दिल्ली हाई कोर्ट ने 16 जुलाई 2026 को पिछले साल सीमापुरी में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की कवरेज के दौरान पत्रकारों पर हुए हमले के मामले में आरोपित आबिद अली और फुरकान को जमानत दे दी।
बता दें कि 04 जुलाई 2025 को रिपोर्टर सुप्रिया पाठक और उनके कैमरामैन श्याम पर उस समय बेरहमी से हमला किया गया था, जब वे सीमापुरी इलाके में सरकारी जमीन पर बने अवैध अतिक्रमण और झुग्गियों की रिपोर्टिंग कर रहे थे। यह इलाका सीमापुरी थाना क्षेत्र में आता है।
पीड़ितों के अनुसार, बुर्का पहने महिलाओं और नाबालिग लड़कों की भीड़ ने उन पर हमला कर दिया। दोनों को बुरी तरह पीटा गया और उनके कैमरे सहित अन्य सामान, नकदी और निजी सामान भी छीन लिया गया। ऑपइंडिया से बातचीत में सुप्रिया पाठक और श्याम ने बताया था कि भीड़ ने उन्हें अलग-अलग घेरकर हमला किया। उन्होंने कहा कि उन पर पथराव किया गया और बेल्ट से भी मारा गया। हमले के दौरान दोनों अपनी जान बचाकर वहाँ से निकलने की कोशिश करते रहे।
इस मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस की सिंगल बेंच ने की। सुनवाई के दौरान आरोपित आबिद अली ने कोर्ट में कहा कि वह उस बस के अंदर नहीं गया था, जिसमें हमला होने के बाद दोनों पत्रकार अपनी जान बचाने के लिए छिपे थे। उसने अपने बचाव में यह भी दावा किया कि उसकी अम्मी ने उसे बस में चढ़ने से रोक दिया था।
दिलचस्प बात यह है कि आबिद अली के वकील ने यह भी दलील दी कि पीड़ित किसी ‘बड़े या स्थापित मीडिया संस्थान’ से नहीं जुड़े थे, बल्कि केवल एक ‘यूट्यूब चैनल के लिए फ्रीलांस रिपोर्टिंग’ कर रहे थे। वहीं दूसरे आरोपित फुरकान ने कोर्ट में दावा किया कि घटना के समय वह मौके पर मौजूद ही नहीं था। उसके वकील ने यह भी कहा कि दोनों पत्रकारों को केवल ‘मामूली चोटें’ आई थीं।
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले के चार अन्य आरोपितों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। आबिद अली और फुरकान ही ऐसे आरोपित थे, जो 05 जुलाई 2025 से जेल में बंद थे।
सुनवाई के दौरान जाँच अधिकारी और सब इंस्पेक्टर वीरेंद्र कुमार कोर्ट में मौजूद नहीं थे। साथ ही चार्जशीट में भी कुछ ‘विसंगतियाँ’ थीं, जैसे फुरकान द्वारा पहनी गई शर्ट के रंग को लेकर अलग-अलग जानकारी दी गई थी। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जस्टिस गिरीश कठपालिया ने आबिद अली और फुरकान को ₹10 हजार के निजी मुचलके पर जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा, “किसी भी आरोपित को बिना वजह अनिश्चित समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता।”
सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने कोर्ट से कहा कि आबिद अली और फुरकान को जमानत नहीं दी जानी चाहिए। उनका कहना था कि दोनों आरोपितों ने उस समय पत्रकारों पर हमला किया, जब वे भीड़ से बचकर वहाँ से निकलने की कोशिश कर रहे थे।
सुनवाई के दौरान जस्टिस गिरीश कठपालिया ने इस बात पर भी चर्चा की कि किसी व्यक्ति को ‘पत्रकार’ किस आधार पर माना जा सकता है। यह चर्चा ऐसे मामले में हुई, जिसमें दो रिपोर्टरों पर हिंसक भीड़ द्वारा हमला किए जाने का आरोप है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “मामला संवेदनशील था। इसके बावजूद शिकायतकर्ताओं ने रिपोर्टिंग शुरू करने से पहले स्थानीय पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी। हालाँकि, इससे उन पर हुए हमले को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन अभियोजन पक्ष ने यह तर्क दिया है कि यह हमला प्रेस की आजादी पर हमला था, इसलिए इस पहलू पर भी विचार करना जरूरी है।”
इसके बाद जस्टिस कठपालिया ने अपने फैसले में करीब तीन पन्नों तक भारतीय मीडिया की मौजूदा स्थिति पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी स्पष्ट नियम और संगठन के काम कर रहा है। उन्होंने अपने आदेश में लिखा, “आज के समय में मोबाइल फोन और माइक्रोफोन रखने वाला लगभग कोई भी व्यक्ति खुद को ‘रिपोर्टर’ बता सकता है।”
