दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के करीब 6 वर्ष बाद अंकित शर्मा की हत्या के मामले में AAP के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन सहित 5 लोगों को कड़कड़डूमा कोर्ट द्वारा दोषी करार दिए जाने के बाद ऑपइंडिया की टीम दिल्ली के चाँद बाग स्थित उस गली में पहुँची जहाँ अंकित शर्मा का परिवार रहता था।
60 फुटा रोड के अंदर जाकर अंकित शर्मा के घर पहुँचने से पहले हमारी मुलाकात घर के दरवाजे पर बैठे एक बुजुर्ग से हुई और हमारे पूछने पर उन्होंने अंकित शर्मा के घर का पता तो बता दिया, लेकिन इसके आगे हमने उनसे अंकित शर्मा और उनके परिवार के बारे में जानने की कोशिश की तो वह कुछ देर चुप रहकर बोले कि आपको क्या करना है?
कोर्ट के फैसले पर मैंने उनकी टिप्पणी ली तो उन्होंने कहा कि यह बहुत अच्छा हुआ है क्योंकि एक निर्दोष (अंकित शर्मा) की हत्या हुई थी और इनको (ताहिर हुसैन सहित सभी दोषियों को) तभी फाँसी की सजा हो जानी चाहिए थी। वह आगे दंगों के बारे में बताते हैं, “उस समय बुजुर्ग होने के कारण हम तो घर से बाहर नहीं निकले लेकिन यहाँ जितने भी मुसलमान हैं, वो इधर आ रहे थे, बहुत भयानक मंजर था। माहौल इतना खतरनाक था कि यहाँ लोगों को अपनी जान बचाना मुश्किल हो रहा था। वह तो अच्छा हुआ कि दूसरी तरफ से गुर्जर समाज के बड़ी संख्या में लोग आ गए। तब जाकर वह लोग भागे। वरना पता नहीं उस घटना में कितने लोग मारे जाते।”
अंकित शर्मा के घर में 5 वर्ष से रह रहे किराएदार
बातचीत के बाद हम एक संकरी सी गली में प्रवेश करते हुए आगे बढ़ गए। हम अंकित शर्मा के मकान वाली गली में पहुँच गए। दरवाजे के अंदर घर में पोंछा लगा रही एक महिला से हमने अंकित शर्मा के घर के बारे में पूछा तो उन्होंने बिना बोले इशारा करते हुए बगल में उनके घर के बारे में बता दिया। इससे पहले कि हम और कुछ पूछते उन्होंने अपने घर का दरवाजा बंद कर लिया। इसके बाद हमने आगे बढ़कर देखा तो नजर आया कि अंकित शर्मा के घर का दरवाजा बंद है। हमने एक शख्स ने ताहिर हुसैन को दोषी ठहराए जाने को लेकर बात करने की कोशिश की लेकिन वो शांत ही रहे।
हमने घंटी बजाई और अंकित शर्मा के घर से एक बच्चा व एक महिला सामने आए लेकिन महिला ने कैमरा देखते ही अपना चेहरा गेट के पीछे छिपा लिया और हमसे किसी भी तरह की बातचीत करने से मना कर दिया। हमारे पूछने पर उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि अंकित का परिवार अब यहाँ नहीं रहता और हम करीब 5 सालों से किराएदार के रूप में यहाँ रह रहे हैं।
‘अब मुसलमानों से उठ गया भरोसा, नहीं करते दोस्ती’
