों का तापमान लगातार ऊँचा बना रहता है और लोगों को आराम नहीं मिल पाता।

विशेषज्ञ बताते हैं कि जब शरीर को रात में भी ठंडा होने का मौका नहीं मिलता तो उसका असर सीधे स्वास्थ्य पर पड़ता है। लगातार गर्म माहौल में रहने से डिहाइड्रेशन, थकान, हीट एक्सॉशन और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि इस बार यूरोप में चर्चा सिर्फ बाहर की गर्मी की नहीं, बल्कि घरों के अंदर फँसी गर्मी की भी हुई।

AC और कूलिंग की चुनौती

यूरोप में गर्मी के इस संकट ने एक और ऐसी कमजोरी सामने ला दी जिस पर पहले बहुत कम ध्यान दिया जाता था- कूलिंग सिस्टम की कमी। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल उठाया कि जब तापमान इतना बढ़ गया तो लोग एयर कंडीशनर का इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहे। लेकिन इसका जवाब यूरोप के मौसम और शहरी इतिहास में छिपा है।

यूरोप के ज्यादातर देशों में लंबे समय तक इतनी तेज और लगातार गर्मी सामान्य नहीं मानी जाती थी। इसलिए वहाँ घरों, अस्पतालों, स्कूलों और सार्वजनिक इमारतों में एयर कंडीशनिंग को जरूरी बुनियादी सुविधा की तरह विकसित नहीं किया गया। कई देशों में आज भी बड़ी संख्या में घर बिना एसी के हैं और लोग गर्मियों में प्राकृतिक वेंटिलेशन पर निर्भर रहते हैं।

लेकिन जब लगातार कई दिनों तक तापमान 40 डिग्री के आसपास बना रहे, रात में भी राहत न मिले और घर खुद गर्मी जमा करने लगें, तब सिर्फ खिड़कियाँ खोलना काफी नहीं होता। कई जगह लोगों ने पोर्टेबल कूलिंग यूनिट और अस्थायी इंतजामों का सहारा लेना शुरू किया। इसका असर स्वास्थ्य पर भी दिखाई दिया।

भारत और यूरोप की गर्मी में फर्क

भारत लंबे समय से गर्म जलवायु वाला देश रहा है। यहाँ के कई हिस्सों में ऊँचा तापमान सामान्य मौसमी अनुभव का हिस्सा है। इसी वजह से लोगों की दिनचर्या, रहने का तरीका और कई जगहों पर घरों की संरचना धीरे-धीरे गर्म मौसम के अनुसार विकसित हुई है।

दोपहर में काम कम करना, हल्के कपड़े पहनना, पानी और छाँव पर निर्भर रहना और गर्मी के हिसाब से जीवन को ढालना लंबे समय से यहाँ की सामाजिक आदतों का हिस्सा रहा है।
दूसरी तरफ यूरोप में लंबे समय तक इतनी तीव्र गर्मी सामान्य नहीं रही। वहाँ के शहर, घर और सार्वजनिक ढाँचा ठंड से बचने के लिए विकसित हुए।

कई घरों में गर्मी रोककर रखने वाला इंसुलेशन है, एयर कंडीशनिंग सीमित है और लगातार ऊँचे तापमान के लिए तैयारी कम रही है। इस गर्मी के दौरान एक और अंतर साफ दिखा कि यूरोप में लंबे दिन, कम हवा और लगातार गर्म रातों ने शरीर को राहत नहीं दी। ऊपर से वहाँ बुजुर्ग आबादी का अनुपात भी ज्यादा है, जो गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील मानी जाती है।

यही वजह है कि भारत और यूरोप की गर्मी की तुलना सिर्फ थर्मामीटर से नहीं, बल्कि मौसम, इंफ्रास्ट्रक्चर और लोगों की तैयारी के आधार पर करनी चाहिए।

तापमान नहीं, परिस्थितियाँ तय करती हैं असर

यूरोप की इस भीषण गर्मी ने एक बात साफ कर दी है कि सिर्फ तापमान देखकर किसी हीटवेव की गंभीरता को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। असली असर उस पूरे सिस्टम पर निर्भर करता है जिसमें लोग रहते हैं, यानी मौसम, हवा, नमी, घरों की बनावट, शहरों की योजना और लोगों की तैयारी।

एक ही तापमान अलग-अलग जगहों पर अलग अनुभव दे सकता है, क्योंकि शरीर का गर्मी से सामना केवल थर्मामीटर की संख्या से नहीं होता। अगर रात में राहत न मिले, हवा न चले, घरों के अंदर गर्मी जमा होती रहे और शरीर को ठंडा होने का समय न मिले, तो वही तापमान ज्यादा खतरनाक बन जाता है।

यूरोप की मौजूदा स्थिति ने दिखाया कि जब कोई क्षेत्र लंबे समय तक ठंडे मौसम के हिसाब से विकसित हुआ हो और अचानक वहाँ लगातार तेज गर्मी आने लगे, तो उसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहता। वह स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजमर्रा की जिंदगी को भी प्रभावित करता है।

इसीलिए विशेषज्ञ बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि गर्मी को समझने के लिए केवल डिग्री नहीं, बल्कि पूरी परिस्थितियों को देखना जरूरी है। यही वजह है कि इस बार की हीटवेव ने सिर्फ तापमान का रिकॉर्ड नहीं तोड़ा, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया कि बदलते मौसम के साथ दुनिया कितनी तैयार है।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

CJP प्रोपेगेंडा आपकी टाइमलाइन तक कैसे पहुँच रहा? समझिए Meta का एल्गोरिदम और मॉडरेशन कैसे साध रहे ग्लोबल लेफ्ट का नैरेटिव

CJP के प्रदर्शन से जुड़े Videos और पोस्ट Meta का एल्गोरिदम कैसे लोगों के फीड तक पहुँचा रहा है, जिन्होंने फॉलो नहीं किया, वो भी इनको देख रहे।

हर दिन नई माँग, हर जवाब पर नई शर्त: राहुल गाँधी ने प्रोटेस्ट के नाम पर शुरू किया प्रोपेगेंडा, अपने ‘पेपर लीक’ इतिहास का...

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने छात्रों की माँग का समर्थन करते हुए पीसी किया और पीएम मोदी ने माफी की माँग की। लेकिन कॉन्ग्रेस राज में पेपर लीक पर कभी किसी ने इस्तीफा नहीं दिया।
- विज्ञापन -