जस्टिस कठपालिया ने आगे कहा कि ‘खुद को पत्रकार’ बताने वाले कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो लोगों के सामने अचानक माइक्रफोन लेकर पहुँच जाते हैं। और अगर सामने वाला व्यक्ति उनके सवालों का जवाब नहीं देता, तो वे यह कहने लगते हैं कि ‘वह सवालों से बच’ रहा है। जस्टिस ने दावा किया कि इस तरह की रिपोर्टिंग से जनता के बीच ‘गुमराह करने वाली धारणा’ बनती है और लोगों पर ‘बेवजह दबाव’ पड़ता है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में आगे कहा, “इतनी ही चिंता की बात यह भी है कि मीडिया का एक वर्ग चुनिंदा रिपोर्टिंग, सनसनी फैलाने वाली खबरों या बिना पुष्टि वाले आरोपों के जरिए किसी खास सामाजिक समूह को निशाना बनाता है या उसकी छवि खराब करता है।” कोर्ट ने कहा कि ऐसी रिपोर्टिंग से समाज में विभाजन बढ़ सकता है, सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है और कानून-व्यवस्था की स्थिति भी बिगड़ सकती है।
यह ध्यान देने वाली बात है कि यह मामला सीमापुरी में सरकारी जमीन पर हुए अवैध अतिक्रमण की रिपोर्टिंग से जुड़ा है। रिपोर्टर सुप्रिया पाठक और उनके कैमरामैन श्याम इसी विषय पर रिपोर्टिंग कर रहे थे, जब उन पर हमला हुआ था। अब, हमले का शिकार हुए इन पत्रकारों के मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ‘पत्रकारिता की नैतिकता’ और मीडिया की भूमिका पर भी टिप्पणी की, जबकि इसी मामले में हिंसा के आरोपितों को जमानत भी दे दी गई।
इस फैसले में कोर्ट का लहजा जरूरत से ज्यादा उपदेश देने वाला और संरक्षणवादी नजर आता है। ऐसा भी लगता है कि कहीं न कहीं पीड़ितों पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि कोर्ट ने इसी मामले के जरिए पत्रकारों के लिए नया नियामक ढाँचा बनाने की बात भी कही।
जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा, “अब समय आ गया है कि संसद ऐसा कानून बनाने पर विचार करे, जिससे प्रेस की आजादी बनी रहे, लेकिन साथ ही पत्रकारों की जवाबदेही, पेशेवर नैतिकता, कानून का सम्मान, नागरिकों के अधिकार और जनहित भी सुरक्षित रहें।”
इस मामले में अब सभी आरोपित जमानत पर बाहर हैं। वहीं जिन पत्रकारों पर हमला हुआ था, उन्हें एक साल बाद कोर्ट में ‘यूट्यूब चैनल के लिए काम करने वाले फ्रीलांसर’ के रूप में पेश किया गया, जिससे उनकी पत्रकारिता की पहचान और भूमिका पर सवाल खड़े होने की बात कही गई है।
नूपुर शर्मा केस की याद दिलाता मामला
यह पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने हिंसा करने वालों की जिम्मेदारी तय करने के बजाय पीड़ित पक्ष पर ही सवाल उठाए हों। जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा को पैगंबर मोहम्मद पर की गई उनकी टिप्पणी को लेकर कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा था कि उदयपुर में हुई नृशंस हत्या जैसी घटनाओं के लिए उनकी टिप्पणियाँ जिम्मेदार हैं और उन्हें ‘पूरे देश से माफी माँगनी चाहिए।’
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने कहा था, “जिस तरह इन्होंने पूरे देश में लोगों की भावनाएँ भड़काई हैं, उसके लिए यही अकेले जिम्मेदार हैं। देश में जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए यही महिला जिम्मेदार है।”
नुपुर शर्मा को जिम्मेदार ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस्लामी कट्टरपंथियों की ओर से की गई हिंसा और नफरत को नजरअंदाज कर दिया था। जबकि नुपुर शर्मा ने केवल वही बातें कही थीं, जिनका उल्लेख इस्लामी हदीसों में मिलता है और जिन्हें दुनिया भर के कई इस्लामी स्कॉलर भी स्वीकार करते हैं।
एक धर्मनिर्पेक्ष और लोकतांत्रिक देश की सर्वोच्च अदालत, जिससे निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की उम्मीद की जाती है, उसने उस समय ऐसा रुख अपनाया जो मध्यकालीन चर्च के मुकदमों की याद दिलाता है। दिल्ली हाई कोर्ट का हालिया फैसला भी इस मामले से अलग नहीं है।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)