इस बीच गली से गुजर रहीं राजवती नाम की एक महिला से हमारी मुलाकात हुई। तो हमने उनसे दंगों के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि दंगों के समय में यहीं अपने घर पर ही थी। हमारा घर ताहिर हुसैन के ठीक पीछे है। उन्होंने हमें बताया, “ताहिर की छत से आग (पेट्रोल बम) फेंकी जा रही थी। नीचे गाड़ियाँ जल रहीं थीं। हमें डर था कि अगर हमारे घर (घनी आबादी) की तरफ अगर आग फेंकी गई तो सब कुछ बर्बाद हो जाएगा। मुसलमान इकट्ठा होकर ईंट-पत्थर बरसा रहे थे। दंगाइयों की भीड़ इतना थी कि हिंदू चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे।”
अंकित शर्मा के बारे में राजवती कहती हैं कि वह हमारा ही पड़ोसी था। तभी ड्यूटी से आया था और फिर घर पर बैग रख वापस चला गया। वो बताती हैं, “उसने माँ के कहने पर चाय भी नहीं पी थी। तभी उसे बड़ी बिल्डिंग के सामने मुसलमान की भीड़ ने घर लिया और फिर वह कभी वापस घर नहीं लौटा। इसके घर हमारा खूब आना-जाना था। वह बहुत अच्छा लड़का था।”
राजवती आगे कहती हैं कि उन दंगों के बाद से इलाके के लोगों में इतना डर है कि लोग अपने मकान और दुकान बेचकर जा रहे हैं। अब सामने रोड पार वाला इलाका पूरा मुस्लिम हो चुका है।
उन्होंने आगे कहा, “यह लोग कसाई हैं और घरों में बकरा काटता हैं तो ऐसे ही उनके बच्चे हो जाते हैं। इसीलिए ये लोग सबसे पहले अपने दोस्त को ही मार देते हैं और हिंदुओं में हमसे कोई अनजाने में जीव जंतु की हत्या हो जाती है तो हम (हिंदू) उसके लिए एकादशी का व्रत रखते हैं। मुसलमानों से दोस्ती करना बिल्कुल ठीक नहीं है। मैं खुद और अपने बच्चों को भी इनसे दूर रखती हूँ। इनके अंदर इंसानियत नहीं है और ये लोग अब भरोसे के लायक नहीं है।”
ताहिर हुसैन दोषी उसने ही कराए दंगे: विष्णु शर्मा
उसी गली में रहने वाले विष्णु शर्मा कोर्ट के फैसले कहते हैं कि ताहिर हुसैन दोषी है उसने ही दंगे कराए थे। वे बताते हैं, “उस समय बहुत बुरा हाल था। यहाँ पेट्रोल बम फेंके जा रहे थे और हमारे भाई अंकित शर्मा को घर के अंदर ले जाकर मार दिया था और फिर नाले में फेंक दिया था। वह बहुत अच्छे इंसान थे। भगवान का शुक्र है कि हम उस घटना में जिंदा बच गए। उस समय हमने मौत को बेहद करीब से देखा था।”
इसके बाद हम उस नाले तक भी पहुँचे, जिसमें अंकित शर्मा का शव मिला था लेकिन आज भी वह नाला गंदगी से भरा हुआ है। रोड पार मूँगा नगर में रहने वाले एक व्यक्ति ने कहा कि हम ताहिर हुसैन को लेकर कुछ नहीं कह सकते। अंकित शर्मा के बारे में भी हमें बाद में पता चला था लेकिन उन दंगों में ऐसे न जाने कितने अंकित शर्मा मारे गए थे। कहने के लिए 56 लोग मारे गए लेकिन यहाँ सैकड़ों लोग मारे गए थे।
सीता निवास, श्रीराम निवास, मुन्नी निवास में अब रह रहे अब्दुल और सलीम
कोर्ट के फैसले पर माथे पर तिलक लगाए एक अन्य युवक ने कहा कि ताहिर हुसैन ने जो किया है वह उसे भुगतना पड़ेगा। हैरानी मुझे इस बात की है कि ताहिर हुसैन को दोषी बताने में कोर्ट को 6 वर्ष क्यों लग गए। युवक ने कहा, “उस घटना के बाद इलाके में डर का माहौल इस तरह है कि आज भी मकानों पर नेम प्लेट तो सीता निवास, श्रीराम निवास, मुन्नी निवास लिखा हुआ है लेकिन उसमें रहने वाला अब कोई अब्दुल या सलीम ही है। जब से दिल्ली में भाजपा की सरकार आई है तब से यहाँ सुरक्षा का माहौल है लेकिन हिंदुओं का पलायन बंद नहीं है।”
ताहिर हुसैन के घर के सामने गुटखा-सिगरेट की छोटी सी दुकान लगाने वाली सरस्वती कहती हैं कि वह 15 साल से यह दुकान लगा रही हैं और घटना वाले दिन वह दुकान पर ही थी। वह बताती हैं, “अचानक से ईंट-पत्थर बरसने शुरू हो गए। चार नंबर गली से इसकी शुरुआत हुई थी। हम कैसे भी अपनी जान बचाकर भागे लेकिन बाद में पता चला कि हमारी भी दुकान को जला दिया गया है।”
वह ताहिर हुसैन के घर की ओर इशारा करते हुए कहती हैं कि दंगाइयों ने अंकित शर्मा को इसी मकान में खींचकर मारा था। उन्होंने कहा, “वह हमारी दुकान पर आता था। वह इतना सुंदर था कि उसका चेहरा आज भी मेरी नजर से नहीं हटता है।”
जिस मंदिर पर चढ़े थे दंगाई उसके पुजारी ने बात करने से किया इंकार
इसके बाद हम ताहिर हुसैन के सामने वाली उस गली में मौजूद शिव मंदिर पर पहुँचे जिसे दंगाइयों ने अपना निशाना बनाया था। वहाँ मौजूद मंदिर के पुजारी ने हमसे कैमरे पर बातचीत करने से मना कर दिया। इसके बाद वहाँ मौजूद वीरेंद्र शर्मा नाम के शख्स ने बताया कि उनका मकान मंदिर के बगल में है और दंगे वाले दिन यहाँ बहुत भयानक मंजर था। उन्होंने कहा, “मैंने मौतें होते देखीं, खून देखा, गोलियाँ चलते देखीं, पेट्रोल बम चलते देखे। चार दिन तक गली में लाइट नहीं आई थी।”
उस भयावह मंजर को याद कर वे आगे बताते हैं, “हमें खाना तक नसीब नहीं हुआ था। हर दिन दोपहर 2 बजे के बाद दंगा शुरू होता था क्योंकि मस्जिद से नमाज पढ़ने का बाद बड़ी संख्या में लोग निकलते थे। मेरी दो गाड़ियों को लगा दी गई थी, दंगाई मंदिर की छत पर चढ़ गए थे। मैंने अपने परिवार को बचाने के लिए उन्हें रातों-रात रिश्तेदार के यहाँ भेज दिया। उस घटना से आज भी लोग इतने डरे हुए हैं कि अपना मकान बेचकर यहाँ से पलायन कर रहे हैं।”
बहरहाल, दिल्ली के चाँद बाग इलाके में हुए हिंदू विरोधी दंगों का खौफ आज भी हिंदुओं के दिमाग में बैठा हुआ है। इस बात का अंदाजा आप ऐसे लगा सकते हैं कि यहाँ से न सिर्फ हिंदू पलायन कर रहे हैं बल्कि यहाँ रहने वाला हिंदू आज भी ताहिर हुसैन के बारे में कैमरे पर खुलकर बोलने के लिए तैयार नहीं है लेकिन ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठा। वह ये कि जिस ताहिर हुसैन की बहु-मंजिला इमारत को मैंने 6 वर्ष पूर्व दंगाइयों के केंद्र में देखा था।
वह इमारत ताहिर हुसैन के दोषी घोषित होने के बाद आज भी न सिर्फ खड़ी हुई है बल्कि उसमे कई छोटी मोटी फैक्ट्रियाँ संचालित होने के साथ ही उसमें कई लोग किराएदार रहते हैं। जबकि हमने इसके उलट यूपी में दंगाइयों की संपत्ति को बुलडोज होते देखा है और यह भी देखा है कि यूपी पुलिस कैसे दंगाइयों को घुटनों पर लाती है। यह हम सबने देखा है।


